अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने वैश्विक स्तर पर महंगाई और ईंधन संकट को जन्म दिया है। यह संघर्ष अब अपने पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर चुका है, और इसका सबसे गंभीर प्रभाव डीजल की कीमतों पर पड़ा है।
कई देशों में डीजल की कीमतें 81 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जिससे आम जनता का बजट प्रभावित हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें 116 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट और तेल टैंकरों पर हमलों के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। एशिया, अफ्रीका और पश्चिमी देशों में डीजल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है।
युद्ध का वैश्विक प्रभाव
28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान द्वारा किए गए मिसाइल हमलों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। इससे कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आई और क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं। चूंकि पेट्रोल और डीजल कच्चे तेल से बनते हैं, इसलिए इनकी कीमतों में भी वृद्धि हो रही है।
एशियाई देशों में डीजल की कीमतों में वृद्धि
एशियाई देशों पर इस संकट का सबसे अधिक असर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, फिलीपींस में डीजल की कीमतें युद्ध के आरंभ के बाद 81.6 प्रतिशत बढ़ गई हैं। मलेशिया में डीजल की कीमतें 57.9 प्रतिशत, जबकि वियतनाम में 45.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सिंगापुर में 44 प्रतिशत, चीन में 25.4 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में 15.1 प्रतिशत और जापान में 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विकासशील देशों की स्थिति
कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी इस संकट से प्रभावित हुई हैं। नाइजीरिया में डीजल की कीमतों में 78.3 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। श्रीलंका में डीजल 37.2 प्रतिशत महंगा हो चुका है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों में भी ईंधन संकट गहरा गया है।
उत्तर अमेरिका और यूरोप में कीमतों में वृद्धि
उत्तर अमेरिका और यूरोप भी इस संकट से अछूते नहीं रहे हैं। अमेरिका में डीजल की कीमतें 41.2 प्रतिशत बढ़ गई हैं। कनाडा में यह वृद्धि 36.9 प्रतिशत, जर्मनी में 30.9 प्रतिशत, फ्रांस में 27.8 प्रतिशत, ब्रिटेन में 18 प्रतिशत और इटली में 14.9 प्रतिशत है। यूक्रेन में भी डीजल की कीमतें 33.9 प्रतिशत बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों में महंगाई का खतरा और बढ़ गया है।



