दिल्ली में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिलने वाला है. राजधानी में हाइड्रोजन बसों की शुरुआत हो चुकी है. लेकिन लोगों के मन में यह सवाल है कि क्या यह सीएनजी बस को टक्कर दे सकेगी?
देश की राजधानी दिल्ली में अब एक बेहद ही महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है. जहां, दिल्ली में पहली हाइड्रोजन बस सेवा की शुरुआत हो चुकी है. इस खास शुरुआत से अब शहर की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में एक नई तकनीक जुड़ गई है. इसके साथ ही पहले के मुताबिक दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन द्वारा शुरू की गई इन हाइड्रोजन ईंधन-सेल बसों का केवल मुख्य ऊर्जा की खपत को सबसे ज्यादा कम करना है.
क्या सीएनजी का स्थान ले पाएगी हाइड्रोजन बसें ?
हांलाकि, अब लोगों के मन में तेजी से एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या हाइड्रोजन बसें सीएनजी बसों का मुकाबला कर पाएंगी या फिर नहीं? लेकिन, हाइड्रोजन बसें साइलेंसर के स्तर पर बेहद ही बेहतरीन विकल्पों में से एक मानी जा रही है, बुनियादी ढांचे और परिचालन लागत के बारे में बात करें तो इसकी तुलना करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है.
क्या है सीएनजी और हाइड्रोजन तकनीक में अंतर?
सीएनजी बसों के बारे में बात करें तो, इसने पुराने डीजल बसों की तुलना में प्रदूषण को सबसे ज्यादा कम करने का काम किया था. तो वहीं, दूसरी तरफ हाइड्रोजन ईंधन-सेल बसें पूरी तरह से अलग तरीके से काम करती हैं. जहां, इसमें ईंधन को सीधे जलाने के बजाय, हाइड्रोजन एक ईंधन-सेल स्टैक के अंदर रासायनिक प्रतिक्रिया करता है जिससे बिजली पैदा की जाती है, इतना ही नहीं फिर वही बिजली इलेक्ट्रिक मोटरों को चलाने का भी एक तरह से काम करती है. तो, इस प्रक्रिया में साइलेंसर से धुएं के बजाय सिर्फ और सिर्फ पानी की भाप ही बाहर निकलती है.
आखिर क्या है हाइड्रोजन बसों के फायदे?
दरअसल, आज हाइड्रोजन तकनीक को वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा पहचान दी जा रही है. यहीं वजह है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के फायदों के साथ-साथ बड़ी बैटरी-इलेक्ट्रिक बसों की तुलना में तेजी से ईंधन भरने का काम बिना किसी परेशानी के आसानी से कर लेती है. हांलाकि, कमर्शियल फ्लीट के लिए यह बहुत मायने रखता है क्योंकि बसों को चार्जिंग स्टेशनों पर ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता है.



