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सिंगापुर की मशहूर निवेश फर्म हेलियोस कैपिटल (Helios Capital) ने भारत में  अडानी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज को चुना…

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भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों का भरोसा एक बार फिर नए शिखर पर पहुंच रहा है. इसी कड़ी में कॉरपोरेट जगत से एक बेहद बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है. एक रिपोर्ट के अनुसार, सिंगापुर की मशहूर निवेश फर्म हेलियोस कैपिटल (Helios Capital) ने भारत में अपने अगले सबसे बड़े दांव के रूप में अडानी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज (Adani Enterprises) को चुना है.

हेलियोस का मानना है कि यह शेयर आने वाले समय में भारतीय बाजार का ‘नेक्स्ट बिग पिक’ (अगला बड़ा विजेता) साबित हो सकता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सिंगापुर की इस बड़ी फर्म ने अडानी ग्रुप पर इतना बड़ा भरोसा क्यों जताया है और इसके मार्केट के लिए क्या मायने हैं.

अडानी एंटरप्राइजेज पर जताया भरोसा

हेलियोस कैपिटल मैनेजमेंट को उम्मीद है कि भारत के अडानी ग्रुप का मुख्य स्टॉक उसके फंड्स के लिए अगला बड़ा विनर साबित होगा, खासकर ऐसे मार्केट में जो ग्लोबल AI क्रेज में पीछे रह गया है. ब्लूमबर्ग के डाटा के मुताबिक, सिंगापुर की एसेट मैनेजमेंट कंपनी ने दूसरी तिमाही में अपने तीन फंड्स के जरिए अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के लगभग 770,000 शेयर खरीदे. इनमें से दो फंड्स ने पहली बार ये शेयर खरीदे थे. हेलियोस के फाउंडर समीर अरोड़ा ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि अडानी से जुड़ी कानूनी और साख (reputation) संबंधी चिंताओं का कम होना और पोर्ट्स व उभरते एनर्जी वेंचर्स में ग्रुप का बिजनेस और निवेश करने की बात को मजबूत बनाता है.

अरोड़ा ने कहा कि हमें हमेशा उनके काम करने का तरीका (execution) पसंद आया है. हमारे पास अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के शेयर हैं, इसलिए हम इसे जानते हैं. अरोड़ा के 75.8 अरब रुपये (795 मिलियन डॉलर) वाले हेलियोस फ्लेक्सी कैप फंड ने पिछले साल लगभग 8 फीसदी रिटर्न दिया है, जो अपने 91 फीसदी साथियों से बेहतर है. इस दौरान निफ्टी 500 TR में 0.7 फीसदी की गिरावट आई है.

क्यों बढ़ रहा है अडानी ग्रुप पर भरोसा

कोयला-से-पोर्ट्स तक फैले इस ग्रुप में उनका भरोसा यह दिखाता है कि प्रतिबंधों से जुड़े आरोपों पर US में समझौता करने और भ्रष्टाचार के आरोपों को सुलझाने के बाद अडानी को हाल ही में कितनी तेजी मिली है. हेलियोस उन दूसरे निवेशकों (जैसे कैपिटल ग्रुप और SBI फंड्स मैनेजमेंट) में शामिल हो गया है जो अडानी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं. अपनी बड़ी एनर्जी असेट्स का फ़ायदा उठाते हुए, अडानी डेटा सेंटर्स और डिजिटल एक्सपेंशन में लगभग 100 बिलियन डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहा है. भारत में मजबूत घरेलू सेमीकंडक्टर बेस की कमी के कारण, ग्लोबल और लोकल इन्वेस्टर्स इन दूसरे स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर मौकों पर ध्यान दे रहे हैं, जिससे अडानी के एनर्जी स्टॉक्स में जबरदस्त तेजी आ रही है.

एआई ने सॉफ्टवेयर सर्विसेज को बनाया मुश्किल

जैसे-जैसे AI टेक सेक्टर को बदल रहा है, हेलिओस के फंड्स ने इंडियन सॉफ्टवेयर सर्विसेज़ जैसे अपने कुछ सबसे बड़े पुराने निवेशों से जल्दी बाहर निकलने का फ़ैसला किया. उन्होंने कहा कि AI की वजह से आए बदलावों ने सॉफ्टवेयर सेक्टर में निवेश को मुश्किल बना दिया है, हालांकि वे अभी भी कुछ कंपनियों को लेकर पॉज़िटिव हैं. फूड डिलीवरी कंपनी इटरनल लिमिटेड और पेटीएम की मालिक कंपनी वन 97 कम्युनिकेशंस लिमिटेड उन कुछ अन्य स्टॉक्स में शामिल हैं जिन्हें लेकर अरोड़ा पॉज़िटिव हैं.

भारत का आउटलुक भी पॉजिटिव

वे भारत के ब्रॉडर आउटलुक को लेकर भी पॉजिटिव हैं और मानते हैं कि बड़ी चुनौतियां कम हो रही हैं. उन्होंने कहा कि तेल की कीमतें स्थिर हो रही हैं, जबकि विदेशी निवेश (खासकर बॉन्ड में) आने की उम्मीद से रुपए की कमजोरी कम हो सकती है. उन्होंने कहा कि फंड ने अपना निवेश फाइनेंशियल, कैपिटल गुड्स, डिफेंस, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज़ और कंज्यूमर कंपनियों की ओर बढ़ाया है. उन्होंने कहा कि दो-तीन वजहें थीं जिनकी वजह से लोग भारत को पसंद नहीं करते थे, और वे सभी वजहें अब खत्म हो रही हैं.

