Ramadan 2026: रमज़ान का पवित्र महीना चल रहा है. मुसलमानों के लिए यह महीना इबादत, सब्र, आत्मसंयम और रहमत का महीना है. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे महीने में की गई इबादत का सवाब (पुण्य) बाकी महीनों में की गई इबादतों से अधिक मिलता है.
रमज़ान में रोज़ेदार भूखे-प्यासे रहकर रोज़े रखता है. रमज़ान में में रोज़ा रखना इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक बताया गया है.
इस्लामिक जानकारों के अनुसार, रमज़ान केवल भूखे-प्यासे रहने का महीना भर नहीं है, बल्कि यह महीना आत्मशुद्धि और नेकी बढ़ाने का माह माना जाता है. रमज़ान में सिर्फ सहरी और इफ्तार भर नहीं होता है, बल्कि इस पूरे महीने रोज़ेदार हर चीज को लेकर संयम बरतता है और इस महीने के रहन-सहन को पूरे साल अपनाने का वादा करते हैं. ये भी मान्यता है कि रोज़ा रखने वाले शख्स को सिर्फ अपनी भूख और प्यास पर कंट्रोल नहीं करना होता है बल्कि न अपने मुंह से कोई गलत बात कहनी होती है, न गलत बात सुननी होती है और न ही किसी तरह का कोई गलत काम करना होता है. यहां तक कि किसी के बारे में बुरा सोचना और किसी को बुरी नजर से देखने की भी पाबंदी होती है. यानी मोटे तौर पर कहा जाए तो जो मान्यता है, उसे अगर पूरी तरह कोई माने तो समझ लीजिए वो बेहतर इंसान की बन जाता है. कुछ पॉइंट्स के जरिए समझते हैं कि रमज़ान के दौरान 24 घंटे रोज़ेदार की जिंदगी कैसी होती है?
रोज़ेदार की 24 घंटे की दिनचर्या
सहरी: रोज़ेदार 24 घंटे में भोर में सूर्योदय (फज्र की नमाज) से लगभग एक घंटा उठकर भोजन (सहरी) करते हैं. इसके बाद सूर्यास्त तक वह बिना पानी-खाने के रहते हैं और रोजा रखते हैं. इस दौरान वह कुरान, नमाज की पाबंदी करते हैं और अल्लाह से दुआ मांगते हैं.
रोजा: रोजे के दौरान रोज़ेदार भोजन ही नहीं, बल्कि पेय, धूम्रपान और बुरे कामों से पूरी तरह से बचते हैं.
इबादत: रोज़ेदार पांच वक्त फज्र, जोहर, असर, मगरिब, इशा की नमाज पढ़ते हैं. कुरान पढ़ते हैं. इस पाक महीने में रोज़ेदार अल्लाह से अपने किए गए गुनाहों की मांफी मांगते हैं. साथ ही इस महीने में एक खास नमाज तारावीह भी पड़ी जाती हैं, जो इशा की नमाज के बाद होती हैं.
इफ्तार: सूर्यास्त के बाद मगरिब की अजान के साथ रोज़ेदार रोजा खोलते हैं. इसे ही इफ्तार करना कहा जाता है. यानी दिनभर भूखा-प्यासा रहने के बाद लोग अच्छे से खाते-पीते हैं. खाने-पीने के बाद जबतक कोई व्यक्ति आराम करने का सोचता है तब तक दिन की आखिरी नमाज का वक्त हो जाता है और ये नमाज आम नमाज से अलग और बड़ी होती है.
तरावीह: रात में करीब 8 बजे या इसके बाद से इशा की नमाज होती है. इस नमाज में तो पूरे साल की तरह 15-20 मिनट ही लगते हैं लेकिन इसके साथ तुरंत ही रमजान में पढ़ी जाने वाली तरावीह नमाज भी पढ़ी जाती है. इस नमाज में कुरान का पाठ किया जाता है. आमतौर पर डेढ़-दो घंटे इसमें लग जाते हैं. इमाम कुरान पढ़ते हैं और नमाजी उनके पीछे खड़े होकर सुनते हैं. यानी दिनभर रोज़े की थकान के बाद रात में ये एक बड़ी नमाज होती है. इस नमाज के बाद आमतौर पर सोते-सोते रात के 11-12 बज जाते हैं. फिर सुबह 4 बजे से सहरी के लिए जगना शुरू हो जाता है. महिलाओं के लिए ये महीना और भी चुनौतीपूर्ण रहता है. एक तो बिना नमक-मिर्च चेक किए उन्हें खाना बनाना पड़ता है. उनका काफी वक्त किचन में गुजर जाता है क्योंकि रमजान में आमतौर पर कई तरह की डिश बनती हैं. दूसरी तरफ, घर के बाकी काम और बच्चों को भी संभालना होता है. अगर कोई महिला वर्किंग हो तो उसके लिए और ज्यादा मुश्किल हो जाती है.
दान-पुण्य और नेकी का काम: इस पवित्र महीने में रोज़ेदार दान करते हैं. जरूरतमंदों की मदद करते हैं. नेकी यानी अच्छा काम करते हैं. आत्म-अनुशासन पर विशेष जोर देते हैं. इस्लाम धर्म में जकात (दान) देना हर संपन्न व्यक्ति के ऊपर फर्ज है, हर साल रमजान के दौरान अपनी कुल कमाई का कम से कम 2.5 फीसद मुसलमानों को दान में देना ही होता है.



