प्रवर्तन निदेशालय यानी प्रवर्तन निदेशालय ने रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी के मुंबई स्थित बंगले ‘एबोड’ को कुर्क कर लिया है. इस संपत्ति की कीमत करीब 3,716 करोड़ रुपये आंकी गई है.
यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून, यानी Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत की गई है. मामला उनकी ग्रुप कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) से जुड़े कथित बैंक धोखाधड़ी से संबंधित है. इस केस में करीब 40 हजार करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड की जांच चल रही है. आइए जानें कि क्या ईडी किसी की जब्त संपत्ति को बेच सकता है कि नहीं.
बंगले की खास बातें
‘एबोड’ नाम का यह बंगला मुंबई के पाली हिल इलाके में स्थित है, जो शहर के सबसे महंगे और पॉश इलाकों में गिना जाता है. यह इमारत करीब 66 मीटर ऊंची है और इसमें 17 फ्लोर हैं. इसे देश के महंगे रिहायशी घरों में शामिल किया जाता है. ईडी ने इस संपत्ति को कुर्क करने के लिए प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया है. इसका मतलब है कि फिलहाल मालिक इस संपत्ति को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकता है.
कुर्की और जब्ती में क्या अंतर है?
PMLA के तहत ईडी पहले प्रोविजनल अटैचमेंट करती है. धारा 5 के तहत अगर एजेंसी को लगता है कि कोई संपत्ति अपराध की कमाई से जुड़ी है, तो वह उसे अस्थायी रूप से अटैच कर सकती है. इस दौरान संपत्ति मालिक के पास रह सकती है, लेकिन वह उसे बेच या गिरवी नहीं रख सकता है. इसके बाद मामला न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के पास जाता है. अगर वह अटैचमेंट को सही मानता है, तो कुर्की जारी रहती है. अंतिम फैसला विशेष अदालत में ट्रायल के बाद होता है.
क्या ईडी कुर्क संपत्ति बेच सकती है?
हां, लेकिन सीधे नहीं बेची जा सकती है. ईडी किसी संपत्ति को तभी संपत्ति बेच सकती है जब अदालत अपराध की पुष्टि कर दे और जब्ती का अंतिम आदेश दे दे. जब विशेष अदालत यह तय कर देती है कि संपत्ति अपराध की आय यानी Proceeds of Crime से जुड़ी है, तब उसे केंद्र सरकार के नाम जब्त कर दिया जाता है. इसके बाद सरकार उस संपत्ति को सार्वजनिक नीलामी या टेंडर के जरिए बेच सकती है. जब तक अदालत का अंतिम आदेश नहीं आता, तब तक ईडी संपत्ति को बेच नहीं सकती है.
बिक्री की प्रक्रिया कैसे होती है?
अंतिम जब्ती आदेश के बाद संपत्ति पूरी तरह केंद्र सरकार के अधिकार में चली जाती है. इसके बाद उसकी कीमत का आकलन कराया जाता है. आमतौर पर बिक्री सार्वजनिक नीलामी के जरिए की जाती है ताकि पारदर्शिता बनी रहे. बिक्री से मिली रकम सरकार के पास जाती है. अगर किसी बैंक या अन्य वित्तीय संस्था का बकाया है, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत उस पर भी विचार किया जाता है.