डीजल, इलेक्ट्रिक या फिर हाइड्रोजन.कौन सी ट्रेन है बेहतर? 5 प्वॉइंट्स में समझिए…

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भारतीय रेलवे अब एक नए दौर में कदम रखने जा रही है. कई दशकों तक डीजल इंजन ने देश के दूर-दराज इलाकों को जोड़ा, फिर इलेक्ट्रिफिकेशन ने रेलवे की तस्वीर बदल दी. अब बारी हाइड्रोजन तकनीक की है, जिसे दुनिया भविष्य के साफ-सुथरे ट्रांसपोर्ट के तौर पर देख रही है.

अगर सब कुछ तय प्लान के मुताबिक रहा, तो हरियाणा के जींद-सोनीपत रेल रूट पर भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन जल्द यात्रियों को लेकर दौड़ेगी. इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने रेल संचालन में हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक अपनाई है. आइए इसी खबर के जरिए समझते हैं कि डीजल, इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन ट्रेन में से कौन-सी बेहतर है. खर्च, मेंटेनेंस और प्रदूषण के हिसाब से किस तकनीक का पलड़ा सबसे भारी है.

सबसे पहले भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की बात करते हैं. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पीएम मोदी 17 जुलाई 2026 को पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखा सकते हैं. भारतीय रेलवे के अनुसार यह 10-कोच वाली ट्रेन 1200 किलोवाट हाइड्रोजन फ्यूल सेल सिस्टम से लैस होगी. इसकी अधिकतम ऑपरेटिंग स्पीड 75 किमी प्रति घंटा तय की गई है और इसे फिलहाल जींद-सोनीपत सेक्शन पर चलाया जाएगा. इससे पहले ट्रेन अपने ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे कर चुकी है. हालांकि आज भी भारतीय रेलवे की सबसे बड़ी ताकत इलेक्ट्रिक ट्रेनें ही हैं, जबकि डीजल इंजन अब सीमित इस्तेमाल में रह गए हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि खर्च, मेंटेनेंस, स्पीड और पर्यावरण के हिसाब से तीनों तकनीकों में कौन आगे है.

  1. खर्च

तीनों तकनीकों में रोजाना चलाने का सबसे कम खर्च इलेक्ट्रिक ट्रेनों का आता है. भारत में बड़े पैमाने पर रेलवे लाइन के इलेक्ट्रिफिकेशन के बाद ज्यादातर डीजल ट्रेनों की जगह इलेक्ट्रिक ट्रेनें चल रही हैं और करीब 95 फीसदी ट्रेनें अब इलेक्ट्रिक हैं. जहां अभी बिजली की लाइन नहीं पहुंची है या कुछ भारी मालगाड़ियां चलती हैं, वहीं डीजल इंजन का इस्तेमाल होता है. इंडिया टुडे की मार्च 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, अजमेर रेल मंडल में एक इलेक्ट्रिक ट्रेन करीब 20 यूनिट बिजली प्रति किलोमीटर खर्च करती है. 6.50 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से इसकी बिजली लागत करीब 130 रुपये प्रति किलोमीटर बैठती है. वहीं डीजल इंजन करीब 3.5 से 4 लीटर डीजल प्रति किलोमीटर खर्च करता है, जिसकी लागत लगभग 350 से 400 रुपये प्रति किलोमीटर होती है. यानी सिर्फ ईंधन के खर्च की बात करें तो डीजल ट्रेन, इलेक्ट्रिक ट्रेन से करीब 2.5 से 3 गुना महंगी पड़ती है.

हालांकि इलेक्ट्रिक ट्रेनों में सबसे बड़ा खर्च शुरुआत में होता है. रेलवे लाइन पर ओवरहेड इलेक्ट्रिफिकेशन (OHE), सब-स्टेशन और पावर सिस्टम बनाने में प्रति किलोमीटर करीब 1.5 से 2.5 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकता है. लेकिन एक बार यह इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो जाए तो अगले 30-35 साल तक इसका ऑपरेशन डीजल के मुकाबले काफी सस्ता रहता है. वहीं हाइड्रोजन ट्रेन फिलहाल सबसे महंगा विकल्प है. भारतीय रेलवे के शुरुआती अनुमान के मुताबिक, एक हाइड्रोजन ट्रेन पर करीब 80 करोड़ रुपये और हाइड्रोजन बनाने व भरने के इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 70 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकता है. इसके अलावा ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करना भी अभी महंगा है. इसलिए फिलहाल यह तकनीक हर रूट की बजाय खास रूटों के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जा रही है.

  1. मेंटेनेंस

मेंटेनेंस के मामले में इलेक्ट्रिक ट्रेनें सबसे आगे मानी जाती हैं. इनमें चलने वाले मैकेनिकल पार्ट्स कम होते हैं, इसलिए इंजन की ओवरहॉलिंग भी कम करनी पड़ती है. साथ ही रीजनरेटिव ब्रेकिंग जैसी तकनीक की वजह से ब्रेक और दूसरे पार्ट्स भी कम घिसते हैं. दूसरी तरफ डीजल इंजन में हजारों मैकेनिकल पार्ट्स होते हैं. इंजन ऑयल, फिल्टर, फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम और ट्रांसमिशन की नियमित सर्विसिंग करनी पड़ती है. इसलिए डीजल इंजन का मेंटेनेंस खर्च इलेक्ट्रिक इंजन से ज्यादा होता है. हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक के लिहाज से सबसे एडवांस है, लेकिन इसमें फ्यूल सेल स्टैक, बैटरी और हाइड्रोजन स्टोरेज सिस्टम की लगातार निगरानी करनी पड़ती है. फ्यूल सेल स्टैक की एक तय लाइफ होती है, जिसके बाद उसे बदलना पड़ता है.

