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कंडोम मिलने की फैलाई थी अफवाह JNU छात्र संघ नेता शेहला राशिद के बैग में , 16 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज

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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की छात्र नेता शेहला राशिद पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में बेगूसराय में 16 लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गई है. नगर थाने में दर्ज इस मामले में सभी के विरुद्ध नामजद प्राथमिकी दर्ज की गई है.

दरअसल, बेगूसराय में कन्हैया कुमार के लिए लोकसभा चुनाव प्रचार करने आईं शेहला राशिद के बारे में फेसबुक पर कई तरह की पोस्ट शेयर की जा रही थीं. कई लोगों ने उनके बारे में लिखा, बेगूसराय में पुलिस की जांच में शेहला रशीद के बैग से मिले ‘कंडोम’. ये कन्हैया के लिए वहां प्रचार करने गई है या चुनावी खर्च निकालने.

यहां बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान बेगूसराय में सीपीआई के प्रत्याशी रहे कन्हैया कुमार के प्रचार में गई थीं. इसी दौरान उन पर यह आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी.

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला पुलिस ने ये कार्रवाई दिल्ली की सामाजिक कार्यकर्ता जेना यमन की महिला आयोग से शिकायत के बाद की है. जेना यमन ने ई-मेल के जरिए आईटी एक्ट के तहत ये मुकदमा दर्ज कराया. उनकी शिकायत है कि अप्रैल में चुनाव अभियान में शामिल होने शेहला राशिद बेगूसराय गई थीं.

उस वक्त बेगूसरय की एक वेबसाइट के फेसबुक पेज पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की गई थी. जेना ने जिन 16 लोगों को नामजद आरोपी बनाया है, इनमें स्थानीय केशव भारद्वाज के साथ रोशन राज, मनीष कुमार, रितेश झा, ज्योति, ए वी विपिन शर्मा, कन्हैया सिंह, राहुल शर्मा, वेंकटेश कुमार सिंह, एस पुरोहित, मंजेश पुरोहित, मंतोष कुमार शांडिल्य, विनोद कुमार मंडल, मुख्तार सिंह और चौकीदार नीतीश कुमार समेत 16 शामिल हैं. इनपर आईपीसी की धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई है.

दरअसल, बीते अप्रैल महीने में शेहला राशिद का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें शेहला कह रही हैं कि हिंदू हो या मुसलमान, सारे अमीर व्यक्ति शाम को होटल में बैठकर एक साथ बीफ खाते हैं और दारू पीते हैं. हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई थी कि वीडियो चुनाव प्रचार के दौरान का ही है, लेकिन इसके बाद शेहला कई लोगों के निशाने पर आ गई थीं. वीडियो के आधार पर उनपर कई सारी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं.

उसी दौरान यह बात फैलाई गई थी कि चुनाव प्रचार के दौरान पुलिस ने जब उनकी बैग की जांच की तो उसमें बड़े पैमाने पर “कंडोम” पाए गए. यह फेसबुक पर चर्चा में रहा था. अप्रैल में शेहला राशिद अपने ही कॉलेज के पास आउट कन्हैया कुमार के प्रचार के लिए बेगूसराय गई थीं. बहरहाल बेगूसराय पुलिस ने देर से ही सही प्राथमिकी दर्ज कर ली है.

रिपोर्ट में हुआ खुलासा : इस पक्षी की प्रजाति हाई वोल्टेज लाइन के कारण विलुप्ति की कगार पर पहुंची

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हाई वोल्टेज के कारण ग्रेट इंडियन बस्टर्ड तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। हाल ही में एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस बात का खुलासा किया है। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बताया है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अपनी प्रजाति की लुप्तिति की ओर बढ़ रही है।

वहीं, पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी इस बारे में खुलासा किया गया है। मंत्रालय की रिपोर्ट में इसके कारणों का खुलासा करते हुए कहा गया है कि हाई वॉल्टेज लाइनों से टकराने के कारण गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पूरी तरह लुप्त होने की ओर बढ़ रहा है।

इसके संबंध में मंत्रालय के तहत सांविधिक निकाय ने कहा कि अब इनकी संख्या सिर्फ 150 ही बची है। जो कि एक चिंता का विषय बना हुआ है। जिनकी अधिकतम संख्या जैसलमेर में है।

जानकारी के लिए बता दें कि हर साल ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के हाई वॉल्टेज लाइनों के टकराने के कारण इनकी संख्या में 15 फीसदी की दर से कमी आ रही है।

