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“Nude Parties in India:  क्या होती है न्यूड पार्टी, जिसे लेकर छत्तीसगढ़ में मचा बवाल?  जानें भारत में इसे लेकर क्या हैं नियम”

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Culture Behind Nude Events: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इस समय न्यूड पार्टी को लेकर जारी पोस्टर को लेकर बवाल मचा हुआ है. भाजपा- कांग्रेस इसको लेकर एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं.

इस पूरे मामले लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने भी बयान देते हुए कहा कि पुलिस को दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की पूरी छूट दी गई है. वहीं, पुलिस ने अभी तक इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है. महिला आयोग, बजरंग दल और कांग्रेस ने इस पूरे मामले पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है. ऐसे में सबसे मन में सवाल आता है कि जिस न्यूड पार्टी के पोस्टर को लेकर पूरे छत्तीसगढ़ में बवाल मचा हुआ है, वह होती क्या है और उसको लेकर भारत में क्या कानून है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.

क्या होती है न्यूड पार्टी? आजकल सोशल मीडिया और इंटरनेट के ज़माने में अक्सर “न्यूड पार्टी” शब्द सुना जाता है. लेकिन बहुत लोग समझ नहीं पाते कि आखिर ये होती क्या है. न्यूड पार्टी का मतलब है कि एक समूह लोग आपस में एक जगह इकट्ठा होते हैं और सभी लोग बिना कपड़ों के, पूरी तरह प्राकृतिक रूप में एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं. इसे अक्सर एक तरह का सामाजिक या कल्चरल एक्सपीरियंस माना जाता है.

इसका मकसद क्या होता है? न्यूड पार्टी का मुख्य उद्देश्य शरीर के प्रति सहजता और आत्मविश्वास बढ़ाना होता है. लोग इस तरह की पार्टियों में भाग लेकर अपने शरीर के बारे में किसी भी तरह के डर, शर्म या सामाजिक जजमेंट से मुक्त होने की कोशिश करते हैं. कई लोग इसे मानसिक और भावनात्मक स्वतंत्रता का माध्यम भी मानते हैं. कुछ लोग इसे सोशल कनेक्शन के रूप में भी देखते हैं.

नियम और सुरक्षा न्यूड पार्टी में कुछ नियम और दिशानिर्देश होते हैं ताकि सभी प्रतिभागी सुरक्षित और सहज महसूस करें.

इनमें शामिल हैं- सहमति: किसी को भी मजबूर नहीं किया जाता. भाग लेने वाला हर व्यक्ति अपनी इच्छा से आता है.

सुरक्षा:  जगह सुरक्षित और निजी होती है. आमतौर पर इन पार्टियों में बाहरी लोगों का प्रवेश नहीं मिलता है.

सम्मान और व्यवहार: सभी लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हैं. किसी की निजता या व्यक्तिगत जगह का उल्लंघन नहीं किया जाता.

कैमरा/फोन नीति:  अधिकतर पार्टियों में कैमरा या फोन का उपयोग प्रतिबंधित होता है ताकि सभी सुरक्षित महसूस करें.

कहां होती हैं ये पार्टियां?  न्यूड पार्टी आमतौर पर निजी जगहों, रिसॉर्ट्स, या क्लबों में आयोजित की जाती हैं. कुछ देशों में ऐसे पार्टियों के लिए विशेष स्थल भी हैं. कई लोग इसे एक नई अनुभव की तलाश के रूप में लेते हैं.

क्या हैं इसके फायदे?  शरीर के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है:  लोग अपने शरीर को स्वाभाविक रूप में स्वीकारना सीखते हैं.

मानसिक तनाव कम होता है: सुरक्षित और आरामदायक माहौल में लोग खुलकर रह सकते हैं.

सोशल कनेक्शन: लोग नए दोस्त बनाते हैं और सामाजिक अनुभव साझा करते हैं.

भारत में क्या है इसको लेकर नियम-कानून? कई बार देश में न्यूड पार्टी से जुड़े मामले देखने को मिल जाते हैं, इसके बावजूद भारत में नियम-कानून और कल्चर के हिसाब से इस तरह की पार्टी के लिए किसी तरह की कोई अनुमति नहीं है. इस तरह की पार्टी का कल्चर पश्चिमी देशों में देखने को मिलती है, वहीं इस तरह के पार्टी का आयोजन होता है.

“वायनाड दौरे पर प्रियंका गांधी, 2 कार्यकर्ताओं की आत्महत्या से सवालों में कांग्रेस”

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केरल के वायनाड से सांसद प्रियंका गांधी इस समय अपने संसदीय क्षेत्र में मौजूद हैं. हालांकि, इस मौके पर इलाके में पार्टी कार्यकर्ताओं की कथित सुसाइड के मामले ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया है.

जानकारी के मुताबिक, एक पार्टी कार्यकर्ता ने पिछले साल सुसाइड की थी और एक ने हाल ही में सुसाइड की. इसी के बाद अब कांग्रेस सवालों में आ गई है. सीपीएम ने वायनाड में कांग्रेस की आंतरिक समस्याओं को लेकर पार्टी की आलोचना की है.

