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NMDC ने एक वित्तीय वर्ष में 50 मिलियन टन लौह अयस्क उत्पादन का किया ऐतिहासिक रिकॉर्ड…

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NMDC का नया मील का पत्थर’

भारत की सबसे बड़ी लौह अयस्क उत्पादक कंपनी NMDC ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में एक ही वित्तीय वर्ष में 50 मिलियन टन (MT) लौह अयस्क का उत्पादन कर देश की पहली खनन कंपनी बनने का गौरव हासिल किया है।

1958 में भारत के लौह अयस्क संसाधनों के विकास के लिए स्थापित, यह नवरत्न CPSE, इस्पात मंत्रालय के अधीन, 1978 में लगभग 10 MT का उत्पादन करती थी।

एक आधिकारिक बयान के अनुसार, “दशकों में, उत्पादन पांच गुना बढ़कर FY 2025-26 में ऐतिहासिक 50 MT तक पहुंच गया है, जो कंपनी के भारत के लौह अयस्क आपूर्ति श्रृंखला के रीढ़ में बदलने का संकेत है।”

NMDC का 50 मिलियन टन के मील के पत्थर तक पहुंचना हाल के वर्षों में विकास में तेज वृद्धि को भी दर्शाता है।

2015 से उत्पादन लगभग दो-तिहाई बढ़कर 30 MT से 50 MT तक पहुंच गया है, जिसमें पिछले चार वर्षों में वर्तमान क्षमता का लगभग एक-पांचवां हिस्सा जोड़ा गया है, जो कंपनी के इतिहास में सबसे तेज विस्तार चरण को दर्शाता है। NMDC लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अमितावा मुखर्जी ने कहा, “50 मिलियन टन तक पहुंचना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और यह NMDC 2.0 के तहत हमारी प्रगति को दर्शाता है। जो एक बार दशकों में बनता था, उसे हमने कुछ वर्षों में तेज कार्यान्वयन, जिम्मेदार खनन प्रथाओं और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता के माध्यम से तेज किया है।”

भारत के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादक होने के नाते, यह मील का पत्थर न केवल हमारे संचालन की ताकत को दर्शाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हमें देश के इस्पात पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करने के लिए कितना विश्वास दिया गया है।

छत्तीसगढ़ और कर्नाटका के खनिज समृद्ध क्षेत्रों में अत्यधिक यांत्रिक संचालन के साथ, NMDC देश की लौह अयस्क सुरक्षा सुनिश्चित करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। कंपनी ने कहा कि वह संचालन उत्कृष्टता, तकनीकी उन्नति और जिम्मेदार खनन प्रथाओं पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखती है, क्योंकि वह विकास के अगले चरण की ओर देखती है। जैसे-जैसे भारत 2030 तक इस्पात उत्पादन क्षमता को 300 मिलियन टन तक बढ़ाने के लक्ष्य की ओर बढ़ता है, लौह अयस्क की स्थिर और विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना एक रणनीतिक प्राथमिकता बन गया है।

देश में गरमाया गैस संकट. संसद में भी सांसदों को नहीं मिल रही चाय .

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मध्य पूर्व में बिगड़ हालातों की वजह से देश में गैस संकट पैदा हो गया है. जिसकी वजह से कई फूड रेस्टोरेंट के बंद पड़े हैं, गैस एजेंसियों के बाहर कतारों की खबरें हैं. इसके अलावा देश के कई हिस्सों में लोगों ने इसको लेकर प्रदर्शन भी किया है.

 गैस संकट की आंच संसद तक भी पहुंच गई है. शनिवार को LPG संकट को लेकर संसद में सरकार और विपक्ष के बीच जमकर बहस हुई.

सरकार का दावा है कि स्थिति काबू में है और वह डिमांड को पूरा करने के लिए काम कर रही है. लेकिन कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के भारी अंतर को उजागर किया. कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सांसदों को संसद में चाय मिलने में भी दिक्कत हो रही है और उन्होंने कहा कि लोगों ‘कालाबाजारी’ के चलते बढ़ी हुई कीमतों लिए 1500 से 2000 रुपये देने पड़ रहे हैं.