डब्ल्यूआईआई ने हैरान करने वाली बात का खुलासा किया है। उसकी रिपोर्ट के अनुसार पिछले 30 वर्षों में इनकी आबादी में 75 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। जैसलमेर में इनकी हुई मौतों की बात की जाये तो सिर्फ जैसलमेर में ही 2017-18 में 5 जीआईबी मौतों को दर्ज किया गया है।

अगर इनकी अन्य प्राकृतिक कारणों से हुई मौतों की बात की जाये तो इनकी दर 4-8 प्रतिशत है। ज​बकि यही संख्या हाई वॉल्टेज लाइनों में 15 ​फीसदी तक पहुंच जाती है। जिसके बाद रिपोर्ट में इनके बारे में चेतावनी दी गई है कि इनकी ज्यादा मौतें बिजली ट्रांसमिशन लाइनों की वजह से होती है।

अगर इस समस्या का जल्द ही कोई निदान नहीं निकाला गया तो इसकी प्रजाति पूरी तरह से विलुप्त हो सकती है। बता दें कि सरकार ने इनकी प्रजाति के संरक्षण के लिए हाल ही में 33 करोड़ रुपये जारी किये हैं।

ट्विटर पर महबूबा मुफ्ती से भिड़े उमर अब्दुल्ला , ट्रिपल तलाक बिल राज्यसभा में पास..

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तीन तलाक विधेयक मंगलवार को राज्यसभा में पारित कर दिया गया. बिल के पक्ष में 99 जबकि विपक्ष में 84 वोट पड़े. बिल पर फाइनल वोटिंग के वक्त राज्यसभा में कुल 183 सांसद मौजूद थे. सरकार को बिल पास करवाने के लिए 92 वोट चाहिए थे. राज्यसभा में विपक्षी दल बिल के खिलाफ एकजुट नहीं हो सके. विपक्ष के कुल 31 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. बीएसपी, सपा, एनसीपी और पीडीपी ने बॉयकट किया.

बिल पास होने के बाद पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला के बीच ट्विटर वार देखने को मिला. उमर अब्दुल्ला ने पीडीपी पर एनडीए का समर्थन करने का आरोप लगाया. इस विवाद की शुरुआत पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती के एक ट्वीट से हुई.

दरअसल, तीन तलाक बिल पास होने के बाद महबूबा मुफ्ती ने एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने लिखा, “तीन तलाक बिल को पास कराने की जरूरत को समझने में नाकाम हूं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इसे अवैध करार दिया था. मुस्लिम समुदाय को दंडित करने के लिए अनावश्यक का हस्तक्षेप है.”

इस पर अब्दुल्ला ने महबूबा मुफ्ती को जवाब देते हुए कहा, “महबूबा मुफ्ती जी, आप को यह चेक करना चाहिए कि इस ट्वीट से पहले आपके सदस्यों ने कैसे वोट किया. मुझे लगता है कि उन्होंने सदन में अनुपस्थित रहकर सरकार की मदद की क्योंकि बिल पास कराने के लिए उन्हें सदन में नंबर चाहिए थे.”

उमर अब्दुल्ला के इस तंज के बाद महबूबा मुफ्ती ने भी पलटवार किया. उन्होंने एक जवाबी ट्वीट में कहा, “उमर साहब, मेरा सुझाव है कि आप नैतिकता का ऊंचा पाठ पढ़ाना बंद कर दीजिए क्योंकि यह आपकी अपनी ही पार्टी थी जिसने 1999 में बीजेपी के खिलाफ मतदान करने के लिए सोज साहब (सैफुद्दीन सोज) को पार्टी से निष्कासित कर दिया था.”

इस पर अब्दुल्ला ने फिर जवाब देते हुए कहा, “मैडम, अगर 20 साल पुरानी घटना को याद करके आप पीडीपी के छल का बचाव कर सकती हैं तो करिए? इसलिए आप स्वीकार कर रही है कि आपने अपने सांसदों को सदन से गैरहाजिर रहने का निर्देश दिया था और इस गैर-मौजूदगी ने इस बार बीजेपी की मदद की.”

गौरतलब है कि महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP के 2 सांसदों ने भी आज वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. अगर देखा जाए तो वोटिंग नहीं करने वाले सांसदों ने अ-प्रत्यक्ष रूप से सरकार की मदद की है.

