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संपूर्ण विश्व को चौंका दिया था इन 5 तस्वीरों ने

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अब इस तस्वीर को देखिए इस तस्वीर को यदि आप अचानक देखेंगे तो आपको लगेगा कि बाज़ आई फोन चला रहा है पर असलियत तो यह है कि बाज़ खिड़की के बाहर बैठा है और खिड़की के अंदर जो व्यक्ति है वह फोन चला रहा है ।

अब इस तस्वीर को देखिए ऐसा लग रहा है कि इस लड़की के पंख निकल आए हैं पर जब ध्यान से आप देखेंगे तो पता चलेगा कि पर तो दीवार पंख बने हुए हैं और यह लड़की वहां से गुजर रही थी और किसी ने उसकी तस्वीर खींच ली ।

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अब यह फोटो देखिए यह फोटो हर किसी को हैरान कर देती है इस तस्वीर को देखकर लगता है कि जैसे यह मक्खी किसी लाइट को लेकर उड़ रही है पर असलियत तो यह है कि इस फोटो को इतनी अच्छे तरीके से खींचा गया है कि यह मक्खी चंद्रमा को लेकर उड़ती हुई नजर आ रही है ।

अब इस तस्वीर को देखिए ओबामा एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भाषण दे रहे हैं वहीं एक व्यक्ति पहले तस्वीर में नजर आता है जिसमें उसके बाल है और दूसरी में नजर आता है कि उसके बाल नहीं है ऐसे कैसे हो सकता है पर ध्यान से जब आप देखेंगे तो पता चलेगा कि उस व्यक्ति के पीछे एक लड़की खड़ी थी ।

यह तस्वीर बहुत ही लाजवाब है यह ट्रक जा रहा है और ऐसा लगता है कि सूरज को अपने ऊपर लाद कर ले कर जा रहा है पर यह तस्वीर इतने अच्छे तरीके से खींची गई है यह दृश्य सच में हैरान कर देता है ।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री बघेल पर किसानों की आशा भरी निगाहें

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तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. श्री एम. जी. रामचन्द्रन के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल एक ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो किसानों के बारे में सोचते, चिंतन करते हैं और उनके हित में हरसंभव मदद कर रहे हैं। ये सोच तमिलनाडु के ‘धान के कटोर‘े के रूप में जाने वाले तंजावुर कावेरी डेल्टा क्षेत्र के किसानों की है। 

तंजावुर के किसानों ने गत दिनों वहां के कलेक्टर से मुलाकात की और उन्हें सौपें गए अपने ज्ञापन मंे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल को ‘‘किसानों के संरक्षक‘‘ का लेख करते हुए रूप में उन्हें बधाई और धन्यवाद दिया है। इन किसानों का कहना है कि एम. जी. रामचन्द्रन ने धान का बोनस दिलाया था, उनके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ही ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो किसानों के बारे मंे इतना अधिक सोचते है और उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के किसानों को 750 रूपये प्रति क्विंटल की दर से बोनस की राशि दिलाई। 