क्या बोले कांग्रेस नेता?

कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि कमी है. मैं रोज़ा (व्रत) रख रहा हूं, लेकिन कल संसद में चर्चा का विषय यह था कि जब सांसदों ने संसद कैंटीन में चाय या कॉफ़ी मांगी, तो उन्हें बताया गया कि यह उपलब्ध नहीं है. और फिर भी, आप दावा करते हैं कि घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है.

उन्होंने आगे कहा कि कालाबाजारी की खबरें आ रही हैं, जिसमें कीमतें 1500 से 2000 रुपये तक मांगी जा रही हैं. जावेद खान ने सरकार पर कई आयोर लगाए. उन्होंने कहा कि सरकार भले ही कहे कि घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. उन्होंने दावा किया कि संसद में ही सांसदों को चाय-कॉफी नहीं मिली, क्योंकि कैंटीन में गैस खत्म हो गई थी. उन्होंने ये भी कहा कि वह खुद रोजा रख रहे हैं, लेकिन संसद में इस मुद्दे पर चर्चा जरूरी थी.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का पलटवार

उन्होंने विपक्ष पर जिम्मेदारी न निभाने का आरोप लगाया. निर्मला ने कहा कि पश्चिम एशिया के हालात के कारण सप्लाई चेन में जो चुनौतियां आ रही हैं, उनसे निपटने के लिए सरकार ने 50,000 करोड़ रुपये का फंड बनाया है, लेकिन विपक्ष इसे सुनने को तैयार नहीं है.

कांग्रेसी नेता बौखला कर झूठ बोल रहा है। संसद भवन की कैंटीन जो सौ रुपए में खाना दे रही है क्या चाय नहीं देती होगी। असंभव।

“US Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग से इन मुस्लिम देशों की बल्ले बल्ले, हो रही तगड़ी कमाई”

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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। जंग ने अब वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर असर डालना शुरू कर दिया है।

युद्ध के 15 दिन पूरे होने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि इस टकराव से किसे नुकसान हुआ और किसे फायदा मिला? दरअसल, जब भी खाड़ी क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है तो इसका सबसे पहला असर ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।

पर्शियन गल्फ दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। ऐसे में संघर्ष की स्थिति बनने पर तेल की सप्लाई बाधित होने का खतरा बढ़ जाता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से ऊपर चली जाती हैं।

US Iran War: तेल निर्यातक देशों को मिलता है लाभ

– तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से उन देशों को सीधा फायदा होता है जो बड़े पैमाने पर तेल निर्यात करते हैं। सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और रूस जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को महंगे तेल से बड़ा लाभ मिलता है।

– हालांकि, इस बार स्थिति थोड़ी अलग नजर आ रही है। क्षेत्र में बढ़ते हमलों और सुरक्षा खतरों की वजह से कई रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को अस्थायी तौर पर बंद करना पड़ा है।

– इससे कुछ खाड़ी देशों को आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ रहा है। इसके बावजूद कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का फायदा तेल निर्यातक मुस्लिम देशों को मिल रहा है।

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US Iran war Impact: रूस को मिला आर्थिक और राजनीतिक फायदा

इस पूरे संघर्ष से सबसे ज्यादा फायदा रूस को मिलने की चर्चा हो रही है। रूस पहले से ही दुनिया के बड़े तेल और गैस निर्यातकों में शामिल है। जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो रूस की आय में भी तेजी से इजाफा होता है। इसके अलावा, राजनीतिक स्तर पर भी रूस को अवसर मिलता है। जब अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व में युद्ध पर केंद्रित रहता है तो यूरोप और पूर्वी यूरोप के अन्य मुद्दों पर उसकी सक्रियता कम हो सकती है। इससे रूस को अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने की गुंजाइश मिलती है।

