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भारत के लिए कलपक्कम रिएक्टर कैसे बनेगा गेम चेंजर? जिसने रच दिया इतिहास…

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तमिलनाडु के कलपक्कम में बना प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है. इस रिएक्टर ने हाल ही में क्रिटिकैलिटी हासिल की है.

इसका मतलब है कि इसमें परमाणु श्रृंखला रिएक्शन सफलतापूर्वक शुरू हो गई है. इसका मतलब है वह प्रक्रिया जिसमें परमाणु के हिस्से यानी न्यूट्रॉन दूसरे परमाणु से टकराते हैं और ऊर्जा पैदा करते हैं. जब यह प्रक्रिया एक के बाद एक लगातार होने लगती है, तो इसे सीरीज रिएक्शन कहा जाता है. सरल शब्दों में कहें तो इससे बिजली बनाने के लिए जरूरी गर्मी पैदा होती है. इसे भारत की परमाणु यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव माना जा रहा है.

कलपक्कम के इस 500 मेगावाट बिजली क्षमता वाले रिएक्टर पर काम 2004 में शुरू हुआ था. उस समय उम्मीद थी कि यह परियोजना कुछ ही वर्षों में पूरी हो जाएगी. लेकिन तकनीकी चुनौतियों, सुरक्षा संबंधी सावधानियों, उपकरणों की जटिलता और देरी के कारण इसे पूरा होने में 22 बरस लगे. लेकिन देर आए-दुरुस्त आए की तर्ज पर कहें तो यह भारत के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव है.

अब जब इस यूनिट ने अपना काम शुरू कर दिया है तो जानना जरूरी है कलपक्कम की इस नई उपलब्धि का देश के लिए मतलब क्या है? अब आगे क्या लक्ष्य है? नई उपलब्धि से क्या-क्या फायदा होगा और देश के लिए इसका महत्व कितना है?

कब रखी गई नींव?

कलपक्कम का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की परमाणु यात्रा का ऐतिहासिक मोड़ है. इस पर काम 2004 में शुरू हुआ था. अब इसने क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली है. यह संकेत है कि भारत का दूसरा चरण वाला परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ रहा है. अब लक्ष्य यह है कि इसे पूरी क्षमता से चलाकर बिजली उत्पादन में लाना है. इससे ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन दक्षता, थोरियम आधारित भविष्य और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे बड़े लाभ मिल सकते हैं. लागत जरूर बढ़ी है, लेकिन इसकी रणनीतिक कीमत और राष्ट्रीय महत्व उससे कहीं अधिक बड़ा है. यह उपलब्धि भारत को दुनिया के उन बहुत कम देशों में खड़ा करती है, जो भविष्य की परमाणु तकनीक पर गंभीर और सफल काम कर रहे हैं.

नई उपलब्धि का मतलब क्या है?

क्रिटिकलिटी हासिल होना किसी परमाणु रिएक्टर के लिए अहम चरण होता है. इसका मतलब है कि रिएक्टर का मूल वैज्ञानिक ढांचा सफल रहा. अब यह साबित हो गया है कि यह प्रणाली नियंत्रित रूप से काम कर सकती है. यह अभी अंतिम मंजिल नहीं है, लेकिन यह वह मोड़ है जहां से रिएक्टर व्यावसायिक बिजली उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ता है.

यह रिएक्टर साधारण परमाणु रिएक्टर जैसा नहीं है. यह फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है. इसका खास गुण यह है कि यह जितना ईंधन खर्च करता है, उससे अधिक उपयोगी परमाणु ईंधन पैदा करने की क्षमता रखता है, इसीलिए इसे ब्रीडर कहा जाता है. यह भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का दूसरा चरण है.

अब आगे क्या लक्ष्य है?

अब अगला लक्ष्य इस रिएक्टर को धीरे-धीरे पूर्ण शक्ति तक ले जाना है. इसके बाद इसे ग्रिड से जोड़कर नियमित बिजली उत्पादन में लाना होगा. वैज्ञानिकों ने तय किया है कि इसी साल इसे पूर्ण संचालन की दिशा में आगे बढ़ाए जाने पर काम चल रहा है. इस परियोजना का लंबी अवधि वाला लक्ष्य इससे भी बड़ा है.

भारत के पास यूरेनियम सीमित है, लेकिन थोरियम का भंडार बहुत अधिक है. भारत का परमाणु कार्यक्रम इस तरह बनाया गया है कि पहले यूरेनियम का उपयोग हो, फिर उससे बने पदार्थों के जरिए फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चलें और अंत में थोरियम आधारित ऊर्जा प्रणाली विकसित की जाए. कलपक्कम की उपलब्धि उसी बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य की मजबूत सीढ़ी है.

देश को इससे क्या फायदा होगा?