बन गए करोड़पति : शैम्पू से बनाया दूध और छा गए ये दो गुर्जर भाई

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दूध को हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है और बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसका खाने और पीने में कई तरीके से इस्तेमाल करते हैं। क्या आपको पता है जो पैकेट बंद दूध आप घर ला रहे हैं और पी रहे हैं दरअसल में वो तरह का जहर है। आपको बता दें, पुलिस ने दो ऐसे भाइयों को गिरफ्तार किया है जो शैम्पू से दूध बनाकर बेचते थे और वो 7 सालों में करोड़पति बन गए।

मध्य प्रदेश के मुरैना में स्पेशल टास्क फोर्स ने देवेंद्र गुर्जर और जयवीर गुर्जर दो भाइयों को गिरफ्तार किया है जिन पर बीते कई सालों से सिंथेटिक (नकली) दूध बनाकर बेचने का आरोप लागा है। इतना ही नहीं दोनों भाइयों ने इस नकली दूध के धंधे से इतना पैसा कमाया कि वो सिर्फ 7 साल में ही तीन बंगले, कई एसयूवी, मिल्क टैंकर, खेती की जमीन, और दो पैकेट बंद दूध की फैक्ट्री के मालिक बन गए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक दूध के रूप में जहर बेच रहे ये दोनों भाई सात साल पहले तक मुरैना के डेयरी फॉर्म में अपनी बाइक से दूध पहुंचाते थे। दूध के धंधे में भारी मुनाफा देखकर इन दोनों भाइयों ने नकली दूध बनाने का काला धंधा शुरू कर दिया।

दोनों भाई ग्लूकोज, यूरिया, रिफाइंड तेल, मिल्क पाउडर, पानी और शैम्पू से सिंथेटिक दूध बनाते थे और फिर उसे न सिर्फ मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बल्कि दूसरे राज्यों में भी भेजा करते थे। एसटीएफ को जांच में इस काम में शामिल हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की नामी कंपनियों का भी पता चला है।

देवेंद्र गुर्जर के साथ ही चंबल के कुछ अन्य डेयरी मालिकों का भी नाम एफआईआर में शामिल किया गया है जो केवल पांच-सात साल में अमीर हो गए। इन लोगों पर मध्य प्रदेश के अलावा हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की नामी कंपनियों को भी सिंथेटिक दूध बेचने का आरोप है।

एसटीएफ के पुलिस अधीक्षक राजेश भदोरिया ने कहा, ‘जांच के दौरान, मुख्य आरोपियों में से छह लोगों देवेंद्र गुर्जर, जयवीर गुर्जर, रामनरेश गुर्जर, दिनेश शर्मा, संतोष सिंह और राजीव गुप्ता के पास बड़ी संपत्ति थी। उनके जीवन स्तर में कुछ ही वर्षों में पूरी तरह से बदलाव आया है। उन्होंने छोटे डेयरी मालिकों से करोड़पति बनने तक के सफर को बहुत तेजी से कवर किया। वे एक लीटर दूध बनाने के लिए सिर्फ 6 रुपए खर्च करते थे, जो थोक बाजार में 25 रुपए में बिकता है। वे ग्लूकोज, यूरिया, रिफाइंड तेल, दूध पाउडर और पानी को मिलाकर सिंथेटिक दूध तैयार करते हैं।

शमी ट्री : घर में लगाएं तो शनि की कृपा, खेत में लगाएं तो बनेंगे ‘राजा’

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 उत्तर प्रदेश में छोंकर व शमी, पंजाब में जंड, राजस्थान में खेजड़ी, गुजरात में खिजड़ो, महाराष्ट्र में शेमा, कर्नाटक में ‘बन्नी’ नाम से पहचान बनाने वाली ‘शमी’ पर भगवान शिव का साक्षात वास होता है. ऐसे ‘शमी’ की पूजा ही नहीं, यह विभिन्न रोगों में भी लाभकारी है. मान्यता है कि इसे घर में लगाने से शनि की कृपा तो खेत में लगाने से धन—धान्य से घर का भण्डारा भरा रहता है, अर्थात राजा बनाती है. यह मिट्टी को कई पौष्टिक आहार देती है.

ग्रहों के राजा शनि को शांत करने वाले ‘शमी’ वृक्ष को भगवती का भी निवास माना जाता है. इसे शिवा, इशानी, लक्ष्मी, इष्टा, शुभकरी आदि नामों से भी जाना जाता है. इसे गमले में भी लगाया जा सकता है. शमी को किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है लेकिन उपयुक्त मौसम जुलाई-अगस्त ही है. मिट्टी को विभिन्न तत्व देने वाले शमी का पौधा यदि खेत के किनारे लगायें तो इससे कम लागत में अच्छी उपज मिलेगी.

