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Bengal Election 2026: ममता की कुर्सी या BJP का राज? SIR, RG Kar-मतुआ समेत ये 5 फैक्टर्स पलटेंगे बंगाल की बाजी…

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West Bengal Election 2026: ममता की कुर्सी या बीजेपी का राज? पश्चिम बंगाल के चुनाव में तीन हफ्ते का समय रह गया और सूबे की सियासी जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस (TMC) जहां चौथी बार सत्ता बरकरार रखने की जद्दोजहद में है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस बार ‘दीदी’ के किले में सेंध लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।

बंगाल पर दुनिया भर की नजर टिकी है ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि राज्य में चुनावी परिणाम की पटकथा कौन से मुद्दे लिख रहे हैं। SIR (वोटर लिस्ट विवाद), RG Kar मामला और मतुआ वोट बैंक जैसे 5 बड़े फैक्टर्स बंगाल की बाजी पलटने का दम रखते हैं।

2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और वामपंथी दलों (CPIM) का सूपड़ा साफ होने के बाद, इस बार चुनावी रणभूमि में नए समीकरण उभर रहे हैं। एक तरफ एआईएमआईएम (AIMIM) और हुमायूं कबीर की एजूपी (AJP) का गठबंधन मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ फुरफुरा शरीफ से जुड़ा इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) अपना प्रभाव बढ़ाने को तैयार है। उत्तर बंगाल के राजबोंग्शी समुदाय से लेकर जंगलमहल के कुर्मी आंदोलन तक, बंगाल चुनाव 2026 की यह लड़ाई केवल नारों की नहीं, बल्कि उन क्षेत्रीय समीकरणों की है जो तय करेंगे कि कोलकाता के ‘राइटर्स बिल्डिंग’ पर इस बार किसका कब्जा होगा।

कागज पर तीन बार की विजेता टीएमसी बेशक आगे नजर आती है, लेकिन बीजेपी जिस तरह चुनाव लड़ती है उसमें चौंकाने वाले फैसले की उम्मीद बेमानी नहीं है। पश्चिम बंगाल के चुनावी गणित को हम मुद्दे और इलाकाई समीकरण में बांट कर समझने का प्रयास करते हैं। 2021 के चुनावों में टीएमसी को 213 सीटें मिलीं, भाजपा को 77, जबकि बाकी दलों का खाता तक नहीं खुला। 2024 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी ने 29 सीटें जीतीं, भाजपा को 12। लेकिन विधानसभा स्तर पर नॉर्थ बंगाल, जंगलमहल, मतुआ बहुल इलाके, मुस्लिम बहुल जिले और टीएमसी के शहरी गढ़वा क्षेत्र निर्णायक होंगे। आंकड़ों के आईने में देखें तो चुनाव का रंग साफ दिखता है।

नॉर्थ बंगाल: भाजपा का मजबूत, टीएमसी की चुनौती (North Bengal BJP Stronghold, TMC Challenge)

नॉर्थ बंगाल यानी कि दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर वाला इलाका। 294-सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए यह इलाका दोनों ही पार्टियों के लिए महत्त्वपूर्ण है। बल्कि इसे ऐसे समझ सकते हैं कि यहाँ से जो पार्टी आगे रहेगी उसके सरकार बनाने की संभावना अधिक होगी। 2021 में भाजपा ने यहां मजबूत पकड़ दिखाई। पार्टी ने अलीपुरदुआर की 5 में से 5, कूच बिहार की 9 में 7 और जलपाईगुड़ी में भी अच्छा प्रदर्शन किया था। दार्जिलिंग पहाड़ियों में भाजपा ने सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग शहर समेत कई सीटें झटक ली थी, जबकि कालिमपोंग सीट पर स्वतंत्र उम्मीदवार विजयी हुए। इस इलाके की कुल 64 विधानसभा सीटों में भाजपा को करीब आधी सीटों पर जीत मिली थी।

टीएमसी ने मुस्लिम बहुल मालदा (12 सीटें) और उत्तर दिनाजपुर (6 सीटें) में अपनी पकड़ कायम रखी। दक्षिण दिनाजपुर का मुकाबला दोनों दलों के बीच बराबरी पर रहा था। यहाँ से टीएमसी ने 4 जबकि भाजपा ने 3 सीटों पर कब्ज़ा जमाया था। इस चुनाव में टीएमसी ने दार्जिलिंग पहाड़ियों के तीन सीटों – दार्जिलिंग, कालिमपोंग और खुर्सियॉन्ग को अनित थापा की भारतीय गोर्खा प्रजातांत्रिक मोर्चा के लिए छोड़ दिया है। यहाँ से राजबोंगशी समुदाय जो कि इस क्षेत्र का सबसे बड़ा अनुसूचित जाति वोट बैंक है, उनकी भूमिका निर्णायक होगी। चाय बागान बेल्ट में भाजपा की पुरानी मजबूती को टीएमसी चुनौती दे रही है। 2021 में राजबोंगशी वोटों ने भाजपा को 40% से ज्यादा समर्थन दिया, लेकिन टीएमसी की कल्याण योजनाओं के कारण यह वोट बैंक भी धीरे-धीरे भाजपा से खिसकने लगा है। अगर राजबोंगशी एकजुट हुए तो भाजपा को फायदा, वरना टीएमसी हावी।

जंगलमहल: कुर्मी-आदिवासी वोट बैंक और 46 सीटों का सियासी ‘रण’

जंगलमहल (Jangalmahal) की 46 विधानसभा सीटें इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव का सबसे अनिश्चित क्षेत्र बनी हुई हैं। वहां का पूरा गणित 50 लाख की आबादी वाले कुर्मी समुदाय के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो लंबे समय से एसटी (ST) दर्जे की मांग को लेकर आंदोलनरत है। 2019 के लोकसभा चुनावों में कुर्मी समुदाय के 35% से अधिक एकतरफा समर्थन ने भाजपा को यहाँ बड़ी जीत दिलाई थी, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी विकास योजनाओं और रणनीतिक घेराबंदी से वापसी करने में कामयाब रही।