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धान विक्रय के लिए किसानों को एग्रीस्टैक पंजीयन कराना अनिवार्य

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छत्तीसगढ़ सरकार किसानों के जीवन में तकनीक के माध्यम से सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। इसी कड़ी में अब राज्य में एग्रीस्टैक पोर्टल को तेजी से लागू किया जा रहा है। यह पोर्टल किसानों के लिए एक डिजिटल सार्वजनिक संरचना है, जो खेती से जुड़ी सभी प्रमुख जानकारियों को एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराता है।

क्या है एग्रीस्टैक पोर्टल

एग्रीस्टैक एक सुरक्षित डिजिटल सिस्टम है, जिसमें किसान की पहचान, जमीन का रिकॉर्ड, फसल की जानकारी और कृषि संबंधी गतिविधियों का पूरा विवरण एकीकृत रूप से दर्ज किया जाता है। इस डेटा का उपयोग किसान की सहमति से ही साझा किया जाता है, जिससे उसकी निजी जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

धान विक्रय के लिए अनिवार्य पंजीयन

इस वर्ष राज्य में सहकारी समितियों के माध्यम से धान विक्रय करने वाले किसानों के लिए एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। यह कदम पारदर्शिता लाने और किसानों को योजनाओं का लाभ सीधे उनके खाते तक पहुंचाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

किसानों को मिल रहे सीधे लाभ

एग्रीस्टैक पोर्टल के माध्यम से किसानों को अब योजनाओं, सब्सिडियों और सहायता राशि की जानकारी सीधे मिल रही है। इससे न केवल बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी, बल्कि लाभ वितरण की प्रक्रिया भी तेज और पारदर्शिता आएगी।

पंजीकरण की प्रक्रिया सरल और निःशुल्क

किसानों के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया बेहद आसान है। किसान अपने आधार कार्ड और ऋण पुस्तिका के साथ नजदीकी कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) या अपनी सहकारी सोसायटी में जाकर निःशुल्क पंजीकरण करवा सकते हैं। पूरी प्रक्रिया कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाती है और किसान को तुरंत डिजिटल पहचान प्रदान की जाती है।

24 लाख से अधिक किसान जुड़ चुके हैं

राज्यभर में अब तक 24 लाख से अधिक किसानों ने एग्रीस्टैक पोर्टल से जुड़कर डिजिटल कृषि सेवाओं का लाभ उठाना शुरू कर दिया है। सरकार का लक्ष्य है कि आगामी रबी सत्र तक राज्य के सभी पात्र किसान इस प्लेटफॉर्म से जुड़कर लाभ उठाना सुनिश्चित करें।

डिजिटल खेती, समृद्ध किसान

एग्रीस्टैक पोर्टल भविष्य में कृषि योजनाओं की रीढ़ साबित होगा। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि खेती को वैज्ञानिक, योजनाबद्ध बनाने में मदद मिलेगी।

धान की फसलों में रोग व कीट प्रकोप से बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञों ने दी सलाह

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छत्तीसगढ़ में इन दिनों हो रही असमय बारिश के फलस्वरूप धान की फसल में झुलसा, शीथ ब्लाइट रोग और कीट प्रकोप से बचाव के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने सामयिक सलाह दी है।
कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि मौसम अनुकूल न होने के कारण धान की फसल पर विभिन्न प्रकार के रोग और कीट प्रकोप देखने को मिल रहे हैं, जिससे पैदावार प्रभावित हो सकती है। धान की फसल में झुलसा रोग के लक्षण पत्तियों पर नाव के आकार के धब्बों के रूप में दिखते हैं। इससे बचाव के लिए किसान ट्राईफ्लोक्सीस्ट्रोवीन, टेबुकोनाजोल, ट्राईसाइक्लाजोल एवं हेक्साकोनाजोल का छिड़काव करें।

इसी प्रकार शीथ ब्लाइट रोग होने पर हैक्साकोनाजोल का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। वहीं जीवाणु जनित झुलसा रोग के प्रकोप पर खेत से अतिरिक्त पानी निकालकर 3-4 दिन तक खुला रखने एवं प्रति हेक्टेयर 25 किलो पोटाश डालने के साथ कासुगेमाइसीन, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, स्ट्रैप्टोसाइक्लिन या प्लान्टोमाइसिन का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। कीट नियंत्रण के लिए तनाछेदक कीट की निगरानी हेतु फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करें। भूरा फुदका कीट के प्रकोप की स्थिति में पाईमेट्राजीन एवं डिनोटेफेरोन का छिड़काव प्रभावी रहेगा।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे समय पर इन उपायों को अपनाकर धान की फसल को सुरक्षित रखें और बेहतर उत्पादन लें। गौरतलब इस खरीफ सीजन में प्रदेश इस में अच्छी बारिश हुई, जिससे अच्छी फसल की संभावना है। वर्तमान कुछ दिनों में प्रदेश में असमय बारिश से कीट प्रकोप व झुलसा रोग बढ़ गए है। बता दें कि खेतों में धान की फसल लहलहा रही है तथा कुछ जगहों पर धान फूटने की स्थिति में है।

चिकित्सकों ने सर्जरी कर कैंसर पीड़ित मरीज की जान बचाने में सफलता हासिल की

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डराने के लिए कैंसर का नाम ही काफी है शुरूआती अवस्था में कोई तकलीफ दर्द नहीं होने के कारण मरीज इसे नजरअंदाज या लापरवाही के चलते ध्यान नहीं देता है, परन्तु जब तक कुछ तकलीफ हो तब तक मरीज का कैंसर बहुत आगे की चरण तक पहुंच चुका होता है तब यह जानलेवा और खतरनाक भी हो जाता है। कुछ ऐसी परिस्थिति से संघर्ष करते हुए बिलासपुर निवासी मरीज लक्ष्मण 61 वर्षीय मुंह में कैंसर के ग्रसित सिम्स बिलासपुर के दंत चिकित्सा विभाग में इलाज के लिए पहुंचा। तंबाकू के कई वर्षों का सेवन करने से उसके मुंह में कैंसर हो गया था, लेकिन सिम्स के दंत चिकित्सा विभाग के चिकित्सकों ने जटिल इलाज व सर्जरी से मरीज की जान बचाने के सफल हुए है। चूंकि उम्र अधिक होने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है। इस स्थिति में इलाज करना चुनौती पूर्ण हो जाता है।

