पिछले एक महीने से मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने समुद्र में भी भयानक स्थिति उत्पन्न कर दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आस-पास लगभग 3000 वाणिज्यिक जहाज फंसे हुए हैं, जिन पर 20,000 से अधिक नाविक सवार हैं।
इन नाविकों की जान हर पल संकट में है और उनके लिए भोजन और पीने का पानी खत्म हो चुका है या खत्म होने के कगार पर है। ये नाविक लगातार हेल्पलाइन संस्थाओं से संपर्क कर मदद की गुहार लगा रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि मदद के लिए आ रहे संदेशों की बाढ़ ने समुद्री हेल्पलाइन टीमों को भी परेशान कर दिया है।
बमबारी के बीच से आ रहे खौफनाक वीडियो
इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एसोसिएशन (ITF) को समुद्र से दिल दहला देने वाले संदेश और वीडियो प्राप्त हो रहे हैं। नाविक अपने जहाजों के पास गिरते बमों के वीडियो भेजकर किसी भी तरह वहां से निकालने की प्रार्थना कर रहे हैं। अरब और ईरान के लिए ITF के नेटवर्क कोऑर्डिनेटर मोहम्मद अरराचेदी ने बताया कि जैसे ही नाविकों को समुद्र में इंटरनेट मिलता है, वे रात के दो या तीन बजे भी फोन कर देते हैं। इन नाविकों की बस एक ही पुकार है कि वे बमबारी के बीच फंसे हैं और मरना नहीं चाहते। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री संस्था (IMO) के अनुसार, 28 फरवरी के बाद से इस अशांत क्षेत्र में कम से कम आठ नाविकों या बंदरगाह मजदूरों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जिसने खौफ को और बढ़ा दिया है।
भारतीय नाविकों की स्थिति
इस भयावह स्थिति में सबसे चौंकाने वाला तथ्य इन नाविकों का शोषण है। ITF को मिलने वाले आधे से अधिक ईमेल वेतन से जुड़ी चिंताओं के बारे में हैं। युद्ध क्षेत्र में काम कर रहे इन नाविकों को केवल 16 डॉलर (लगभग 1500 रुपये) रोजाना की मामूली दिहाड़ी मिल रही है। युद्ध क्षेत्र घोषित होने के बाद कई परेशान नाविक पूछ रहे हैं कि क्या अब उनकी दिहाड़ी बढ़ाकर 32 डॉलर की जाएगी? संस्था का कहना है कि यह कम वेतन जहाज मालिकों की मनमानी का परिणाम है, जो बिना उचित श्रम समझौते के काम करा रहे हैं। भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, म्यांमार और इंडोनेशिया जैसे देशों के ये नाविक आर्थिक मजबूरी के चलते जहाज छोड़ने का खर्च नहीं उठा सकते, इसलिए वे मौत के साये में भी भूखे-प्यासे काम करने को मजबूर हैं।



