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संप्रदा सिंह: बना डाली 26 हजार करोड़ की दवा कंपनी, सेल्समैन से करियर की शुरुआत

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बिहार के सबसे अमीर उद्योगपति रहे और मशहूर दवा कंपनी एल्केम ग्रुप ऑफ कंपनी के मालिक संप्रदा सिंह का शनिवार को निधन हो गया. 94 साल के सिंह ने मुंबई के लीलावती अस्पताल में सुबह 9 बजकर 20 मिनट आखिरी सांस ली. संप्रदा सिंह की पहचान न केवल एक सफल उद्योगपति के तौर पर होती थी बल्कि उनको फार्मा लाइन का एक दिग्गज भी माना जाता था. एक साधारण किसान के पुत्र से बिहार के सबसे बड़े उद्योगपति बनने तक की संप्रदा बाबू की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम न थी. कौन थे संप्रदा सिंह

संप्रदा सिंह का जन्म 1925 में मूल रूप से बिहार के जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड के ओकरी गांव में हुआ था. संप्रदा सिंह ने अपनी पढाई गया विश्वविद्यालय से की. गांव के लोग बताते हैं कि वो शुरू से ही कुछ अलग करना चाहते थे और यही कारण है कि संप्रदा की जिद ने उन्हें लगातार आगे बढ़ाया और उनकी गिनती बिहार ही नहीं देश के बड़े उद्योगपति के तौर पर हुई. संप्रदा सिंह ने 45 साल पहले फार्मा कंपनी अल्‍केम की स्थापना की थी. अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर उन्होंने 26 हजार करोड़ रुपए से ज्‍यादा की वैल्‍यूएशन वाली कंपनी खड़ी कर दी.

8 अगस्‍त 1973 को अल्‍केम लैबोरेटरीज लिमिटेड की स्थापना करने वाले संप्रदा की कहानी पूरी तरह से फिल्मी थी. पिता जंमीदार थे इस कारण खेती विरासत में मिली थी लेकिन संप्रदा ओकरी में रहकर भी धान-गेहूं की बजाय सब्जी समेत अन्य नगदी फसल उपजाना चाहते थे. गांव के ही शैलेंद्र सिंह और शंभू शर्मा ने बताया कि उनके पिता के पास करीब 25 बीघा जमीन थी लेकिन उस जमाने में ग्रेजुएशन करने वाले संप्रदा धान और गेहूं की बजाय सब्जी समेत अन्य चीजों की खेती करना चाहते थे लेकिन वो सफल नहीं हुए. गांव में आये अकाल के बाद संप्रदा ने मुड़कर पीछे नहीं देखा और फिर बिहार के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए.

संप्रदा सिंह की पहचान भले ही देश के बड़े और मशहूर उद्योगपतियों के तौर पर होती है लेकिन बहुत कम लोगों को ये पता है कि उन्होंने भी अपने करियर की शरूआत एक केमिस्ट शॉप पर नौकरी से की थी. पटना में एक केमिस्ट शॉप में नौकरी करने वाले संप्रदा सिंह उन दिनों छाता भी बेचा करते थे. संप्रदा सिंह ने 1953 में रिटेल केमिस्‍ट के तौर पर एक छोटी शुरुआत की फिर पटना में दवा की दुकान शुरू की. इसके बाद 1960 में उन्होंने पटना में मगध फार्मा के बैनर तले उन्होंने फार्मा डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का बिजनेस शुरू किया.

पटना के बाद मुंबई का किया रूख

पटना समेत बिहार में दवा का व्यापार करने वाले संप्रदा ने अपने व्यवसाय को बढ़ाने के साथ कुछ ही दिनों में इसे भारत के पूर्वी क्षेत्र का दूसरा बड़ा डिस्‍ट्रीब्‍यूशन नेटवर्क खड़ा कर दिया. व्यवसाय को बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ ही दिनों में उन्‍होंने मुंबई का रूख कर लिया. चले गए।

इलाके में संप्रदा बाबू के नाम से जाने जाने वाले इस उद्योगपति के बारे में लोग बताते हैं कि संप्रदा बाबू जब मुंबंई गए थे तो वो अपने साथ एक लाख रुपये लेकर गए थे और इसी पैसे से उन्होंने अपनी दवा कंपनी शुरू की. उन्होंने अपनी कंपनी की नाम अल्‍केम लैबोरोटरीज दिया और इस कंपनी ने देखेते ही देखते नाम और पैसे दोनों कमाए. दवा की मांग बढ़ने पर संप्रदा सिंह ने अपनी दवा फैक्ट्री शुरू कर दी और उसके बाद उनकी कंपनी चल पड़ी. संप्रदा ने अपने इस व्यवसाय के माध्यम से लोगों को उस वक्त में रोजगार के अवसर दिए जब इलाका बेरोजगारी की मार झेल रहा था.

2017 में मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

2017 में प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स में उनका नाम आया था और उन्हें 43वां स्थान प्राप्त हुआ था. देश के सबसे बुजुर्ग अरबपति सम्प्रदा सिंह वर्ष 2018 में फोर्ब्स की ‘द वर्ल्ड बिलियनेयर्स लिस्ट ‘में शामिल हुए थे. उस वक्त उनकी संपत्ति 1.2 अरब डॉलर थी. अपनी संपत्ति की वजह से वो फोर्ब्स की लिस्ट में 1,867वें पायदान पर रहे थे.