मरीज का कैंसर इतना बढ़ गया था, कि गले में उपस्थित लिंफ नोड में सूजन काफी बड़ा हो गया था। जिसका साइज 7×6 सेमी बढ़ गया था। जांच में पाया गया की कैंसर की अंतिम स्टेज से ग्रसित होने की पुष्टि हो गई। दंत चिकित्सा विभाग के चिकित्सकों ने सर्जरी का निर्णय लिया, इलाज के लिए आवश्यक खून जांच एक्स-रे और सिटी स्केन कराकर सुनियोजित तरीके से 7-8 घंटे की जटिल सर्जरी कर पूरा किया गया। इस सर्जरी को तीन भागों में किया गया। इसमें कैंसर के साथ संक्रमित जबड़े के हिस्से को निकाला गया। कैंसर जो गर्दन में फैल गया था, उसको निकाला गया और अंत में कैंसर को निकालने के बाद खाली जगह पर छाती से मांस जिसे पीएमएमसी फ्लैप कहते हैं, का टुकड़ा निकालकर लगाकर सर्जरी पूरी की गई।

सर्जरी को डॉ. भूपेन्द्र कश्यप के मार्गदर्शन में किया गया। सर्जरी करने वाली टीम में डॉ. संदीप प्रकाश (ओरल एवं मैक्जिलोफेसियल सर्जन) विभागाध्यक्ष, डॉ. जण्डेल सिंह ठाकुर, डॉ. केतकी किनिकर, डॉ. हेमलता राजमणी, डॉ. प्रकाश खरे, डॉ. सोनल पटेल, के अलावा निश्चेतना विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मधुमिता मूर्ति, एवं मेजर ओटी के अन्य चिकित्सक, स्टाफ, वार्ड बॉय तथा रेडियोडायग्नोसिस की विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना सिंह एवं उनके अन्य स्टाफ सहित, सबके संगठित सहयोग से किया गया है। छ.ग. आयुर्विज्ञान सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति एवं चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह के प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन से दंत चिकित्सा विभाग कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। समय समय पर दंत चिकित्सा विभाग श्रेष्ठता साबित कर रहा है।

CJI बीआर गवई ने दिखाया बड़ा दिल, जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील को किया माफ, नहीं होगा कोई ऐक्शन

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प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने बड़ा दिल दिखाते हुए उस वकील को माफ कर दिया है, जिसने उनपर जूता फेंकने की कोशिश की थी. सीजेआई पर जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी. शीर्ष सूत्रों ने सोमवार को सीएनएन-न्यूज18 को यह जानकारी दी. सीजेआई ने अधिकारियों से इस कृत्य को “अनदेखा” करने को कहा.
यह घटना उस समय हुई जब प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ वकीलों द्वारा मामलों की सुनवाई कर रही थी. कुछ गवाहों ने कहा कि वकील ने मंच के पास पहुंचने के बाद अपना जूता निकालकर प्रधान न्यायाधीश पर फेंकने की कोशिश की, जबकि कुछ ने कहा कि ऐसा लग रहा था कि वह कागज़ का एक रोल फेंक रहा था.
हालांकि, घटना से हैरान गवई ने वकीलों से हंगामे को नजरअंदाज करने और अपनी दलीलें जारी रखने को कहा. उन्होंने कहा, “इन सब से विचलित मत होइए. हम विचलित नहीं हैं. ये चीजें मुझ पर असर नहीं डालती हैं.
“वकील 2011 से बार का अस्थायी सदस्य है. हम उसकी सदस्यता रद्द करने की कार्रवाई शुरू करेंगे. मैंने सीजेआई से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वह अभी भी बेंच पर थे. सोशल मीडिया में सीजेआई की टिप्पणियों की गलत व्याख्या के कारण यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. कानून अपना काम करेगा.”
इस बीच, जब वकील को अदालत कक्ष से बाहर ले जाया जा रहा था, तो उन्हें यह कहते हुए सुना गया: “‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे’ (सनातन धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे)”. यह घटना संभवतः 16 सितंबर के मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई की टिप्पणियों से जुड़ी हुई थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में यूनेस्को की विश्व धरोहर खजुराहो मंदिर परिसर के हिस्से, जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की सात फुट की मूर्ति के पुनर्निर्माण और पुनः स्थापित करने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था.

पहले मणिपुर, अब महाराष्ट्र… भारत में कौन सा गेम खेल रहे अमेरिका के एक्स आर्मी मैन, निशाने पर हिन्दू

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भारत में हाल के दिनों में अमेरिकी नागरिकों की संदिग्ध गतिविधियों ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं. पहले मणिपुर में अमेरिका के एक पूर्व सैनिक को ड्रोन और रक्षा उपकरणों की सप्लाई करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. वहीं अब महाराष्ट्र के भिवंडी में एक अमेरिकी नागरिक और यूएस आर्मी के रिटायर्ड मेजर को अवैध धर्मांतरण करवाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.
पहले मणिपुर और अब महाराष्ट्र के भिवंडी में अवैध धर्मांतरण की कोशिश से अमेरिका के पूर्व सैनिकों और मिशनरियों की भूमिका पर शक गहराता जा रहा है. क्या यह एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है, जिसमें हिंदू समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है?
महाराष्ट्र में क्या कर रहा था पूर्व अमेरिकी सैनिक?
महाराष्ट्र के ठाणे स्थित भिवंडी तालुका में अवैध धर्मांतरण के मामले में पुलिस ने एक अमेरिकी नागरिक जेम्स वॉटसन समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है. 58 वर्षीय जेम्स वॉटसन अमेरिकी सेना में मेजर रह चुका है. पुलिस के अनुसार, वॉटसन भारत में बिजनेस वीज़ा पर आया था, लेकिन वह यहां अवैध तरीके से धर्मांतरण के काम में जुट गया.