कात्यायनी देवी से उत्पन्न

शमी धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए कात्यायनी देवी से उत्पन्न माना गया है. इस कारण इसे पवित्र गमले में या साफ जगह में लगाना चाहिए. इस पौधे के आसपास नाली का पानी या कूड़ा नहीं होना चाहिए. इस पवित्र पौधे को सफाई पसंद है. केमिकल फर्टिलाइजर का प्रयोग नहीं करना चाहिए. इस पौधे को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती लेकिन धूप बहुत चाहिए. शमी का वृक्ष सदैव ऐसी जगह लगाएं, जहां आप अपने घर से निकलते समय उसे देख सकें. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निकलते समय आपके दाहिने हाथ की तरफ पड़े. इसे पूर्व दिशा या ईशान कोण में भी लगा सकते हैं. इसे छत पर भी लगाया जा सकता है.

मिट्टी को देता है दो सौ किग्रा नाइट्रोजन

शमी प्राकृतिक अनुकूलता के लिए भी बहुत उपयोगी है. पानी को भाप बनाकर (वाष्पोत्सर्जन) उड़ाने की इसकी आदत कम है. 24 घंटे यह मात्र.5 मिमी पानी ही उड़ाता है. इसके साथ ही यह प्रति वर्ष एक हेक्टयेर क्षेत्र में लगभग दो सौ किग्रा नाइट्रोजन को वायु से शोषित कर जमीन को कई तत्व उपलब्ध कराती है.

कुष्ठ रोग के साथ ही बुद्धवर्धक भी

शमी का गोंद मई-जून में निकलता है. इसको लड्डू में मिलाकर प्रसव के बाद महिलाओं को खिलाना काफी फायदेमंद होता है. चरक संहिता के अनुसार शमी का फुल गुरु, उष्ण, मधुर, रूक्ष और केशनाशक है. भावमिश्र ने लिखा है कि शमी कफ, खांसी, भ्रमरोग, श्वांस, कुष्ठ तथा कृमि नाशक है. यह बुद्धिवर्धक भी है.

अपच, गठिया रोग में भी आता है काम

इसके औषधीय गुणों का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि गर्भवती स्त्रियां फूलों को शक्कर के साथ लेती हैं तो गर्भपात का डर कम रहता है. इसकी छाल का लेप फोड़े-फुंसी पर लगाया जाता है. नाखून और दांतों का जहर हटाने के लिए भी इसके छाल का प्रयोग होता है. अपच, गठिया रोग, घावों, बवासीर, प्रमेह में भी यह फाददेमंद है.

खेत के लिए एंटीबायोटिक

शमी को खेत के किनारे लगाने पर फसलों के लिए भी काफी फायदेमंद है. इसका कारण है कि यह एंटीबायोटिक का काम करता है. इसका कारण है, इसकी पत्तियों में नाइट्रोजन 2.9 प्रतिशत, फास्फोरस 0.4 प्रतिशत, पोटेशियम 1.4 प्रतिशत, कैल्शियम 2.8 प्रतिशत पाया जाता है और पत्तियां जल्दी ही जमीन में सड़कर मिट्टी को फायदा पहुंचाती है. इससे खेतों में कम खाद के प्रयोग पर भी अच्छी फसलें होती हैं.

‘राम तेरी गंगा मैली’ की एक्ट्रेस मंदाकिनी, अब जी रही हैं ऐसी LIFE

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बॉलीवुड में फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ से फेमस हुए एक्ट्रेस मंदाकिनी आज अपना 50वां जन्मदिन मना रही हैं. मंदाकिनी का जन्म 30 जुलाई 1969 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ था. मंदाकिनी आजकल बॉलीवुड की चकाचौंध से काफी दूर हैं. वह काफी दिनों से लाइमलाइट में नहीं हैं. दरअसल, मंदाकिनी फिल्म फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में अपने बोल्ड सीन्स की वजह से जानी जाती हैं. उनकी इस फिल्म में दिए गए सीन्स आज भी काफी फेमस हैं और यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर काफी हिट हुई थी. हालांकि, इस फिल्म के बाद उनकी बाकी की फिल्में कोई खास कमाल करने में सफल नहीं रही.