व्यापम से भी बड़ा डंपर घोटाला, मंत्री ने किया दोबारा जांच की मांग

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मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की जांच के बीच डंपर घोटाले का जिन्न बाहर निकल आया है. सामान्य प्रशासन मंत्री गोविंद सिंह ने डंपर घोटाले को व्यापम से भी बड़ा करार देते हुए इसकी दोबारा जांच की मांग की है. वहीं बीजेपी इसे बदले की भावना से की जा रही कार्रवाई करार दे रही है. व्यापम घोटाले की फाइलें दोबारा खोले जाने की खबरों के बीच डंपर घोटाले को लेकर भी आवाज उठाई जाने लगी है. मध्य प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री गोविंद सिंह ने संकेत दिए हैं कि व्यापम के साथ अब सरकार डंपर घोटाले की जांच भी दोबारा शुरू कर सकती है. गोविंद सिंह की मानें तो डंपर घोटाला व्यापम से भी बड़ा घोटाला है और इसकी जांच होनी ज़रूरी है.

कांग्रेस का आरोप है कि डंपर घोटाला सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री और उनके परिवार से जुड़ा हुआ है. लिहाजा गोविंद सिंह का बयान सामने आते ही बीजेपी आगबबूला हो गई है. बीजेपी की मानें तो कांग्रेस बदले की भावना से काम कर रही है. मंत्री गोविंद सिंह ने कहा कि उनकी मांग है कि व्यापमं की जांच प्रभावी तरीके से हो और साथ ही डंपर घोटाले की जांच की शुरुआत भी की जाए.

वहीं बीजेपी प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा कि कांग्रेस सरकार लगातार आरोप और प्रत्यारोप की राजनीति कर रही है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार दोषी पहले तय कर रही है. कांग्रेस के लोग निष्कर्ष पहले निकाल रहे हैं और जांच कराने की बात बाद में कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह वही कांग्रेस है जिसे न न्यायालय पर भरोसा है और न ही जांच एजेंसी पर भरोसा है. इनके अनुसार इन्होंने जो कह दिया वही सही है.

बता दें कि डंपर घोटाले को कांग्रेस के तत्कालीन मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा ने जोर शोर से उठाया था और इसे लेकर कानूनी लड़ाई भी लड़ी. लेकिन घोटाले में लोकायुक्त अपनी जांच कर चुकी है और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से केके मिश्रा की याचिका खारिज हो चुकी है. ऐसे में घोटाले की दोबारा जांच का जुमला बीजेपी के नेताओं को घेरने की कहीं सियासी बयानबाजी भर तो नहीं है.

नहीं कर सकेंगे सरकारी कर्मचारि अब एक से अधिक पत्नी से शादी

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परिवार नियंत्रण अधिनियम अस्तित्व में आया तो ‘हम दो, हमारे दो’ नारे का इस्तेमाल किया गया । जैसे-जैसे जनसंख्या वृद्धि नहीं रुकी, हम दोनों ने नारा बदल दिया। कुछ लोगों की कई शादियाँ होती हैं। मदुरई उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को इस एक से अधिक शादी करने वाले सरकारी अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने का आदेश दिया।

मदुरई की तेनमोली नाम की एक महिला ने मदुराई हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। उसके पति को पुलिस कांस्टेबल के रूप में नौकरी मिली और एसआई पद पर पदोन्नत किया गया। जब उसने 1982 में शादी की, तब यह देर से बताया गया कि उन्होंने पहले ही मुत्तुलक्ष्मी नाम की एक महिला से शादी कर ली है और उनके तीन बच्चे है। इस जानकारी के बाद तेनमोली और पति के बीच झगड़ा हुआ। उसने उसिलामट्टी पुलिस थाने में पति के खिलाफ शिकायत की। बड़े-बुजुर्गों के कहने पर दोनों में समझौता हुआ और पति ने दोनों पत्नियों की देखभाल करने की बात मान ली। पति का कुछ दिनों बाद निधन हो गया। वह पेंशन और वित्तीय सहायता के लिए कार्यालय के चक्कर काटती रही लेकिन उसे सहायता राशि नहीं मिली।

मदुराई हाईकोर्ट ने कहा कि पूछताछ के दौरान यह बात सामने आती है कि अधिकारी या कर्मचारी ने दो शादियां की है तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए।

कोटा बैराज के 6 गेट खोले, जयपुर का रावता बांध टूटा, बाढ़ के हालात, ग्रामीणों ने किया पलायन

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राजस्थान में चल रहे भारी बारिश के दौर के बीच जयपुर जिले के चाकसू में स्थित रावता बांध शनिवार को टूट गया. 1981 के बाद पहली बार लबालब हुआ यह बांध इतना कमजोर हो चुका था की पानी का दबाव सह नहीं सका और टूट गया. बांध टूटने से आसपास के इलाके में बाढ़ के हालात हो गए. पानी गांव-ढाणियों में घुस गया. हालात यह हो गए कि ग्रामीणों को घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है. दूसरी तरफ हाड़ौती अंचल में चंबल कैंचमेंट एरिया में मूसलाधार बारिश होने के कारण कोटा बैराज के 6 गेट खोल दिए गए हैं.

38 साल बाद भरा था रावता बांध
करीब 38 साल बाद भरा रावता बांध प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हो गया. स्थानीय लोगों की मानें तो रावता बांध में दरारें पहले से ही थीं. ग्रामीणों ने प्रशासन को इसकी सूचना भी दे थी, लेकिन वह लापरवाह बना रहा. 24 और 25 जुलाई को हुई भारी बारिश से बांध पूरा भर तो गया, लेकिन उसकी कमजोर दीवारें पानी के दबाव को सहन नहीं कर पाईं और शनिवार को बांध टूट गया. बांध एक बार टूटा तो फिर बिखरता ही चला गया. बांध से निकला पानी गांव-ढाणियों में घुस गया. हालात यह हो गई कि कुछ इलाकों में कमर तक पानी भर गया.

इससे पैदा हुए बाढ़ जैसे हालात को देखते हुए ग्रामीणों ने वहां से पलायन करना शुरू कर दिया. ग्रामीण अपना जरुरी सामान और मवेशियों को लेकर घरों से निकल गए और खुली जगह जाकर डेरा डाला. बांध टूटने के बावजूद ग्रामीणों को शनिवार देर रात तक प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं मिल पाई.