वायनाड में पिछले साल पूर्व जिला कांग्रेस समिति (DCC) के कोषाध्यक्ष एन.एम. विजयन और उनके बेटे ने जहर खाकर सुसाइड की थी. इसी के बाद हाल ही में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मुल्लनकोली पंचायत सदस्य जोस नेल्लेदम ने भी जहर खा लिया है. जहां दो लोगों ने सुसाइड की है. वहीं, वायनाड के मुल्लनकोली में एक स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता की कथित आत्महत्या के एक दिन बाद, विजयन की बहू पद्मजा ने कथित रूप से अपनी कलाई काटकर सुसाइड करने की कोशिश की. पुलिस ने बताया कि पद्मजा को अस्पताल में भर्ती कराया गया, उनकी हालत अब स्थिर है.

विजयन की बहू ने क्यों की सुसाइड की कोशिश पूर्व जिला कांग्रेस समिति (DCC) के कोषाध्यक्ष एन.एम. विजयन की पिछले साल मृत्यु हुई थी, उन्होंने और बेटे ने जहर कर्ज के चलते जहर खा लिया था. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक पद्मजा ने बताया था कि विजयन की मृत्यु के बाद पार्टी की तरफ से उनको आर्थिक सहायता देने का वादा किया गया था. लेकिन, अभी तक यह वादा पूरा नहीं किया गया.

विजयन (78 वर्ष) और उनके बेटे (38 वर्ष) ने कथित रूप से कर्ज में डूबने के बाद जहर खाकर आत्महत्या की थी. परिवार ने दावा किया कि उन्होंने पार्टी गतिविधियों के लिए भारी कर्ज लिया था और जब उसे चुकाने में असमर्थ रहे तो उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म कर दी. इस घटना के बाद कांग्रेस ने जिम्मेदारी लेने और परिवार के कर्ज को चुकाने का भरोसा दिया था. हालांकि, शनिवार को पद्मजा ने कहा कि परिवार पर अब भी दो करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज बाकी है, जिसमें से 20 लाख रुपये से भी कम का भुगतान हुआ है.

न्होंने कहा, मेरे ससुर ने पार्टी के लिए कर्ज लिया था, न कि व्यक्तिगत जरूरतों के लिए. पार्टी ने सभी देनदारियों को चुकाने का वादा किया था, लेकिन अब वह अपने वादे से मुकर गई है. साथ ही, परिवार ने डीसीसी कार्यालय के सामने प्रदर्शन करने और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने की योजना बनाई है.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद राजमोहन उननीथन ने कहा कि विजयन की मौत की जांच अभी जारी है. जांच पूरी होने के बाद पैसा दिया जाएगा. जांच लंबित होने पर पार्टी पैसे कैसे दे सकती है?

जोस नेल्लेदम ने क्यों की सुसाइड? वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मुल्लनकोली पंचायत सदस्य जोस नेल्लेदम की हाल की आत्महत्या ने पार्टी को और शर्मिंदा कर दिया है. शुक्रवार को घर के पास एक तालाब में मृत पाए गए नेल्लेदम ने कथित रूप से जहर खाया और कलाई काट ली थी.

उनकी मौत के बाद सामने आए एक वीडियो में नेल्लेदम ने आरोप लगाया कि उन्हें साथी नेता कनट्टुमलायिल धन्यवादन की गिरफ्तारी से जुड़े झूठे आरोपों के तहत निशाना बनाया गया. धन्यवादन की गिरफ्तारी उनके घर से शराब और विस्फोटक मिलने के बाद की गई थी, लेकिन 13 दिन बाद उन्हें छोड़ दिया गया, जब पाया गया कि इन सामानों को दूसरे पार्टी कार्यकर्ता ने लगाया था. नेल्लेदम ने स्वीकार किया कि उन्होंने पुलिस को सूचना दी थी, लेकिन कहा कि उन्हें झूठा दोषी ठहराया गया.

वायनाड डीसीसी अध्यक्ष एन.डी. अप्पाचन ने कहा कि पुलिस ने नेल्लेदम के घर से एक सुसाइड नोट बरामद किया है, उसकी सामग्री को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. मुझे इसमें कुछ गड़बड़ लगती है. पुलपल्ली पुलिस ने धन्यवादन को बिना जांच किए रिमांड पर भेज दिया. हमें संदेह है कि पुलिस की कार्रवाई के पीछे राजनीतिक मकसद हैं. उन्होंने कहा कि डीसीसी नेल्लेदम के परिवार से संपर्क में है और पार्टी उन्हें समर्थन देगी. उन्होंने पार्टी में किसी भी तरह के आपसी झगड़े से इनकार किया.

सीपीएम ने साधा निशाना दूसरी ओर, सीपीएम ने वायनाड में कांग्रेस की आंतरिक समस्याओं को लेकर कांग्रेस की आलोचना की है. मंत्री वी. शिवनकुट्टी ने कहा कि कांग्रेस केरल में एक माफिया बन गई है. हत्याएं, आत्महत्या के लिए उकसाना, खुलेआम हिंसा, गर्भपात यही कांग्रेस आज दर्शाती है. अब खबरें आ रही हैं कि वायनाड के दिवंगत पूर्व डीसीसी कोषाध्यक्ष एन.एम. विजयन की बहू ने भी सुसाइड की कोशिश की है.

