असम की राजनीति में ‘जालुकबारी’ महज एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि सत्ता के रसूख और बदलाव की एक जीवित कहानी है। गुवाहाटी के प्रवेश द्वार पर स्थित यह इलाका इन दिनों फिर से चर्चा के केंद्र में है।
यहां की फिजाओं में न केवल ब्रह्मपुत्र की लहरें उठती हैं, बल्कि चार दशकों की वह सियासी विरासत भी शामिल है जिसने असम का भविष्य तय किया है।
आगामी 2026 विधानसभा चुनाव के करीब आते ही सबकी नजरें इस हॉट सीट पर टिकी हैं। यहां सूबे के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा अपनी साख और विकास के दावों के साथ एक बार फिर चुनावी समर में उतरने जा रहे हैं।
एक ही सीट पर गुरु-चेले की दिलचस्प सियासी जंग
जालुकबारी का राजनीतिक इतिहास किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। पिछले 40 से अधिक वर्षों से इस सीट पर ‘गुरु-चेले’ की जोड़ी- भृगु कुमार फुकन और हिमंत बिस्वा सरमा का दबदबा रहा है। भृगु फुकन, जो असम समझौते के हस्ताक्षरकर्ता और राज्य के पूर्व गृह मंत्री थे, ने ही हिमंत को राजनीति की बारीकियां सिखाई थीं।
समय का चक्र ऐसा घूमा कि दोनों के रास्ते अलग हो गए और उन्होंने दो बार आमने-सामने चुनाव लड़ा। 1996 में गुरु फुकन ने अपने शिष्य को मात दी, लेकिन 2001 में हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस के टिकट पर अपने ही गुरु को हराकर राजनीतिक गुरु-दक्षिणा दी। तब से लेकर आज तक हिमंत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।
कांग्रेस से भाजपा तक का सफर
हिमंत बिस्वा सरमा ने इस सदी की शुरुआत के साथ ही जालुकबारी में अपनी जीत का सिलसिला शुरू किया था। उन्होंने लगातार तीन बार- 2001, 2006 और 2011 में कांग्रेस की तरफ से जीत दर्ज की। हालांकि, 2015 में पार्टी नेतृत्व से मतभेदों के चलते उन्होंने पाला बदला और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए।
दिलचस्प बात यह है कि दल बदलने के बावजूद जनता का उन पर भरोसा कम होने के बजाय और बढ़ गया। 2016 में उनकी जीत का अंतर करीब 85,000 वोटों का था, जो 2021 तक आते-आते एक लाख के पार पहुंच गया। यह आंकड़े बताते हैं कि जालुकबारी की जनता के लिए उम्मीदवार की अपनी एक अलग पहचान है।
बदलती जालुकबारी की तस्वीर कैसी है?
जालुकबारी केवल चुनाव और नारों के लिए ही नहीं जानी जाती। यह असम की शिक्षा और ज्ञान का एक बड़ा केंद्र भी है। यहां गोहाटी विश्वविद्यालय, असम इंजीनियरिंग कॉलेज और कई बड़े शोध संस्थान मौजूद हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित इस निर्वाचन क्षेत्र का शहरीकरण बहुत तेज़ गति से हुआ है। आधुनिक अपार्टमेंट, मॉल और सरायघाट पुल के साथ बेहतर कनेक्टिविटी ने इसकी शक्ल बदल दी है।
वोटरों की संख्या में भी यहां निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। 2011 में यहां लगभग 1.67 लाख मतदाता थे, जो 2026 तक बढ़कर 2.06 लाख से अधिक हो चुके हैं। यहाँ के मतदाता जागरूक हैं और मतदान के प्रति उनका उत्साह हमेशा से ही जबरदस्त रहा है।
हिमंत के सामने इस बार कौन?
जैसे-जैसे 2026 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, जालुकबारी में एक बार फिर पुराने प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने होंगे। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा अपनी छठी जीत की तलाश में हैं, जबकि उनके सामने कांग्रेस समर्थित विपक्षी गठबंधन ने रोमन चंद्र बोरठाकुर को उतारा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री के रूप में सरमा का मजबूत नेतृत्व और गुवाहाटी में हुए विकास कार्य इस सीट को भाजपा के लिए एक ‘सेफ बेट’ यानी सुरक्षित दांव बनाते हैं। हालांकि, विपक्ष ने इसे एक बड़ी चुनौती के रूप में लिया है। क्या 2026 में भी यह मुकाबला एकतरफा रहेगा या लोकतंत्र कोई नया मोड़ लेगा, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।