हाड़ौत अंचल के चंबल कैंचमेंट एरिया में मूसलाधार बारिश होने से कोटा बैराज के 6 गेट खोलकर 65 हजार क्यूसेक पानी चंबल में छोड़ा जा रहा है. इतनी भारी मात्रा में बैराज से पानी छोड़ने से नयापुरा स्थित चंबल की रियासतकालीन पुलिया पर पानी आ गया. इससे दोनों तरफ से यातायात को बंद कर दिया है. चंबल नदी किनारे बसे आबादी क्षेत्रों और गांवों को भी प्रशासन ने अलर्ट कर दिया है.

पेशी के लिए बंदी को ले जा रहे सिपाही की ट्रेन में लगी आंख, अब देते नहीं बन रहा जवाब

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देवरिया जनपद में लूट समेत एक दर्जन मुकदमे में आरोपित एक बंदी को कानुपर नगर की पुलिस ट्रेन से पेशी पर देवरिया ले जा रही थी। बंदी की अभिरक्षा में लगे तीन सिपाही ट्रेन में सो गए। ट्रेन गोंडा कचेहरी रेलवे स्टेशन पर रुकी तो बंदी हथकड़ी छुड़ाकर फरार हो गया। मगर सिपाहियों की नींद नही खुली। ट्रेन कचेहरी स्टेशन से गोंडा रेलवे स्टेशन पहुंचने पर सिपाही जागे तो बंदी फरार हो चुका था। मामले में बंदी की अभिरक्षा में लगे सिपाही ने कोतवाली जीआरपी में बंदी के फरार होने की रिपोर्ट दर्ज कराई है। देवरिया जिले के सलेमपुर थाना क्षेत्र के रामपुर बुजुर्ग गांव का रहने वाला अनूप कुमार सिंह उर्फ बबलू सिंह देवरिया व गोरखपुर जनपद में लूट समेत एक दर्जन मुकदमे में आरोपित है। ऐसे ही एक मामले में अनूप फतेहपुर जेल में बंद था, बाद में उसे कानपुर जेल में ट्रांसफर कर दिया गया। शुक्रवार की रात कानपुर नगर के पुलिस लाइंस के सिपाही परमात्मा शरण, रुद्र प्रताप सिंह व प्रणव कुमार अनूप को कानपुर जेल से लेने के बाद आम्रपाली एक्सप्रेस ट्रेन से देवरिया लेकर जा रहे थे। 

शनिवार को देवरिया न्यायालय में उसकी पेशी थी। ट्रेन शनिवार की भोर तकरीबन साढ़े चार बजे गोंडा कचहरी रेलवे स्टेशन पहुंची थी। अनूप की अभिरक्षा में लगे तीनों सिपाही सो गए तो वह हथकड़ी छुड़ाकर फरार हो गया। जब ट्रेन गोंडा रेलवे स्टेशन पहुंची तो सिपाहियों की नींद टूटी। मगर अनूप फरार हो चुका था। सिपाहियों ने इसकी सूचना अधिकारियों को दी। बंदी के फरार होने की सूचना पर गोंडा पुलिस ने भी उसकी तलाश तेज कर दी। मगर उसका पता नहीं चल सका। 

मामले में सिपाही परमात्मा शरण ने कोतवाली जीआरपी में बंदी अनूप के फरार होने की रिपोर्ट दर्ज कराई है। कोतवाल जीआरपी अजीत सिंह ने बताया कि रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है। फरार बंदी की तलाश की जा रही है।

सीओ क्राइम कानपुर ने की सिपाहियों ने पूछताछ बंदी अनूप सिंह के फरार होने की सूचना मिलने के बाद गोंडा पहुंचे कानपुर नगर के सीओ क्राइम आरके चतुर्वेदी ने बंदी की अभिरक्षा में कानपुर से भेजे गए सिपाही परमात्मा शरण, रुद्र प्रताप सिंह व प्रणव कुुमार से जीआरपी कोतवाली में दो घंटे तक कड़ी पूछताछ की।

सीओ क्राइम ने सिपाहियों से पूरी पड़ताल की। जिसमें पता चला कि तीनों सिपाही सो गए थे, जबकि बंदी की अभिरक्षा में लगे सिपाहियों को भेजने से पहले बंदी पर नजर रखने के निर्देश कड़े निर्देश दिए गए हैं। सीओ क्राइम ने बताया कि कार्यवाही के लिए सिपाहियों के लापरवाही की रिपोर्ट एसएसपी कानपुर नगर को सौंपी जाएगी।

जानिए रेलवे की इस नई सर्विस के बारे में, ट्रेन में सीट मिलना हुआ अब बेहद आसान

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भारतीय रेलवे अपने यात्रियों की सुविधाओं का खास ख्याल रखती हैं. इसीलिए रेलवे ने अब जनरल डिब्‍बों के लिए बॉयोमेट्रिक सिस्‍टम को शुरू किया है. इस कदम से जनरल क्‍लास (General Class) के यात्री को आसानी सीट दिलाने के लिए उठाया है. ये ऐसे कोच हैं, जो अनारक्षित (Unreserved) होते हैं. इनमें पहले आओ, पहले पाओ (First Come, First Serve) के आधार पर यात्री को सीट मिलती है. रेलवे ने इसे फिलहाल वेस्‍टर्न रेलवे (Western Railway) के मुंबई सेंट्रल (Mumbai Central) रेलवे स्‍टेशन और बांद्रा (Bandra) टर्मिनस पर शुरू किया है. क्या करना होगा-जनरल डिब्बों के लिए टिकट खरीद रहे यात्रियों को बायोमीट्रिक मशीन पर पर अपना फिंगरप्रिंट देना होगा, जिसके बाद उन्हें एक टोकन जेनरेट किया जाएगा. ये टोकन नंबर हर जनरल क्लास के कोच सीटों के नंबर के क्रम में अलॉट किए जाएंगे.