इस नई उपलब्धि से देश को कई बड़े फायदे हो सकते हैं. भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी. देश की बिजली जरूरत तेजी से बढ़ रही है. कोयला और तेल पर हमेशा निर्भर रहना लंबे समय में अच्छा विकल्प नहीं है. परमाणु ऊर्जा लगातार और बड़े पैमाने पर बिजली दे सकती है. यह तकनीक ईंधन का बेहतर उपयोग करती है. सामान्य रिएक्टरों की तुलना में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अधिक कुशल माने जाते हैं. ये इस्तेमाल किए गए ईंधन से भी आगे उपयोगी सामग्री तैयार कर सकते हैं. इससे भारत को थोरियम आधारित भविष्य की दिशा में बढ़ने में मदद मिलेगी.

देश की बिजली जरूरत तेजी से बढ़ रही है और इसके लिए परमाणु ऊर्जा गेम चेंजर साबित होगी.

यह भारत के लिए बहुत खास बात है, क्योंकि दुनिया के बड़े थोरियम भंडारों में भारत भी शामिल है. इससे विदेशी ईंधन पर निर्भरता घट सकती है. अगर भारत अपनी घरेलू परमाणु ईंधन क्षमता बढ़ाता है, तो ऊर्जा नीति अधिक आत्मनिर्भर बन सकती है. इस परियोजना से उच्च स्तरीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और निर्माण क्षमता बढ़ती है. ऐसी परियोजनाएं देश में परमाणु तकनीक, विशेष धातु, सुरक्षा प्रणालियों और उन्नत औद्योगिक कौशल को मजबूत करती हैं.

दुनिया में किन देशों के पास ऐसे प्रोजेक्ट हैं?

फास्ट ब्रीडर या फास्ट न्यूट्रॉन रिएक्टर बहुत कम देशों के पास हैं. यह तकनीक कठिन और महंगी है. अभी प्रमुख रूप से रूस, चीन और भारत इस क्षेत्र में सक्रिय माने जाते हैं. रूस इस क्षेत्र में सबसे आगे है. उसके पास बीएन-600 और बीएन-800 जैसे रिएक्टर हैं, जो लंबे समय से चल रहे हैं. चीन ने सीएफआर-600 जैसे प्रोजेक्ट पर काम आगे बढ़ाया है. भारत अब कलपक्कम के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के जरिए इस चुनिंदा समूह में मजबूत स्थिति बना रहा है. जापान और फ्रांस जैसे देशों ने भी पहले ऐसे प्रयास किए थे, लेकिन कई परियोजनाएं बंद हो गईं या आगे नहीं बढ़ सकीं. इसलिए भारत की यह सफलता और भी महत्वपूर्ण बन जाती है.

अब तक इस पर कितनी लागत आई है?

इस परियोजना की शुरुआती लागत लगभग 3,492 करोड़ रुपये आंकी गई थी. लेकिन देरी और तकनीकी कठिनाइयों के कारण लागत काफी बढ़ गई. हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार यह लागत बढ़कर लगभग 8,181 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. संसदीय समिति से जुड़ी रिपोर्ट में भी इस आंकड़े की पुष्टि हुई है.

देश के लिए यह प्रोजेक्ट कितना महत्वपूर्ण है?

देश के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है. इसे केवल एक बिजली परियोजना मानना ठीक नहीं होगा. यह भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक और वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक है. यह परियोजना बताती है कि भारत केवल परमाणु ऊर्जा का उपभोक्ता देश नहीं है, बल्कि जटिल परमाणु तकनीक विकसित करने वाला देश भी है. यह उपलब्धि भारत को उन्नत परमाणु तकनीक वाले चुनिंदा देशों की पंक्ति में लाती है. इससे देश की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा बढ़ती है. इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि भारत को आने वाले दशकों में स्वच्छ, स्थिर और बड़े पैमाने की ऊर्जा चाहिए. सौर और पवन ऊर्जा जरूरी हैं, लेकिन वे हर समय उपलब्ध नहीं रहतीं.

परमाणु ऊर्जा स्थिर आपूर्ति दे सकती है. ऐसे में कलपक्कम परियोजना भारत के ऊर्जा मिश्रण को मजबूत कर सकती है. रणनीतिक दृष्टि से भी यह अहम है. अगर भारत फास्ट ब्रीडर और बाद में थोरियम आधारित प्रणाली में सफल होता है, तो यह दुनिया के लिए एक अलग मॉडल होगा. यह उपलब्धि केवल आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाले 30 से 50 वर्षों की तैयारी है.

इस तरह कह सकते हैं कि कलपक्कम का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की परमाणु यात्रा का ऐतिहासिक मोड़ है. इस पर काम 2004 में शुरू हुआ था. अब इसने क्रिटिकलिटी हासिल कर ली है. यह संकेत है कि भारत का दूसरा चरण वाला परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ रहा है. अब लक्ष्य यह है कि इसे पूरी क्षमता से चलाकर बिजली उत्पादन में लाना है. इससे ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन दक्षता, थोरियम आधारित भविष्य और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे बड़े लाभ मिल सकते हैं. लागत जरूर बढ़ी है, लेकिन इसकी रणनीतिक कीमत और राष्ट्रीय महत्व उससे कहीं अधिक बड़ा है. यह उपलब्धि भारत को दुनिया के उन बहुत कम देशों में खड़ा करती है, जो भविष्य की परमाणु तकनीक पर गंभीर और सफल काम कर रहे हैं.