    इस आशय की खबरंे तमिलनाडु के प्रतिष्ठित मीडिया समूह जुनियर विकटन के तमिल संस्करण में प्रकाशित हुई है। अखबार ने लिखा है कि वर्ष 1977-78 मंे तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. श्री एम. जी. आर. ने अपने पहले कार्यकाल में 100 रूपये प्रति क्विंटल बोनस दिया था, मीडिया समूह ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की तुलना उस कदम से की है।
छत्तीसगढ़ के नागरिक के साथ-साथ स्वयं मुख्यमंत्री श्री बघेल भी तमिलनाडु राज्य के किसानों के बीच से आई इस खबर से अनजान थे। उन्होंने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह खुशी की बात है कि छत्तीसगढ़ में खेती-किसानी को बढ़ावा देने और किसानों और गांवों के विकास और कल्याण का बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ में किए जा रहे कार्याें दूर-दराज क्षेत्रों के किसानों ने भी तारीफ की है।  
    उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ मंे मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में सरकार का गठन होने के साथ दो घंटे के भीतर ही कैबिनेट की बैठक कर किसानों को धान का उचित मूल्य देने के लिए प्रति क्विंटल राशि बढ़ाकर ढाई हजार रूपए करने और किसानों के अल्पकालीन कृषि ऋण माफी करने जैसे दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य है, जो किसानों से देश में सबसे अधिक 2500 रूपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर रहा है।
इससे जहां किसानों का कृषि ऋण को बोझ कम हुआ और उन्हें ऋण के बोझ मानसिक और तनाव से मुक्ति मिली, वहीं फसल का उचित मूल्य मिलने से ना केवल उनके चेहरे में रौनक वापस लौटी बल्कि उनके घर-परिवार और गांवों मंे भी समृद्धि की आहट आई। इन निर्णयों से किसानों मंे व्यापक रूप से उत्साह और ऊर्जा का संचार हुआ और वे सरकार को भरपूर आशीर्वाद दे रहे है। केबिनेट के इस निर्णय से राज्य के 16 लाख 65 हजार किसानों द्वारा ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंकों से बांटे गए 6 हजार 230 करोड़ रूपए का अल्पकालीन कृषि ऋण माफ किया गया। 
इसी तरह श्री भूपेश बघेल सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के व्यावसायिक बैंकों द्वारा बांटे गए लगभग चार हजार करोड़ रूपए का अल्पकालीन ऋण को भी माफ करने का निर्णय लिया है। इससे राज्य के लगभग बीस लाख किसानों को साढ़े ग्यारह हजार रूपए की ऋण की ऋण माफी की लाभ मिल रहा है। इससे राज्य के किसानों को कर्ज के कुचक्र से मुक्ति दिलाने मंे मदद मिली है। ये किसान अब शून्य प्रतिशत ब्याज ऋण योजना से लाभ लेने मंे भी सक्षम बने है और उन्हें निजी साहूकार एवं सूदखोरों से कर्ज लेने की विवशता खत्म हुई है।  
इसी तरह राज्य शासन द्वारा 15 लाख किसानों को राहत देते हुए लगभग 15 वर्षों से लम्बित सिंचाई कर की बकाया राशि को 207 करोड़ रूपए की सिंचाई कर की बकाया राशि माफ की गई। 
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा एक अभिनव पहल करते हुए ‘छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी-नरवा, गरूवा, घुरवा, बारी – ऐला बचाना है संगवारी’ योजना शुरू की गई। इसके माध्यम से प्राकृतिक जल संसाधनों तथा नालों के उद्गम स्रोत से लेकर उसे रिचार्जिंग करने का कार्य वैज्ञानिक ढंग से किया जाना प्रारंभ किया गया। इसी तरह फसलों को चरने वाले पशुधन के संरक्षण और संवर्धन के लिए गौठान में डे-केयर के रूप में रखने की व्यवस्था प्रारंभ की गई। गोबर और अनुपयोगी कृषि उत्पादों के माध्यम से कम्पोस्ट एवं वर्मी खाद का उत्पादन गांव-गांव में शुरू किया गया और हजारों किसानों को उनके बारी का विकास करते हुए गांव में पौष्टिक फल एवं सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू किया गया। इस अभियान की पूरे देश में चर्चा की जा रही है और उसे रोल मॉडल की तरह स्वीकार किया जा रहा है।  
तमिलनाडु का तंजावुर एक उदाहरण है कि किस तरह छत्तीसगढ़ के किसान पुत्र और स्वयं कृषक मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देशभर के छोटे-छोटे गांवों के किसानों के दिल में अलग जगह बनाई है। 

नव मनोनीत राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके का माना विमान तल पर स्वागत किया : मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल

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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज शाम यहां माना विमानतल पर छत्तीसगढ़ की नव मनोनीत राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके का आत्मीय स्वागत किया। 

सावधान : फंसेंगे बुरा और अकाउंट हो जाएगा बैन, अगर TikTok पर बनाएंगे ऐसे वीडियोज़

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TikTok प्‍लेटफॉर्म पर गैरकानूनी और अश्‍लील कंटेंट वाले वीडियोज़ बनाना सख्त मना है. गैरकानूनी कंटेट को लेकर हाल ही में सरकार ने टिक-टॉक से सवाल पूछा है. राज्यसभा में पूछे सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि टिकटॉक द्वारा गैरकानूनी कटेंट फैलाए जाने को लेकर कई रिपोर्ट्स थीं, जिसके बारे में सरकार ने टिकटॉक से विस्तृत जानकारी मांगी है.

