समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी और ममता बनर्जी की जीत को लेकर आश्वस्त थे. अब बंगाल के रुझानों के बाद चर्चा है कि अखिलेश यादव इससे क्या सीख लेते हैं?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रुझानों ने सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है. जहां भारतीय जनता पार्टी बहुमत के आंकड़े से आगे निकलती दिख रही है. समाचार लिखे जाने तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बीजेपी 190 सीटों पर आगे थी. वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस 94 सीटों के आसपास सिमटती नजर आ रही है. इस पूरे चुनाव में अखिलेश यादव की सक्रियता और ममता बनर्जी के पक्ष में उनके दावे अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गए हैं.
ममता बनर्जी की संभावित हार के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम से अखिलेश यादव को क्या सीख लेनी चाहिए, खासकर तब जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है.
अति आत्मविश्वास से बचना होगा
राजनीति में आत्मविश्वास जरूरी है, लेकिन अति आत्मविश्वास अक्सर नुकसानदायक साबित होता है. ममता बनर्जी की जीत को लेकर लगातार दावे करना और ग्राउंड रियलिटी को नजरअंदाज करना एक बड़ी रणनीतिक भूल मानी जा रही है. अखिलेश यादव के लिए यह संकेत है कि उन्हें चुनावी आकलन में अधिक संतुलन और सतर्कता बरतनी होगी. साल 2024 में 37 लोकसभा सीटें जीतने के बाद अखिलेश यादव, उत्साह और आत्मविश्वास से लबरेज हैं लेकिन कई बार उनका आत्मविश्वास, अतिआत्मविश्वास में बदलता दिखता है.
कम अंतर वाली सीटों पर फोकस
चुनाव जीतने का गणित सिर्फ बड़ी लहर पर निर्भर नहीं करता, बल्कि करीबी मुकाबले वाली सीटें ही सत्ता का रास्ता तय करती हैं. यूपी जैसे बड़े राज्य में अखिलेश यादव को माइक्रो-मैनेजमेंट और बूथ स्तर की रणनीति मजबूत करनी होगी. साल 2022 के चुनाव परिणामों में करीब 49 सीटें ऐसी थीं जिन पर हार जीत का फैसला 5000 से भी कम मतों पर हुआ था. उदाहरण के लिए बहराइच सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा, जहां अनुपमा जायसवाल ने सिर्फ 407 वोट से जीत हासिल की. छिबरामऊ में सपा के अरविंद सिंह यादव ने बीजेपी की अर्चना पांडेय को 1118 वोट से हराया, जबकि इटावा में बीजेपी की सरिता भदौरिया 3981 वोट से जीतीं.
विवादित चेहरों से दूरी
राजनीति में चेहरे बहुत मायने रखते हैं. विवादित नेताओं या बयानों से जुड़ाव पूरे नैरेटिव को प्रभावित कर सकता है. यह सीख साफ है कि पार्टी की छवि को लेकर सजग रहना जरूरी है, खासकर तब जब विपक्ष लगातार मुद्दा बनाने की कोशिश में हो. भारतीय जनता पार्टी, सपा पर यह आरोप लगातार लगाती रही है कि पार्टी के रिश्ते माफियाओं से रहे हैं. अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी जैसे माफियाओं से सपा का रिश्ता रह भी चुका है. बीजेपी लगातार आरोप लगाती रही है कि साल 2017 तक सपा के सरकार में कानून और व्यवस्था नाम की चीज नहीं थी. हालांकि सपा इन दावों को खारिज करती रही है.
कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण और ऊर्जा
किसी भी चुनाव की रीढ़ कार्यकर्ता होते हैं. यदि संगठन में अनुशासन की कमी हो या जमीनी कार्यकर्ता असंतुष्ट हों, तो उसका असर सीधे वोटिंग पर पड़ता है. अखिलेश यादव के लिए यह जरूरी है कि वे संगठन को मजबूत करें और कार्यकर्ताओं के बीच स्पष्ट संदेश और दिशा बनाए रखें. इसके लिए भी साल 2022 का उदाहरण ज्यादा सटीक है जब मतदान के बाद कई विधानसभा सीटों और जिलों से यह खबरें आईं कि सपा के कार्यकर्ताओं ने डीएम, एसडीएम और चुनाव अधिकारियों की गाड़ियां चेक की. यह सब तब हो रहा था जब राज्य में 1-2 चरण के मतदान बचे थे. कौशांबी, आजमगढ़, वाराणसी तक में ऐसे मामले सामने आए थे.
अयोध्या और धार्मिक भावनाएं
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अयोध्या का सेंटिमेंट बेहद संवेदनशील और प्रभावी है. इस मुद्दे पर किसी भी तरह की चूक राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है. इसलिए धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए संतुलित राजनीति करना एक महत्वपूर्ण सीख है. साल 2024 में सपा अयोध्या में फैजाबाद लोकसभा निर्वाचन लोकसभा क्षेत्र में जीत गई. पार्टी के प्रत्याशी अवधेश प्रसाद ने बड़ी जीत हासिल की. 2024 के बाद 18वीं लोकसभा के पहले दिन से लेकर बीते विशेष सत्र तक, कई मौकों पर अखिलेश ने बीजेपी को अयोध्या की हार का जिक्र करना नहीं भूले. जून 2024 में ही उस वक्त बड़ा विवाद हुआ जब अखिलेश ने अवधेश प्रसाद को ‘अयोध्या का राजा’ तक कह दिया था.
विकास मॉडल को अपडेट करना होगा
मौके बे मौके, अखिलेश यादव अपनी सरकार के काम को गिनाते रहे हैं. यह जरूरी भी है ताकि सपा को लेकर विपक्ष के नैरेटिव को ध्वस्त किया जा सके. हालांकि एक समय के बाद एक्सप्रेसवे और इंफ्रास्ट्रक्चर का बार-बार जिक्र करना मतदाताओं को अखिलेश के आत्ममुग्ध होने का एहसास करा सकते हैं. अब वोटर्स इससे आगे की अपेक्षा रखते हैं. सिर्फ ‘एक्सप्रेसवे’ की राजनीति अब पर्याप्त नहीं है. हालांकि अखिलेश इस दिशा में कदम भी आगे बढ़ा रहे हैं. हाल के दिनों में उन्होंने यूपी बोर्ड के टॉपर्स को लैपटॉप दिया. वहीं महिलाओं के लिए भी सरकार आने पर एक निश्चित धनराशि देने का ऐलान भी किया है.
सामाजिक समीकरणों का विस्तार
यूपी की राजनीति जातीय समीकरणों पर टिकी रही है, लेकिन बदलते दौर में व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाना जरूरी है. केवल पारंपरिक वोट बैंक पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. अन्य जातियों और वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर गंभीरता से काम करना होगा. सपा चीफ भले ही पीडीए की बात कर रहे हैं और दावा करते रहे हैं कि साल 2024 में यह फॉर्मूला चला लेकिन स्पष्ट तौर पर यह कहीं दिखता नजर नहीं आता कि मुस्लिम और यादव वोट के अलावा अखिलेश और किसी वर्ग को अपने साथ जोड़ पाए हों.
ब्राह्मणों को साधने के लिए अखिलेश ‘हाता नहीं भाता’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन उनकी पार्टी के मंच पर इस वर्ग की कमी कहीं न कहीं महसूस की जाती है. उधर, सपा चीफ दलितों की बात भले कर रहे हों लेकिन दलितों के बीच सपा के प्रति विश्वास जगाना अभी भी बाकी है. सपा, कांशीराम, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की जयंतियां मनाती है लेकिन सिर्फ इतने से दलितों का भरोसा जीतना आसान नहीं है.