चीन की रणनीति भी मजबूत

इस संघर्ष से चीन को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलता दिखाई दे रहा है। चीन लंबे समय से मध्य पूर्व में अपनी आर्थिक और राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को अपने तेल के लिए वैकल्पिक खरीदारों की तलाश रहती है। ऐसे में चीन अपेक्षाकृत कम कीमत पर ईरान से तेल खरीद सकता है। इससे उसे सस्ता ईंधन मिलता है और साथ ही क्षेत्र में उसका प्रभाव भी बढ़ता है।

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हथियार उद्योग की बढ़ती मांग

युद्ध का एक बड़ा आर्थिक लाभ हथियार बनाने वाली कंपनियों को भी मिलता है। अमेरिका, फ्रांस, यूके और रूस की रक्षा कंपनियों को ऐसे समय में बड़े ऑर्डर मिलने लगते हैं। मध्य पूर्व के कई देश क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए मिसाइल सिस्टम, फाइटर जेट और अन्य आधुनिक हथियार खरीदते हैं। इससे रक्षा उद्योग को अरबों डॉलर का कारोबार मिलता है।

इजराइल की रणनीतिक सोच

ईरान और इजराइल के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। इजराइल हमेशा ईरान की परमाणु और सैन्य क्षमता को अपने लिए बड़ा खतरा मानता रहा है। ऐसे में यदि युद्ध के कारण ईरान का सैन्य ढांचा कमजोर होता है तो इसे इजराइल अपने लिए रणनीतिक राहत के रूप में देखता है, भले ही संघर्ष के दौरान उसे भी नुकसान झेलना पड़े।

घरेलू राजनीति पर भी असर

कई बार युद्ध का लाभ सीधे देशों को नहीं बल्कि वहां के नेताओं को मिलता है। राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दे को आगे रखकर सरकारें घरेलू असंतोष से ध्यान हटाने की कोशिश करती हैं। ईरान और अमेरिका दोनों में यह रणनीति अलग-अलग समय पर देखने को मिलती रही है। अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार, हथियार उद्योग, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

Silver Rate Today: जंग के बीच चांदी में बड़ी गिरावट! झटके में 11,000 गिरे दाम, अब इतना सस्ता हो गया सिल्वर?

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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत में चांदी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। 13 मार्च 2026 को सर्राफा बाजार में चांदी के दाम में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

अखिल भारतीय सर्राफा संघ के अनुसार राजधानी दिल्ली में चांदी की कीमत ₹11,000 गिरकर ₹2,65,500 प्रति किलोग्राम (सभी टैक्स सहित) रह गई। इससे पहले पिछले कारोबारी दिन चांदी ₹2,76,500 प्रति किलो पर बंद हुई थी।

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर भी चांदी के वायदा भाव में गिरावट देखी गई। यहां चांदी करीब 3.24 प्रतिशत यानी ₹8,683 गिरकर ₹2,59,279 प्रति किलो पर आ गई, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह ₹2,67,962 प्रति किलो पर बंद हुई थी। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के ताजा आंकड़ों के अनुसार एक किलो चांदी की कीमत करीब ₹7,813 घटकर ₹2.60 लाख प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है। इससे पहले यह करीब ₹2.68 लाख प्रति किलो थी। गुडरिटर्न्स की रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू बाजार में चांदी की कीमत आज करीब ₹5,000 गिरकर ₹2,75,000 प्रति किलो तक आ गई। चूंकि शनिवार और रविवार को बाजार बंद रहता है, इसलिए फिलहाल यही कीमतें मान्य मानी जा रही हैं।

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International Market: वैश्विक बाजार में भी दबाव

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चांदी के भाव दबाव में हैं। हाजिर चांदी का भाव गिरकर करीब 83.14 डॉलर प्रति औंस पर आ गया है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती और कमोडिटी बाजार में अस्थिरता की वजह से कीमती धातुओं के दाम में उतार-चढ़ाव जारी है।