वॉटसन ने कथित रूप से ग्रामीणों से कहा कि हिंदू धर्म अंधविश्वास पर आधारित है और ईसाई धर्म अपनाने से खुशहाली और समृद्धि मिलेगी. उन्होंने दावा किया कि बीमारियां ईसा मसीह की प्रार्थना और प्रसाद के रूप में दी जाने वाली शराब पीने से दूर हो जाएंगी. हालांकि पुलिस ने उसके भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 (धार्मिक भावनाएं भड़काने के लिए दुर्भावनापूर्ण कृत्य), धारा 302 (जानबूझकर धार्मिक भावनाएं आहत करना), विदेशी नागरिक अधिनियम (वीज़ा नियमों के उल्लंघन) और महाराष्ट्र के 2013 के एंटी-ब्लैक मैजिक कानून के तहत मामला दर्ज करते हुए गिरफ्तार कर लिया है.
मणिपुर में क्या हुआ था?

इससे पहले पिछले साल दिसंबर में अमेरिका के 40 वर्षीय मिशनरी और पूर्व सैनिक डैनियल स्टीफन कोर्नी को लेकर चौंकाने वाली खबरें आई थी. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्नी ने मणिपुर में कूकी उग्रवादियों को ड्रोन और बुलेटप्रूफ जैकेट्स बांटे. यह घटना तब सामने आई जब उनके यूट्यूब चैनल ‘फूल फॉर क्राइस्ट’ पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे नक्सल प्रभावित इलाकों और हिंसा से जूझते मणिपुर में ‘युद्ध क्षेत्र’ का दौरा करते दिखे. रिपोर्ट के अनुसार, कोर्नी ने कूकी नागरिकों को राहत सामग्री के साथ-साथ ड्रोन और बुलेटप्रूफ वेस्ट भी दिए, जिनका इस्तेमाल “मेइती हिंदुओं” के खिलाफ निगरानी और संभावित हमलों के लिए किया जा सकता था.
क्या है असली मकसद?
अमेरिकी सेना में सेवा का अनुभव होने की बात भी सामने आई, जिसने इस घटना को और संदिग्ध बना दिया. मणिपुर में जातीय हिंसा के बीच यह कदम भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना गया था. कहा यह गया कि ये मिशनरी गतिविधियां हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर भारत की सामाजिक सौहार्द को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं में एक पैटर्न दिखाई दे रहा है. मणिपुर में उग्रवादियों को सैन्य सहायता और महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण के प्रयास दोनों ही भारत की आंतरिक स्थिरता को चुनौती दे सकते हैं. डैनियल कोर्नी और जेम्स वाटसन जैसे व्यक्तियों का अमेरिकी सेना से जुड़ा होना संयोग नहीं माना जा रहा. कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि यह अमेरिका के धार्मिक संगठनों के विस्तार का हिस्सा हो सकता है, जो भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देशों में प्रभाव बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं.

पेंट, स्याही में डलता है जो जहर, उसे क्यों मिलाया जाता है कफ सिरप में? वो भी लिमिट से कई हजार गुना ज्यादा

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राजस्‍थान और मध्‍य प्रदेश में हाल ही के दिनों में कफ सिरप पीने से 16 बच्चों की मौत से देश सदमे में है. तमिलनाडु औषधि नियंत्रण विभाग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जिस कोल्ड्रिफ सिरप को बच्‍चों को दिया गया था उसमें डाई एथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) की मात्रा स्वीकार्य स्तर से अधिक पाई गई है. इस रिपोर्ट के बाद कई राज्‍यों ने कोल्ड्रिफ सिरप पर बैन लगा दिया गया. मध्य प्रदेश के औषधि नियंत्रक की जांच में भी सामने आया है कि सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) की मात्रा 48% से ज्यादा पाई गई, जबकि स्वीकार्य सीमा केवल 0.1% है. आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस डीईजी को सिरप में मिलाया गया है उसका इस्‍तेमाल ब्रेक फ्लूइड्स, पेंट, स्याही आदि बनाने में होता है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन भी कई बार चेतावनी दे चुका है कि दवाओं में इसका इस्‍तेमाल बहुत घातक है. डब्‍ल्‍यूएचओ का यह दावा सच भी साबित हो चुका है, क्‍योंकि डीईजी मिली दवाएं पीने से दुनिया के कई देशों में बच्‍चों की मौत हो चुकी है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दवा कंपनियां इस ‘जहर’ को दवाओं में मिलाती ही क्‍यों हैं?
इस सवाल का जवाब जानने से पहले हम डीईजी के बारे में कुछ अहम जानकारियां आपको देते हैं. डाई एथिलीन ग्लाइकॉल एक रंगहीन और गंधहीन अल्कोहलिक कंपाउंड है. रेजिन, प्लास्टिसाइजर्स,ब्रेक फ्लुइड, कुछ लुब्रिकेंट, लोशन, क्रीम, डियोडोरेंट आदि में नमी बनाए रखने,रंग, स्याही तथा प्रिंटिंग कार्यों में सॉल्वेंट और घुलनशील योजक के रूप में किया जाता है. अगर हम साधारण शब्‍दों में कहें तो यह जहर है और इसे खाद्य पदार्थों से दूर रखने की ही सिफारिश की जाती है. यह इतना घातक है कि एक किलोग्राम में 1 से 2 मिलीलीटर एथिलीन ग्लाइकॉल मिलाने पर ही यह इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकता है. यही वजह है कि भारत में कुछ दवाओं में इसे 0.01 फीसदी मात्रा में ही मिलाने की अनुमति है.

