Kolkata West Bengal Re-Polling: पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर, मगराहाट पश्चिम और फलता में दोबारा मतदान से चुनाव आयोग को भारी नुकसान भी उठाना पड़ रहा है. चलिए जानें कि एक बूथ पर कितना खर्चा आता है.
लोकतंत्र का महापर्व यानी चुनाव कराने में भारी-भरकम सरकारी मशीनरी और करोड़ों रुपये का खर्च लगता है. एक-एक पोलिंग बूथ को सुरक्षित और चालू हालत में तैयार करने के लिए लाखों रुपये खर्च होते हैं. ऐसे में जब किसी धांधली या हिंसा की वजह से दोबारा मतदान यानी री-पोलिंग करानी पड़ती है, तो वह पूरा खर्च सीधे दोगुना हो जाता है. हाल ही में पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर, मगराहाट पश्चिम और फलता विधानसभा क्षेत्रों में दोबारा मतदान कराने के चुनाव आयोग के फैसले ने इस चुनावी खर्च और इसके आर्थिक नुकसान को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है.
फलता में दोबारा चुनाव का फैसला
पश्चिम बंगाल के चुनावी घमासान के बीच चुनाव आयोग ने फलता विधानसभा सीट पर भी दोबारा वोटिंग कराने के स्पष्ट आदेश जारी कर दिए हैं. आयोग ने यह कड़ा कदम चुनाव प्रक्रिया के दौरान मिलीं गंभीर शिकायतों और गड़बड़ियों की जांच के बाद उठाया है. आयोग का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए फलता में री-पोलिंग कराना बेहद जरूरी हो गया था. इस नए आदेश के बाद स्थानीय प्रशासन ने तैयारियों को तेज कर दिया है, लेकिन इसके साथ ही सरकारी खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ और बढ़ गया है.
15 बूथों पर फिर से मतदान
इससे पहले पश्चिम बंगाल के दो प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों के 15 पोलिंग बूथों पर कड़ी सुरक्षा के बीच पुनर्मतदान संपन्न कराया गया. इसमें डायमंड हार्बर के 4 बूथ और मगराहाट पश्चिम के 11 बूथ शामिल थे, जहां 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द कर दिया गया था. इन सभी 15 बूथों पर 2 मई को दोबारा वोट डलवाए गए. चुनाव आयोग को यहां नई सिरे से व्यवस्थाएं करनी पड़ीं, क्योंकि पहले दिन हुई गड़बड़ियों के कारण जनता का भरोसा बहाल करना जरूरी था. इस री-पोलिंग ने प्रशासनिक अमले की मेहनत और समय दोनों को काफी बढ़ा दिया.
एक बूथ को सजाने का खर्च
आखिर एक पोलिंग बूथ को तैयार करने में कितना पैसा लगता है? चुनाव आयोग जब किसी एक बूथ को वोटिंग के लिए तैयार करता है, तो उसमें खर्चों की एक लंबी लिस्ट शामिल होती है. इसमें सबसे पहले ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों का सुरक्षित प्रबंधन और ट्रांसपोर्टेशन आता है. इसके अलावा वहां तैनात होने वाले मतदान कर्मियों का यात्रा भत्ता, खाने-पीने का इंतजाम, स्टेशनरी और अब वेबकास्टिंग जैसी आधुनिक तकनीक का खर्च भी जुड़ता है. अनुमान बताते हैं कि देश में एक सामान्य चुनाव के दौरान प्रति बूथ औसतन 1 लाख रुपये या उससे अधिक का खर्च आता है.
सुरक्षा व्यवस्था में सबसे ज्यादा खर्च
एक सामान्य पोलिंग बूथ पर होने वाले खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा सुरक्षा व्यवस्था में जाता है. चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से पूरा कराने के लिए वहां भारी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और पुलिस के जवानों को तैनात किया जाता है. जवानों के ठहरने, आने-जाने और उनके भत्तों पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है. संवेदनशील राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल में तो यह सुरक्षा खर्च सामान्य से कहीं अधिक बढ़ जाता है. ऐसे में जब किसी बूथ पर दोबारा चुनाव होता है, तो सुरक्षा बलों को फिर से वहां तैनात करना पड़ता है, जिससे खर्च काफी बढ़ जाता है.
री-वोटिंग से सरकारी खजाने को कितनी चोट?
जब भी किसी विधानसभा क्षेत्र में दोबारा मतदान होता है, तो वह सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालता है. चुनाव आयोग को री-पोलिंग के लिए नए सिरे से वैसी ही पूरी तैयारी करनी पड़ती है, जैसी सामान्य चुनाव में होती है. इसमें पोलिंग अधिकारियों को दोबारा ड्यूटी पर भेजना, नई मशीनों की टेस्टिंग और सबसे जरूरी, संवेदनशील इलाकों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की फिर से तैनाती शामिल है. यह सारा अतिरिक्त खर्च सीधे सरकारी खजाने से जाता है, जिसका कोई दूसरा फायदा नहीं होता और यह पूरी तरह से पैसे का नुकसान है.
आम जनता की जेब पर असर
चुनाव में जो भी पैसा खर्च किया जाता है, वह देश के नागरिकों द्वारा चुकाए गए टैक्स से आता है. जब भी राजनीतिक हिंसा, बूथ कैप्चरिंग या अन्य गड़बड़ियों की वजह से दोबारा मतदान होता है, तो वह आम जनता के पैसे की बर्बादी होती है. पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहां पहले से ही भारी सुरक्षा बलों की जरूरत होती है, वहां री-वोटिंग कराना प्रशासन के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन जाता है. इससे न सिर्फ लाखों रुपयों का आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि सरकारी अमले को अपनी सामान्य ड्यूटी छोड़कर दोबारा चुनावी काम में जुटना पड़ता है.