All Time High से बड़ी गिरावट

दिलचस्प बात यह है कि इसी साल 29 जनवरी 2026 को चांदी का वायदा भाव ₹4,20,048 प्रति किलो के ऑल टाइम हाई स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन उसके बाद बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली है। 31 दिसंबर 2025 को चांदी की कीमत लगभग ₹2.30 लाख प्रति किलो थी, जो जनवरी के अंत तक बढ़कर ₹3.86 लाख प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई थी। इसके बाद पिछले करीब 44 दिनों में चांदी की कीमत में करीब ₹1,25,445 तक की गिरावट दर्ज की गई है।

भारत में सोना-चांदी के भाव कैसे तय होते हैं

भारत में सोना और चांदी की कीमतें कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों पर निर्भर करती हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार, डॉलर की स्थिति, कच्चे तेल की कीमत, आयात शुल्क, जीएसटी और घरेलू मांग-आपूर्ति का बड़ा असर होता है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA), मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) और अंतरराष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों के आधार पर रोजाना इन धातुओं के दाम तय होते हैं। शादी-विवाह का सीजन, निवेश की मांग और आर्थिक हालात भी इनकी कीमतों को प्रभावित करते हैं।

ईरान-अमेरिका संघर्ष: तेल संकट और कूटनीतिक विरोधाभास…

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ईरान के विदेश मंत्री का अमेरिका पर हमला

ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष ने वैश्विक कूटनीति में एक अनोखा विरोधाभास उत्पन्न किया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शनिवार को अमेरिका को ‘पाखंडी’ बताते हुए उस पर तीखा हमला किया।

अराघची का कहना है कि जो अमेरिका पहले भारत पर रूसी तेल का आयात न करने का दबाव बना रहा था, वही अब युद्ध के कारण उत्पन्न तेल संकट के चलते रूस से तेल खरीदने के लिए गिड़गिड़ा रहा है।

अराघची की आलोचना और अमेरिका की नीति

अराघची ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के माध्यम से अमेरिका की निंदा की। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन ने महीनों तक भारत पर दबाव डाला कि वह रूसी तेल का आयात बंद करे, लेकिन अब जब ईरान के साथ संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में तनाव बढ़ गया है, तो वह देशों को वही तेल खरीदने के लिए प्रेरित कर रहा है। उन्होंने लिखा, “अमेरिका ने भारत को धमकाकर रूस से तेल का आयात बंद करवाने की कोशिश की।”

यूरोपीय सरकारों पर आरोप

अराघची ने यूरोपीय सरकारों पर भी आरोप लगाया कि वे रूस के खिलाफ अमेरिकी समर्थन प्राप्त करने के लिए ईरान के खिलाफ एक ‘अवैध युद्ध’ का समर्थन कर रही हैं। उन्होंने कहा, “यूरोप को लगा था कि ईरान के खिलाफ अवैध युद्ध का समर्थन करने से उन्हें रूस के खिलाफ अमेरिका का समर्थन मिलेगा। यह बेहद दयनीय है।”

तेल की कीमतों में वृद्धि

ईरान के विदेश मंत्री ने ये टिप्पणियाँ ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के संदर्भ में कीं, जिसमें बताया गया था कि तेल की बढ़ती कीमतों से रूस को राजस्व में भारी बढ़ोतरी हो रही है।

अमेरिका की नई छूट

इन टिप्पणियों के बीच, ट्रंप प्रशासन ने 30 दिनों की एक छूट की घोषणा की है, जिसके तहत विभिन्न देश समुद्र में फंसे हुए रूसी तेल के जहाजों से तेल खरीद सकते हैं। यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के उद्देश्य से उठाया गया है, क्योंकि मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं।

ईरान का भारत के लिए सुरक्षित मार्ग

संघर्ष के बावजूद, ईरान ने भारत के झंडे वाले दो लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) कैरियर को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है। भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने कहा कि तेहरान इस रणनीतिक जलमार्ग से भारत जाने वाले जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करेगा।

राहुल गांधी ने भाजपा सरकार पर कृषि नीतियों को लेकर उठाए सवाल…

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लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शनिवार को भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से जुड़े उनके सवालों का उत्तर देने से बच रही है।