  1. स्पीड और ऑपरेशन

स्पीड के मामले में सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि ट्रैक की क्षमता भी काफी अहम होती है. फिर भी तीनों सिस्टम में फर्क साफ दिखाई देता है. डीजल ट्रेनें आमतौर पर 110 से 120 किमी प्रति घंटा की अधिकतम स्पीड तक चलती हैं और भारी इंजन होने की वजह से इनकी रफ्तार पकड़ने की क्षमता थोड़ी धीमी होती है. इलेक्ट्रिक ट्रेनें बहुत तेजी से स्पीड पकड़ती हैं. यही वजह है कि वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनें इलेक्ट्रिक तकनीक पर आधारित हैं. कम समय में ज्यादा स्पीड हासिल करने की क्षमता इन्हें व्यस्त रेल रूटों के लिए सबसे बेहतर बनाती है. भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की तय ऑपरेटिंग स्पीड फिलहाल 75 किमी प्रति घंटा होगी. हालांकि ट्रायल के दौरान इससे ज्यादा स्पीड भी दर्ज की गई थी, लेकिन नियमित संचालन सुरक्षा मानकों के हिसाब से होगा. हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगातार टॉर्क देता है, जिससे चढ़ाई और कठिन रूटों पर भी इसका प्रदर्शन बेहतर रहता है.

  1. प्रदूषण और पर्यावरण

पर्यावरण के लिहाज से डीजल ट्रेन सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाती है क्योंकि इसमें सीधे जीवाश्म ईंधन जलता है. इससे कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और बारीक प्रदूषक कण निकलते हैं. इलेक्ट्रिक ट्रेन खुद धुआं नहीं छोड़ती, लेकिन उसका असली कार्बन फुटप्रिंट इस बात पर निर्भर करता है कि बिजली किस स्रोत से बनाई गई है. अगर बिजली कोयले से बनेगी तो अप्रत्यक्ष प्रदूषण रहेगा, जबकि सौर या पवन ऊर्जा से बनी बिजली के साथ यह लगभग जीरो-एमिशन ट्रांसपोर्ट बन सकती है. हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके फ्यूल सेल से सिर्फ जलवाष्प निकलती है. अगर इसमें इस्तेमाल होने वाला हाइड्रोजन भी ग्रीन हाइड्रोजन हो, तो यह लगभग जीरो-कार्बन रेल ट्रांसपोर्ट बन सकता है. यानी कम प्रदूषण के मामले में हाइड्रोजन ट्रेन सबसे बेहतर विकल्प मानी जा सकती है.

  1. यात्रियों के लिए सुविधाएं

डीजल इंजन में शोर और कंपन ज्यादा होता है, जिससे लंबे सफर में यात्रियों के आराम पर असर पड़ सकता है. इलेक्ट्रिक ट्रेनें ज्यादा शांत और स्मूद होती हैं. इनमें एसी, लाइटिंग और दूसरी ऑनबोर्ड सुविधाओं के लिए लगातार बिजली मिलती रहती है. हाइड्रोजन ट्रेन में भी सफर का अनुभव लगभग इलेक्ट्रिक ट्रेन जैसा ही होता है. फ्यूल सेल और बैटरी आधारित सिस्टम की वजह से शोर कम होता है और यात्रा ज्यादा आरामदायक लगती है. अगर टिकट की बात करें, तो रेलवे किराया इस आधार पर तय नहीं करता कि ट्रेन किस ईंधन से चल रही है. ट्रेन का किराया हमेशा दूरी, क्लास और मिलने वाली सुविधाओं के आधार पर तय किया जाता है.

भारत जैसे बड़े रेल नेटवर्क में आने वाले कई वर्षों तक इलेक्ट्रिक ट्रेनें ही रेलवे की रीढ़ बनी रहेंगी क्योंकि उनका ऑपरेशन सबसे सस्ता और बड़े स्तर पर सबसे ज्यादा व्यावहारिक है. डीजल इंजन का इस्तेमाल धीरे-धीरे और कम होता जाएगा. वहीं हाइड्रोजन ट्रेनें उन इलाकों में बेहतर विकल्प बन सकती हैं, जहां इलेक्ट्रिफिकेशन करना मुश्किल, महंगा या पर्यावरण के लिहाज से चुनौती भरा है. यानी हाइड्रोजन तकनीक इलेक्ट्रिक ट्रेनों की जगह लेने नहीं, बल्कि उन्हें सपोर्ट करने के लिए उभर सकती है. अगर आने वाले समय में ग्रीन हाइड्रोजन सस्ती हो जाती है, तो रेलवे में हाइड्रोजन ट्रेनों की भूमिका और भी बढ़ सकती है.

टाटा मोटर्स ने भारत में अपनी लोकप्रिय SUV Harrier और Safari का नया Stealth Edition लॉन्च…

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टाटा मोटर्स ने भारत में अपनी लोकप्रिय SUV Harrier और Safari का नया Stealth Edition लॉन्च कर दिया है. इस नए एडिशन में कंपनी ने कार के डिजाइन और इंटीरियर में कुछ खास बदलाव किए हैं, जिससे दोनों SUV पहले से ज्यादा स्टाइलिश और प्रीमियम नजर आती हैं.हालांकि, इंजन और परफॉर्मेंस में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

कीमत और वेरिएंट

2026 Tata Harrier Stealth Edition की एक्स-शोरूम कीमत 23.43 लाख रुपये से शुरू होकर 26.01 लाख रुपये तक जाती है. वहीं, Safari Stealth Edition की कीमत 24.09 लाख रुपये से 26.76 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) तक रखी गई है.कंपनी ने इस एडिशन को टॉप वेरिएंट पर तैयार किया है. इससे ग्राहकों को ज्यादा फीचर्स के साथ एक अलग और खास लुक वाली SUV खरीदने का विकल्प मिलेगा. इससे पहले भी टाटा ने Stealth Edition पेश किया था, लेकिन वह सीमित संख्या में उपलब्ध था.