ऐसा नहीं है कि दवा बनाने में डाई एथिलीन ग्लाइकॉल डालना कोई मजबूरी है. इसके बिना भी दवाएं बनाई जा सकती हैं. दरअसल, कंपनियां पैसा बचाने के लिए इसका इस्‍तेमाल करती हैं. डाई एथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) और एथिलीन ग्लाइकॉल का इस्‍तेमाल पीने वाली दवाओं में सॉल्वेंट्स के रूप में किया जाता है. कफ सिरप में इसका यूज उसे मीठा बनाने के लिए भी किया जाता है. वैसे कायदे से सॉल्‍वेंट के रूप में ग्लिसरीन या प्रोपलीन ग्लाइकॉल का इस्‍तेमाल करना चाहिए. क्‍योंकि ये दोनों ही डीईजी के मुकाबले महंगे होते हैं तो कंपनियां अवैध रूप से ज्‍यादा मात्रा में दवाओं में डीईजी मिला देती हैं. मध्‍य प्रदेश में कोल्ड्रिफ सिरप में 48 फीसदी डीआईजी पाया पाया गया, जबकि स्‍वीकृत मात्रा सिर्फ 0.01 फीसदी है.

डाइएथिलीन ग्लाइकोल एक जहरीला पदार्थ है. इसका सबसे ज्‍यादा असर किडनी पर होता है. यह शरीर में जाकर ऑक्सालिक एसिड और ग्लाइकोलिक एसिड जैसे जहरीले तत्वों में टूट जाता है, जो गुर्दों की कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं. इससे गुर्दे फेल होने तक की नौबत आ जाती है.इसके अलावा डीईजी नर्व सिसटम और दिल पर भी असर करता है.

कौन हैं रतन टाटा के करीबी विजय सिंह, जिन्‍हें हटाए जाने पर ग्रुप में हो गया बवाल, दो गुट में बंट गया टाटा संस

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वेटरन रतन टाटा के निधन के बाद से ही टाटा समूह में सबकुछ अच्‍छा नहीं चल रहा है. शुरुआत में तो यह बातें अंदरखाने ही चलती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे सबकुछ सतह पर आ गया. अब तो हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सरकार को भी इसमें हस्‍तक्षेप करना पड़ा है. टाटा समूह में जारी विवाद पर विराम लगाने के लिए सोमवार को दिल्‍ली में केंद्र सरकार के मंत्रियों और टाटा समूह के शीर्ष अधिकारियों के बीच बातचीत भी हुई. सुनने में आ रहा है कि सबसे ज्‍यादा विवाद रतन टाटा के करीबी माने जाने वाले विजय सिंह को हटाए जाने को लेकर हो रहा है. आखिर विजय सिंह कौन हैं और सारे विवाद के केंद्र में उनका नाम क्‍यों आ रहा है.
विजय सिंह को रतन टाटा का करीबी माना जाता है. वह 1970 बैच के मध्‍य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं. उन्‍होंने साल 2007 से 2009 तक भारत के रक्षा सचिव के रूप में भी काम किया और रिटायर होने के बाद रतन टाटा ने उन्‍हें अपने साथ जोड़ लिया. रतन टाटा उन्‍हें ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्‍ट के नामित निदेशक के रूप में नियुक्‍त कर दिया था. उनकी आयु 70 साल पूरी होने पर साल 2018 में वह बोर्ड से हट गए थे, लेकिन रतन टाटा ने साल 2022 में आयु सीमा में छूट देकर उन्‍हें दोबारा शामिल कर लिया. बाद में उन्‍हें टाटा ट्रस्‍ट का उपाध्‍यक्ष भी बना दिया गया.

क्‍यों शुरू हुआ विवाद
विजय सिंह को हटाए जाने का विवाद पिछले साल अक्‍टूबर में रतन टाटा के निधन के बाद से ही शुरू हो गया था. समूह में पनपे आंतरिक मतभेदों की वजह से विजय सिंह को हटाने की कवायद शुरू हो गई. पिछले महीने सितंबर में टाटा ट्रस्‍ट की बोर्ड मीटिंग में 7 ट्रस्‍टी में से 4 ट्रस्टियों ने रतन टाटा के रहने के दौरान ही उनकी नियुक्ति का विरोध किया था. इसमें प्रमित झावेरी, डेरियस खंबाटा, मेहली मिस्‍त्री और जहांगीर ने विजय सिंह का विरोध किया था. ट्रस्टियों ने सिंह को बोर्ड में होने वाली चर्चाओं की जानकारी व अन्‍य फैसलों का अपडेट नहीं देते थे.

नोएल से अलग जाकर लिया फैसला
रतन टाटा के करीबी होने के नाते नोएल टाटा ने भी विजय सिंह का हमेशा समर्थन किया था. इसके साथ वेणु श्रीनिवासन ने भी उनका समर्थन किया, लेकिन वोटिंग के जरिये उन्‍हें हटा दिया गया. हालांकि, विवाद बढ़ाने पर सिंह ने खुद ही इस्‍तीफा दे दिया, फिर भी वह ट्रस्‍टी बने रहे. विजय सिंह को हटाने के बाद टाटा ट्रस्‍ट में दो गुट बन गए. इस विवाद से टाटा संस के नियंत्रण, नामित निदेशकों की नियुक्ति और टाटा कैपिटल के आईपीओ को लेकर विवाद बढ़ा है. एक ट्रस्‍टी ने ईमेल करके वेणु श्रीनिवासन को हटाने की बात कही थी. इससे टाटा संस पर कब्‍जा किए जाने जैसी स्थिति पैदा हो गई.