उन्होंने कहा, ऐसी घटनाएं घट रही हैं और कांग्रेस नेता राहुल ममकूताथिल जैसे लोगों को बचाने में लगे हैं, जिन पर यौन उत्पीड़न का आरोप है. कांग्रेस की आंतरिक समस्याएं अब सामाजिक समस्या बन गई हैं. जो आलोचना करते हैं, उन पर साइबर हमले किए जा रहे हैं, कई कांग्रेस नेता खुद भी इसका शिकार हो गए हैं.

“हम एक छत के नीचे नहीं रह सकते, कुकी विधायकों ने पीएम मोदी से कर अलग केंद्र शासित प्रदेश की मांग”

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हिंसा के दो साल बाद मणिपुर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कुकी-जो आदिवासी विधायकों ने बड़ी मांग कर दी है। उन्होंने कहा कि मणिपुर के आदिवासियों के लिए अलग प्रशासन या फिर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए।

पीएम मोदी को सौंपे गए ज्ञापन में उन्होंने कहा, चुराचांदपुर के पहले दौरे पर हम आपका दिल से स्वागत करते हैं। आपके दौरे के बाद हमें बड़े राजनीतिक परिवर्तन की आशा है। आपको पता है कि मणिपुर के घाटी इलाके से हमारे लोगों को भगा दिया गया और उनपर अत्याचार किए गए। बहुसंख्यक समुदाय ने अल्पसंख्यक आदिवासियों पर बहुत कहर ढाए हैं।

उन्होंने आगे कहा, दोनों पक्ष ”केवल अच्छे पड़ोसियों के रूप में शांति से रह सकते हैं, फिर कभी एक ही छत के नीचे नहीं रह सकते।” इस दावे के साथ कुकी विधायकों ने प्रधानमंत्री से ”विधानसभा वाले एक अलग केंद्र शासित प्रदेश की उनकी मांग को पूरा करने के लिए बातचीत में तेजी लाने” का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ”हमारा मानना ​​है कि केवल इसी से हमारे लोगों में स्थायी शांति, सुरक्षा, न्याय और अपनेपन की भावना आएगी।”

जुलाई 2023 में, कुकी समुदाय से जुड़े इन 10 आदिवासी विधायकों ने हिंसक झड़पों के मद्देनजर केंद्र से अपने समुदाय के लिए एक अलग प्रशासन गठित करने का आग्रह किया था। वहीं मणिपुर पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘मणिपुर ‘भारत माता’ के मुकुट को सुशोभित करने वाला ‘रत्न’ है। यहां किसी भी प्रकार की हिंसा निंदनीय है। यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के साथ घोर अन्याय भी है। हमें मिलकर मणिपुर को शांति और विकास के पथ पर आगे ले जाना होगा।’

मेइती समुदाय के लोग इंफाल घाटी में रहते हैं, जबकि कुकी समुदाय आस-पास की पहाड़ियों पर रहता है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि राज्य में शांति पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता तथा इसे केवल बातचीत और एकता से ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘मणिपुर में अपार क्षमताएं हैं, लेकिन हिंसा हमारे सामाजिक ताने-बाने को कमज़ोर करती है। केवल शांति और सद्भाव ही राज्य को भारत के पूर्वी क्षेत्र के मुकुट के मणि के रूप में उसका उचित स्थान दिला सकता है।’

“नेपाल के बाद लंदन की सड़कों पर उतरे लाखों लोग, दक्षिणपंथी गुटों की क्या हैं मांगें?”

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“नेपाल के बाद लंदन की सड़कों पर उतरे लाखों लोग, दक्षिणपंथी गुटों की क्या हैं मांगें?”

ब्रिटेन की राजधानी लंदन में शनिवार को एक लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतर आए। हालिया इतिहास का यह सबसे बड़ा दक्षिणपंथी संगठनों का प्रदर्शन है। एंटी इमिग्रेशन कार्यकर्ता टॉमी रॉबिन्सन के नेतृत्व में करीब 1.10 लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे।

इस दौरान पुलिस अधिकारियों पर हमले की भी खबरें सामने आईं। यह रैली यूनाइट द किंगडम मार्च के नाम से आयोजित की गई थी। इसके जवाब में स्टैंड अप टू रेसिज्म नामक काउंटर-प्रदर्शन भी हुआ, जिसमें लगभग 5,000 लोगों ने भाग लिया।

मेट्रोपॉलिटन पुलिस को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा ताकि दोनों गुट आमने-सामने न आ जाएं। पुलिस ने बताया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरों को तोड़ने और प्रतिबंधित क्षेत्रों में घुसने की कोशिश की। इस दौरान कई पुलिस अधिकारी घायल हो गए। हालात काबू में लाने के लिए अतिरिक्त बल तैनात किया गया और घुड़सवार दस्ते भी उतारे गए।