1985 से 1996 तक का ही था फिल्मी सफर 
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए मंदाकिनी पहली पसंद नहीं थी. इस फिल्म के लिए पहले डिंपल कपाड़िया को कास्ट किया जाने वाला था. हालांकि, राज कपूर को उनका ऑडिशन पसंद नहीं आया था. इसके बाद मंदाकिनी का स्क्रीन टेस्ट देख उन्हें सिलेक्ट किया गया. यूं तो मंदाकिनी ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1985 में की थी, लेकिन उनका करियर 1996 में ही खत्म हो गया था.

अब ऐसी लाइफ जी रही हैं मंदाकिनी 
रिपोर्ट्स की मानें तो अब मंदाकिनी बॉलीवुड से काफी दूर हैं और अपनी योगा क्लासेज चलाती हैं. मंदाकिनी ने 1980 में डॉ. केटी आर ठाकुर से शादी करली थी. दोनों की शादि लव कम अरेंज मैरिज थी. अब मंदाकिनी एक नॉर्मल हाउस वाइफ की तरह अपनी लाइफ जी रही हैं और कहा जाता है कि वह दलाई लामा की फॉलोअर हैं. मंदाकिनी का नाम अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के साथ भी जुड़ चुका है. मंदाकिनी और दाऊद इब्राहिम की एक क्रिकेट मैच के दौरान फोटो वायरल हुई थी. हालांकि, मंदाकिनी ने हमेशा इस बात को खारिज किया था. आखिरी बार मंदाकिनी को 1996 में आई फिल्म ‘जोरदार’ में देखा गया था.

धनिया से धनवान हुए महादेव, पचास हजार लगाकर कमा लिए लाखों

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“महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश के किसान धनिया की खेती से मालमाल हो रहे हैं। उस्मानाबाद (महाराष्ट्र) के गांव महालंगी के किसान महादेव गोपाल ढवले ने तो अपने तीन एकड़ खेत में पचास हजार की लागत से धनिया की खेती कर इस बार मंडी से साढ़े पांच लाख रुपए की कमाई कर ली है।”

हर साल औसतन तीन टन उत्पादन के साथ भारत विश्व में धनिया का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक है। हमारे देश में धनिया की खेती सबसे ज्यादा पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में होती है। इसकी पैदावार एक बीघे में 30 क्विंटल तक हो जाती है। मार्च में जब खेत खाली होते हैं, किसान उसी मौके का फायदा उठाकर इसकी खेती से मालामाल होने लगे हैं। महज एक महीने में इससे प्रति बीघा लगभग एक लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है। बारिश कम होने से सिंचाई के लिए पानी के संकट से परेशान उस्मानाबाद (महाराष्ट्र) के गांव महालंगी के किसान महादेव गोपाल ढवले ने कुछ महीने पहले इस सीजन में पचास हजार की लागत से अपने तीन एकड़ खेत में धनिया की बुवाई कर दी थी।

उस्मानाबाद क्षेत्र में ज्यादातर अन्य किसानों की तरह महादेव भी इससे पहले मूंग, सोयाबिन, उड़द, कपास जैसे खेती करते रहे हैं। दरअसल, धनिया की खेती उन इलाकों के लिए मुफीद साबित हो रही है, जहां अवर्षण के कारण सिंचाई के लिए पानी एक बड़ी समस्या है। धनिया कम ही दिनों में तैयार हो जाती है, इसलिए इसकी खेती में सूखा पीड़ित क्षेत्रों के किसान अब ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं। इस बार जब तैयार होकर धनिया की फसल बाजार पहुंची तो महादेव को कुल बिक्री से साढ़े पांच लाख रुपए मिल गए। अब उनकी कमाई की पूरे इलाके में चर्चा है। 

महादेव की तरह ही शिवपुरी (म.प्र.) के गांव समसपुर के किसान जगन्नाथ धाकड़ ने भी धनिया खेती से साढ़े चार लाख रुपए कमा लिए हैं। इस समय उनके खेतों का धनिया श्योपुर से लेकर ग्वालियर तक मंडियों में महक रहा है। इस बार यहां की मंडियों में धनिया सौ रुपए किलो तक बिक रहा है। अब जगन्नाथ धाकड़ की देखादेखी आसपास के दर्जनों किसानों अतर सिंह धाकड़, दौलत सिंह धाकड़, बुद्धू धाकड़, बाबू धाकड़ आदि का भी रुझान धनिया की खेती में रमने लगा है। जगन्नाथ तो पिछले कई वर्षों से धनिया की खेती से खूब मुनाफा कमा रहे हैं।