गृह राज्यमंत्री ने कहा, ‘आईटी ऐक्ट, 2000 के अनुसार टिक-टॉक एक इंटरमीडियटरी है. इस संदर्भ में आईटी ऐक्ट के तहत गैर-कानूनी कटेंट को ऑनलाइन रिमूव किया जा सकता है. आईटी ऐक्ट का सेक्शन 79 कहता है कि इंटरमीडियरी इस बात का ध्यान रखेंगे कि किसी भी तरह का नुकसानदायक या गैर-कानूनी कंटेट को न फैलाया जाए. साथ ही कहा गया है कि जब भी कोई गैर-कानूनी कंटेट इंटरमीडियरी की जानकारी में कोर्ट या सरकार द्वारा लाया जाता है तो उनसे उम्मीद की जाती है कि वे उस कंटेट को हटा दें. 

बैन हुए 60 लाख वीडियो बता दें कि हाल ही में tiktok ने अश्लील कंटेंट और पॉलिसी का उल्लघंन करने वाले 60 लाख वीडियो डिलीट किए हैं. कंपनी ऑफिशियल ने बताया कि ये वीडियोज़ भारत की गाइडलाइंस का उल्‍लंघन कर रहे थे. वीडियो बैन करने का मकसद TikTok प्‍लेटफॉर्म से गैरकानूनी और अश्‍लील कंटेंट को हटाना था.

टिक टॉक’ के दुनिया भर में 80 करोड़ यूजर्स हैं. TikTok की पैरेंट कंपनी Beijing Bytedance Technology Co. ने बताया कि भारत में ऐप के 20 करोड़ से ज्‍यादा यूज़र्स हैं. TikTok इंडिया के डायरेक्‍टर (सेल्‍स एंड पार्टनरशिप्‍स) सचिन शर्मा ने कहा है कि कंपनी अपनी कम्‍युनिटी गाइडलाइंस का उल्‍लंघन करते कंटेंट का किसी तरह समर्थन या प्रमोशन नहीं करती.

इस ऐप में लोगों को कुछ ही सेकेंड लंबे वीडियो शेयर करने की अनुमति दी जाती है. यूजर्स ‘टिक टॉक’ का इस्तेमाल तमाम तरह के वीडियो अपलोड करने और शेयरिंग में कर रहे हैं. इनमें चुटकुलों से लेकर गंभीर राजनीतिक और सामाजिक कमेंट्री जैसा कंटेंट भी होता है.

साल में केवल एक दिन ही होते है दर्शन,बाकी दिन रहता है बंद यह अद्भुत मंदिर

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भारत में कई सारे मंदिर स्थापित है। जो अपने चमत्कार के चलते प्रसिद्ध है। वैसे भी भारत को आस्था का देश कहा जाता है। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे है जिसके चमत्कार के बारे में जानकर आप हैरान हो जाओगे।

आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में जानकर आप हैरान हो जाओगे। जानकारी के लिए बता दें कि हम बात कर रहे है नागचंद्रेश्वर मंदिर की जो मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि नागपंचमी के दिन लाखों श्रद्धालुओं का जमावड़ा एकत्रित हो जाता है।

इस मंदिर के दरवाजे केवल 24 घंटो के लिए ही खुलते है। बाद में इनको बंद कर दिया जाता है। इस मंदिर के बारे में ऐसा माना जाता है कि नागपंचमी के दिन नागदेवता स्वयं यहां निवास करते है एवं किस्मत वाले ही इस नागदेवता को देख पाते है।

इस मंदिर में 11वी शताब्दी कीअद्भुत मूर्ति विराजमान है इसमें नागचंद्रेश्वर अपने फन फैलाए हुए है एवं नाग आसन पर शिव-पार्वती विराजमान है।बताया जाता है कि ये प्रतिमा नेपाल से लाई गई थी। इतना ही नहीं ऐसी प्रतिमा इस मंदिर के अलावा औऱ कही पर भी मौजुद नहीं है।विश्व का ये एक मात्र ऐसा मंदिर है

जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सांप पर विराजमान है।मंदिर में विराजमान मुर्तियों में शिवजी गणेश जी औऱ मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प श्य्या पर विराजित है। माना जाता है कि मंदिर का निर्माण परमान राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग करवाया था

