1980 और 90 के दशक में मेलोडी ने भारतीय बाजार में कदम रखा और देखते ही देखते यह बच्चों से लेकर बड़ों तक की पहली पसंद बन गई.
पीएम मोदी इस वक्त पांच देशों नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड, यूएई और इटली के दौरे पर हैं. इस यात्रा के आखिरी पड़ाव में वह इटली की राजधानी रोम पहुंच चुके हैं, जहां उन्होंने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को भारत की मशहूर ‘Parle Melody’ चॉकलेट का पैकेट गिफ्ट किया. आइए जानते हैं कि पार्ले की मशहूर मेलोडी चॉकलेट कब बनी थी? इसका इतिहास क्या है?
पीएम मोदी के गिफ्ट पर क्या बोलीं पीएम मेलोनी?
पीएम मोदी के इस सरप्राइज गिफ्ट को देखकर जॉर्जिया मेलोनी बेहद खुश हुईं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो शेयर करते हुए पीएम मोदी को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी मेरे लिए बेहद बेहतरीन टॉफी मेलोडी गिफ्ट में लाए हैं. जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट पर आया, लोगों ने इसे खूब पसंद किया. सोशल मीडिया पर मीम्स और कमेंट्स की बाढ़ आ गई.
कब बनी थी Parle की Melody?
इस वीडियो के वायरल होते ही लोग पारले की ‘मेलोडी’ के बारे में सर्च करने लगे हैं. हर कोई जानना चाहता है कि आखिर हम सभी के बचपन की यह फेवरेट टॉफी कब बनी थी और इसका इतिहास क्या है? बता दें कि ‘मेलोडी’ को भारत की सबसे पुरानी और जानी-मानी कंपनी Parle Products (पारले) ने बनाया है. पारले कंपनी ने इसे करीब 41 साल पहले यानी साल 1983 में लॉन्च किया था.
1980 और 90 के दशक में मेलोडी ने भारतीय बाजार में कदम रखा और देखते ही देखते यह बच्चों से लेकर बड़ों तक की पहली पसंद बन गई. इस टॉफी की खासियत इसके बाहर मौजूद कैरेमल (Caramel) की एक मीठी परत होती है और अंदर चॉकलेटी क्रीम भरी होती है. यही अनोखा स्वाद इसे बाकी टॉफियों से अलग बनाता है. एक वक्त था, जब यह टॉफी सिर्फ 50 पैसे में मिला करती थी. महंगाई बढ़ने के बावजूद आज भी यह भारत की लगभग हर छोटी-बड़ी दुकान पर महज एक रुपये में आसानी से मिल जाती है.
मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?
अगर आप 90 के दशक से ताल्लुक रखते हैं तो आपको टीवी पर आने वाला मेलोडी का विज्ञापन (TV Ad) जरूर याद होगा. इसका स्लोगन था, ‘मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है? मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!’ यह लाइन देश के सबसे कामयाब विज्ञापनों में गिनी जाती है. यह टैगलाइन इतनी हिट थी कि लोग अपनी रोजमर्रा की बातचीत में भी दोस्तों से मेलोडी का नाम लेकर मजाक करने लगे थे. दिलचस्प बात यह है कि कंपनी ने आज तक नहीं बताया कि मेलोडी सच में इतनी चॉकलेटी क्यों है और यही रहस्य इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया.
कैसे शुरू हुआ था ‘पारले‘ का सफर?
जिस कंपनी ने मेलोडी जैसी आइकॉनिक टॉफी बनाई, उसका इतिहास भी बेहद शानदार है. पारले कंपनी की शुरुआत साल 1929 में हुई थी. इसे मुंबई के विले पार्ले इलाके में चौहान परिवार (मोहनलाल चौहान) ने शुरू किया था. शुरुआत में यह कंपनी सिर्फ 12 लोगों के साथ बेकरी का काम करती थी और ब्रेड-बन आदि बनाती थी. 1939 में कंपनी ने बिस्कुट बनाना शुरू किया, जिसमें ‘Parle-G’ (पारले-जी) सबसे ज्यादा मशहूर हुआ. आगे चलकर 1983 में मेलोडी और 1989 में ‘मैंगो बाइट’ जैसी कैंडी बाजार में उतारी गईं. सिर्फ 60 हजार रुपये से शुरू हुई यह कंपनी आज 45 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा की वैल्यू वाली कंपनी बन चुकी है.