उन्होंने कहा कि सरकार अपने स्वार्थ के लिए भारतीय कृषि को बलि चढ़ा रही है। राहुल ने फेसबुक पर एक पोस्ट में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी द्वारा दिए गए उत्तरों पर असंतोष व्यक्त किया।

सरकार के जवाब पर असंतोष

राहुल गांधी ने लोकसभा में सीधे सवाल किया कि 2021 में किसानों से किए गए वैधानिक एमएसपी के वादे को अब तक लागू क्यों नहीं किया गया। सरकार ने इस पर सीधे उत्तर देने के बजाय अपनी मौजूदा एमएसपी नीति को दोहराया। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार ने राज्यों पर एमएसपी बोनस समाप्त करने के लिए दबाव डाला, जिसे उसने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के नाम पर उचित ठहराने की कोशिश की।

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर सवाल

जब राहुल गांधी ने पूछा कि क्या अमेरिका के साथ व्यापार बाधाओं को कम करने की प्रतिबद्धता भारत की एमएसपी और सार्वजनिक खरीद नीतियों को प्रभावित करती है, तो सरकार ने इस सवाल का भी उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में ‘गैर-व्यापार बाधाओं’ को कम करने का क्या मतलब है। क्या इसका मतलब एमएसपी व्यवस्था और सरकारी खरीद को कमजोर करना है? सरकार इस सवाल से भी बच रही है।

किसानों के अधिकारों की रक्षा की प्रतिबद्धता

राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार न केवल किसानों से किए गए वादों को पूरा करने से इनकार कर रही है, बल्कि अपने स्वार्थ के लिए भारतीय कृषि को भी कुर्बान करने को तैयार है। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे किसानों के अधिकारों की रक्षा और एमएसपी को सुरक्षित रखने के लिए संसद के अंदर और बाहर अपनी आवाज उठाते रहेंगे। राहुल गांधी ने इस समझौते को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार निशाना साधा है और चेतावनी दी है कि यह कृषि क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित होगा। भारत और अमेरिका ने 7 फरवरी को एक अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा पर सहमति जताई थी।

असम में युवा मतदाताओं की भूमिका: 2026 विधानसभा चुनाव की तैयारी..

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2026 विधानसभा चुनाव की तैयारी

असम में 2026 विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ते हुए, राजनीतिक चर्चाएं धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। राजनीतिक नेता भाषण दे रहे हैं, पार्टियां गठबंधन बना रही हैं, और सोशल मीडिया पर विचारों की भरमार है।

लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कॉलेज के छात्र इस सब में कहां खड़े हैं?

युवाओं की एक बड़ी संख्या असम के मतदान जनसंख्या का हिस्सा है। कई छात्र 2026 में पहली बार वोट डालेंगे। उनके लिए, यह चुनाव केवल सरकार चुनने का मामला नहीं है, बल्कि उस भविष्य का चुनाव है जिसमें वे जीना चाहते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता, बढ़ती कीमतें, बाढ़ नियंत्रण और विकास जैसे मुद्दे उनके जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। इसलिए, छात्रों को राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय होना चाहिए।

कुछ कैंपस में सक्रिय बहस

कुछ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में राजनीतिक बहसें काफी सक्रिय हैं। छात्र पार्टी नीतियों, नेतृत्व शैलियों और सरकारी निर्णयों पर चर्चा करते हैं। वे सेमिनारों में भाग लेते हैं, छात्र संगठनों में शामिल होते हैं और अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करते हैं। सोशल मीडिया भी राजनीतिक अभिव्यक्ति का एक प्रमुख मंच बन गया है। इंस्टाग्राम स्टोरीज, व्हाट्सएप ग्रुप और एक्स पोस्ट विचारों, तर्कों और प्रचार संदेशों से भरे हुए हैं। कई छात्रों के लिए, डिजिटल स्पेस भौतिक बहसों से अधिक प्रभावशाली हो गया है।