नया ब्लैक डिजाइन

Stealth Edition की सबसे बड़ी खासियत इसका नया Stealth Black कलर है. दोनों SUV में मैट फिनिश वाले 19-इंच अलॉय व्हील दिए गए हैं, जो इन्हें सामान्य मॉडल से अलग बनाते हैं.इसके अलावा, फ्रंट फेंडर के पास Stealth बैजिंग दी गई है. बाकी डिजाइन को ज्यादा नहीं बदला गया है, ताकि SUV का ओरिजिनल और दमदार लुक बरकरार रहे.

अंदर मिलेगा प्रीमियम केबिन

Harrier और Safari Stealth Edition के अंदर ऑल-ब्लैक थीम दी गई है. इसमें Carbon Noir लेदरेट सीट्स मिलती हैं, जो केबिन को ज्यादा लग्जरी फील देती हैं. इसके अलावा सेंटर कंसोल पर Terrain Response सिस्टम के लिए खास डिजाइन वाला डायल भी दिया गया है.

फीचर्स की बात करें तो इसमें 14.9 इंच टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम, वायरलेस Apple CarPlay और Android Auto, 13-स्पीकर JBL ऑडियो सिस्टम, Dolby Atmos, डुअल-जोन क्लाइमेट कंट्रोल, पैनोरमिक सनरूफ, Alexa कनेक्टिविटी, 360 डिग्री कैमरा और Level-2 ADAS जैसे फीचर्स मिलते हैं.

इंजन में नहीं हुआ बदलाव

Tata Harrier और Safari Stealth Edition में वही इंजन ऑप्शन मिलेंगे जो रेगुलर मॉडल में दिए जाते हैं. इनमें 1.5-लीटर टर्बो पेट्रोल इंजन मिलता है, जो 170hp पावर और 280Nm टॉर्क देता है. वहीं, 2.0-लीटर डीजल इंजन 170hp पावर और 350Nm टॉर्क जनरेट करता है.दोनों इंजन के साथ 6-स्पीड मैनुअल और 6-स्पीड ऑटोमैटिक गियरबॉक्स का ऑप्शन मिलता है. कुल मिलाकर, Stealth Edition उन ग्राहकों के लिए है जो ज्यादा बदलाव के बिना अपनी SUV में एक अलग, डार्क और प्रीमियम लुक चाहते हैं.

बॉम्बे HC”  बेटे ने नहीं निभाई जिम्मेदारी तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने फ्लैट लौटाने का आदेश…

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मुंबई में एक माता-पिता ने ये सोचकर अपने जीवन भर की कमाई अपना लाखों का फ्लैट अपने बेटे के नाम ट्रांसफर किया था कि बेटा बुढ़ापे में उनकी सेवा करेगा, लेकिन जब बेटे ने सेवा करने में आनाकानी की बेईज्जती करने लगा तकलीफ देने लगा तब माता पिता ने कोर्ट की शरण ली और कई महीनों तक चले कोर्ट मामले मैं जो फैसला आया वो माता पिता के हक में आया.

बेटे ने नहीं निभाई जिम्मेदारी तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने फ्लैट लौटाने का आदेश दिया. अगर माता-पिता ने इस भरोसे पर अपनी संपत्ति बेटे या बेटी के नाम कर दी है कि बुढ़ापे में उनकी देखभाल की जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होता, तो वे अपनी संपत्ति वापस पाने के हकदार हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यही स्पष्ट किया है.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि यदि माता-पिता ने अपने बेटे को इस शर्त पर संपत्ति उपहार (गिफ्ट डीड) के जरिए दी थी कि वह उनकी देखभाल करेगा, लेकिन उसने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो माता-पिता उस संपत्ति को वापस लेने का कानूनी अधिकार रखते हैं. यह अधिकार तब भी लागू होगा, जब माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हों.

बहू-बेटे ने नहीं की थी देखभाल

ये मामला मुंबई के लोअर परेल स्थित एक फ्लैट से जुड़ा है. 68 साल के पिता ने अपने बेटे को फ्लैट गिफ्ट किया था. बाद में उन्होंने आरोप लगाया कि बेटा और बहू उनकी तथा उनकी पत्नी की देखभाल नहीं कर रहे हैं और उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत राहत की मांग की.

हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के आदेश को सही ठहराते हुए बेटे को फ्लैट वापस करने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि माता-पिता द्वारा संपत्ति हस्तांतरित करने के पीछे उनकी देखभाल की अपेक्षा स्वाभाविक और निहित होती है. यदि इस भरोसे का पालन नहीं किया जाता, तो गिफ्ट डीड रद्द की जा सकती है. यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है.

मां वैष्णो देवी दर्शन के लिए शुरू होगी वॉल्वो, मिलेगी वर्ल्ड क्लास सुविधाएं…

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पंजाब से मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए बड़ी खुशखबरी है. पहली बार विभाग की ओर से श्रद्धालुओं के लिए एसी बस सेवा शुरू की जा रही है. पंजाब रोडवेज की इस नई पहल से यात्रियों को बेहद किफायती दरों पर सुरक्षित और आरामदायक सफर का विकल्प मिलेगा.

यह बस सेवा जालंधर और लुधियाना से जम्मू-कटरा के लिए एसी वॉल्वो बस सेवा के रूप में शुरू होगी.

सरकारी किराए पर मिलने वाली इस लग्जरी सुविधा से यात्रियों को ट्रेनों की लंबी वेटिंग और निजी ऑपरेटरों के महंगे किराए से राहत मिलेगी. मिली जानकारी के अनुसार, बस सेवा सोमवार से नियमित रूप से रोजाना संचालित होगी.