जगन्नाथ की तरह ही फतेहपुर (उ.प्र.) के किसान अमित पटेल पिछले कई वर्षों से धनिया की खेती कर रहे हैं। वह दिन में सिर्फ दो घंटे की मेहनत करके हरी धनिया बेचकर हर महीने 15 से 20 हजार रुपए की कमाई कर लेते हैं। इस तरह उनको अपने मात्र डेढ़ बीघे खेत में धनिया की खेती से सालाना दो लाख रुपए से अधिक की कमाई हो जाती है।

इसी तरह पंजाब में बिहार-उत्तर प्रदेश के चार-पांच लाख प्रवासी मजदूर सब्जियों की खेती से ऊंची कमाई कर रहे हैं। सीतामढ़ी (बिहार) के मदन शाह बताते हैं कि उन्होंने पंजाब के स्थानीय किसान से पचास हजार रुपए के सालाना किराए पर पंद्रह एकड़ जमीन लेकर उसमें धनिया के साथ ही अन्य सब्जियों की भी फसल रोप दी। तैयार फसल वह लुधियाना की मंडियों में बेचने लगे। उससे उन्हे प्रति एकड़ पचीस हजार रुपए से अधिक की कमाई हुई है। इससे पहले वह प्रति एकड़ एक लाख रुपए तक कमा चुके हैं। वह बताते हैं कि धनिया की फसल जल्दी तैयारा हो जाने से समय पर नकदी मिल जाती है, जिससे वह अपनी लाखों की बचत के भरोसे ही बाकी तरह की सब्जियों से भी भरपूर मुनाफा पा ले रहे हैं।

अलीगढ़ (उ.प्र.) का गांव चेंडोला सुजानपुर भी धनिया की खेती के लिए मशहूर हो रहा है। यहां का धनिया तो दिल्ली-कश्मीर तक की मंडियों में महक रहा है। लगभग साढ़े पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के अस्सी फीसदी किसान सिर्फ धनिया की खेती कर रहे हैं। हां, राजस्थान में जरूर इस बार धनिया की खेती घाटे का सौदा रही क्योंकि मौसम की मार से झालावाड़ इलाके में इसकी पूरी खेती बर्बाद हो गई।

जानकर चौक जाएंगे आप, इस देश में हैं 1रूपय की इतनी कीमत

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 हमारे देश में आज कल 1 रूपय के सिक्के की कोई वेल्यू नहीं हैं। आज कल लोग यही सोचते हैं कि आज कल 1 रूपय में कुछ नहीं मिलता हैं लेकिन आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर 1 रूपय का सिक्का भी काफी खीमती होता हैं। अगर आप 1 रूपय का सिक्का लेकर इस जगह पर जाते हैं तो वहां पर आपको काफी अमीर समझा जाएगा।

हम सभी को पता हैं कि आज कल भारत अपनी अर्थावस्था को मजबूत करने में लगा हुआ हैं। मजबूत अर्थावस्था के साथ साथ भारत आबादी में भी दूसरे स्थान पर आता हैं। भारत अपनी अर्थावस्था को मजबूत करने के लिए काफी सारे कदम उठा रहा हैं। और उनमे से काफी में वह अपना मुकाम भी हासिल कर रहा हैं।

आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यस्था में से एक होगी। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सबसे बड़ा योगदान वहां की करेंसी का होता है। आज हम आपको एक ऐसे देश के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां भारतीय मुद्रा काफी मजबूत है।

बता दें कि हम कहीं और की नहीं बल्कि वियतनाम की बात कर रहे है। वियतनाम की राष्ट्रीय मुद्रा डांग है, जो भारतीय मुद्रा के मुकाबले काफी कमजोर है। वर्तमान समय में भारतीय एक रुपए की कीमत वियतनान में 337.08 वियतनामी डांग के बराबर है। अगर आप इस खूबसूरत से देश में छुट्टियां बिताने का प्लान कर रहे हैं, तो बहुत ही सस्ते और किफायती दरों में आप यहां यात्रा कर सकते हैं।

ये लोग भूलकर भी बादाम खाने की न करें गलती.