नोएडा का पहला एलिवेटेड रोड टिका है 125 पिलरों पर

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सेक्टर-28 विश्वभारती स्कूल से सेक्टर-61 शॉप्रिक्स मॉल तक 4.80 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड रोड 125 पिलरों पर टिका हुआ है। यह नोएडा का पहला एलिवेटेड रोड है, जिसका उद्घाटन राज्य में योगी सरकार बनने के बाद 28 जून 2017 को किया गया था। इससे पहले 14 दिसंबर 2016 को इसका लोकार्पण तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया था। छह लेन के इस एलिवेटेड रोड पर 480 करोड़ रुपये खर्च हुए। रोड को बनाने में 79 हजार मिट्रिक टन सीमेंट लगी और 26 हजार टन स्टील का प्रयोग किया गया है। परियोजना का काम 15 अक्तूबर 2014 को शुरू किया गया था, जिसे 14 अक्तूबर 2017 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया, लेकिन खास बात यह रही कि लक्ष्य से चार महीने पहले ही यह काम पूरा कर लिया गया। इस एलिवेटेड रोड पर दो रैम्प भी बनाए गए हैं जो कि सेक्टर-33 और निठारी में है। इसके माध्यम से पुराने एनएच-24, डीएनडी, मामूरा, सेक्टर-49 सहित अन्य स्थानों को जोड़ने में मदद मिली। इसके बनने से छह ट्रैफिक सिग्नल हटा दिए गए, जिससे वाहन चालकों की राह दिल्ली व अन्य शहरों के लिए सुगम बन सकी।

उलेमा ने कहा- कोई नहीं पढ़ेगा सड़क पर नमाज, किया भावपूर्ण सरकारी आदेश का स्वागत

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देवबन्द के उलेमा ने सरकार के उस आदेश का स्वागत किया है जिसमें सड़क पर नमाज ना पढ़ने के लिए कहा गया है. उलेमा का कहना है कि ये सरकार का एक अच्छा कदम है, इसका स्वागत होना चाहिए. चाहे हिंदू हो या मुसलमान, दोनों को ही सड़क पर कोई भी धार्मिक आयोजन नहीं करना चाहिए.

देवबंद उलेमा ने कहा कि कुछ मुट्ठी भर लोग देश का माहौल खराब करना चाहते थे लेकिन उप जिलाधिकारी के आदेश के बाद अब ये नहीं होगा. हालांकि उलेमा ने इस पर सफाई भी दी. उन्होंने कहा कि डीएम अलीगढ़ ने जो अपना बयान जारी किया है, उसमें कहा कि सड़क पर कोई भी धार्मिक काम नहीं होगा, जैसे नमाज पढ़ी जाती है, या हमारे हिंदू भाई कोई और प्रोग्राम करते हैं. तो हम डीएम साहब के इस आदेश का समर्थन करते हैं.

इत्तेहाद उलेमा ए हिन्द के उलेमा मुफ्ती असद ने आगे कहा कि इस वक्त में मुल्क के हालात ऐसे हैं कि कुछ फिरका परस्त लोग देश का माहौल बिगाड़ने की कोशिश में लगे हैं. सड़क पर कोई भी धार्मिक काम या कोई हमारे हिंदू भाई प्रोग्राम करते हैं और फिरका परस्त उसको बिगाड़ने का काम करते हैं. तो उससे मुल्क का माहौल खराब होता है. तो डीएम साहब ने जो आदेश जारी किया है हम इसका समर्थन करते हैं 

वजह है बड़ी रोचक, इस देश की संसद में छत से नहीं जमीन से जुड़े हैं पंखे

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आपके-हमारे सबके घरों में पंखे तो लगे ही होते है, और कैसे लगे होते है, जाहिर है छत से नीचे की तरफ लटकते हुए। लेकिन, इस देश की संसद में पंखे उल्टे लगे है, यानी जमीन से ऊपर की तरफ।

नेशनल डेस्क: आपके-हमारे सबके घरों में पंखे तो लगे ही होते है, और कैसे लगे होते है, जाहिर है छत से नीचे की तरफ लटकते हुए। लेकिन, इस देश की संसद में पंखे उल्टे लगे है, यानी जमीन से ऊपर की तरफ। हैं ना दिलचस्प बात। तो अब आप ये जानना नहीं चाहेंगे कि हम किस देश की संसद का जिक्र कर रहे हैं। ये मजेदार बात किसी और की नहीं बल्कि हमारे अपने ही देश भारत की है। जी हां, हमारी संसद के सेंट्रल हॉल में उल्टे पंखे लगे हैं। अगर आप पार्लियामेंट के सेंट्रल हॉल की कोई तस्वीर या वीडियो देखें तो आप गौर करेंगे कि वहां पंखे उल्टे लगे हैं, यानी ये पंखे खंबे बनाकर उन पर उल्टे लटकाए गए हैं।