गर्मी की छुट्टियों और त्योहारों के सीजन में मां वैष्णो देवी जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है. ऐसे में ट्रेनों में लंबी वेटिंग और निजी वॉल्वो बसों के अधिक किराए के कारण यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता था. ऐसे में सरकारी किराए में लग्जरी सफर की शुरुआत होने से आम जनता की जेब पर बोझ कम होगा.

खरीदी गई आधुनिक यूरो-6 वॉल्वो बसें

पंजाब रोडवेज की यह सुपरफास्ट वॉल्वो बस लुधियाना से चलेगी, जिसके बाद जालंधर बस स्टैंड होते हुए जम्मू के लिए आगे बढ़ेगी. दरअसल, पंजाब रोडवेज ने हाल ही में आधुनिक यूरो-6 वॉल्वो बसों की नई खेप खरीदी है.

इन नई बसों को फिलहाल दिल्ली एयरपोर्ट रूट पर चलाया जा रहा है. दिल्ली रूट पर नई बसों के शामिल होने के बाद वहां से उपलब्ध हुई पुरानी वॉल्वो बसों को अब उन नए रूटों पर भेजा जा रहा है, जहां यात्रियों की अधिक मांग है.

मिली 3 नई बसें

इसी योजना के तहत जालंधर डिपो को दिल्ली रूट के लिए 3 नई वॉल्वो बसें मिली हैं, जिससे जम्मू-कटरा रूट पर बस सेवा शुरू करने के लिए बसें उपलब्ध हो सकी हैं. विभागीय अधिकारियों के अनुसार, इस गर्मी के सीजन में इन बसों को लेकर यात्रियों से काफी अच्छे रिस्पॉन्स की उम्मीद है.

हरियाणा परिवहन द्वारा भी इसी तरह की वॉल्वो बसें कटरा के लिए चलाई जाती हैं, जिसकी तर्ज पर अब पंजाब ने भी कदम बढ़ाया है. रोडवेज विभाग का कहना है कि आने वाले दिनों में यात्रियों की मांग और फीडबैक को देखते हुए पंजाब के अन्य प्रमुख शहरों से भी कटरा व अन्य धार्मिक स्थलों के लिए नई बस सेवाएं शुरू की जाएंगी.

देश की दूसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल ने अपने निवेशकों के लिए बड़ी खुशखबरी…

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देश की दूसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल ने अपने निवेशकों के लिए बड़ी खुशखबरी दी है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के लिए 24 रुपये प्रति इक्विटी शेयर का अंतिम डिविडेंड देने की घोषणा की है.

यह एयरटेल के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा सालाना डिविडेंड है. कंपनी ने इसके लिए 24 जुलाई 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की है. हालांकि, इस डिविडेंड का लाभ लेने के लिए निवेशकों को 23 जुलाई तक कंपनी के शेयर खरीदने होंगे.

कंपनी ने मई 2026 में बताया था कि उसके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने 24 रुपये प्रति पूरी तरह चुकता (Fully Paid-up) इक्विटी शेयर के अंतिम डिविडेंड की सिफारिश की है. अब रिकॉर्ड डेट तय होने के बाद यह साफ हो गया है कि पात्र निवेशकों को यह भुगतान किया जाएगा, बशर्ते शेयरधारकों की मंजूरी मिल जाए.

23 जुलाई क्यों है आखिरी मौका?

भारती एयरटेल ने स्टॉक एक्सचेंज को दी गई सूचना में कहा है कि जिन निवेशकों का नाम 24 जुलाई को कारोबार समाप्त होने तक कंपनी के डिपॉजिटरी रिकॉर्ड में दर्ज होगा, उन्हें डिविडेंड मिलेगा.

सेबी के T+1 सेटलमेंट सिस्टम के तहत शेयर खरीदने के एक ट्रेडिंग दिन बाद निवेशक के डीमैट खाते में शेयर पहुंचते हैं. इसलिए यदि कोई निवेशक 23 जुलाई तक एयरटेल के शेयर खरीदता है, तो वे 24 जुलाई तक उसके डीमैट खाते में आ जाएंगे और वह डिविडेंड पाने का हकदार बन जाएगा.

पहले भी लगातार देती रही है डिविडेंड

भारती एयरटेल का डिविडेंड देने का रिकॉर्ड भी मजबूत रहा है. कंपनी ने जुलाई 2009 से अब तक 22 बार डिविडेंड दिया है. पिछले साल कंपनी ने 16 रुपये प्रति शेयर और उससे पहले 8 रुपये प्रति शेयर का डिविडेंड दिया था. फिलहाल कंपनी का डिविडेंड यील्ड करीब 0.84% है.

शेयर पर ब्रोकरेज की क्या है राय?

शुक्रवार को एयरटेल का शेयर करीब 1% की गिरावट के साथ 1,915 रुपये के आसपास कारोबार करता दिखा. हालांकि पिछले एक महीने में शेयर ने लगभग 8% की तेजी दिखाई है. वहीं, लंबी अवधि में इसने निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया है. पिछले तीन वर्षों में शेयर ने 116% और पांच वर्षों में 261% का रिटर्न दिया है.

अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म नोमुरा ने एयरटेल पर ‘Buy’ रेटिंग बरकरार रखते हुए इसका लक्ष्य मूल्य 2,355 रुपये तय किया है. ब्रोकरेज का मानना है कि 5G नेटवर्क विस्तार लगभग पूरा होने और पूंजीगत खर्च कम होने के बाद कंपनी का फ्री कैश फ्लो मजबूत होगा, जिससे भविष्य में उसकी वित्तीय स्थिति और बेहतर हो सकती है.