शनिवार को लंदन में प्रदर्शन के अलावा कई बड़े फुटबॉल मैच और कॉन्सर्ट भी थे, जिसके चलते पुलिस ने 1,600 से अधिक अधिकारियों को तैनात किया। 500 अन्य शहरों से बुलाए गए थे प्रदर्शनकारियों ने यूनियन फ्लैग और सेंट जॉर्ज क्रॉस के झंडे लहराए। कुछ ने अमेरिकी और इजरायली झंडे भी थामे हुए थे। “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” कैप पहने कई लोग प्रधानमंत्री कियर स्टार्मर के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। कई पोस्टरों पर लिखा था – “उन्हें घर भेजो”।

टॉमी रॉबिन्सन का असली नाम स्टीफन याक्सली-लेनन है। उन्होंने मार्च को अभिव्यक्ति की आजादी का जश्न बताया। उन्होंने हाल ही में मारे गए अमेरिकी दक्षिणपंथी नेता चार्ली किर्क को भी श्रद्धांजलि दी। रॉबिन्सन ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा, “हजारों लाखों लोग आज लंदन की सड़कों पर एकजुट होकर अपनी आजादियों के लिए खड़े हैं।”

रॉबिन्सन अपने समर्थकों के बीच खुद को पत्रकार और व्हिसलब्लोअर बताते हैं और कहते हैं कि वे सरकार की गलतियों को उजागर करते हैं। उनके समर्थकों में टेस्ला और एक्स के मालिक एलन मस्क जैसे प्रभावशाली नाम भी शामिल हैं। हालांकि, रीफॉर्म यूके जैसी बड़ी एंटी-इमिग्रेंट पार्टी उनसे दूरी बनाए रखती है, क्योंकि रॉबिन्सन के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।

रैली में शामिल एक समर्थक सैंड्रा मिशेल ने कहा – “हम अपना देश वापस चाहते हैं। हम अपनी आजादी और अभिव्यक्ति का अधिकार वापस चाहते हैं। अवैध प्रवासियों को रोका जाना चाहिए। हम टॉमी पर भरोसा करते हैं।”

पुलिस कमांडर क्लेयर हेन्स ने कहा, “हम इस प्रदर्शन को वैसे ही संभालेंगे जैसे किसी और प्रदर्शन को। बिना किसी पक्षपात के। लोगों को कानूनसम्मत अधिकार दिए जाएंगे, लेकिन अव्यवस्था फैलाने वालों के खिलाफ सख्ती बरती जाएगी।” उन्होंने माना कि पहले भी कुछ प्रदर्शनों में एंटी-मुस्लिम नारेबाजी और भड़काऊ घटनाएं सामने आई थीं, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि लंदन की विविध समुदायों को भयभीत होकर घरों में रहने की जरूरत नहीं है।

यह प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब ब्रिटेन में प्रवासियों के मुद्दे ने राजनीतिक बहस पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है। इस साल अब तक 28,000 से अधिक प्रवासी छोटे नावों से इंग्लिश चैनल पार करके ब्रिटेन पहुंचे हैं। देशभर में सड़कों और मोहल्लों में लाल-सफेद झंडों की मौजूदगी बढ़ी है। समर्थकों का कहना है कि यह राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है, लेकिन एंटी-रेसिज्म कैंपेनरों का मानना है कि यह विदेशियों के प्रति नफरत का संदेश है।

अब धीरे-धीरे विश्व के सभी इसी देश एवं इस्लाम छोड़कर अन्य देश मुसलमान के बढ़ते आबादी से परेशान हो चुके हैं अब सारे देश में जागरूकता आ रही है इस्लाम एक जोंबी है समाज के लिए एक गंदगी है।

“भारत-पाक मैच को लेकर गुस्से में पहलगाम के पीड़ित, कहा- व्यर्थ लग रहा है ऑपरेशन सिंदूर”

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“भारत-पाक मैच को लेकर गुस्से में पहलगाम के पीड़ित, कहा- व्यर्थ लग रहा है ऑपरेशन सिंदूर”

जम्मू-कश्मीर के पाहलगाम में हुए आतंकी हमले में अपने परिजनों को खो चुके पीड़ित परिवारों ने शनिवार को एशिया कप भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का कड़ा विरोध किया है।

पीड़ितों का कहना है कि जब पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या की तब पाकिस्तान से किसी भी तरह का संबंध नहीं रखना चाहिए।

पाहलगाम हमले में पिता और भाई को खो चुके सावन परमार ने कहा, “जब से इंडिया-पाक मैच की खबर आई है, हम बेहद निराश हैं। पाकिस्तान से किसी भी तरह का संबंध नहीं रखना चाहिए। अगर मैच खेलना ही है तो पहले मेरा 16 साल का भाई लौटा दो, जिसे गोलियों से भून दिया गया था। ऑपरेशन सिंदूर अब बेकार लगता है।”

गौरतलब है कि 22 अप्रैल को हुए पाहलगाम हमले में आतंकियों ने पहले पर्यटकों की पहचान हिंदू के रूप में की और फिर उन्हें निशाना बनाया। इस हमले में 25 भारतीय और 1 नेपाली नागरिक मारे गए थे। आतंकियों ने पीड़ितों से कहा था, “जा के मोदी को बोल देना।” यह बताते हुए कि उन्होंने कैसे पर्यटकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया।