अब आप सोचेंगे कि इसके पीछे की वजह क्या है। दरअसल, इसके पीछे की वजह है इसका आर्किटेक्चर है। जब संसद भवन बनी तो इसके गुंबद को ही इसका मेन प्वाइंट माना गया, जिसकी वजह से उसे बहुत ऊंचा रखा गया। ये बात है साल 1921 की और अब उस वक्त तो एयर कंडीशनर होता नहीं था और सीलिंग ऊंची होने के कारण पंखे लगाना काफी मुश्किल था। वहीं बहुत ज्यादा लंबे डंडों के सहारे पंखे लगाने से संसद की खूबसूरती पर असर पड़ रहा था। ऐसे में खंबों पर पंखें लगाने की तरकीब सोची गई। फिर क्या था सेंट्रल हॉल की लंबाई को ध्यान में रखते हुए खंबे बनाए गए और उस पर उल्टे पंखे लगाए जिससे हॉल के कोने-कोने में उसकी हवा पहुंचे।

हालांकि बाद में जब वहां एयर कंडीशनर लगाने की बात हुई तो संसद की ऐतिहासिकता को बनाए रखने के लिए इन पंखों को उल्टा ही लगे रहने दिया गया। जिससे पार्लियामेंट की खूबसूरती और ऐतिहासिकता बनी रहे।

अब जब आपने पखों के पीछे की कहानी जान ली तो आप ये भी जरूर सोच रहे होंगे कि आखिर निर्माण में इतने ऊंचे गुम्बंद की क्या जरूरत थी। तो इसके पीछे भी एक दिलचस्प बात है। क्या आपको मालूम है कि हमारे पार्लियामेंट का निर्माण के एक मंदिर के तर्ज पर हुआ है। सही पढ़ा आपने एक मंदिर के तर्ज पर, उस मंदिर का नाम है चौसठ योगिनी मंदिर।

अब भारत में 4 चौसठ योगिनी मंदिर है दो उड़ीसा में और दो मध्य प्रदेश में, लेकिन मध्य प्रदेश के मुरैना में बने चौसठ योगिनी मंदिर सबसे प्रमुख और प्राचीन है। ये मंदिर अपनी शानदार वास्तुकला और खूबसूरत निर्माण के लिए जाना जाता है। शानदार वास्तुकला और बेहद खूबसूरती से बनाए गए यह मंदिर एक वृत्तीय आधार पर निर्मित है, और इसमें 64 कमरें हैं। हर कमरे में एक-एक शिवलिंग बना हुआ है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 200 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। वहीं इसके मध्य में एक खुला हुआ मण्डप है, जिसमें एक विशाल शिवलिंग है। यह मंदिर 1323 ई में बना था।

ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने इसी मंदिर को आधार मनाकर दिल्ली के संसद भवन का निर्माण कराया था। संसद भवन का पूरा आर्किटेक्चर इस मंदिर पर बेस्ड है। जिस तरह ये मंदिर एक वृत्तीय आधार और 101 खंभों पर टिका है। उसी तरह से संसद भवन का भी मुख्य आकर्षण उसका बेहद ऊंचा गुंबद और 144 खंभे हैं।

हमारा संसद भवन देश की ऐतिहासिक धरोहर है। जो दुनिया के शानदार वास्‍तुकला के कुछ उत्‍कृष्‍ट नमूनों में से एक माना जाता है। तो अब जब भी आप दिल्ली आए संसद भवन जरूर देखें। जहां कुछ दिलचस्प बातों के साथ-साथ एक बेहद शानदार और भव्य आर्टिटेक्चर आपको देखने को मिलेगा।

‘मिलारेपा’ कैसे बना 80 लोगों को मौत के घाट उतारने वाला ‘तिब्बत का बुद्ध’

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कई बौद्ध संन्यासियों या साधुओं के जीवन के बारे में आपने सुना होगा लेकिन क्या आप तिब्बत में बुद्ध के अवतार माने गए उस साधु की कहानी जानते हैं, जिसने एक, दो नहीं बल्कि करीब 80 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था? हत्याओं के बाद कैसे वो अध्यात्म की इस चरम अवस्था तक पहुंचा कि न केवल साधु बल्कि उसे तिब्बत में बुद्ध का अवतार तक कहा गया? यही नहीं, बल्कि जिस गुरु से ज्ञान पाने के लिए उसने पूरा जीवन लगा दिया, कैसे वही गुरु उसका शिष्य बन गया? ये अछूती कहानी आपको जानना चाहिए.