सरकार ने किया हस्‍तक्षेप
टाटा संस का विवाद इस कदर बढ़ गया है कि सरकार को भी इस 157 साल पुराने कारोबारी समूह को चिंता शुरू हो गई. टाटा समूह देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना है और इसीलिए सरकार को लेकर लेकर चिंता हो रही है. यही वजह है कि सरकार के दो मंत्रियों और नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, एन चंद्रशेखरन और डेरियस खंबाटा के साथ बैठक की है. सरकार की मंशा है कि ट्रस्‍टीज के बीच सुलह हो और टाटा संस की लिस्टिंग सुनिश्चित हो सकेगी. सरकार ने यह हस्‍तक्षेप करोड़ों निवेशकों और राष्‍ट्रीय हितों को देखते हुए किया है.

कौन हैं रतन टाटा के करीबी विजय सिंह, जिन्‍हें हटाए जाने पर ग्रुप में हो गया बवाल, दो गुट में बंट गया टाटा संस

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वेटरन रतन टाटा के निधन के बाद से ही टाटा समूह में सबकुछ अच्‍छा नहीं चल रहा है. शुरुआत में तो यह बातें अंदरखाने ही चलती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे सबकुछ सतह पर आ गया. अब तो हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सरकार को भी इसमें हस्‍तक्षेप करना पड़ा है. टाटा समूह में जारी विवाद पर विराम लगाने के लिए सोमवार को दिल्‍ली में केंद्र सरकार के मंत्रियों और टाटा समूह के शीर्ष अधिकारियों के बीच बातचीत भी हुई. सुनने में आ रहा है कि सबसे ज्‍यादा विवाद रतन टाटा के करीबी माने जाने वाले विजय सिंह को हटाए जाने को लेकर हो रहा है. आखिर विजय सिंह कौन हैं और सारे विवाद के केंद्र में उनका नाम क्‍यों आ रहा है.
विजय सिंह को रतन टाटा का करीबी माना जाता है. वह 1970 बैच के मध्‍य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं. उन्‍होंने साल 2007 से 2009 तक भारत के रक्षा सचिव के रूप में भी काम किया और रिटायर होने के बाद रतन टाटा ने उन्‍हें अपने साथ जोड़ लिया. रतन टाटा उन्‍हें ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्‍ट के नामित निदेशक के रूप में नियुक्‍त कर दिया था. उनकी आयु 70 साल पूरी होने पर साल 2018 में वह बोर्ड से हट गए थे, लेकिन रतन टाटा ने साल 2022 में आयु सीमा में छूट देकर उन्‍हें दोबारा शामिल कर लिया. बाद में उन्‍हें टाटा ट्रस्‍ट का उपाध्‍यक्ष भी बना दिया गया.

क्‍यों शुरू हुआ विवाद
विजय सिंह को हटाए जाने का विवाद पिछले साल अक्‍टूबर में रतन टाटा के निधन के बाद से ही शुरू हो गया था. समूह में पनपे आंतरिक मतभेदों की वजह से विजय सिंह को हटाने की कवायद शुरू हो गई. पिछले महीने सितंबर में टाटा ट्रस्‍ट की बोर्ड मीटिंग में 7 ट्रस्‍टी में से 4 ट्रस्टियों ने रतन टाटा के रहने के दौरान ही उनकी नियुक्ति का विरोध किया था. इसमें प्रमित झावेरी, डेरियस खंबाटा, मेहली मिस्‍त्री और जहांगीर ने विजय सिंह का विरोध किया था. ट्रस्टियों ने सिंह को बोर्ड में होने वाली चर्चाओं की जानकारी व अन्‍य फैसलों का अपडेट नहीं देते थे.

नोएल से अलग जाकर लिया फैसला
रतन टाटा के करीबी होने के नाते नोएल टाटा ने भी विजय सिंह का हमेशा समर्थन किया था. इसके साथ वेणु श्रीनिवासन ने भी उनका समर्थन किया, लेकिन वोटिंग के जरिये उन्‍हें हटा दिया गया. हालांकि, विवाद बढ़ाने पर सिंह ने खुद ही इस्‍तीफा दे दिया, फिर भी वह ट्रस्‍टी बने रहे. विजय सिंह को हटाने के बाद टाटा ट्रस्‍ट में दो गुट बन गए. इस विवाद से टाटा संस के नियंत्रण, नामित निदेशकों की नियुक्ति और टाटा कैपिटल के आईपीओ को लेकर विवाद बढ़ा है. एक ट्रस्‍टी ने ईमेल करके वेणु श्रीनिवासन को हटाने की बात कही थी. इससे टाटा संस पर कब्‍जा किए जाने जैसी स्थिति पैदा हो गई.

सरकार ने किया हस्‍तक्षेप
टाटा संस का विवाद इस कदर बढ़ गया है कि सरकार को भी इस 157 साल पुराने कारोबारी समूह को चिंता शुरू हो गई. टाटा समूह देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना है और इसीलिए सरकार को लेकर लेकर चिंता हो रही है. यही वजह है कि सरकार के दो मंत्रियों और नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, एन चंद्रशेखरन और डेरियस खंबाटा के साथ बैठक की है. सरकार की मंशा है कि ट्रस्‍टीज के बीच सुलह हो और टाटा संस की लिस्टिंग सुनिश्चित हो सकेगी. सरकार ने यह हस्‍तक्षेप करोड़ों निवेशकों और राष्‍ट्रीय हितों को देखते हुए किया है.