सावन की मां किरण यतीश परमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया, “हमारे घाव अभी भरे नहीं हैं। अगर ऑपरेशन सिंदूर पूरा नहीं हुआ है तो इंडिया-पाकिस्तान मैच क्यों हो रहा है? देशभर के लोगों को उन परिवारों से मिलना चाहिए जिन्होंने पाहलगाम में अपने अपनों को खोया है।”

गनपॉइंट पर मैच नहीं कराया जा सकता: अइशान्या द्विवेदी पाहलगाम हमले में पति को खो चुकीं नवविवाहिता अइशान्या द्विवेदी ने भी बीसीसीआई पर कड़ा निशाना साधा। उन्होंने कहा, “बीसीसीआई किसी पर गनपॉइंट पर मैच नहीं थोप सकता। सिर्फ 1-2 खिलाड़ियों को छोड़कर बाकी ने इस मैच का बहिष्कार नहीं किया, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”

आपको बता दें कि इस नरसंहार के बाद केंद्र सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था, जिसमें पाकिस्तान और पीओजेके (PoJK) में स्थित कई आतंकी ठिकानों और पाकिस्तान की एयर डिफेंस सिस्टम पर कार्रवाई की गई थी। अब पीड़ित परिवारों का कहना है कि अगर पाकिस्तान से क्रिकेट खेला जा रहा है तो यह कार्रवाई अधूरी और बेअसर साबित होती है।

“तेजस्वी के बयान पर घमासान; NDA ने बताया महागठबंधन में फूट, राजद-कांग्रेस सफाई दे रही”

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बिहार के नेता प्रतिपक्ष और महागठबंधन को-ऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने मुजफ्फरपुर में कहा कि हम सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। नेता प्रतिपक्ष के इस बयान पर खलबली मच गया है।

एनडीए के घटक बीजेपी और जदयू के नेताओं ने इसे ने आरोप लगाया है कि महागठबंधन में सीएम फेस पर फूट का नतीजा है। वहीं राजद और कांग्रेस के प्रवक्ता सफाई दे रहे है।

मुजफ्फरपुर के कांटी प्रखंड मुख्यालय में बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण करने आए तेजस्वी यादव ने खुले मंच से एक ऐसा बयान दिया कि बिहार की राजनीति में खलबली मच गई। उन्होंने कहा कि सभी 243 सीटो पर तेजस्वी चुनाव लड़ेगा। आप लोग तेजस्वी यादव का बीजेपी के नेता नीरज कुमार ने कहा है कि तेजस्वी यादव दिन में सपने देखना छोड़ दें। कितनी भी सीटों पर लड़ लें लेकिन कोई फायदा नहीं है। सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का दम आपमें नहीं है। अपने साथी कांग्रेस पर दबाव बनाने की राजनीति कर रहे हैं कि सीएम फेस घोषित कर दिया जाए। लेकिन बिहार की जनता को उनके चेहरे पर भरोसा नहीं है। उनके चेहरे पर चारा घोटा, अलकतरा घोटाला और लैंड फॉर जॉब घोटाला का दाग लगा है।

जदयू प्रवक्ता अंजुम आरा का कहना है कि यह तेजस्वी यादव का बड़बोलापन है। उनकी राजनीतिक विरासत में सिर्फ घपला घोटाला है। उनका बयान अहंकार भरा है। उनके साथी दलों को सोचना चाहिए कि ऐसा बयानों से क्या जताना चाहते है।

राजद और कांग्रेस अपने नेता के बचाव में उतर गई है। राजद प्रवक्ता एजाज अहमद का कहना है कि तेजस्वी यादव ठीक कह रहे हैं। गठबंधन के सभी दल 243 सीटों पर चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। वे महागठबंधन के नेता हैं। उनके चेहरे पर जनता वोट करेगी और महागठबंधन की सरकार बनाएगी। कांग्रेस प्रवक्ता ज्ञान रंजन ने भी एजाज अहमद का समर्थन किया है। इंडिया गठबंधन एकजुट है। अब वोट चोर की सरकार नहीं चलेगी।

दरअसल तेजस्वी के ताजा बयान को प्रेशर पॉलिटिक्स के तौर पर देखा जा रहा है। राजद उन्हें सीएम फेस घोषित कर चुकी है पर कांग्रेस की ओर से इस पर मुहर नहीं लगाई जा रही है। लेकिन तेजस्वी यादव इशारों में खुद को सीएम कैंडिडेट दिखाते रहते हैं।

“मेरे दिमाग की कीमत हर महीने 200 करोड़, नितिन गडकरी ने गिना डाले अपने बेटे के कारोबार”

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इथेनॉल को लेकर विवाद के बीच केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने विरोधियों को करारा जवाब दिया है। उन्होंने कहा, मेरा दिमाग की ही कीमत हर महीने 200 करोड़ की है। मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं है और मैं कभी नीचे नहीं गिर सकता हूं।

