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गणगौर पर्व: पार्वतीजी की पूजा और उसकी महिमा…

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गणगौर का महत्व

गणगौर पर्व विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए मनाया जाता है, जबकि पुरुषों के लिए इस व्रत की पूजा देखना भी वर्जित है। यह पर्व गणगौर पार्वतीजी की पूजा और उनकी शोडषोपचार आराधना का अवसर है, लेकिन यह एक सामाजिक उत्सव का रूप भी धारण कर चुका है।

गणगौर के अवसर पर विशेष रूप से मैदा के गुने बनाए जाते हैं। विवाह के बाद पहली बार, नवविवाहिता अपने मायके में गणगौर मनाती है और इन गुने तथा सास के कपड़ों का वायना अपने ससुराल भेजती है। यह परंपरा पहले वर्ष में होती है, जबकि बाद में हर साल गणगौर ससुराल में मनाई जाती है। ससुराल में बहु गणगौर का आयोजन करती है और अपनी सास को वायना, कपड़े और सुहाग का सामान भेंट करती है। इसके साथ ही, सोलह सुहागिन ब्राह्मणियों को भोजन कराकर उन्हें श्रृंगार की वस्तुएं और यथाशक्ति दक्षिणा दी जाती है। इस विधि में समय और स्थान के अनुसार कुछ भिन्नता हो सकती है, लेकिन मूल विधान यही रहता है।

गणगौर पूजा की विधि

गणगौर के दिन, पार्वतीजी की प्रतिमा या चित्र की पूजा नहीं की जाती, बल्कि बालू से गौराजी की मूर्ति बनाकर पूजा का विधान है। पूजा से पहले महिलाएं सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनकर संपूर्ण श्रृंगार करती हैं। घर के किसी पवित्र स्थान पर चौबीस अंगुल चौड़ी और लंबी वर्गाकार वेदी बनाकर हल्दी, चंदन, कपूर, और केसर से सजाया जाता है। इस चौक पर बालू से गौरी की प्रतिमा बनाकर उस पर सुहाग की सभी वस्तुएं, कांच की चूड़ियां, महावर, सिंदूर, और रोली चढ़ाई जाती हैं। गौरी की इस प्रतिमा को फल-फूल और नैवेद्य अर्पित करते हुए पूर्ण श्रद्धा से पूजा की जाती है। पार्वतीजी की पूजा के बाद महिलाएं अपनी मांग में चढ़ाए गए सिंदूर को भरती हैं। पूजा दोपहर में होती है और इसके बाद भोजन किया जा सकता है, लेकिन पूरे दिन में एक बार ही भोजन करने का विधान है। कई नगरों में इस दिन दोपहर के समय गौराजी के जलूस भी निकाले जाते हैं।

गणगौर की कथा

कथा

प्राचीन काल में, भगवान शिवजी, पार्वतीजी और नारदजी भ्रमण पर निकले। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी। गांव वालों ने जब सुना कि भगवान शिवजी पार्वतीजी के साथ आए हैं, तो कुलीन स्त्रियों ने उनके पूजन के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने की तैयारी की। इसी तैयारी में उन्हें देर हो गई। निम्न वर्ग की स्त्रियां जैसे थीं, वैसे ही हल्दी-चावल लेकर शिव-पार्वती के पास पहुंच गईं। पार्वतीजी ने उनकी पूजा स्वीकार की और उन पर सुहाग रस छिड़क दिया, जिससे वे अटल सौभाग्य प्राप्त कर लौट गईं। कुछ समय बाद, उच्च कुल की नारियां सोलह श्रृंगार और पूजा की सामग्रियों के साथ आईं। शिवजी ने पार्वतीजी से कहा कि उन्होंने साधारण स्त्रियों में सुहाग रस बांट दिया, अब उच्च कुल की नारियों को क्या देंगी? पार्वतीजी ने उत्तर दिया कि वे अपनी अंगुली चीरकर अपना रक्त का सुहाग रस देंगी। इस प्रकार, जो भी उच्च कुल की स्त्रियों पर यह रस पड़ेगा, वह अटल सौभाग्यवती रहेगी।