इस साधु को मिलारेपा नाम से जाना जाता है और बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ किताबों में मिलारेपा को तिब्बत का बुद्ध तक कहा गया है. मिलारेपा के जन्म के साल के बारे में एकराय नहीं है, लेकिन 11वीं सदी में मिलारेपा का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था, इस पर एकराय है. कम उम्र में ही मिलारेपा के सिर से पिता का साया उठ गया था. पिता की मुत्यु के बाद मिलारेपा के चाचा ने उसका सब कुछ हड़प लिया और फिर उसके, उसकी मां और छोटी बहन के साथ नौकरों जैसा व्यवहार करने लगा.

बदला लेने के लिए सीखी तंत्र विद्या मिलारेपा अपने चाचा के दुर्व्यवहार के चलते बदले और गुस्से की भावनाओं के साथ बड़ा हुआ और वयस्क होते ही अपना घर छोड़ कर चला गया. उसने तंत्र विद्या सीखी और कुछ तांत्रिक क्रियाओं में महारत हासिल की. सालों बाद जब वह तंत्र विद्या में महारत हासिल कर वापस लौटा तो उसे चता चला कि उसकी मां और छोटी बहन चल बसे थे. ये जानकर वह आगबबूला था और उसने बदला लेने का मन बना लिया था.

कुछ ही समय में उसे पता चला कि उसके चाचा के बेटे की शादी का आयोजन होने वाला था. इसी मौके पर उसने बदले के इरादे से तंत्र शक्तियों का प्रयोग किया और पूरे आयोजन पर ओले बरसा दिए. इन ओलों में दबकर 80 से 85 लोग मारे गए और मिलारेपा का बदला पूरा हुआ. वह खुश तो हुआ लेकिन ज़्यादा समय तक खुश रह नहीं पाया. उसे अपने किए पर पछतावा होने लगा और वह अपराध बोध से ग्रस्त हो गया.

मिलारेपा अपने अपराध बोध से मुक्त होना चाहता था और अपने किए गुनाह के लिए प्रायश्चित कर और ज्ञान हासिल कर उसी जन्म में दोषमुक्त होना चाहता था. इसके लिए उसने कई गुरुओं के पास जाकर विनती की लेकिन उसे कहीं रास्ता नहीं मिला. फिर उसे गुरु मार्पा का पता मिला और वह उस शहर में पहुंचा और मार्पा से ज्ञान के लिए विनती की, लेकिन मार्पा उसकी कड़ी परीक्षा और मन की शुद्धि के लिए उसे सालों तक इंतज़ार कराना चाहता था. इस कहानी पर सद्गुरु की व्याख्या कहती है कि मार्पा अहंकार से भी ग्रस्त था.

सालों के बाद मिली दीक्षा
मार्पा ने खेत, मकान और आश्रम में कई तरह के मज़दूरी और चाकरी वाले काम मिलारेपा से सालों तक करवाए. इन सालों में मिलारेपा ने छुपकर मार्पा से ज्ञान पाने की कोशिश की लेकिन कई बार मार्पा ने अपने शिष्यों और शक्तियों से मिलारेपा को पिटवाया भी. कई सालों तक मार्पा का हर आदेश मानते रहे मिलारेपा को मार्पा की पत्नी की मदद मिली और उसके बाद मार्पा ने उसे दीक्षा देने का निश्चय किया. दीक्षा के बाद मार्पा ने मिलारेपा को एक अंधेरी कोठरी में साधना करने को कहा.

फिर मिलारेपा का गुरु बन गया शिष्य
अंधेरी कोठरी में साधना करते हुए मिलारेपा को सपने में देवी डाकिनी ने दर्शन दिए और कहा कि वह अपने गुरु मार्पा से उस ज्ञान के बारे में पूछे, जिसके बारे में उसने नहीं बताया. कठोर साधना के तीसरे ही दिन मिलारेपा जब यह प्रसंग सुनाने के लिए मार्पा के पास पहुंचा तो मार्पा हैरान था और उसने माना कि उस ज्ञान के बारे में उसे भी नहीं पता था. इस ज्ञान की गुत्थी को सुलझाने के लिए मिलारेपा को लेकर मार्पा अपने गुरु नारोपा के पास भारत पहुंचा.

मार्पा की बातें सुनने के बाद नारोपा ने तिब्बत की दिशा में सिर झुकाकर कहा ‘अंधकार में डूबे उत्तर में आखिर एक प्रकाश दिखा’. इसके बाद नारोपा ने मार्पा और मिलारेपा को जीवन के संपूर्ण ज्ञान के बारे में सब कुछ विस्तार से बताया. इसके बाद मार्पा और मिलारेपा तिब्बत लौटे तो मार्पा गुरु के बजाय मिलारेपा के शिष्य की तरह हो गया था. मिलारेपा ने लंबा जीवन जिया और अपने ज्ञान को लोगों तक पहुंचाया. सद्गुरु की व्याख्या के मुताबिक तिब्बती संस्कृति में पिछले कई सौ सालों के दौरान जो बड़ी चीजें हुई हैं, उनका आधार मिलारेपा ने ही तैयार किया.