उन्होंने कहा कि वह जो कुछ भी करना चाहते हैं वह किसानों के हित के लिए है। इसका कमाई से कोई लेना-देना नहीं है।

नागपुर में एग्रीकोज वेलफेयर सोसाइटी के एक कार्यक्रम में संबोधन के दौरान उन्होंने कहा, आपको क्या लगता है कि ये सब मैं पैसे के लिए कर रहा हूं? मैं कोई दलाल नहीं हूं, ईमानदारी से कमाना जानता हूं। उन्होंने कहा, बहुत सारे राजनेता लोगों को लड़ाकर खुद फायदा उठाना जानते हैं, लेकिन हम उनमें नहीं हैं।

गडकरी ने कहा, मेरा भी घर-परिवार है। मैं कोई संत नहीं हूं। मुझे हमेशा लगता है कि विदर्भ में 10 हजार किसानों की आत्महत्या शर्म की बात है। जब तक कि हमारे किसान समृद्ध नहीं हो जाते, हम अपने प्रयास कम नहीं करेंगे। गडकरी ने अपने बेटे की कंपनी को लेकर कहा कि वह केवल आइडिया देने का काम करते हैं। उन्होंने कहा, मेरा बेटा इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस करता है। उसने हाल ही में ईरान से 800 कंटेनर सेब ऑर्डर किए और यहां से 100 कंटेनर केले भेज दिए।

गडकरी ने कहा, मेरे बेट ने गोवा से 300 कंटेनर मछलियां सर्बिया को सप्लाई कीं। उन्होंने कहा, बेटे ने ऑस्ट्रेलिया में दूध के प्रोडक्ट की फैक्ट्री लगाई है। वह अब अबू धाबी और अन्य जगहों पर भी कंटेनर भेजता है। उन्होंने बताया कि उनका बेटा आईटीसी के साथ मिलकर 26 चावल मिलें चलाता है। गडकरी ने कहा, मुझे पांच लाख टन चावल के आटे की जरूरत पड़ती है। इसलिए वह मिल चलाता है और मैं उससे आटा खरीद लेता हूं। उन्होंने कहा कि ये कुछ उदाहरण है जिससे पता चलता है कि बिजनेस में इंटरेस्ट रखने वाले लोग कृषि क्षेत्र में कैसे अवसर पैदा कर सकते हैं।

भारत-पाक मैच को लेकर भड़के ओवैसी, सरकार और उनकी पार्टी ने भी सवाल उठाए…

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एशिया कप में रविवार रात होने वाले भारत बनाम पाकिस्तान मुकाबले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विवाद गहराता जा रहा है। पाहलगाम आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की मौत और उसके बाद हुए ऑपरेशन सिंदूर के बीच इस मैच पर सवाल उठाते हुए विपक्ष और पीड़ित परिवारों ने बहिष्कार की मांग की है।

वहीं एआईएमआईएम चीफ और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी ने भी सवाल उठाए हैं।

AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “क्या हमारे 26 नागरिकों की जान की कीमत कुछ हजार करोड़ रुपये से कम है? प्रधानमंत्री ने कहा था कि खून और पानी साथ नहीं बह सकते, बातचीत और आतंकवाद साथ नहीं चल सकते। फिर एक क्रिकेट मैच से बीसीसीआई को कितनी कमाई होगी, 2000 करोड़, 3000 करोड़? क्या पैसों की कीमत जान से ज्यादा है?”

ओवैसी ने असम और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से भी सवाल किया कि क्या उनके पास यह ताकत नहीं है कि पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलने से इनकार कर सकें?

कांग्रेस नेता अभिषेक दत्त ने मैच रद्द करने की मांग की और कहा कि सरकार के “नो टॉक्स विद टेरर” वाले रुख से यह निर्णय मेल नहीं खाता। AAP नेताओं ने शनिवार को पाकिस्तान का पुतला जलाया। पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने क्लबों और रेस्टोरेंट्स का बहिष्कार करने की अपील की, जो मैच का लाइव प्रसारण करेंगे।

शिवसेना (UBT) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने नागरिकों से मैच न देखने की अपील की। उन्होंने कहा, “क्रिकेट पर आतंक को तरजीह न दें, पाहलगाम के 26 परिवारों के साथ खड़े हों।” शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करते हुए कहा, “युद्ध और क्रिकेट साथ-साथ कैसे हो सकते हैं? इन्होंने देशभक्ति को भी धंधा बना दिया है।”

भाजपा का पलटवार बीजेपी नेता दिलीप घोष ने कहा, “कांग्रेस के शासन में भी मैच खेले जाते थे। हमने पाकिस्तान को जंग में हराया है, क्रिकेट में भी हराएंगे। मैदान छोड़ना सही नहीं।” केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि मैच और तनाव को अलग-अलग मुद्दे समझना चाहिए। उन्होंने कहा, “खेल का भी महत्व है। खिलाड़ियों ने मेहनत की है। जो फैसला लिया गया है, सोच-समझकर लिया गया है।”

आपको बता दें कि यह मैच पहले भारत में होना था, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते राजनीतिक तनाव को देखते हुए टूर्नामेंट को UAE स्थानांतरित किया गया। मैच रविवार रात 8 बजे दुबई में शुरू होगा।

ED के सामने दिल्ली हाई कोर्ट ने रख दी कौन सी नई शर्त?