8th Pay Commission: न्यूनतम वेतन, फिटमेंट फैक्टर और भत्तों पर केंद्रित, वेतन आयोग को लेकर चर्चा…

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8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चा मुख्य रूप से न्यूनतम वेतन, फिटमेंट फैक्टर और भत्तों पर केंद्रित रही है, लेकिन कर्मचारी संगठनों के सुझावों में एक और प्रस्ताव सामने आया है.

क्या सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारी और सबसे कम सैलरी पाने वाले कर्मचारी की कमाई के बीच कोई सीमा होनी चाहिए?

अलग-अलग कर्मचारी संगठनों ने 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (CPC) को सौंपे गए अपने ज्ञापनों में अलग-अलग राय रखी है. जहां एक ग्रुप चाहता है कि न्यूनतम और अधिकतम वेतन के बीच के अंतर पर सीमा तय की जाए, वहीं दूसरे का तर्क है कि सीनियर और टेक्नीकल पोस्ट पर ऐसी कोई लिमिट नहीं होनी चाहिए. ये प्रस्ताव आयोग को सौंपे गए हैं और सरकार ने इन्हें अभी स्वीकार नहीं किया है.

कुछ कर्मचारी संगठन क्यों चाहते हैं कैपिंग?

नेशनल काउंसिल (JCM) स्टाफ साइड, जो केंद्र सरकार के कई कर्मचारी यूनियंस का प्रतिनिधित्व करती है, ने सिफारिश की है कि न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात 1:12 से ज्यादा नहीं होना चाहिए. 8वें वेतन आयोग को सौंपे गए अपने ज्ञापन के अनुसार, रेश्यो को सीमित करने से सरकारी सेवा में आय की अत्यधिक असमानता को कम करने, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने और निष्पक्षता व सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध एक आदर्श नियोक्ता के रूप में सरकार की भूमिका को मजबूत करने में मदद मिलेगी.

ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि वेतन के क्रमिक स्तरों के बीच का अंतर उचित होना चाहिए ताकि सैलरी मैट्रिक्स में ग्रेड के बीच अचानक बड़े उछाल के बजाय स्ट्रक्चरल बैलेंस बना रहे. रेलवे सीनियर सिटिजन्स वेलफेयर सोसाइटी (RSCWS) ने भी ऐसी ही सिफारिश की है. अपने प्रस्ताव में, संगठन ने कहा कि सैलरी मैट्रिक्स में हाईएस्ट लेवल्स का निचले स्तरों के साथ तर्कसंगत संबंध होना चाहिए, साथ ही सीनियर पोस्ट से जुड़ी अधिक जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.

साथ ही, इसने कहा कि न्यूनतम और अधिकतम वेतन के बीच का अनुपात संतुलित रहना चाहिए ताकि कुल सैलरी स्ट्रक्चर न्यायसंगत और सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनी रहे. दोनों संगठनों ने सैलरी स्ट्रक्चर में न्यूनतम और अधिकतम वेतन स्तरों के बीच संतुलित संबंध बनाए रखने की सिफारिश की है.

ये चाहते हैं कोई कैपिंग

हालाँकि, इंडियन रेलवेज टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने एक अलग रुख अपनाया है. 8वें वेतन आयोग को सौंपे गए अपने ज्ञापन में, एसोसिएशन ने कहा कि टॉप सैलरी पाने वालों को को न्यूनतम और अधिकतम वेतन के अनुपात से सीमित नहीं किया जाना चाहिए. IRTSA ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि टेक्नोक्रेट्स (तकनीकी विशेषज्ञों), विशेष रूप से रेलवे में काम करने वालों, का वेतन नॉन-टेक्नोक्रेट कर्मचारियों के वेतन से अलग तय किया जाना चाहिए.

मेमोरैंडम के अनुसार, इससे उन्हें खतरनाक काम की स्थितियों, अतिरिक्त काम के घंटों, खास नौकरी की जरूरतों और रेलवे कर्मचारियों के काम करने की खास परिस्थितियों के लिए उचित मुआवजा मिल सकेगा. अधिकतम सैलरी के बारे में ये प्रस्ताव उन कई सुझावों में से हैं जो कर्मचारी संगठनों ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे हैं. अन्य मेमोरैंडम में फिटमेंट फैक्टर, न्यूनतम बेसिक पे, हाउस रेंट अलाउंस, ट्रांसपोर्ट अलाउंस, पेंशन बेनिफिट्स और सैलरी तय करने के तरीके में बदलाव की मांग की गई है.

आयोग अपनी सिफारिशें तैयार करने से पहले मंत्रालयों, विभागों और कर्मचारी यूनियंस से सलाह-मशविरा कर रहा है. अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले वह विभिन्न सुझावों की जांच करेगा. कर्मचारी संगठनों द्वारा दिए गए किसी भी प्रस्ताव को सरकार ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है.8वें वेतन आयोग की घोषणा नवंबर 2025 में की गई थी और उम्मीद है कि यह अपने गठन के 18 महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप देगा. रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र सरकार आयोग की सिफारिशों पर अंतिम निर्णय लेगी.

ऑस्ट्रेलिया का भारत को यूरेनियम बेचना मोदी की कामयाबी, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश…

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ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम मिलने को ब्रेकथ्रू बताने के लिए बीजेपी को कांग्रेस ने आड़े हाथों लिया है. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर कहा कि, BJP का इकोसिस्टम यह दिखाने में लगा हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया का भारत को यूरेनियम बेचना मोदी की कामयाबी है.

जबकि, 4 दिसंबर 2011 को, ऑस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड को अक्टूबर 2008 के भारत-US न्यूक्लियर एग्रीमेंट के बाद भारत को यूरेनियम बेचने के लिए अपनी पार्टी से मंजूरी मिल गई थी.

