अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोलने वाले बिल को मंजूरी दे दी है। इसमें भारत और चीन जैसे रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार भी प्रभावित हो सकते हैं। बिल अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा।
अमेरिका के इस कदम के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने अपना रुख साफ किया है। MEA ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इसके लिए अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा खरीद जारी रखेगा। मंत्रालय ने कहा कि फैसले बदलते बाजार हालात को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।
दरअसल, अमेरिकी कानून राष्ट्रपति को रूस से पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े आयातकों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है। लेकिन यहां एक जरूरी ट्विस्ट है-बिल पास होते ही भारत पर 100% टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। इसे लागू करने का फैसला आगे अमेरिकी राष्ट्रपति के स्तर पर होगा।
भारत पहले भी साफ कर चुका है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय जरूरतों और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है। रूस से कच्चे तेल की खरीद भारत के आयात मिश्रण का बड़ा हिस्सा है और सरकार लगातार अलग-अलग देशों से ऊर्जा स्रोत हासिल करने की नीति पर जोर देती रही है।
इस पूरे मामले का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रह सकता। अगर अमेरिका भविष्य में भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है तो भारतीय सामानों के अमेरिकी बाजार में महंगा होने का खतरा रहेगा। इससे भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता और भारतीय निर्यातकों के लिए भी अनिश्चितता बढ़ सकती है।
फिलहाल भारत ने टकराव बढ़ाने के बजाय अपने पुराने रुख को दोहराया है-ऊर्जा सुरक्षा के लिए अलग-अलग स्रोतों से खरीद जारी रहेगी और अमेरिकी कानून से जुड़े घटनाक्रम पर नजर रखी जाएगी। अब असली नजर इस बात पर है कि ट्रंप इस नए अधिकार का इस्तेमाल करते हैं या नहीं और अगर करते हैं तो भारत पर कितना टैरिफ लगाया जाता है।