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क्या आप जानते है बादम खाना आपको कितना महंगा पड़ सकता है। कई बार लोगों को यह कहते भी सुना होगा कि दिमाग को तेज बनाना है तो रोजाना सुबह बादाम खाए। हो सकता है आप रोजाना इसे खाते भी हो। बहुत सारे लोग स्वस्थ रहने के लिए भी इसको अपनी डाइट में शामिल करते हैं, क्योंकि इसमें में प्रोटीन, वसा, विटामिन और मिनेरल पर्याप्त मात्रा में होते हैं। इतनी ही नहीं यह हमारी स्किन के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है पर क्या आप जानते हैं कुछ लोगों के लिए बादाम का सेवन नुकसान भी दे सकता है।

मोटापे से परेशान लोग-जो लोग मोटापे से परेशान हैं, उनको भी इसका सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसमें कैलोरी और वसा बहुत अधिक मात्रा में होती है, जो वजन बढ़ाने का काम करता है।

एंटीबायोटिक दवाइयां-अगर आप किसी हेल्थ प्रॉब्लम के चलते एंटीबायोटिक मेडिसन ले रहे हैं, तो ऐसे में बादाम खाना बंद कर दें, क्योंकि बादाम में ज्यादा मात्रा में मैग्नीशियम भी होता है। इसके ज्यादा सेवन से हमारे शरीर को दवाइयों के असर पर फर्क पड़ सकता है।

हाई ब्लड प्रैशर के पेशेंट्स- जिन लोगों का ब्लड प्रैशर हाई रहता हैं, उन्हें बादाम के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि इन लोगों को नियमित तौर पर ब्लड प्रैशर की दवाईयां लेनी रहती हैं, जिनके साथ बादाम का सेवन आपको भारी पड़ सकता है।

पथरी की समस्या- जिन लोगों के किडनी में पथरी या गॉल ब्लेडर संबंधी परेशानी हो उन्हें बादाम से दूरी बनाकर रखनी चाहिए, क्योंकि इनमें ऑक्सलेट अधिक मात्रा में होता है।

पाचन क्रिया संबंधी परेशानियां-अगर आपको डाइजेशन संबंधी कोई परेशानी है तो ऐसे में आपको बादाम के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि इनमें फाइबर बहुत अधिक मात्रा में होता है जो आपकी परेशानी को और बढ़ा सकता है। अगर आपको एसिडिटी की शिकायत रहती है तो बादाम का खाना एवॉइड करें।

साग-पात की चटनी

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विभिन्न प्रकार के साग-पात की चटनियों के भी चटखारे लिये जा सकते हैं. ये साग-पात अक्सर मौसमों के बहाने हमारी मंडियों में चले आते हैं और फिर अपनी खुशबू से हमारे रसोईघर को महका देते हैं. इस बार के जायके में कुछ साग-पात और उनकी चटनी के बारे में बता रहे हैं व्यंजनों के माहिर…

हमारे देश की अद्भुत विविधता को हमारा खान-पान और ‘स्थानीय’ (प्रादेशिक) जायके जिस तरह प्रतिबिंबित करते हैं, उसकी मिसाल ढूंढ पाना कठिन है. दिलचस्प बात यह है कि जहां भाषा-बोली और पहनावा कभी-कभार अलग पहचान या विवाद को जन्म दे देते हैं, वहां ‘पराये’ व्यंजन को अपनाने में हम देर नहीं लगाते.

आप यह सवाल उठा सकते हैं कि शाकाहारियों और मांसाहारियों के बीच की खाई कम गहरी और खतरनाक नहीं तथा जिन जानवरों का मांस खाया जाता है, उनका वर्गीकरण भी कट्टरपंथी वर्जित तथा स्वीकृत में करते हैं. पवित्र तथा प्रदूषित पशुओं की प्रजाति भक्ष्य-अभक्ष्य के रूप में निर्धारित की जाति है. यह उलझी बहस फिर कभी.

यह वर्ष राष्ट्रपिता बापू के जन्म की 150वीं जयंती का है. इस मौके पर यह रेखांकित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि क्यों वह शाकाहार का हठ पालते थे. संक्षेप में, साझा रसोई में एक साथ बैठ कर खानेवाले सभी लोग निःसंकोच भाव से सब्जियां खा सकते हैं, मांसाहारी भी.