त्सांगन्योन हेरुका की किताब ‘हंड्रेड थाउज़ेंड सॉंग्स ऑफ मिलारेपा’ इस बात की तस्दीक़ करती है कि मिलारेपा ने अपने जीवन में एक लाख गीतों की रचना की. इसी कारण उसे संत कवि भी कहा जाता है. ‘लाइफ ऑफ मिलारेपा’ किताब में भी मिलारेपा के गीतों के इस चक्र का ब्योरा है. मिलारेपा की कहानी इस आदर्श का बखान करती है कि एक हत्यारा भी सही मायनों में प्रायश्चित और कठोर साधना से अवतार या सिद्ध साधु बन सकता है.

200 आविष्कार और 40 पेटेंट हासिल करने वाला ये भारतीय वैज्ञानिक, क्यों गुमनाम रह गया

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आज के समय में जब विज्ञान के क्षेत्र में भारत दुनिया में अपना लोहा मनवाने की होड़ में शामिल है, एक ऐसे नाम को भुला दिया गया है, जो उस समय भारत का नाम विज्ञान की दुनिया में रोशन कर रहा था, जब भारत में वैज्ञानिक आविष्कारों को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. एक ऐसा वैज्ञानिक, जिसने खुद विज्ञान के बारे में सीखा और वह जिस अंधेरे से उभरा था, मौत के बाद गुमनामी के उसी अंधेरे में खो गया. आइए जानें कि कौन थे शंकर अबाजी भिसे और क्यों उन्हें याद किया जाना ज़रूरी है.

बात 19वीं सदी की है, जब तत्कालीन बॉम्बे में भिसे की परवरिश हो रही थी. उन दिनों अमेरिका की कुछ विज्ञान पत्रिकाएं वहां आया करती थीं. भिसे की विज्ञान में दिलचस्पी थी और वो मैकेनिकल इंजी​नियरिंग की शिक्षा हासिल करना चाहते थे, लेकिन उस वक्त भारत में ये सब मुमकिन नहीं था. भिसे की लगन का नतीजा ये हुआ कि इन्हीं पत्रिकाओं से उन्होंने अपनी शिक्षा और ट्रेनिंग हासिल की और ये बात कई दशकों बाद भिसे ने एक अखबार को बताई, जब उन्हें अपने आविष्कारों के लिए कुछ शोहरत मिली.

भिसे की विज्ञान में रुचि और खुद की ट्रेनिंग इस कदर थी कि 20 साल की उम्र पार करते ही उन्होंने बॉम्बे में एक वैज्ञानिक क्लब की स्थापना की थी. उसी उम्र में उन्होंने कुछ मशीनें और गैजेट बनाए जिनमें टैंपर प्रूफ बोतल, इलेक्ट्रिक बाइसिकल और बॉम्बे के रेलवे सिस्टम के लिए स्टेशन इंडिकेटर वगैरह. इसके बाद उनके जीवन में बड़ा मौका तब आया, जब 1890 के दशक के आखिर में ब्रिटिश आविष्कारकों की एक पत्रिका ने मशीनें डिज़ाइन करने की एक प्रतियोगिता का ऐलान किया.

भिसे ने इसी प्रेरणा के चलते एक रात में चार घंटे के समय में एक मशीन का ब्लूप्रिंट स्केच किया और इसे प्रतियोगिता में भेजा. ब्रिटेन के तमाम प्रतियोगियों को पीछे छोड़कर भिसे विजेता बने. अब भिसे की पूछ परख शुरू हुई और विज्ञान के क्षेत्र में भिसे को बढ़ावा देने के लिए उनके ब्रिटेन जाने के लिए बॉम्बे प्रशासन ने इंतज़ाम शुरू किए. जाते हुए भिसे ने अपने दोस्तों से कहा था ‘जब तक मैं कामयाब नहीं होता, या मेरा आखिरी पाउंड खत्म नहीं हो जाता, तब तब मैं घर नहीं लौटूंगा’. ये वाक्य उस समय के नौजवान वैज्ञानिकों के लिए बड़ी प्रेरणा बन गया था.