इसके बाद यात्रियों को अपने टोकन नंबर के क्रम में एक लाइन में खड़े होना होगा. एक आरपीएफ स्टाफ एंट्री पॉइंट पर खड़ा होगा जो टोकन का सीरियल नंबर चेक करेगा और पैसेंजर को उसी ऑर्डर में कोच में आने देगा. वेस्टर्न रेलवे की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ये बायोमेट्रिक टोकन सिस्टम है. इसको इस लिए लगाया गया है कि सीट को लेकर कोई मनमानी न कर सके. जनरल कोच के लिए यह व्यवस्था की गई है. कोच में सीट भरने के बाद भी किसी यात्री को चढ़ने से रोका नहीं जाएगा. बॉयोमेट्रिक टोकन के लिए 4 मशीनें लगाई गई हैं. बाकी 4 अहमदाबाद डिविजन के सूरत स्‍टेशन पर लगेगी.

इन ट्रेनों में हुई शुरुआतअमरावती एक्‍सप्रेस (Mumbai Central)
जयपुर सुपरफास्‍ट एक्‍सप्रेस (Mumbai Central)
करनावति एक्‍सप्रेस (Mumbai Central)
गुजरात में (Mumbai Central)
गोल्‍डन टेम्‍पल मेल (Mumbai Central)
पश्चिम एक्‍सप्रेस (Bandra Terminus)
अमरावति एक्‍सप्रेस (Bandra Terminus)
अवध एक्‍सप्रेस (Bandra Terminus)
महाराष्‍ट्र संपर्क क्रांति एक्‍सप्रेस (Bandra Terminus)

अब जब कोई यात्री जनरल डिब्‍बे का टिकट खरीदेगा तो उसे पहले फिंगरप्रिंट स्‍कैन कराना होगा. इसके बाद 1 टोकन जनरेट होगा. रेलवे उतने ही टोकन जारी करेगा, जितनी कोच में सीटें होंगी.

इसके बाद ट्रेन छूटने से पहले जनरल डिब्‍बे के यात्रियों की अलग से लाइन लगेगी. यह लाइन टोकन संख्‍या के सीरीयल के आधार पर होगी. RPF के लोग टोकन संख्‍या वेरिफाई करने के बाद यात्री को ट्रेन में बैठने देंगे.

दलालों की हुई छुट्टी-यह सिस्टम यात्रियों को व्यवस्थित तरीके से बिठाने और जनरल कोच में सीट पर कब्जा कर बेचने वालों पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया है. क्‍योंकि रेलवे को शिकायत मिली थी कि कुछ अराजक तत्‍व विशेष ट्रेनों में जनरल डिब्‍बे की सीट बेचने का रैकेट चला रहे हैं. वे पहले सीट पर कब्‍जा कर लेते हैं और फिर उसे यात्रियों को देने के एवज में मोटी रकम ऐंठते हैं.

अगर मर्द से ज़बरदस्ती करे औरत तो क्या यह रेप है?, पढ़ें पूरी ख़बर

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जब एक पुरुष किसी महिला के साथ बिना उसकी मर्ज़ी के ज़बरदस्ती सेक्स करता है तो यह रेप है, लेकिन अगर एक महिला पुरुष को बिना उसकी मर्ज़ी के ऐसा करने पर मजबूर करे तो क्या ये भी रेप नहीं है?

इंग्लैंड और वेल्स के क़ानून में यह रेप नहीं है, लेकिन इस घटना पर अध्ययन करने वाले एक लेखक का कहना है कि शायद ऐसा होना चाहिए.

लैंकास्टर यूनिवर्सिटी लॉ स्कूल की डॉक्टर सियोभान वियरे ने ब्रिटेन में साल 2016-17 के दौरान जबरन सेक्स पर पहला शोध किया है. इसमें उन्होंने 200 से अधिक पुरुषों से ऑनलाइन सर्वे के ज़रिए सूचना इकट्ठी की.

उन्होंने मई 2018 और जुलाई 2019 के बीच 30 पुरुषों से व्यक्तिगत इंटरव्यू किए. यह शोध हाल ही में प्रकाशित हुआ है.

इसमें उन परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की गई है जिसमें ज़बरन सेक्स होता है, इसके परिणाम क्या होते हैं और क़ानूनी कार्रवाई कैसे होती है.

साक्षात्कार किए जाने वाले सभी लोगों के नाम गोपनीय रखे गए हैं लेकिन हम उनमें से एक को जॉन के नाम से पुकारेंगे.

जॉन बताते हैं कि कुछ ग़लत हो रहा है इसका पहला आभास उन्हें तब हुआ जब उनके पार्टनर ने खुद को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया.

एक डरावनी घटना के बाद वो अपनी पार्टनर को इलाज के लिए लेकर गए जहां दंपति ने इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों पर घंटों बातें कीं.

लगभग 6 महीने बाद खुद को नुकसान पहुंचाने की बजाए उसने जॉन को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

ज़बरदस्ती

जॉन बताते हैं, “मैं लिविंग रूम में बैठा था और वह किचन से आई, मेरे नाक पर बहुत ज़ोर से घूंसा मारा और फूहड़पन से हँसते हुए भाग गई. उसके बाद से रोज़ाना झगड़ा होना शुरू हो गया.”

बाद में उसने अपने डॉक्टर से मदद लेने की कोशिश की. उसकी कुछ काउंसलिंग भी हुई थी और उन्हें मनोवैज्ञानिक से इलाज के लिए सलाह दी गई थी.

जॉन बताते हैं कि उनकी पार्टनर दफ्तर के बाद घर आने पर उनसे ‘सेक्स की मांग’ करने लगी, “वो हिंसक होने लगी और हालात यहां तक पहुंच गए कि उसके घर आने की सोचकर ही मैं भयभीत हो जाता.”