श्रीलंकाई लुटेरों ने समुद्र में मचाया कहर, 11 मछुआरों को दरांती से काटा, लूट ले गए नाव का इंजन और कीमती सामान

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समुद्र में मछली पकड़ने का काम तमिलनाडु के तटीय गांवों के लोगों की आजीविका का आधार है, लेकिन यह काम खतरों से भरा हुआ भी है. दरअसल, हाल ही में नागपट्टिनम जिले के नाम्बियार नगर गांव के 11 मछुआरों पर श्रीलंका से आए समुद्री लुटेरों ने क्रूर तरीके से हमला कर दिया. यह हमला इतना भयानक था कि सभी मछुआरे गंभीर रूप से घायल हो गए और उनमें से एक की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है. लुटेरों ने न केवल मछुआरों से मारपीट की, बल्कि उनकी नाव, मछली और कीमती उपकरण भी लूटकर ले गए. यह घटना मछुआरों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. स्थानीय लोग और मछुआरा संगठन सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
हमले का भयावह दृश्य
दरअसल, यह दर्दनाक घटना तब हुई, जब नाम्बियार नगर के 11 मछुआरे रोजाना की तरह नाव लेकर अरब सागर में मछली पकड़ने निकले थे. पुलिस के अनुसार, यह हमला समुद्र के बीच हुआ, जब श्रीलंका की ओर से आए समुद्री लुटेरे अचानक उनकी नाव के पास पहुंचे. लुटेरों ने मछुआरों पर धारदार दरांती, लोहे की रॉड और मोटे लकड़ी के डंडों से ताबड़तोड़ हमला कर दिया. मछुआरे इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं थे और उन्हें बचाव का मौका भी नहीं मिला. हमलावरों ने बेरहमी से उन पर प्रहार किए, जिससे सभी मछुआरे बुरी तरह घायल हो गए.

दिल्ली के ‘तीन मूर्ति’ का इजरायल कनेक्शन, हाइफा के बच्चे भी जानेंगे, क्या आपने सोचा किसकी हैं वो तीनों मूर्तियां

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इजरायल में लोग कह रहे हैं कि वो अपनी किताबों में जो इतिहास पढ़ाया जाता है वो दुरुस्त करेंगे? ये मत सोचना कि उनका इतिहास है, वो जानें कि वो अपने बच्चों का क्या पढ़ाएंगे, हम तो यहां अपने इतिहास से ही जूझ रहे हैं. जो इजरायल में करने जा रहे हैं, उसका हमसे सीधा नाता है और वो जो अपने बच्चों को पढ़ाने जा रहे हैं वो हमें भी अपने बच्चों को पढ़ाने की जरूरत है. उससे पहले ये तो जान लें कि वो है क्या? अभी जब ब्रिटेन ने भी फिलीस्तीन को मान्यता दे दी कुछ दिन पहले तो कई लोगों ने इतिहास भी खंगाला कि ब्रिटेन का रोल क्या था इजरायल बनाने में और इतने दिनों तक वो फिलीस्तीन को क्यों नहीं मान्यता दे रहा था.
ऐसे में कहानी गई पिछली सदी में क्योंकि कहानी ये है जहां अब इजरायल है वहां तुर्की का राज हुआ करता था. वो ऑटोमन तुर्क साम्राज्य का हिस्सा था. तुर्कों का बहुत बड़ा साम्राज्य था- ऑटोमन तुर्क साम्राज्य. तुर्की से पूरे अरब से लेकर उत्तरी अफ़्रीका तक फैले राज्य में ये इलाका भी था, जहां आज इजरायल है. फिलीस्तीन कहते थे इलाके को, हालांकि कोई ऐसा नक्शा काट कर बॉर्डर बना कर कोई देश नहीं था लेकिन ये इलाका भी तुर्क साम्राज्य में था.यहां बंजर रेगिस्तान था ज्यादातर तो तुर्क जागीरदार, यहां अपनी मिल्कियत चलाते थे. पहली वर्ल्ड वॉर हुई, उसमें ऑटोमन तुर्क जर्मनी के साथ थे और ब्रिटेन था दूसरी तरफ. उस जंग में ब्रिटेन ने तुर्कों को हरा दिया था और इस फिलीस्तीन वाले इलाके पर जब कब्जा कर लिया था. उसके बाद ही तो ब्रिटेन ने वहां दुनिया भर के यहूदियों को जमीनें देने की योजना शुरू की थी कि यहूदी यहां आ कर बस जाएं. 1918 में जंग जीतने के बाद ब्रिटेन ने ये किया था और ये आगे चल कर यहूदियों का देश ही बन गया. आज तक फिलीस्तीनी वही तो लड़ाई लड़ रहे हैं कि यहां पर बसाए गए और फिर वहां अपना देश ही बना लिया.
हाइफा की जंग ब्रिटेन नहीं, भारत ने जीती थी
अब आप कहोगे कि वो तो ठीक है लेकिन इसका हमसे क्या मतलब? तो सुनिये इजरायल क्या करने जा रहा है अपनी किताबों में. जहां उसकी किताबों में ये पढ़ाया जाता थी कि ब्रिटेन की फौज ने ये जमीन आजाद करवा कर दी जिस पर आ कर यहूदी बसे और इजरायल बना, वहां पर अब किताबों में ये पढ़ाया जाएगा कि भारतीय फौजियों ने ये जमीन आजाद करवा कर दी, जहां पर यहूदी बस सके और इजरायल बन सका. वो क्यों? क्योंकि पहली वर्ल्ड वॉर में जो अंग्रेजों की सेना लड़ी थी उसमें कौन लड़े थे? भारतीय सैनिक ही तो थे. ये उसी जंग की कहानी है जिसको हमारे यहां भी लोग भूल चुके हैं- हाइफा की जंग. इसे भारतीय सैनिकों ने लड़ा था.