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दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) जब्त या फ्रीज की गई संपत्ति को अपने पास रखने की मांग करते समय ‘धन शोधन निवारण अधिनियम’ (PMLA) में दिए गए नियमों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से संपत्ति रखने से बचाने के लिए प्रक्रिया से जुड़े सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और हरीश वदियन शंकर की पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इससे पहले कि ED किसी संपत्ति को अपने पास रखने की अनुमति मांगे, एक अधिकृत अधिकारी को सबसे पहले एक औपचारिक आदेश पारित करके यह बताना होगा कि 180 दिनों तक संपत्ति को अपने पास रखना क्यों जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि इस अहम कदम के बिना, निर्णायक प्राधिकरण (adjudicating authority) कानूनी रूप से यह तय नहीं कर सकता है कि संपत्ति का संबंध मनी लॉन्ड्रिंग से है या नहीं। निर्णायक प्राधिकरण एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, जिसे केंद्र द्वारा PMLA की धारा 6 के तहत नियुक्त किया जाता है। यह तय करने में इसकी अहम भूमिका है कि ED द्वारा कुर्क या जब्त की गई संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल है या नहीं, और ऐसी कुर्की की वैधता की पुष्टि करना भी इसी का काम है।

यह फैसला ED की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें उसने फरवरी 2019 के ‘PMLA अपीलीय न्यायाधिकरण’ (PMLA appellate tribunal) के फैसले को चुनौती दी थी। अपीलीय न्यायाधिकरण ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में आरोपी से जुड़ी जब्त या फ्रीज की गई संपत्तियों को अपने पास रखने की ED की अर्जी खारिज कर दी थी। अपीलीय न्यायाधिकरण ने संपत्ति रखने की अनुमति देने वाले निर्णायक प्राधिकरण (adjudicating authority) के आदेश को पलट दिया था। न्यायाधिकरण ने यह निष्कर्ष निकाला था कि जब्त की गई संपत्ति को जिस तरह से रखा गया था, वह PMLA की योजना के अनुरूप नहीं था।

हाई कोर्ट में अपनी याचिका में, जांच एजेंसी ने यह दावा किया था कि ज़ब्त या फ्रीज की गई संपत्ति को रखने के लिए औपचारिक आदेश जारी करना कानूनी या प्रक्रिया से जुड़ी कोई जरूरी शर्त नहीं है, ताकि धारा 17(4) के तहत संपत्ति को अपने पास रखा जा सके। ED ने आगे यह भी तर्क दिया कि धारा 20 के तहत दिए गए प्रक्रिया से जुड़े नियम केवल निर्देशिका (directory) हैं, अनिवार्य (mandatory) नहीं।

हालांकि, आरोपी के वकील ने यह दलील दी कि अधिकृत अधिकारी द्वारा संपत्ति को अपने पास रखने का औपचारिक आदेश यह सुनिश्चित करता है कि निर्णायक प्राधिकरण के पास सभी जरूरी जानकारी हो, इससे पहले कि वह ED को मनी लॉन्ड्रिंग में उसकी संलिप्तता की जांच के लिए एक साल तक जब्त की गई संपत्ति को अपने पास रखने की अनुमति दे।

धारा 17(4) के तहत, एक अधिकृत ED अधिकारी को खोजबीन, जब्ती, या फ्रीज करने के आदेश के 30 दिनों के भीतर निर्णायक प्राधिकरण (adjudicating authority) के सामने एक आवेदन दाखिल करना होता है, ताकि जब्त या फ्रीज की गई संपत्ति को अपने पास रखने की अनुमति मिल सके। वहीं, धारा 20 का संबंध जब्त या फ्रीज की गई संपत्ति को अपने पास रखने से है। इसके लिए, ED निदेशक द्वारा अधिकृत एक अधिकारी को एक अलग और स्वतंत्र आदेश पारित करना होता है, जिसमें यह बताया जाता है कि संपत्ति को 180 दिनों तक अपने पास रखना क्यों जरूरी है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि निर्णायक प्राधिकरण यह फैसला कर सके कि संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल है या नहीं और उसकी कुर्की (attachment) की पुष्टि कर सके।

न्यायमूर्ति शंकर की ओर से लिखे गए इस फैसले में बेंच ने कहा कि वैध आदेश के बिना सीधे आवेदन देना कानूनी जरूरतों को नजरअंदाज करने जैसा होगा। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के शॉर्टकट से ऐसे व्यक्ति के लिए गंभीर और कठोर परिणाम हो सकते हैं, जिसकी संपत्ति जब्त या फ्रीज की गई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रक्रिया से जुड़े सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना पारित किया गया कोई भी आदेश अमान्य (void) होगा।