एक दिन जॉन की आंख खुली तो उन्होंने पाया कि उनका दाहिना हाथ बिस्तर के फ्रेम के साथ हथकड़ी में बंधा है. ऐसा उनकी पार्टनर ने किया था.

फिर बेड के बराबर में रखे स्टीरियो सिस्टम के लाउड स्पीकर से उनके सिर पर मारना शुरू कर दिया और उसका दूसरा हाथ नायलॉन की रस्सी से बांध दिया और उन पर सेक्स करने का दबाव बनाया.

दर्द और डर के मारे जॉन उसकी फरमाइश पूरी करने में असमर्थ थे, इसलिए उनकी पार्टनर ने दोबारा उन्हें पीटना शुरू कर दिया और आधे एक घंटे तक बांधे रखा. उसके बाद उनकी पार्टनर इस बारे में कुछ भी बात करने को राज़ी नहीं थी.

कुछ समय बाद वो प्रेग्नेंट हो गई और कुछ दिनों तक इस झगड़े पर विराम लग गया. लेकिन बच्चा पैदा होने के कुछ दिन बाद फिर जब एक रात जॉन की आँख खुली तो पाया उनके हाथ बेड के साथ हथकड़ी से बंधे हुए हैं.

लोगों में धारणाएं

उन्होंने बताया कि फिर उसकी पार्टनर ने ज़बरदस्ती वियाग्रा खिलाई और उनका मुंह बंद कर दिया.

वो बताते हैं, “मैं कुछ नहीं कर सकता था. इसके बाद मैं नहाने चला गया और मुझे पता नहीं मैं कितनी देर शॉवर में था, अंत में मैं सीढ़ियों से नीचे गया. कमरे में घुसते ही जो पहली बात उसने मुझसे कही वो थी- “रात के खाने में क्या है?”

जब जॉन ने इसके बारे में लोगों को बताने की कोशिश की तो किसी को भरोसा नहीं हुआ.

वो बताते हैं, “मुझसे कहा गया है कि मैंने घर क्यों नहीं छोड़ा. यह मेरा घर था जो मैंने अपने बच्चों के लिए खरीदा था और पैसा भी मेरा था, इसलिए मैं आर्थिक रूप से रिश्ते में बंधा था. लोगों को मुझ पर अभी भी यक़ीन नहीं क्योंकि लोग कहते हैं कि तुमने उसे वापस क्यों नहीं मारा? काश! मैं और जल्दी छुटकारा पा गया होता.”

डॉ वियरे ने कुछ और पुरुषों के इंटरव्यू किये. उनका तजुर्बा भी जॉन से मिलता जुलता था. उनकी रिसर्च का एक निष्कर्ष यह भी है कि ये अपराध ज़्यादातर महिला पार्टनर या एक्स पार्टनर के साथ होता है और यह अक्सर घरेलू हिंसा में होता है.

एक अन्य पुरुष ने कहा, “हम इसके बारे में बात करने से डरते हैं और शर्मिंदा होते हैं. जब हम इसके बारे में बात करते हैं, तो हमें विश्वास नहीं होता है, क्योंकि हम पुरुष हैं.”

रिसर्च के नतीजे

इन अनुभवों की रिपोर्ट करने में पुरुषों को अक्सर शर्म आती है, वे यौन शोषण का उल्लेख किए बिना घरेलू हिंसा की रिपोर्ट करा सकते हैं.

दिमाग पर गंभीर असर पड़ सकता है, आत्महत्या के विचार आ सकते हैं और यौन क्षमता जा सकती है.

कुछ पुरुषों ने बार-बार पीड़ित होने की बात कही, कुछ बचपन में यौन शोषण से पीड़ित थे, कुछ ने अलग-अलग तरीक़े से यौन हिंसा को सहन किया.

पुरुषों में पुलिस, न्यायिक प्रणाली और क़ानून को लेकर कई नकारात्मक धारणाएं थीं.

वियरे के शोध में एक मिथक यह भी सामने आया है कि पुरुषों के साथ जबरन सेक्स असंभव है क्योंकि पुरुष महिलाओं की तुलना में शारीरिक रूप से अधिक मजबूत होते हैं.

दूसरे ये कि पुरुष महिलाओं के साथ सभी यौन अवसरों को सकारात्मक मानते हैं.

एक तीसरा मिथक यह है कि अगर पुरुषों में उत्तेजना होती है तो इसका मतलब वो ज़रूर सेक्स चाहता है. वियरे के अनुसार, “वास्तव में उत्तेजना विशुद्ध एक शारीरिक प्रतिक्रिया है.”

वो कहती हैं, “अगर पुरुष डरे हुए, क्रोधित, भयभीत आदि हैं तो भी वे उत्तेजित हो सकते हैं और बने रह सकते हैं. ऐसे शोध भी हैं जो दिखाते हैं कि महिलाओं के साथ बलात्कार होने पर वे सेक्सुअली एक्टिव हो सकती हैं क्योंकि उनका शरीर शारीरिक रूप से प्रतिक्रिया देता है. यह पुरुष और महिला दोनों पीड़ितों के लिए एक मुद्दा है जिस पर पर्याप्त चर्चा नहीं की गई है, इस बारे में स्पष्ट सबूत हैं.”

वियरे के साल 2017 के अध्ययन में प्रतिभागियों में से कई ने अत्याधिक नशे में होने के बाद भी सेक्स के अनुभवों के बारे में बताया जबकि जो उनके साथ हो रहा था, वो उसे रोकने में असमर्थ थे.

क़ानूनी मान्यता

साक्षात्कार देने वालों में से एक का कहना था कि एक महिला के साथ क्लब में रातभर पार्टी करने के बाद जब वो घर जा रहा था, उसे डेट रेप की दवा दी गई और जबरदस्ती सेक्स करने के लिए मजबूर किया गया.

एक और व्यक्ति ने बताया कि जब वह एक छात्र था तो एक समर कैम्प में उसे सेक्स करने के लिए मजबूर किया गया.