चुप्पी और राजनीतिक दूरी

हालांकि, कई कैंपस में चुप्पी है। कुछ छात्र मानते हैं कि राजनीति केवल विभाजन और तनाव पैदा करती है। वे पढ़ाई, परीक्षाओं और करियर की तैयारी पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करते हैं। कई लोग मानते हैं कि राजनीति पर खुलकर बोलने से दोस्ती को नुकसान हो सकता है। कुछ छात्र राजनीतिक चर्चा से बचते हैं ताकि हॉस्टल और कक्षाओं में शांति बनी रहे। इसके अलावा, एक बड़ी संख्या में छात्र राजनीति से निराश हैं। वे महसूस करते हैं कि नेता केवल चुनावों के समय युवाओं को याद करते हैं।

युवा मतदाताओं के लिए सवाल

2026 के चुनाव युवा मतदाताओं के लिए गंभीर सवाल भी लाते हैं। वे किस प्रकार के विकास की इच्छा रखते हैं? क्या वे वर्तमान नीतियों से संतुष्ट हैं? क्या उन्हें प्रतिनिधित्व महसूस होता है? नौकरी के अवसर, स्टार्टअप समर्थन, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, नशे की लत और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। ब्रह्मपुत्र द्वारा हर साल आने वाली बाढ़ हजारों परिवारों को प्रभावित करती है। छात्र इन वास्तविकताओं से अलग नहीं हैं।

राजनीतिक जागरूकता का महत्व

हालांकि, राजनीतिक जागरूकता का मतलब किसी भी पार्टी का अंध समर्थन नहीं है। इसका मतलब है नीतियों को समझना, नेताओं से सवाल करना और आलोचनात्मक सोच रखना। कैंपस को खुली चर्चा के स्थान होना चाहिए जहां विभिन्न विचारों का सम्मान किया जाए। स्वस्थ बहस लोकतंत्र को मजबूत करती है। चुप्पी इसके विपरीत इसे कमजोर करती है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक भागीदारी दुश्मनी में न बदले। चुनाव अक्सर भावनात्मक प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करते हैं। लेकिन छात्रों को सम्मानपूर्वक असहमत होना सीखना चाहिए। एक कैंपस को सीखने का स्थान रहना चाहिए, न कि संघर्ष का।

असम के युवाओं का महत्वपूर्ण क्षण

असम के युवा एक महत्वपूर्ण क्षण में खड़े हैं। 2026 विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की प्रतिस्पर्धा नहीं हैं। ये उन दिशा-निर्देशों के बारे में हैं जिनमें राज्य आने वाले वर्षों में आगे बढ़ेगा। युवा मतदाता उस दिशा को प्रभावित करने की शक्ति रखते हैं।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि छात्र राजनीतिक हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या वे सूचित, विचारशील और जिम्मेदार नागरिक हैं। क्या कैंपस सार्थक बहस के केंद्र बनेंगे? या वे चुप्पी के स्थान बने रहेंगे जहां राजनीति से बचा जाता है?

इसका उत्तर न केवल चुनाव को आकार देगा, बल्कि असम के लोकतांत्रिक भविष्य को भी प्रभावित करेगा।

PM Modi In Assam: पीएम ने किया शिलॉन्ग-सिलचर कॉरिडोर का भूमि पूजन, 8 घंटे का सफर 5 घंटे में होगा…

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PM Modi In Assam: पीएम नरेंद्र मोदी ने असम दौरे पर सिलचर में शिलांग-सिलचर कॉरिडोर परियोजना का भूमि पूजन किया। यह उत्तर-पूर्व भारत का पहला एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड चार लेन हाई-स्पीड कॉरिडोर होगा।

पीएम मोदी ने इसे पूर्वोत्तर के विकास के लिए मील का पत्थर बताया। असम में कुछ ही दिन में चुनाव होने वाले हैं। उससे पहले अहम विकास परियोजनाओं का ऐलान और शिलान्यास हो रहा है।

हाई स्पीड कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस पर भी हमला बोला। पीएम ने कहा कि कांग्रेस के राज में दशकों तक पूर्वोत्तर और असम को विकास योजनाओं से दूर रखा गया। आज असम पूर्वोत्तर ही नहीं देश में विकास का मॉडल बन रहा है।

