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तमिलनाडु की सियासत में आखिर हर पार्टी के नाम में क्यों जुड़ा रहता ‘K’, 82 सालों से इस ‘क’ के इर्द-गिर्द घूम रही है राज्य की पूरी राजनीति…

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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों और थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) की धमाकेदार एंट्री ने दक्षिण की राजनीति में हलचल मचा दी है. विजय की इस जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि तमिलनाडु की सत्ता का रास्ता आज भी ‘K’ यानी ‘कड़गम’ शब्द से ही होकर गुजरता है. आखिर क्या वजह है कि पेरियार के दौर से लेकर आज विजय के उदय तक, हर पार्टी के नाम में यह शब्द अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है? पिछले 82 सालों से राज्य की पूरी सियासत इसी एक शब्द के इर्द-गिर्द क्यों सिमटी हुई है? जानते हैं पूरी कहानी.

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने देश को चौंका दिया है. दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार विजय की राजनीतिक पारी की ‘अपार सफलता’ ने यह साफ कर दिया है कि तमिलनाडु की जनता नए चेहरों को स्वीकार तो कर रही है, लेकिन अपनी जड़ों और पहचान के साथ समझौता करने को तैयार नहीं है. विजय की पार्टी के नाम में लगा ‘कड़गम’ शब्द उसी गौरवशाली द्रविड़ विरासत की अगली कड़ी है, जिसने दशकों से राज्य की किस्मत लिखी है. इसी के साथ यह भी तय हो गया कि तमिलनाडु की राजनीति में ‘K’ फैक्टर (कड़गम) महज एक नाम नहीं, बल्कि एक अभेद्य किला है. जिसे पार पाना किसी के लिए भी असभंव है. 1944 में पेरियार द्वारा ‘द्रविड़ कड़गम’ की स्थापना के बाद से आज तक, यानी पिछले 82 सालों से, चेन्नई के सचिवालय की कुर्सी उसी को मिली है जिसके पास इस नाम की विरासत रही है. विजय की हालिया जीत ने इसी ‘कड़गम’ परंपरा को और मजबूती दी है, जिसने राष्ट्रीय पार्टियों को सालों से राज्य की सीमाओं पर ही रोक कर रखा है. आइए समझते हैं कि आखिर इस एक शब्द में ऐसी क्या जादुई ताकत है जो तमिल मानुष के दिल पर राज करती है.

क्या है कड़गम शब्द का असली मतलब?

तमिल भाषा में ‘कड़गम’ का सीधा और सरल अर्थ होता है- ‘संस्था’, ‘संगठन’ या ‘परिषद’. प्राचीन समय में विद्वानों की सभा को कड़गम कहा जाता था. राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल एक ऐसे मंच के रूप में किया गया, जो किसी ‘पार्टी’ (जो कि एक अंग्रेजी शब्द है) से कहीं ज्यादा भावनात्मक और जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस हो. इसे अपनाने का मकसद लोगों को यह बताना था कि यह कोई चुनावी मशीनरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधार का आंदोलन है जो तमिलनाडु के आत्मसम्मान के लिए बना है.

पेरियार: वो नायक जिसने बदला इतिहास

इस पूरी कहानी की नींव 1944 में पड़ी थी. द्रविड़ आंदोलन के पुरोधा ई.वी. रामास्वामी ‘पेरियार’ ने दक्षिण की राजनीति को नई पहचान दी.  मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पेरियार ने अपनी ‘जस्टिस पार्टी’ का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कड़गम’ (DK) कर दिया था. पेरियार का मानना था कि ‘जस्टिस पार्टी’ नाम में एक तरह का संभ्रांतवाद झलकता है, जबकि ‘कड़गम’ शब्द सीधे तौर पर आम तमिल जनता की भाषा और उनकी मिट्टी से जुड़ा हुआ है. यहीं से तमिलनाडु की सियासत में ‘K’ फैक्टर की आधिकारिक एंट्री हुई थी.

तमिलनाडु की सियासत के इन दिग्गजों ने ‘कड़गम’ शब्द को अपनी पहचान बनाया है.