वियरे का कहना है कि ताज़ा अध्ययन में अधिकांश प्रतिभागियों ने अपने जबरन सेक्स के अनुभवों को “बलात्कार” माना और कुछ लोग निराश थे कि यह इंग्लैंड और वेल्स के कानून के तहत बलात्कार के रूप में नहीं गिना जाएगा.

एक और व्यक्ति ने बताया, “इस तथ्य के बारे में बात करते हुए ये बताना कि आपकी साथी नशे में थी और उसने खुद को आपके ऊपर थोप दिया, बल्कि आपका बलात्कार किया, क्या ये फैंटसी नहीं लगता है?”

वियरे लिखती हैं कि कई अमरीकी राज्यों में बलात्कार को मोटे तौर पर गैर-सहमति वाले सेक्स के रूप में परिभाषित किया गया है. ऑस्ट्रेलियाई राज्य विक्टोरिया में भी इस बारे में क़ानून है.

शोध में सुझाई गई आठ सिफारिशों में से एक यह है कि बलात्कार के कानून में सुधार करने की गंभीर ज़रूरत है.

विश्व में बेअसर क्यों हो रही हैं मलेरिया की दवाएं

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दक्षिण पूर्वी एशिया के इलाके में मलेरिया से लड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ज़रूरी दवाएं बेअसर हो रही हैं. मलेरिया के परजीवी इन दवाओं को लेकर इम्यून हो गए हैं यानी अब इन दवाओं का भी उन पर असर नहीं हो रहा.

कंबोडिया से लेकर लाओस, थाईलैंड और वियतनाम में अधिकतर मरीज़ों पर मलेरिया में दी जाने वाली प्राथमिक दवाएं असर नहीं कर रही हैं. खासकर कंबोडिया में इन दवाओं के फेल होने के सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं.

अगर दक्षिण एशियाई देश भारत की बात करें तो साल 2017 में आई वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मलेरिया के मामलों में 24 फ़ीसदी तक कमी आई है. दुनिया के 11 देशों में कुल मलेरिया मरीज़ों के 70 फ़ीसदी केस पाए जाते हैं, और इन देशों में भारत का नाम भी शामिल है.

साल 2018 में भारत में मलेरिया बीमारी के मामलों में 24 फ़ीसदी कमी आई है और इसके साथ ही भारत अब मलेरिया के मामले में टॉप तीन देशों में से एक नहीं है. हालांकि अब भी भारत की कुल आबादी के 94 फ़ीसदी लोगों पर मलेरिया का ख़तरा बना हुआ है.

भारत ने साल 2027 तक मलेरिया मुक्त होने और साल 2030 तक इस बीमारी को खत्म करने का लक्ष्य रखा है.

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मलेरिया के मामले कमी का लक्ष्य ओडिशा के इस बीमारी से लड़ने में मिली कामयाबी के कारण मुमकिन हो सका है. इससे पहले भारत में कुल मलेरिया मरीज़ों का 40 फ़ीसदी हिस्सा ओडिशा राज्य से आता था.

कंबोडिया में मलेरिया के लिए दो दवाओं का इस्तेमाल होता है- आर्टेमिसिनिन और पिपोराक्विन

इन दवाओं का कॉम्बिनेशन कंबोडिया में साल 2008 में लाया गया.

लेकिन साल 2013 में कंबोडिया के पश्चिमी हिस्से में पहला ऐसा मामला सामने आया जब मलेरिया के परजीवी पर इन दोनों दवाओं का असर खत्म होने लगा.

लेंसेंट की हालिया एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण पूर्वी एशिया के मरीज़ों के खून के सैंपल लिये गए. जब इन परजीवियों के डीएनए की जांच की गई तो पाया गया कि ये परजीवी दवा प्रतिरोधी हो चुके हैं और ये प्रभाव कंबोडिया से होकर लाओस, थाईलैंड और वियतनाम तक फैल चुका है.

इसका म्यूटेशन, समस्या को और भी विकराल बना रहा है. इन देशों के कई इलाकों में 80 फ़ीसदी तक मलेरिया परजीवियों पर दवा बेअसर हो चुकी हैं.

क्या अब मलेरिया लाइलाज हो गया है?

नहीं, लैंसेंट के ही दूसरे जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में कहा गया कि इन रोगियों को स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट से ठीक नहीं किया जा रहा है. इलाज वैकल्पिक दवाओं से किया जा सकता है.

वियतनाम में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी क्लिनिकल रिसर्च यूनिट के प्रोफ़ेसर ट्रान तिन्ह हिएन कहते हैं, ” मलेरिया के परजीवियों में प्रतिरोध के प्रसार और गहराते इस संकट ने वैकल्पिक उपचारों को अपनाने की ज़रूरत पर प्रकाश डाला.”

अब मलेरिया में आर्टेमिसियम के साथ दूसरी दवाओं के इस्तेमाल और तीन दवाओं के कॉम्बिनेशन से इसका इलाज संभव है.

समस्या क्या है?

दुनिया को मलेरिया से मुक्त करने की दिशा में हो रहे तमाम प्रयासों को इससे झटका लगा है.

सबसे बड़ा संकट है कि अगर ये अफ़्रीका में पहुंच गया तो क्या होगा, जहां मलेरिया के मामले सबसे ज़्यादा हैं.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ओलिवियो मियोट्टो के मुताबिक, ”परजीवियों का ये बढ़ता प्रतिरोध प्रभावी तरीके से बढ़ रहा है और नए क्षेत्रों में जाने और नए जेनेटिक को अपनाने में सक्षम है. अगर ये अफ़्रीका पहुंच गया तो इसके नतीजे भयानक होंगे, क्योंकि मलेरिया अफ़्रीका की सबसे बड़ी समस्या है.”

