हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर दी है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या पार्टी इसके खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है या नहीं.
तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 बागी सांसदों द्वारा अपने गुट का नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय करने और एनडीए को समर्थन देने की घोषणा ने एक नई राजनीतिक और कानूनी बहस छेड़ दी है. हालांकि बागी सांसद दल बदल विरोधी कानून के तहत सुरक्षा का दावा कर सकते हैं लेकिन संवैधानिक प्रावधान यह साफ करता है कि सिर्फ दूसरी पार्टी में शामिल होने से उन्हें अयोग्य घोषित होने से अपने आप सुरक्षा नहीं मिलती. अब इस कदम की संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत जांच होने की संभावना है और तृणमूल कांग्रेस के पास इस विलय को चुनौती देने के लिए कई कानूनी विकल्प मौजूद हैं.
टीएमसी बागी गुट को अदालत में चुनौती दे सकती है?
भारत के संवैधानिक ढांचे के तहत मूल राजनीतिक पार्टी बागी सांसदों या फिर विधायकों को कानूनी रूप से चुनौती दे सकती है अगर उसे लगता है कि उन्होंने दल बदल विरोधी कानून का उल्लंघन किया है. पहला कदम आमतौर पर लोकसभा या फिर विधानसभा के स्पीकर के सामने उठाया जाता है. लेकिन खास परिस्थितियों में न्यायिक हस्तक्षेप भी संभव है.
क्या है पहला कदम?
तृणमूल कांग्रेस लोकसभा स्पीकर के सामने अयोग्यता याचिका दायर कर सकती है और 10वीं अनुसूची के तहत बागी सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर सकती है. स्पीकर ही वह प्राधिकारी है जिन्हें यह तय करने का अधिकार है कि क्या सांसदों ने दल बदल विरोधी प्रावधानों का उल्लंघन किया है. अगर स्पीकर फैसला लेने में देरी करते हैं तो पीड़ित पक्ष सुप्रीम कोर्ट या फिर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है और समय सीमा के अंदर फैसले के लिए निर्देश मांग सकता है.
सिर्फ दो तिहाई का नियम काफी नहीं
कई बागी समूह पार्टी के कम से कम दो तिहाई विधायकों का समर्थन होने का दावा करके अयोग्यता से बचने की कोशिश करते हैं. हालांकि संवैधानिक संशोधन में इन प्रावधानों को काफी सख्त बना दिया है. 91वें संवैधानिक संशोधन ने उस पुराने प्रावधान को खत्म कर दिया जो पार्टी के साधारण विभाजन के आधार पर सुरक्षा की अनुमति देता था. आज बागी सिर्फ इसलिए कानूनी मान्यता का दावा नहीं कर सकते कि उनके पास विधायी पार्टी के अंदर पर्याप्त संख्या बल है.
विलय को संवैधानिक दोहरे परीक्षण पर खरा उतरना होगा
दल बदल विरोधी कानून के तहत सुरक्षा के लिए पात्र होने के लिए बागी गुट को किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी के साथ वैध विलय का प्रमाण देना होगा. विलय को संवैधानिक शर्तों को पूरा करना होगा. इसमें शामिल विधायकों में से कम से कम दो तिहाई का समर्थन होना शामिल है.
किसी दूसरे पार्टी के साथ विलय की सिर्फ घोषणा करना ही काफी नहीं है. विलय की वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या सभी संवैधानिक जरूरतों को पूरा किया गया है.
अदालत कब दखल दे सकती है?
अदालत तब दखल दे सकती है जब इस बात के सबूत हो कि स्पीकर ने पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया या फिर बिना किसी वैध कानूनी आधार के किसी बागी गुट को मान्यता दी. अगर कथित विलय में वास्तविक संगठनात्मक मंजूरी की कमी हो तो भी न्यायिक जांच हो सकती है.