जयराम ने कहा कि, BJP के ट्रोल्स, जिनमें उसके कुछ MP भी शामिल हैं, इन सभी को अपना होमवर्क बेहतर तरीके से करने की जरूरत है. दरअसल, ऑस्ट्रेलिया ने 2011 में ही भारत को न्यूक्लियर एक्सपोर्ट पर लगा बैन हटा लिया था. कांग्रेस का सवाल है कि, मोदी सरकार को ये बताना चाहिए कि अगर भारत इतना ‘भरोसेमंद स्ट्रेटेजिक पार्टनर’ था, तो 5 सितंबर 2014 के न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट को लागू होने में 11 साल क्यों लगे?

2008 को ही बन गया था कानून

जयराम ने पीएम मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि, अवार्ड-जीवी ने गर्व से घोषणा की है कि, ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम सप्लाई करेगा. जबकि, ये सिर्फ यूनाइटेड स्टेट्स-इंडिया न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट की वजह से मुमकिन हो पाया है, जो आखिरकार 8 अक्टूबर, 2008 को कानून बन गया. जुलाई 2005 में प्रेसिडेंट जॉर्ज बुश के साथ डॉ. मनमोहन सिंह की मीटिंग ने ही बातचीत शुरू की थी.

कांग्रेस ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि, उस दौरान BJP ने पार्लियामेंट के अंदर और बाहर, दोनों जगह इस बदलाव लाने वाले एग्रीमेंट का हमेशा से विरोध किया था. कांग्रेस टर्निंग पॉइंट बनाती है जबकि BJP यू-टर्निंग पॉइंट बनाने में माहिर है.

कब हुई डील?

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 9 जुलाई को सिविल न्यूक्लियर एनर्जी, समुद्री सुरक्षा और ज़रूरी मिनरल सेक्टर से जुड़े कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बानीज ने शांतिपूर्ण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सुनिश्चित करने में दोनों देशों की साझेदारी की अहम भूमिका पर जोर दिया.

सिविल न्यूक्लियर एनर्जी पर यह समझौता हुआ, जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की कमर्शियल सप्लाई की जाएगी ताकि नई दिल्ली के न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट्स को ईंधन मिल सके, दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक सिविल न्यूक्लियर सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर होने के 10 साल से ज्यादा समय बाद हुआ है.

अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी पर विपक्ष के हमले के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी विपक्ष पर जमकर वार…

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अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी पर विपक्ष के हमले के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी विपक्ष पर जमकर वार कर रहे हैं. सीएम योगी ने आज शुक्रवार को विपक्षी दलों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जो लोग आज अयोध्या में आस्था की बात कर रहे हैं, उन्होंने कभी हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़वाने का पाप किया था.

साथ ही मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि अयोध्या की भदरसा नगर पंचायत का नाम बदलकर भरत नगर किया जाएगा जबकि नए नगर निकाय क्षेत्र का नाम मां ज्वाला के नाम पर रखा जाएगा.

सीएम योगी अयोध्या में 432 करोड़ रुपये की लागत वाली 217 विकास से जुड़े परियोजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण तथा बीकापुर विधानसभा क्षेत्र में पूर्व मंत्री दिवंगत मुन्ना सिंह चौहान की प्रतिमा के अनावरण के बाद आयोजित जनसभा को संबोधित कर रहे थे. सीएम योगी ने किसी दल का नाम लिए बगैर कहा, “आज अयोध्या में जो लोग आस्था की बात कह रहे हैं, इन्होंने हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़वाने का पाप किया था.”

क्या जामा मस्जिद में होगा हनुमान चालीसाः CM योगी

उन्होंने आगे कहा, “आप सोच सकते हैं कि क्या कोई जामा मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ कर पाएगा? क्या कोई सरकार ऐसा करवा पाएगी? क्या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ऐसा करवा पाएंगी? अगर नहीं, तो फिर अयोध्या में हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने का पाप क्यों कराया गया?”

मुख्यमंत्री ने कहा, “उन्होंने हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने का पाप किया और हमने अयोध्या को स्वच्छ, सुंदर और सनातन धर्म की राजधानी के रूप में फिर से स्थापित करने का कार्य किया है.”

अयोध्या के कायाकल्प किए जाने की बात करते हुए मुख्यमंत्री योगी ने दावा किया कि आज अयोध्या तीनों लोकों से न्यारी और वैभवशाली नगरी के रूप में विकसित हो रही है. उन्होंने आगे कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप अयोध्या अब सौर ऊर्जा आधारित शहर बन चुका है और देश के प्रमुख शहरों में अपनी अलग पहचान बना रहा है.

डबल इंजन की सरकार में राम मंदिर संभवः CM योगी

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “अयोध्या ने आज वह करके दिखाया है जो 500 सालों में नही हो सका था. पीढ़ियों पर पीढियां गईं, संतों, राजाओं और समाज के प्रत्येक तबगे ने रामजन्मभूमि मुक्ति के लिए आंदोलन किया, संघर्ष किया. लेकिन, जो कहते थे कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता, आज वो देख रहे हैं कि यहां पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आ रहे हैं. पिछले दिनों आपने देखा होगा ये समाजवादी पार्टी के नमूनों का क्या होता है, अयोध्या भदरसा का चेयरमैन कैसे वहां पर गुस्ताखी कर रहा था, यही असली चरित्र है इन लोगों का.”

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने राम मंदिर निर्माण में कई तरह की बाधाएं खड़ी कीं. भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए और रामभक्तों पर गोलियां चलवाईं. लेकिन डबल इंजन की सरकार बनने के बाद राम मंदिर का निर्माण संभव हुआ.

