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Mayawati : उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और इसकी प्रमुख मायावती चर्चा का विषय…

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और इसकी प्रमुख मायावती चर्चा का विषय बनी हुई हैं. चर्चा है कि मायावती आगामी यूपी चुनाव 2027 में कुछ बड़ा करने जा रही हैं. इसी बीच यह भी चर्चा है कि क्या बीएसपी 2027 के यूपी चुनाव में गठबंधन करके उतरेंगी. हालांकि वह गठबंधन किसके साथ और कब होगा यह केवल अनुमानों में है. करीब 12 साल से राजनीतिक रूप से शांत हो चुकीं मायावती और बीएसपी को लेकर इस तरह की चर्चाएं क्यों शुरू हुई, आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं.

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख ने मायावती ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. अगले साल की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीएसपी सुप्रीमो ने 24 मई को अपनी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ गहन समीक्षा बैठक की, जिसके बाद से लखनऊ से लेकर दिल्ली तक में चर्चाओं का बाजार गरम हो चला है. इस बैठक के बाद मायावती ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कीं, बल्कि उन्होंने सोशल मीडिया पेज एक्स से दो पेज की प्रेस विज्ञप्ति जारी करके छोड़ दीं. मायावती के प्रेस के सामने नहीं आने के बाद लोगों के मन में कई और सवाल उठने लगे हैं.

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से बिलकुल खामोश हो गई हैं. 2007 से 2012 तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के बाद ना केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बीएसपी का जनाधार लगातार गिर रहा है. पार्टी के लगातार खराब प्रदर्शन के बाद भी मायावती किसी भी चुनाव में खास सक्रिय नहीं दिखती हैं. अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले मायावती के ऐक्टिव होने से अनुमानों का बाजार गरमाने लगा है. मायावती की ओर से जारी दो पन्ने के प्रेस नोट में दो तीन बातें गौर करने लायक है, जिसको लेकर चर्चाएं शुरू होना लाजिमी है.

  1. बीएसपी की गहन समीक्षा बैठक के बाद जारी प्रेस नोट में कहीं भी खुलकर नहीं कहा गया है कि पार्टी आगामी यूपी चुनाव में अकेले दम पर लड़ेगी. आमतौर पर देखा गया है कि बीएसपी प्रमुख मायावती हमेशा इस बात को लेकर क्लियर रहती हैं कि उन्हें गठबंधन में चुनाव लड़ना है या अकेले. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों को याद करें तो मायावती ने करीब एक साल पहले ही स्पष्ट रूप से बता दिया था कि उनकी पार्टी अकेले ही राज्य के सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. इस बार ऐसी स्पष्टता नहीं दिखने के चलते चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या बीएसपी किसी पार्टी के साथ गठबंधन में रहकर आगामी यूपी चुनाव लड़ेगी.
  2. यह चर्चा इसलिए और भी ज्यादा जोर पकड़ रही है क्योंकि पिछले दिनों जब राहुल गांधी जब अमेठी और रायबरेली में जनसभाएं कर रहे थे उसी दौरान कांग्रेस के दो दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम और तनुज पूनिया अचानक लखनऊ के मॉल रोड स्थित मायावती से मिलने उनके घर पहुंचे थे. हालांकि मायावती ने दोनों कांग्रेसी नेताओं को मिलने का वक्त नहीं दिया, जिसके बाद इन्होंने कहा कि वह पार्टी की तरफ से नहीं बल्कि व्यक्तिगत तौर पर बहनजी का हालचाल जानने पहुंचे थे. दूसरी तरफ फजीहत के बाद कांग्रेस ने इन दोनों नेताओं से लिखित में ऐसा करने की वजह पूछ ली है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि आमतौर पर ऐसी घटनाओं पर मायावती स्पष्टता के साथ मीडिया के सामने आकर कहती रहीं कि फलां पार्टी उनसे रिश्ते जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन वह ऐसा नहीं करेंगी. इस बार मायावती के घर पहुंचे दोनों कांग्रेसी नेताओं की घटना पर बीएसपी या मायावती की तरफ से अब तक कोई बयान नहीं आया है.
  3. गहन समीक्षा बैठक के प्रेस नोट में एक बात और करने वाली है कि इसमें किसी भी पार्टी का नाम नहीं लिया गया है. इसमें मायावती की तरफ से या तो सत्तापक्ष या विपक्ष शब्द कहकर संबोधित किया गया है. ऐसे में ये कयास लगाया जाना जरूरी हो जाता है कि जो मायावती मीडिया के सामने साफगोई से किसी भी राजनीति दल का नाम लेकर हमला करती रही हैं, उन्होंने इस बार ऐसा क्यों किया है.

मायावती के लिए 2027 में गठबंधन करना क्यों है जरूरी?