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन के प्रोफ़ेसर कॉलिन सदरलैंड कहते हैं, ”ये परजीवी एक डरावने जानवर जैसे हैं इसमें कोई संशय नहीं है. हालांकि, मुझे लगता है कि ये परजीवी बहुत फिट नहीं हैं, क्योंकि इनकी संख्या में गिरावट हो रही है.”

प्रोफ़ेसर कॉलिन मानते हैं कि ”परजीवियों का दवा प्रतिरोधी होना एक बड़ी समस्या तो है लेकिन इसे वैश्विक संकट तो नहीं कहा जा सकता. इसके परिणाम इतने भयानक नहीं होंगे जैसा हम सोच रहे हैं.”

हर साल दुनियाभर में मलेरिया के 21.9 करोड़ मामले सामने आते हैं.

कपकपी, ठंड लगना और तेज़ बुखार मलेरिया के लक्षण है. अगर मलेरिया का सही इलाज ना हो तो समस्या गंभीर हो सकती है.

लोगों ने पूछा- क्या ये है पुलिस का काम, जब SP ने दबाए कांवड़िये के पैर

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उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारियों की ‘कांवड़िया भक्ति’ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है.

सावन के महीने में जारी कांवड़ यात्राओं के बीच पुलिस अधिकारियों के ऐसे वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहे हैं जहां अधिकारी कांवड़ यात्रियों के पैर दबाते और हेलीकॉप्टर से उन पर फूल बरसाते दिख रहे हैं.

कुछ सोशल मीडिया यूज़र पुलिस अधिकारियों की इन तस्वीरों की सराहना कर रहे हैं तो कुछ इन पर सवाल उठा रहे हैं.

सबसे ज़्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले के पुलिस अधीक्षक अजय कुमार पांडेय के एक वीडियो को लेकर हो रही है.

शामली पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर जारी इस वीडियो में एसपी अजय कुमार पांडेय एक कांवड़ यात्री के पैरों की मसाज करते दिख रहे हैं.

इस वीडियो के वायरल होने के बाद जब सवाल उठे तो एसपी पांडेय ने कहा, “ये वीडियो एक हेल्थ कैंप का है. मुझे इस कैंप की शुरुआत के लिए बुलाया गया था. कैंप का उद्घाटन करने के बाद मैंने तीर्थयात्रियों की सांकेतिक सेवा के लिए ऐसा किया.”

उन्होंने आगे कहा, “एक पुलिस अधिकारी के तौर पर कानून व्यवस्था को बनाए रखना और यहां रुकने या फिर यहां से गुजरने वाले लोगों की बेहतर सेवा हो, ये ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है. मैं अपने सहकर्मियों को संदेश देना चाहता था कि हमारा काम सिर्फ़ सुरक्षा देना नहीं. हमें अपने लोगों की सेवा भी करनी चाहिए.”

इसके पहले शामली के एसपी की कांवड़ यात्रा पर फूल बरसाने की तस्वीर सामने आई थी.

उत्तर प्रदेश पुलिस के एडीजी ज़ोन के ट्विटर हैंडल से भी एक वीडियो जारी किया गया जिसमें अधिकारी कांवड़ यात्रियों पर फूल बरसाते दिख रहे हैं.

कई सोशल मीडिया यूज़र ऐसे वीडियो और तस्वीरों के लेकर प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. कुछ यूज़र पुलिस के जज़्बे की तारीफ़ कर रहे हैं तो कुछ सवाल भी उठा रहे हैं.

सूर्य प्रताप सिंह नाम के एक ट्विटर यूज़र ने लिखा है, “शर्मनाक दृश्य….पुलिसिंग न करके ये सब। मज़ाक बना के रख दिया है, व्यवस्था का.”

जाहिद परवेज़ नाम के एक ट्विटर यूज़र ने सवाल किया है, “ये पुलिस का काम है या फिर योगी भक्ति है?”

आशीष जोशी के नाम से बने ट्विटर अकाउंट से पुलिस को सलाह दी गई है कि मसाज देने की बजाए उन्हें लिंचिंग रोकने के लिए क़दम उठाने चाहिए.

पत्रकार सौरभ शुक्ला ने भी सवाल उठाया तो उन्हें आशुदीप सिंह नाम के एक ट्विटर यूज़र ने जवाब दिया और एसपी पांडेय की ‘सेवाभावना’ का समर्थन किया.

कई दूसरे सोशल मीडिया यूज़र भी पुलिस अधिकारियों की ‘कांवड़िया भक्ति’ की तारीफ़ कर रहे हैं.

कश्मीर के मन में डर, आर्टिकल 35-ए और सुरक्षा बल की 100 अतिरिक्त कंपनियां

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भारत प्रशासित कश्मीर में सुरक्षाबलों की 100 अतिरिक्त कंपनियों की तैनाती के फैसले के बाद से कश्मीर घाटी में डर का माहौल है.

इसे लेकर आम लोगों में हैरानी और उलझन है और सब इसके अपने-अपने मतलब निकाल रहे हैं.

राजनीतिक दलों से लेकर आम लोग तक यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि कश्मीर में 100 अतिरिक्त कंपनियां भेजने के बाद क्या होगा.

26 जुलाई 2019 को सोशल मीडिया पर गृह मंत्रालय के एक आदेश की कॉपी काफ़ी शेयर की जाने लगी थी.

इस कॉपी में लिखा था कि कश्मीर में विद्रोही गतिविधियों के ख़िलाफ़ ग्रिड और क़ानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अर्धसैनिक बलों की 100 अतिरिक्त कंपनियां भेजी जाएंगी. इनमें सीआरपीएफ़ की 50, बीएसएफ की 10 और एसएसबी की 30 और आईटीबीपी की 10 कंपनियां शामिल हैं.

कुछ न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने कश्मीर में दो दिन बिताए और सुरक्षा अधिकारियों के साथ अलग से बैठक की थी.