भदरसा अब भरत नगर भरत कुंड हुआः CM योगी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में अयोध्या की भदरसा नगर पंचायत का नाम बदलने का ऐलान करते हुए कहा, “इसका नाम अब भदरसा नहीं होगा, बल्कि वो भरत नगर भरत कुंड होगा.” उन्होंने आगे कहा, “भरत जी की स्मृति को, भरत जैसा भाई दुनिया के अंदर मिलना कठिन है, लेकिन अयोध्या का सौभाग्य है कि अयोध्या ने प्रभु राम भी दिए, भरत भी दिए, लक्ष्मण भी दिए, शत्रुघ्न भी दिए.”

उन्होंने कहा कि देश के अंदर हम जहां कहीं भी जाते हैं, पूरब में जाते हैं, पश्चिम में जाते हैं, उत्तर में, दक्षिण में कहीं भी हम जाते हैं, अयोध्या की पहचान आज भी मौजूद है और इसलिए अब भदरसा ‘भरत नगर’ ‘भरत कुंड’ के नाम पर जाना जाएगा, वो नगर पंचायत उस रूप में हम आगे बढ़ाएंगे.

पिछले महीने राम मंदिर में दान और चढ़ावे के कथित गबन के आरोपों को लेकर विपक्ष ने सरकार और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर लगातार सवाल उठाए हैं. 7 जून को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सबसे पहले इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया था.

विवाद बढ़ने पर 19 जून को अयोध्या दौरे के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने लोगों से धैर्य रखने की अपील की थी कि एसआईटी की जांच ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर देगी.

PM मोदी ने अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा में अंतरिक्ष में भारत की उपलब्धियों का जिक्र किया…

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PM मोदी ने अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा में अंतरिक्ष में भारत की उपलब्धियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा, कैसे भारत ने चांद के साउथ पोल पर चंद्रयान लैंड कराया. दुनिया में कोई और देश ऐसा नहीं कर पाया.

भारत सिर्फ इससे संतुष्ट नहीं रहा है. इसलिए भारत अब स्पेस में अपना गगनयान भेजने की तैयारी कर रहा है और अब अपना स्पेस स्टेशन बनाने के लक्ष्य पर चल रहा है. भारत पहले ही दावा कर चुका है कि 2035 तक अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन बनकर तैयार हो जाएगा.

अब सवाल है कि अंतरिक्ष में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन कैसे बनता है, इसे तैयार करने में कितना समय लगता है और कितनी तैयारी के बाद यह स्थापित हो पाता है? आइए समझते हैं.

क्या है स्पेस स्टेशन?

स्पेस स्टेशन एक तरह का स्पेसक्राफ्ट ही होता है, लेकिन आकार में बड़ा होता है. यहीं पर अंतरिक्ष यात्री रहते हैं. रिसर्च करते हैं. स्पेस स्टेशन के निर्माण का फैसला कई देश मिलकर लेते हैं और मिलकर ही इसका निर्माण करते हैं. अलग-अलग देशों की स्पेस एजेंसियां इसे तैयार करने में मदद करती हैं.

अंतरिक्ष में कैसे बनता है स्पेस स्टेशन?

पूरे स्पेस स्टेशन को एक साथ नहीं तैयार किया जाता. इसका निर्माण टुकड़ों में किया जाता है. इसे धरती पर तैयार किया जाता है और फिर इसके अलग-अलग हिस्सों को अंतरिक्ष यात्रियों के जरिए स्पेस में जोड़ा जाता है. इसके लिए एस्ट्रोनॉट को कई तरह की तैयारियां करनी पड़ती हैं. विशेष उपकरणों को रखने के साथ खास तरह का स्पेस सूट पहनना पड़ता है.

धरती से करीब 250 मील दूर स्पेस स्टेशन की ऑर्बिट होती है. स्पेस स्टेशन के सभी हिस्से जुड़ने के बाद यह पूरी तरह से इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है. अब इसका खर्च और निर्माण में लगने वाले समय को जान लेते हैं.

स्पेस स्टेशन का निर्माण टुकड़ों में किया जाता है. फोटो: Pixabay

तैयार होने में कितना समय लगता है?

इसके निर्माण में कितना समय लगता है यह इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के उदाहरण से समझ सकते हैं. ISS का निर्माण अमेरिका, जापान, रूस, यूरोप और कनाडा की स्पेस एजेंसियों ने मिलकर किया था. इसे तैयार करने में 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च आया था. निर्माण की शुरुआत 1998 में हुई और बनकर 2011 में तैयार हुआ है. यानी एक बात तो साफ है कि स्पेस स्टेशन को बनने में कई सालों का समय लगता है.

स्पेस स्टेशन में यहां 6 लोग एक साथ रह सकते हैं. फोटो: Pixabay

कितना बड़ा है स्पेस स्टेशन?

इसे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के उदाहरण से समझते हैं. यह 5 बेडरूम वाले घर जितना बड़ा है. इसमें एक जिम, दो बाथरूम और एक बड़ी खिड़की है. यहां 6 लोग एक साथ रह सकते हैं. पूरे स्पेस स्टेशन का कुल वजन एक मिलियन पाउंड बताया गया है, जो किसी फुटबॉल के मैदान के बराबर है. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में अमेरिका, रूस, जापान और यूरोप की साइंस लैब है.

पूरे स्पेस स्टेशन का कुल वजन एक मिलियन पाउंड बताया गया है.

कहां से मिलती है स्पेस स्टेशन को बिजली?

बिजली के लिए स्पेस स्टेशन के किनारों पर सोलर पैनल लगे हैं. सूर्य की किरणों के जरिए एनर्जी मिलती है और ये बिजली में कंवर्ट हो जाती है. यही नहीं, स्टेशन के बाहर लगी रोबोटिक आर्म्स कई तरह के प्रयोगों में काम आती हैं.