भारतीय राष्ट्रवाद के नेता दादाभाई नौरोजी लंदन में पहले ही प्रतिष्ठित थे. उस समय इंग्लैंड में भिसे को तकनीकी कंपनियों में काम दिलाने और एग्रीमेंट तय करने में नौरोजी ने मदद की थी क्योंकि भिसे के खाते में कई इंटरनेशनल पेटेंट आ चुके थे और नौरोजी ​इस काबिलियत से प्रभावित थे. इसके बाद भिसे के आविष्कारों का सिलसिला शुरू हुआ, जो 200 आविष्कारों और 40 पेटेंट तक पहुंचा.

भिसे के नाम दर्ज हुए कई आविष्कार और पेटेंट
भिसे ने एक अनोखा इलेक्ट्रॉनिक साइनबोर्ड ईजाद किया, जिसे बाद में लंदन के क्रिस्टल पैलेस में प्रदर्शनी में रखा गया. फिर इसे लंदन, वेल्स और संभवत: पेरिस के स्टोर्स में काम के लिए उपयोग में लाया गया. भिसे ने नौरोजी को अपने नए आविष्कारों के बारे में बताया था कि किचन गैजेट्स, टेलिफोन, सिरदर्द के इलाज के लिए एक डिवाइस और टॉयलेट सफाई के लिए एक ऑटोमेटिक सिस्टम भिसे तैयार कर चुके थे. लेकिन, भिसे ने अपने एक आविष्कार के बारे में संभवत: नौरोजी को नहीं बताया था और वह था पुशअप ब्रा. जी हां, भिसे ने 1905 के ज़माने में सीने के उभार में सहायक ये आविष्कार भी कर दिया था.

इन सबके अलावा, भिसे का सबसे बड़ा आविष्कार था : भिसोटाइप. ये एक ऐसा टाइपराइटर था, जिसने प्रिंटिंग उद्योग में क्रांति ला दी थी. दुनिया भर के निवेशकों ने इस ​आविष्कार को क्रांतिकारी माना था और उनका अंदाज़ा था कि इससे प्रिंटिंग उद्योग बहुत आगे तक चला जाएगा.

शोहरत से गुमनामी तक
इस क्रांतिकारी आविष्कार ने एक तरफ भिसे को शोहरत दिलाई, तो वही उनके पतन का कारण बना. पहले इस भिसोटाइप को लेकर नौरोजी की मदद से कार्ल मार्क्स के अनुयायी रहे समाजवादी हिंडमैन के साथ करार की बात आगे बढ़ी. हिंडमैन ने भिसे को फाइनेंस का भरोसा दिलाया था. उस वक्त ​की प्रिंटिंग की सबसे बड़ी कंपनी लिनोटाइप के साथ बातचीत आगे बढ़ी और भिसे अपनी मशीन को फाइनल टच देने की तैयारियों में जुट गए. लेकिन, ऐन मौके पर हिंडमैन ने फाइनेंस न जुटा पाने पर अफसोस ज़ाहिर किया.

इसका अंजाम ये हुआ कि काफी वक्त और पैसा लगा चुकने के बाद भिसे के पास कुछ नहीं बचा था. 1908 में उन्हें बॉम्बे लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन, लंदन का ये सफर इतनी आसानी से खत्म होने वाला नहीं था. बॉम्बे आकर उन्होंने अपने टाइपकास्टर के बारे में क्रांतिकारी नेता गोपाल कृष्ण गोखले को बताया. उन्होंने भिसे को बड़े उद्योगपति रतन जे टाटा से मिलवाया. इसके बाद भिसे टाटा के भरोसे पर अमेरिका गए.

न्यूयॉर्क में भिसे को अपने आयोडीन घोल वाले आविष्कार के लिए काफी दौलत व शोहरत मिली. लेकिन, भिसोटाइप के लिए न तो वो मार्केटिंग कर पाए और न ही उस मशीन से उन्हें कुछ हासिल हो पा रहा था. बीबीसी की एक रिपोर्ट में उपरोक्त ज़िक्र के साथ कहा गया है कि इसके बाद उन्होंने इसके आगे का आविष्कार करते हुए ‘स्पिरिट टाइपराइटर’ भी बनाया. लेकिन, इसका अंजाम भी भिसोटाइप की तरह निराशाजनक रहा. भिसे के अंतिम समय तक उन्हें ‘भारत का एडिसन’ तो कहा जाता रहा लेकिन न तो उनके आविष्कारों की कद्र हुई और न ही उन्हें लंबे समय तक याद रखा गया.