रिपोर्ट्स का यह भी कहना था कि अजित डोभाल के कश्मीर घाटी के दो दिवसीय दौरे के बाद अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजने का फ़ैसला लिया गया है.

जैसे ही आदेश की कॉपी सार्वजनिक हुई डर और खौफ़ ने पूरे कश्मीर को जकड़ लिया. कश्मीर में राजनीतिक दल और ज़्यादा सुरक्षाबल भेजने के ख़िलाफ़ हैं.

राजनीतिक दलों का डर

पीडीपी अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने इस फ़ैसले के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की है. उन्होंने कहा कि कश्मीर एक राजनीतिक मसला है और इसके लिए राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है.

महबूबा मुफ़्ती ने कहा, “केंद्र सरकार के इस फ़ैसले से घाटी के लोगों में खौफ़ का माहौल है. कश्मीर में और ज़्यादा सुरक्षाबलों की कोई ज़रूरत नहीं है. जम्मू-कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है जिसका सैन्य समाधान नहीं है. भारत सरकार को अपनी नीति पर फिर से विचार करना होगा.”

जेके पीपल्स मूवमेंट के अध्यक्ष शाह फैज़ल ने कहा कि हमें चिंता है कि अगर जल्दबाज़ी में कुछ निर्णय लिया गया तो कश्मीर के हालात बिगड़ सकते हैं.

उन्होंने कहा, “जब से सोशल मीडिया पर सर्कुलर शेयर होना शुरू हुआ है तब से हर कोई डर में है. मैंने आज एयरपोर्ट पर देखा है और लोगों लगता है कि हालात ख़राब हो सकते हैं और कश्मीर में कुछ बड़ा हो सकता है. कश्मीर एक संघर्ष क्षेत्र है जहां अफ़वाहें बहुत आसानी से फैलती हैं. यह एक अजीब स्थिति है. अभी तक किसी वरिष्ठ अधिकारी का बयान भी नहीं आया है जिससे की अफ़वाहों को शांत किया जा सके.”

उनसे ये पूछने पर कि किस तरह की चिंताएं हैं तो शाह फैज़ल ने कहा, “पिछले कुछ महीनों में कई चर्चाएं हुई हैं. जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को ख़त्म किया जा सकता है. हाल ही में इस मुद्दे पर चर्चा भी की गई थी. यह भी कहा जा रहा है कि सरकार कोई असाधारण क़दम भी उठा सकती है. लेकिन, हमारा मानना है कि ऐसे संवैधानिक मामले जल्दी में नहीं सुलझ सकते.”

अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजने के फ़ैसले के आरोप की आलोचना करते हुए पूर्व एमएलए और आवामी इत्तेहाद पार्टी के अध्यक्ष इंजीनियर राशिद ने कहा, “कश्मीर में सुरक्षाबलों का आना कोई नहीं बात नहीं है. लेकिन, जिस उद्देश्य के लिए वो आ रहे हैं, वो चिंताजनक है. हमने यहां पकड़ो और मारों की नीति देखी है. हमने यहां लोगों को मरते देखा है. यहां कई अज्ञात कब्रें हैं.”

इंजीनियर राशिद कहते हैं, “कश्मीर के लोग कश्मीर की समस्या के समाधान के बारे में बात करते हैं. अगर कश्मीरियों के पास 25 पैसे हैं तो वो एक रुपये की मांग कर रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि वो 25 पैसे भी वापस दे दो. मैं भारत सरकार से अपील करता हूं कि कोई बचकाना क़दम न उठाए. इन तरीकों से कश्मीरियों को नहीं दबाया जा सकता.”

‘मन में डर बैठ जाता है’

कश्मीर में आम लोग अतिरिक्त सुरक्षाबलों के आने के फ़ैसले से डरे हुए हैं. लोगों का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि क्या होने वाला है.

अब्दुल अहद ने बताया, “कोई नहीं जानता की क्या होने वाला है. यहां तक कि हमारे दो पूर्व मुख्यमंत्रियों को भी नहीं पता कि आगे क्या होगा. हम आम लोगों ने बस सुना है कि अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजे जा रहे हैं जो हमारे लिए चिंता की बात है. ऐसे हालात में लोगों के मन में डर बैठ जाता है. अगर कुछ होने वाला है तो सरकारी अधिकारियों को इस बारे में स्पष्ट रूप से बताना चाहिए क्योंकि ये उनकी जिम्मेदारी है.”

‘ये एक नियमित प्रक्रिया है’

हालांकि, बीजेपी की जम्मू-कश्मीर इकाई ने अनुच्छेद 35ए हटाने की ख़बरों को साफ़ तौर पर ख़ारिज कर दिया है. उनका कहना है कि अतिरिक्त सुरक्षाबल चुनाव को देखते हुए भेजे जा रहे हैं.

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना ने पत्रकारों को बताया, “यह फ़ैसला चुनाव को लेकर किया गया है. आने वाले दिनों में राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इसके लिए अतिरिक्त सुरक्षाबलों की ज़रूरत होगी. महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्लाह ट्वीट करके डर पैदा कर रहे हैं. ऐसा कुछ नहीं है. आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है.”

इस मामले में शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह एक नियमित प्रक्रिया है.

इंस्पेक्टर जनरल सीआरपीएफ रविदीप साही ने श्रीनगर में एक समारोह के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा, “सुरक्षाबलों का आना और जाना एक निरंतर प्रक्रिया है. क़ानून व्यवस्था और चरमपंथ विरोधी ऑपरेशन को मजबूत करने की ज़रूरत महसूस हुई है. यह नियमित तौर पर होता रहता है.”

पिछले दो सालों में भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने कई अलगाववादी नेताओं, कार्यकर्ताओं और व्यापारियों को आतंकी फंडिंग के आरोप में गिरफ़्तार किया है.

हाल ही में, अपने दो दिवसीय कश्मीर दौरे पर गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि आतंकवाद और अलगाववाद को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है.