PM Modi In Assam: पीएम ने असम और पूर्वोत्तर को बताया विकास का गेटवे<

असम के सिलचर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘चाहे सड़कें हों, रेलवे हो या कॉलेज, इनमें से हर एक परियोजना बराक वैली को उत्तर-पूर्व का एक बड़ा लॉजिस्टिक्स और व्यापार केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रही है। इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र के युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अनगिनत अवसर पैदा होंगे। इन विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए मैं आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूं।’

Shillong Silchar Corridor से मिलेगी आर्थिक विकास को रफ्तार

– करीब 166 किलोमीटर लंबा यह प्रोजेक्ट लगभग 22,860 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जाएगा। इस कॉरिडोर से मेघालय और असम के बीच कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार होगा।

– परियोजना के पूरा होने के बाद गुवाहाटी और सिलचर के बीच की दूरी कम हो जाएगी और यात्रा समय 8.5 घंटे से घटकर लगभग 5 घंटे रह जाएगा।

– सरकार का कहना है कि यह हाई-स्पीड कॉरिडोर क्षेत्र में आर्थिक विकास को गति देगा और सीमावर्ती व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर किया तीखा हमला, असम के विकास पर जोर…

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शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पार्टी पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि देश उनके अतीत के कार्यों के लिए उन्हें दंडित कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस लगातार चुनावों में हार का सामना कर रही है और अब वे देश के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।

शिलांग-सिलचर कॉरिडोर के भूमि पूजन के अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि असम में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया गया है और अब हर राज्य कांग्रेस को सबक सिखा रहा है।

कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन पर टिप्पणी

पिछले महीने एआई शिखर सम्मेलन में भारतीय युवा कांग्रेस के सदस्यों द्वारा किए गए कपड़े फाड़ने के विरोध का उल्लेख करते हुए, पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने इस सम्मेलन को बदनाम करने के लिए अजीब विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के पास अब हताशा में अपने कपड़े फाड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने यह भी कहा कि पूरे देश ने इस तरह के विरोध की निंदा की है।

असम के युवाओं के लिए अवसर

प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा सरकार के वर्तमान राजनीतिक माहौल की तुलना पूर्व की सरकारों से करते हुए कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्होंने असम के युवाओं को हिंसा और आतंकवाद के चक्र में फंसाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने असम को ‘बांटो और राज करो’ की नीति का प्रयोगशाला बना दिया था। अब असम के युवाओं के लिए अवसरों का आकाश खुला है।

बराक घाटी का विकास

उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने पूर्वोत्तर को उसके हाल पर छोड़ दिया था। आजादी के समय कांग्रेस ने सीमा निर्धारण इस तरह से किया कि बराक घाटी का समुद्र से संपर्क पूरी तरह से टूट गया। बराक घाटी, जो कभी एक प्रमुख व्यापार मार्ग और औद्योगिक केंद्र था, अब अपनी मूल शक्ति से वंचित हो गया है।

शिलांग-सिलचर कॉरिडोर का महत्व

शिलांग-सिलचर कॉरिडोर के शिलान्यास समारोह की लागत 24,000 करोड़ रुपये बताई गई है। पीएम मोदी ने कहा कि अगर कांग्रेस से पूछा जाए तो वे इसे लिख भी नहीं पाएंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि असम में भाजपा की सरकार बराक घाटी को व्यापार और वाणिज्य का प्रमुख केंद्र बनाने के लिए काम कर रही है।

Sonam Wangchuk NSA Revoked: 6 महीने बाद जेल से बाहर आएंगे सोनम वांगचुक, केंद्र सरकार ने हटाया उन पर से NSA?

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Sonam Wangchuk NSA Revoked: केंद्र सरकार ने लद्दाख के प्रमुख सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई हिरासत को वापस ले लिया है। वांगचुक को लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिया गया था। सरकार के इस फैसले को तनाव कम करने की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। उनकी रिहाई की मांग को लेकर देशभर में आवाजें उठ रही थीं, जिसके बाद गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप से यह कार्रवाई रद्द की गई।