दिल्ली में तीन मूर्ति चौक से लोग गुजर जाते हैं. तीन मूर्ति भवन के बारे में शायद लोग जानते भी हैं कि वहां नेहरू रहते थे जब प्रधानमंत्री थे और अब वो म्यूजियम है. पर वो तीन मूर्ती क्या है और वो तीन मूर्तियां किनकी हैं ज्यादातर लोग नहीं जानते. वो तीन मूर्तियां उन्हीं फौजियों की याद में हैं, जिन्होंने वो जमीन तुर्कों से आजाद करवाई थी, जहां आज इजरायल है. वो मूर्तियां तीन ही क्यों हैं उस की भी बात करेंगे लेकिन अब तो इजरायल भी अपने बच्चों को पढ़ा रहा है कि भारतीय फौजियों का क्या रोल था उसके बनने में, तो आप भी तो जान लीजिये. ये उस भूली हुई जंग की कहानी है जो जानना सबके लिए ज़रूरी है.
जब मशीनों और तोपों से लड़ गए तलवार और भाले

ये कहानी 1918 की है, जब दुनिया आग और धुएं में जल रही थी. पहला विश्व युद्ध हो रहा था, हर तरफ ख़ून, मिट्टी और बारूद. दूर उन रेगिस्तानी पहाड़ों में, भारत की धरती से गए कुछ घुड़सवार सैनिक इतिहास रचने वाले थे. ये हिंदुस्तान के साधारण परिवारों के लोग थे, रेगिस्तान और मैदानों के बेटे, जो आजादी की उम्मीद में, ब्रिटिश झंडे तले लड़ रहे थे. उनकी कहानी सिर्फ एक जंग की नहीं, बल्कि एक नए देश इजराइल के जन्म की कहानी है. इस कहानी ने दिल्ली की सड़कों से लेकर हाइफा की किताबों तक छाप छोड़ी. 1918 में हिंदुस्तान आजाद नहीं था. ब्रिटिश राज था, जैसे कोई बड़ा शतरंज का खेल, जहां अंग्रेज हिंदुस्तानियों को अपनी मोहरों की तरह इस्तेमाल करते थे. पहली वर्ल्ड वॉर हुई तो अंग्रेजों ने 10 लाख से ज्यादा हिंदुस्तानी सेना में भर्ती कर लिये. कुछ पैसे के लिए भर्ती हुए, कुछ रोमांच के लिए, कुछ बस ज़िंदा रहने के लिए. 74,000 से ज्यादा शहीद हो गए ब्रिटेन के लिए लड़ते हुए, लेकिन उनके नाम रेत में लिखे निशान की तरह मिट गए. वैसे दिल्ली में इंडिया गेट पर उनमें कई के नाम जरूर लिखे हैं, लेकिन बहुत से गुमनाम रह गए. उधर पश्चिम एशिया में दुश्मन था ऑटोमन साम्राज्य, तुर्की से अरब तक फैला विशाल साम्राज्य, जो जर्मनी का दोस्त था. उसके कब्जे में था हाइफा, जो आज इजराइल का हिस्सा है, लेकिन तब तुर्की का एक धूल भरा बंदरगाह था. वहां तैनात थीं जर्मन मशीनगनें और तोपें क्योंकि पहली वर्ल्ड वॉर में पहली बार बड़े पैमाने पर मशीनगन का इस्तेमाल हुआ था. मशीनगनों ने कई जंगों की बाजी पलट दी थी वर्ल्ड वॉर में. अंग्रेजों को हाइफा चाहिए था क्योंकि हाइफा बंदरगाह भूमध्य सागर में था और उसी रास्ते से तुर्कों को यूरोप से यानी जर्मनी से सारा असलहा भी मिल रहा था. अंग्रेजों की कैलकुलेशन ये थी कि अगर हाइफा पर कब्जा हो जाए तो समुद्र से उसके रास्ते इस पूरे इलाके में सेना की एंट्री हो सकती थी. यानी ये हाइफा बंदरगाह उनके लिए जिंदगी की डोर था, खाना, हथियार, और जीत की राह. दिक्कत ये थी कि जर्मनी और तुर्कों ने यहां मशीन गनें लगाई हुई थी और ब्रिटिश सेना ने यहां उतारे घुड़सवार सैनिक, भाले लिये हुए. 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड, उसमें थे लगभग 400 घुड़सवार, जो भारत के तीन रजवाड़ों से आए थे. जोधपुर, मैसूर, हैदराबाद- ये वो रियासतें थीं, जिनके शासकों ने अपनी सेनाएं अंग्रेजों को दीं थीं. उन्हीं के ये घुड़सवार सैनिक थे और इनके लीडर थे मेजर दलपत सिंह, जोधपुर लैंसर्स के एक शांत, ऊंचे कद के राजपूत योद्धा. उनके पास थे मराठा घोड़े, लंबे भाले, तलवारें, और हिम्मत का जज्बा. न तोप, न मशीन गन, बस घोड़े और दिलेरी.
घोड़ों की टाप से बारूद का नशा हुआ चूर
23 सितंबर 1918 को हुक्म आया- हाइफा पर हमला. सामने थे 1,500 ऑटोमन तुर्क और जर्मन सैनिक. माउंट कार्मेल की चट्टानों में छिपे, 17 तोपों और मशीनगनों के साथ. नीचे दलदल जैसी नदी थी. मशीनगन के सामने घोड़ों पर चढ़कर लड़ना मौत को बुलावा देने जैसा था. जंग के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ था लेकिन मेजर दलपत सिंह ने अपने जवानों को इकठ्ठा किया. सबने अपनी पगड़ियां कसीं और घोड़ों को एड़ लगाई और शुरू हुई हाइफा की जंग, इतिहास की आखिरी घुड़सवार से लड़ी गई जंग. सुबह गर्म थी, धुंध भरी. जोधपुर लैंसर्स, नीली पगड़ियों में, शहर के दक्षिण से आगे बढ़े. मशीनगन की गोलियां हवा में गूंजने लगीं. दलपत ने देखा, पहाड़ी पर दुश्मन की मुख्य तोपें थीं, वो फायर कर के हर चीज को चूर-चूर कर रही थीं. मेजर दलपत ने इशारा किया- हमला करो, और दो टुकड़ियां यानि लगभग 200 घुड़सवार, तोपों की तरफ दौड़े. घोड़ों की टापों ने जमीन हिला दी, धूल का गुबार उठा. तुर्की के सैनिक आत्मविश्वास से भरे थे कि मशीनगनों के सामने घोड़े? उनको लगा ये कौन पागल हैं जो सिर्फ भालों से लड़ते हुए मौत के मुंह में आ रहे हैं. लैंसर्स गोलियों के तूफान से निकले, भाले तने हुए. 90 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से वो तोपों पर टूट पड़े. तलवारें चमकीं, भाले चुभे. तुर्क सैनिक चीखते हुए भागे. दलपत खुद आगे थे, तलवार उठाए, पर एक गोली ने उन्हें ढूंढ लिया. वो गिरे, रेत खून से लाल हो गई.