हिंदी विरोध और द्रविड़ गौरव की ढाल

कड़गम शब्द के इतना लोकप्रिय होने के पीछे एक बड़ा कारण ‘हिंदी विरोध आंदोलन’ भी रहा है. तमिलनाडु की राजनीति का मूल मंत्र ही अपनी भाषा और संस्कृति का संरक्षण रहा है. जब भी केंद्र की ओर से हिंदी को बढ़ावा देने की कोशिश हुई, इन कड़गम पार्टियों ने उसे तमिल संस्कृति पर हमले के रूप में पेश किया. विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, क्षेत्रीय दलों को लगा कि ‘पार्टी’ या ‘दल’ जैसे शब्द सुनने में उत्तर भारतीय लगते हैं, इसलिए उन्होंने जानबूझकर ‘कड़गम’ शब्द को पकड़े रखा ताकि वे अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान बनाए रख सकें.

अन्नादुरै की बगावत और डीएमके का जन्म

पेरियार के सबसे करीबी शिष्य सी.एन. अन्नादुरै के साथ उनके वैचारिक मतभेद बढ़ गए. 1949 में अन्नादुरै ने अलग रास्ता चुनने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने पेरियार की विचारधारा और ‘कड़गम’ शब्द को नहीं त्यागा. उन्होंने अपनी नई पार्टी का नाम रखा ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (DMK). अन्नादुरै यह अच्छी तरह जानते थे कि अगर उन्हें जनता के दिलों पर राज करना है, तो उन्हें ‘कड़गम’ की विरासत को साथ लेकर चलना होगा. उनकी इस रणनीति ने काम किया और 1967 में पहली बार एक शुद्ध द्रविड़ कड़गम पार्टी ने सत्ता पर कब्जा कर लिया.

एमजीआर और जयललिता का सियासी सफरनामा

डीएमके के भीतर जब सुपरस्टार एम.जी. रामचंद्रन (MGR) का कद बढ़ा, तो 1972 में उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई. उन्होंने इसका नाम ‘अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (ADMK) रखा, जिसे बाद में ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (AIADMK) कर दिया गया. उन्होंने ‘अन्ना’ और ‘कड़गम’ दोनों शब्दों को अपने नाम में पिरोया ताकि वह खुद को अन्नादुरै का असली वारिस साबित कर सकें. जयललिता ने इसी नाम के सहारे सालों तक राज्य पर राज किया और ‘अम्मा’ के रूप में अपनी अमिट पहचान बनाई. इसी ‘K’ फैक्टर ने उन्हें राज्य की देवी बना दिया.

विजय की जीत और कड़गम का जलवा

सुपरस्टार विजय ने अपनी पार्टी का नाम ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ रखा और देखते ही देखते उन्होंने सूबे की राजनीति में अपनी जड़ें जमा लीं. उनकी इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ ‘कड़गम’ शब्द के प्रति लोगों का भरोसा है. तमिलनाडु में आम जनता का मानना है कि जो पार्टी अपने नाम में कड़गम लगाती है, वही उनकी भाषा, संस्कृति और अधिकारों के लिए दिल्ली से लड़ सकती है.  विजय ने भी इसी सेंटीमेंट को भुनाया और अपनी नई पार्टी को द्रविड़ विरासत का असली उत्तराधिकारी साबित कर दिया.

कड़गम विरासत: प्रमुख पार्टियां और उनके सूत्रधार

तमिलनाडु की सियासत के इन दिग्गजों ने ‘कड़गम’ शब्द को अपनी पहचान बनाया है. इनमें द्रविड़ कड़गम (पेरियार), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (सी.एन. अन्नादुरै), एआईएडीएमके (एम.जी. रामचंद्रन), तमिलगा वेत्री कड़गम (विजय), एमडीएमके (वाइको) और डीएमडीके (विजयकांत) प्रमुख हैं, जिन्होंने पिछले 82 सालों से राज्य की वैचारिक और राजनीतिक दिशा तय की है.

सिनेमा से सत्ता तक कड़गम का प्रभाव

तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता. कड़गम पार्टियों ने अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए फिल्मों का भरपूर सहारा लिया. करुणानिधि के लिखे संवाद हों या एमजीआर की फ़िल्मी छवि, ‘कड़गम’ की विचारधारा हर घर तक पहुँच गई. पर्दे पर जब नायक ‘कड़गम’ के झंडे तले लड़ता था, तो असल जिंदगी में भी लोग उस नाम के दीवाने हो जाते थे. आज भी वहां यह धारणा मजबूत है कि अगर नाम में ‘कड़गम’ नहीं, तो वह पार्टी अपनी नहीं. विजय ने भी इसी फिल्मी और सियासी फार्मूले को सफलतापूर्वक दोहराया है.