भारत की ऊर्जा सुरक्षा की नई चुनौती
रूस और ईरान से मिली छूट का अंत; भारत का अगला कदम क्या होगा?
भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक नई चुनौती उत्पन्न हो गई है, क्योंकि अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को समाप्त कर दिया है।
यह छूट मुख्य रूप से ओमान की खाड़ी में वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण दी गई थी।
प्रतिबंधों की समयसीमा
अमेरिका के ट्रेजरी विभाग के अनुसार, तेल आयात के लिए लागू ‘जनरल लाइसेंस’ अब समाप्त हो रहे हैं। रूस से तेल आयात पर जो छूट 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हुई, वहीं ईरान के तेल कार्गो के लिए दी गई छूट 19 अप्रैल 2026 को खत्म होगी। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि इन छूटों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा, क्योंकि इनका उद्देश्य केवल संकट के समय फंसे हुए तेल की निकासी करना था।
भारत के लिए नए तेल स्रोत
रूस और ईरान पर बढ़ते दबाव के चलते, भारत अब 40 से अधिक देशों से तेल खरीदने की योजना बना रहा है। भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, भारत गुयाना, ब्राजील, कोलंबिया और इक्वाडोर जैसे देशों से अपनी आपूर्ति बढ़ा रहा है, विशेष रूप से गुयाना से रिकॉर्ड स्तर पर खरीददारी कर रहा है। अमेरिका भी भारत के लिए शेल तेल का एक प्रमुख और विश्वसनीय सप्लायर बना रहेगा। इसके अलावा, भारत ने मध्य-पूर्व देशों पर निर्भरता कम करने के लिए नाइजीरिया और अंगोला जैसे पश्चिम अफ्रीकी देशों से तेल आयात बढ़ाने का निर्णय लिया है। पारंपरिक सप्लायर्स में इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) शामिल हैं, हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य के विकल्प पर चर्चा जारी है।
अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी और ईरानी तेल की कमी से भारतीय रिफाइनरियों के मार्जिन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे महंगाई में वृद्धि हो सकती है। हालांकि, भारत सरकार का दावा है कि वर्तमान में देश के पास कम से कम आठ हफ्तों का पर्याप्त तेल स्टॉक उपलब्ध है और वैकल्पिक व्यवस्थाएं पूरी तरह से सक्रिय हैं।