कौन था हाइफा का हीरो?
“हाइफ़ा का हीरो” 42 साल की उम्र में चला गया, मगर उनके जवान नहीं रुके. मिनटों में उन्होंने तोपखाने पर कब्जा कर लिया, 30 बंदी बना लिए, 2 मशीनगनों पर कब्जा कर लिया और ऊंटों पर लदी तोपें हथिया लीं. फिर पूर्व की दिसा से मैसूर लैंसर्स आए और हरी पगड़ियों में दक्षिण भारत के शेर थे. उन्होंने ऑस्ट्रियाई तोपखाने को चुप करा दिया, फिर हैदराबाद लैंसर्स ने पीछे से मोर्चा संभाला, तलवारें तैयार. मिलकर वो हाइफा के दरवाजों पर टूट पड़े. तुर्क निशानची छतों से गोलियां चलाते रहे, औरतें-बच्चे डर से दुबके थे. हालांकि लैंसर्स बाढ़ की तरह घुसे, तोपचियों को भाला मारा, दीवारें लांघीं और सूरज ढलते-ढलते जंग खत्म और हाइफा शहर उनके कब्जे में आ गया. 1,350 बंदी बना लिए, उनमें 35 ऑटोमन तुर्क अफसर थे, 2 जर्मन थे, 17 तोपें, 11 मशीनगनें हथिया लीं. मेजर दलपत सिंह का पार्थिव शरीर हीरो की तरह घर लाया गया.
ये युद्ध नहीं चमत्कार था …
इतिहासकार कहते हैं ये चमत्कार था. आधुनिक युद्ध में पहली बार घुड़सवारों ने एक किलेबंद शहर जीता, वो भी मशीनगन से लड़ते हुए. मिलिटरी इतिहास में दर्ज है हाइफा की जंग कि कैसे घोड़े पर भाले लिए हुए सैनिकों ने मशीनगन वाले सैनिकों को हराकर एक बंदरगाह पर कब्जा कर लिया. ब्रिटिश जनरल एडमंड एलनबी ने लंदन संदेश भेजा कि इस पूरी जंग में इससे ज़्यादा हैरतअंगेज हमला नहीं हुआ. हाइफ़ा पर कब्जा जंग का वो पड़ाव था जिसने पूरी जंग को ही मोड़ दिया. तुर्क टूट गए, उनका साम्राज्य बिखर गया और 2 महीने बाद उनको घुटने टेकने पड़े. इस हमले ने फिलिस्तीन में ब्रिटिश जहाजों को रास्ता दिया और उसी वजह के इलाके पर ब्रिटेन का कब्जा हो सका था और ये सिर्फ ब्रिटिश सेना की जीत नहीं थी. यहीं से इज़राइल बनने की कहानी शुरू हुई.

यहां से पड़ी इजरायल की नींव
ऑटोमन राज में फिलिस्तीन टुकड़ों में बंटा था, कोई यहूदी देश नहीं था, बस तुर्क हाकिमों की जमीनों के टुकड़े थे. अंग्रेजों ने घोषणा कर दी कि वहां यहूदियों को बसने के लिए ज़मीनें देंगे. उनको युद्ध के लिए यहूदी समर्थन चाहिए था और तेल से भरे इलाके पर कब्जा चाहिए था. हाइफा की जीत इस सब की चाभी थी. बंदरगाह खुला तो ब्रिटिश सैनिक लहरों की तरह आए और ऑटोमन तुर्कों को हटाया. यहूदी नेताओ ने मौका देखा और यूरोप से यहूदी शरणार्थी आए, उन्होंने जमीनें खरीदीं और बस्तियां बनाईं. हाइफा जैसे बंदरगाहों से उनके जहाज उतरे लेकिन इतिहास में ये सब ब्रिटिश सेना की जीत दर्ज हुई. हिंदुस्तानी सिपाहियों को किसी ने याद नहीं किया और उन सिपाहियों को भी तब नहीं पता था कि ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए, उन्होंने अनजाने में एक यहूदी वतन की राह खोली. अगर उन जांबाज घुड़सवारों ने अगर तोपों को और मशीनगन को ना हराया होता तो शायद तुर्क इतनी जल्दी न हारते, ब्रिटिश सेना का कब्जा और टलता. खैर, जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद के शासकों ने 1922 में दिल्ली में एक स्मारक बनवाया. तीन कांस्य मूर्तियां – लैंसर्स की. लैंसर यानी भाले से वार करने वाला.
अब सच्चा इतिहास पढ़ेंगे इजरायल के बच्चे
अब 2025 में, इज़रायल में हाइफ़ा में स्कूलों की किताबें बदल रही हैं. बच्चे पहले पढ़ते थे ब्रिटिश सेना ने उन्हें आज़ाद किया. अब पढ़ेंगे वो जाबांज़ हिंदुस्तानी थे. मेजर दलपत सिंह की अगुवाई में लैंसर्स ने भाले और तलवारों से लोहा लिया था मशीन गन से. ऐसी जंग जो मिलिट्री हिस्ट्री में कभी नहीं हुई कि घोड़े पर बैठे सैनिकों ने भालों से मशीन गन को हरा दिया हो. अब तो इजरायल में भी किताबों में पढ़ा रहे हैं तो आप तो जान लो और आने वाली पीढियों को भी बताना. बैटल ऑफ हाइफा. जोधुपर, मैसूर और हैदराबाद के लैंसर और तीन मूर्ति के बारे में भी.