कोर्ट ने कहा, “धारा 20 जब्त फ्रीज या की गई संपत्ति को अपने पास रखने के संबंध में एक प्रक्रिया से जुड़ा सुरक्षा उपाय है। इसे दरकिनार करके संपत्ति को अपने पास रखने की अनुमति देना कानून के आदेश का उल्लंघन होगा और PMLA में प्रक्रिया से जुड़े सुरक्षा उपायों को शामिल करने के उद्देश्य को ही खत्म कर देगा।”

अपने 41 पन्नों के फैसले में, कोर्ट ने यह बात भी कही: “धारा 20 किसी भी ज़ब्ती के दिन से लागू होती है और जब्त किए गए सामान को 180 दिनों तक अपने पास रखने के लिए इसे लागू करना होगा। सीधे शब्दों में कहें, धारा 17 के तहत जब्ती या फ्रीज करने की कार्रवाई के बाद, धारा 20 के प्रावधानों को सौंप दिया जाएगा। हमारी राय में कानून ऐसा कोई रास्ता नहीं देता है, जिसमें सीधे धारा 17(4) के प्रावधानों का सहारा लिया जा सके।”

“नेपाल हिंसा में शामिल लोगों की होगी जांच, मारे गए लोग शहीद; सुशीला कार्की देंगी 10 लाख का मुआवजा”

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नेपाल की राजनीति एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। हाल ही में हुए संसद भंग और सड़कों पर भड़की हिंसा के बीच देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकीं सुशीला कार्की ने रविवार को अंतरिम प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला।

कार्की ने साफ कहा कि उनकी सरकार केवल संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए है न कि सत्ता में लंबे समय तक टिके रहने के लिए। प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद कार्की ने अपने पहले संबोधन में Gen-Z को बड़ा झटका दिया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि नेपाल में हाल में हुए हिंसक प्रदर्शन की जांच कराई जाएगी।

प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद कार्की ने अपने पहले संबोधन में कहा, “तोड़फोड़ की घटना में शामिल लोगों की जांच होगी। मेरा दल और मैं सत्ता का स्वाद चखने नहीं आए हैं। हम छह महीने से ज्यादा नहीं रुकेंगे और नई संसद के चुने जाने के बाद जिम्मेदारी सौंप देंगे। जनता के सहयोग के बिना हम सफल नहीं होंगे।”

नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के बाद सुशीला कार्की ने कहा, “8 सितंबर की घटना में मारे गए सभी लोगों को शहीद घोषित किया गया है और उन्हें दस-दस लाख रुपये दिए जाएंगे। घायलों का खर्च सरकार उठाएगी और उन्हें मुआवजा भी दिया जाएगा। शवों को काठमांडू से दूसरे जिलों में भेजने की व्यवस्था सरकार करेगी। हम आर्थिक संकट में हैं। हमें पुनर्निर्माण पर चर्चा और काम करना चाहिए। निजी संपत्तियां भी जला दी गईं। हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। सरकार उन्हें कुछ मुआवजा देने के उपायों पर काम करेगी। यह आसान ऋण या किसी अन्य उपाय के माध्यम से हो सकता है।”

नेपाल में यह राजनीतिक संकट तब गहराया जब सत्ता में चल रही गठबंधन सरकार आंतरिक मतभेदों और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण गिर गई। संसद भंग होने के बाद विपक्षी दलों और नेपाल के युवाओं जिन्हें Gen-Z कहा गया, ने व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई जगहों पर हिंसक झड़पें और सरकारी संपत्तियों की तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। इन्हीं हालातों को नियंत्रित करने और अगले आम चुनाव तक व्यवस्था चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट और संवैधानिक निकायों की सिफारिश पर कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया।

कौन हैं सुशीला कार्की? सुशीला कार्की नेपाल की राजनीति और न्यायपालिका दोनों में ही एक चर्चित चेहरा रही हैं। वह 2016 में नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं और अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े फैसलों के लिए जानी गईं। कार्की की नियुक्ति को नेपाल की राजनीति में साफ-सुथरी छवि और महिला नेतृत्व को आगे लाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।

कार्की के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक स्थिरता बहाल करना और देश को चुनाव तक ले जाना है। हाल के वर्षों में नेपाल ने बार-बार सरकार बदलने का रिकॉर्ड बनाया है। केवल पिछले 10 वर्षों में देश में एक दर्जन से अधिक प्रधानमंत्रियों ने पदभार संभाला। इससे जनता का विश्वास कमजोर हुआ है और लोकतांत्रिक संस्थाएं दबाव में आई हैं।

साथ ही, नेपाल इस समय आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई से भी जूझ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई सरकार को सिर्फ राजनीतिक संक्रमण संभालने तक सीमित न रहकर जनहित से जुड़े तात्कालिक मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा।

कार्की ने अपने बयान में कहा कि उनकी सरकार का प्राथमिक उद्देश्य निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराना है। उन्होंने नागरिक समाज और युवाओं से अपील की कि वे लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिम्मेदारी निभाएं। नेपाल की जनता अब इस इंतजार में है कि क्या सुशीला कार्की का कार्यकाल वास्तव में राजनीतिक स्थिरता की दिशा में एक कदम साबित होगा या फिर यह भी नेपाल की राजनीति के अस्थिर अध्यायों में से एक बनकर रह जाएगा।