गांधी जी अपने आश्रमों में, चाहे वह दक्षिण अफ्रीका हो या फिर चंपारण का भितरवा या अहमदाबाद के निकट साबरमती या वर्धा में सेवाग्राम, आसानी से सुलभ, किफायती सामग्री को रोजमर्रा के खाने में शामिल करने की कोशिश करते रहते थे. उनके निजी सचिव महादेव देसाई के अभिन्न मित्र नरहरि देसाई की पत्नी मणिबेन ने उनके साथ बिताये अपने चंपारण प्रवास के संस्मरणों में इस बात का उल्लेख किया है कि कैसे उन दिनों बापू खाने का रस लेते थे और रोजाना ताजी चटनी पिसवाते थे.

कुछ समय पहले तक पुदीने और धनिये की पत्तियां कोई खरीदता नहीं था- दुकानदारों से खुद ही ग्राहकों को छोटी या बड़ी गड्डी मुफ्त में मिल जाती थी. देहात में तो हर छप्परवाले घर के आंगन और झोंपड़ियों के सामने या पिछवाड़े तरह-तरह के मौसमी साग की पत्तियां हरियाली बिखेरती थीं.

खेतों की मेड़ों या नमी वाली जगह उगनेवाली हरी पत्तियों को तलाशना कठिन नहीं था और यह मुंह का जायका बदलने के साथ बदलते मौसम के माफिक प्रभाव के कारण मुफीद समझी जाती थीं. जायके, तासीर और किफायत के साथ कुदरती गुणवत्ता का संयोग रोजमर्रा के खाने में अनायास होता था.

ये तमाम बातें इस घड़ी हमें इसलिए याद आ रही हैं कि हाल ही में हैदराबाद के दौरे से लौटे एक मित्र ने हमें जोंगुरा के अचार की एक शीशी उपहार में दी.

इसी बहाने हम अपने पाठकों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहते हैं कि कुछ घास-फूस सरीखी पत्तियां ऐसी हैं, जो अपने विशिष्ट स्वाद के कारण खटास-तीखेपन की वजह से अखिल भारतीय लोकप्रियता हासिल कर चुकी हैं. जोंगुरा इनमें प्रमुख है. महाराष्ट्र में यह पत्ती ‘अंबाडी’ कहलाती है, तो असम में ‘टेंगा माथा’. झारखंड में कुंद्रुम, जिसे अंग्रेजी में ‘रोसेल’ नाम से जाना जाता है, की सूखी पत्तियों का चूर्ण चाव से खाया जाता है. तटवर्ती ओड़िशा निवासी भी इससे अपरिचित नहीं.

प्रयोगशाला में शोध करनेवालों ने इस बात की पुष्टि की है कि जोंगुरा में अनेक पौष्टिक तत्व मौजूद हैं (सूक्ष्म मात्रा में खनिज सरीखे), जो सेहत के लिए फायदेमंद हैं.

इसका सबसे अधिक चलन आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में है, पर नामभेद के साथ इसके साम्राज्य की सरहद कर्नाटक और महाराष्ट्र से लेकर झारखंड, असम तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों तक पहुंचती है. यह गरीबपरवर जंगली घास चटनी या चटनीनुमा अचार के रूप में खायी-खिलायी जाती है और इसे सिर्फ नमक और हरी मिर्च की ही दरकार होती है. संसाधनहीन किसान-मजदूर रागी के मुद्दे (उबले लड्डू), ज्वार की भाखरी के साथ इसे अपनी मित्र सब्जी की तरह इस्तेमाल करते हैं.

साधन-संपन्न लोग जोंगुरा का उपयोग दूसरी सब्जियों, दाल तथा सामिष व्यंजनों के साथ जुगलबंदी के तौर पर करते हैं. जोंगुरा का मजा कुछ-कुछ पुदीने वाले साग सरीखा होता है, तो ‘पप्पू’ (दाल) अवध के सगपैता की याद अनायास दिलाती है.

रोचक तथ्य

कुछ घास-फूस सरीखी पत्तियां ऐसी हैं, जो अपने विशिष्ठ स्वाद के कारण खटास-तीखेपन की वजह से अखिल भारतीय लोकप्रियता हासिल कर चुकी हैं. जोंगुरा इनमें प्रमुख है.

महाराष्ट्र में जोंगुरा की पत्ती को ‘अंबाडी’ कहते हैं, तो असम में इसे ‘टेंगा माथा’ कहते हैं.झारखंड में कुंद्रुम, जिसे अंग्रेजी में ‘रोसेल’ कहा जाता है, की सूखी पत्तियों का चूर्ण चाव से खाया जाता है. तटवर्ती ओडिशा निवासी भी इससे परिचित हैं.