मौजूदा समय में मायावती की पार्टी के केवल एक विधायक हैं. बीएसपी लोकसभा, राज्यसभा, यूपी विधान परिषद में शून्य पर है. 2014 के लोकसभा में बीएसपी का खाता नहीं खुला. 2019 में बीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया जिसके चलते उनके 10 सांसद जीते. 2024 में फिर अकेले लड़ी तो एक बार फिर से पार्टी का रिजल्ट शून्य ही रहा. इसी यूपी में विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2012 में जब मायावती सत्ता से बाहर गईं तो उनके 80 विधायक जीते थे. 2017 के चुनाव में जब बीजेपी 325 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ यूपी की सत्ता पर काबिज हुई तब बीएसपी के केवल 19 विधायक जीते. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी यूपी में केवल एक विधायकों तक सिमट गई.

वोट हासिल करने के मामले में भी बीएसपी का प्रदर्शन लगातार गिरता रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को उत्तर प्रदेश में लगभग 19.6% और देश स्तर पर लगभग 4.2% वोट मिले. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को यूपी में लगभग 19.3% वोट मिले. वहीं राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3.6% वोट मिले. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का वोट प्रतिशत काफी घटा और यूपी में लगभग 9.3% और पूरे देश में लगभग 2.07% रहा. जहां तक यूपी विधानसभा चुनावों की बात है तो 2017 में 22.23% और 2022 में केवल 12.88% पर सिमट गया. यानी मायावती की पार्टी लगातार रसातल में जाती रही.

बीएसपी के राष्ट्रीय पार्टी के तमगे पर खतरा

फिलहाल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) देश की राष्ट्रीय पार्टी है. लेकिन चुनाव दर चुनाव उसके घटते जनाधार के चलते वह राष्ट्रीय पार्टी बनने रहने के किसी भी नियम को फॉलो नहीं कर पा रही है.

  • राष्ट्रीय पार्टी के लिए कम से कम 4 राज्यों में एक ‘राज्य स्तरीय दल’ (State Party) के रूप में मान्यता.
  • अगर किसी पार्टी ने लोकसभा के आम चुनाव में कुल सीटों की कम से कम 2% सीटें (वर्तमान में 543 में से 11 सीटें) जीती हों. ये 11 सीटें किसी एक राज्य से नहीं, बल्कि कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों से जीतकर आनी चाहिए.
  • अगर किसी पार्टी को लोकसभा चुनाव या राज्यों के विधानसभा चुनाव में 4 या उससे अधिक राज्यों में कुल वैध मतों का न्यूनतम 6% वोट मिला हो.
  • इसके साथ-साथ पार्टी को किसी भी राज्य या राज्यों से लोकसभा की कम से कम 4 सीटों पर जीत दर्ज करनी जरूरी है.

बहुजन समाज पार्टी राष्ट्रीय पार्टी का तमगा बरकार रखने के किसी भी नियम शर्त का पालन नहीं कर पा रही है. ऐसे में 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव मायावती के लिए करो या मरो वाली स्थिति हो गई है. ऐसे में राजनीति के जानकार मानते हैं कि मायावती अपनी पार्टी का प्रदर्शन सुधारने के लिए पूरी संभावना है कि वह किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन कर सकती हैं. प्रेस नोट में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा का ना होना इस अनुमान को और भी ज्यादा बल देता है. हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा कब और कहां होगी ये तो वक्त ही बताएगा.

बीएसपी पर बी टीम होने के लगते रहे आरोप

पिछले चार चुनावों में बीएसपी और मायावती का जिस तरह का रवैया रहा उसे देखकर उनपर कभी बीजेपी की बी टीम तो कभी इंडिया गठबंधन की बी टीम होने के आरोप लगते रहे. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में जिस तरह से मायावती ने अपने घोषित उम्मीदवार ऐन मौके पर बदले और उसके बाद वहां के जातीय समीकरण के हिसाब से प्रत्याशी दिए उससे यही आरोप लगे कि वह पूरे चुनाव में समाजवादी पार्टी को नुकसान और बीजेपी को फायदा पहुंचाने का काम कर रही हैं. ठीक उसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने कई सीटों के जातीय समीकरण को देखते हुए इस तरह से उम्मीदवार उतारे जिससे कुछ जगहों पर बीजेपी को तो ज्यादातर जगहों पर इंडिया गठबंधन को फायदा होता हुआ दिखा. इसी तरह जब उनके भतीजे और बीएसपी में उत्तराधिकारी माने जा रहे आकाश आनंद ने अग्रेसिव तरीके से चुनावी रैलियों में बोलना शुरू किया तो मायावती ने खुद उन्हें पद से हटाकर शांत कर दिया. यानी मायावती को जिस जुझारूपन और जनता के मुद्दों पर लड़ाके के तरह राजनीति के लिए जाना जाता रहा, वह बिल्कुल सरेंडर मूड में दिखीं. ऐसे में इस बार यूपी चुनाव से पहले मायावती ने जिस तरह की सक्रियता दिखाने की कोशिश की हैं, उसको लेकर अनुमानों का दौर शुरू होना लाजिमी है.