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LIC की ये पॉलिसी 90 दिन के बच्चे से 65 साल के लोग भी ले सकते हैं

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(LIC) ने कुछ ही दिनों पहले नवजीवन (Navjeevan) नाम का एक नई इंश्योरेंस पॉलिसी लॉन्च की है. इसकी वजह से बहुत लोग इस पॉलिसी के बारे में जानते हैं. यह पॉलिसी नॉन लिंक्ड पार्टिसिपेटिंग एंडोमेंट लाइफ इंश्योरेंस है. इस प्लान का नंबर 853 है. इसमें प्रोटेक्शन और सेविंग दोनों तरह के फीचर हैं. इस नए प्लान में पॉलिसी होल्डर को सिंगल प्रीमियम पेमेंट की सुविधा भी मिलेगी. इसके अलावा 5 साल तक भी प्रीमियम भरा जा सकता है.ये इंश्योरेंस प्लान 90 दिन के छोटे बच्चे से लेकर 65 साल की उम्र वाले व्यक्ति के लिए उपलब्ध है. इसमें 45 साल के बाद रिस्क सम एश्योर्ड चुनने का भी विकल्प होगा.

कैसे खरीद सकते हैं पॉलिसी-LIC का नवजीवन इश्योरेंस पॉलिसी ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरीकों से खरीदा जा सकता है. ये प्लान एजेंट भी बेच सकेंगे. इस पॉलिसी को सीधे LIC की वेबसाइट https://eterm.licindia.in/onlinePlansIndex/login.do पर जाकर खरीदा जा सकता है.

नवजीवन इंश्योरेंस पॉलिसी का नंबर UIN 512N331VO1 है. इस पॉलिसी में कम से कम 1 लाख रुपए का बीमा होगा. अधिकतम बीमा कराने की कोई लिमिट नहीं है. अगर किसी की आयु 45 वर्ष से ज्यादा है तो उसे लिमिटेड प्रीमियम में विकल्प 2 विकल्प मिलेंगे. इसमें वार्षिक प्रीमियम का 10 गुना सम एश्योर्ड और दूसरे विकल्प में वार्षिक प्रीमियम का 7 गुना सम एश्योर्ड का विकल्प होगा.

पॉलिसी टर्म-इसके साथ LIC एक्सीडेंटल डेथ और डिसएबिलिटी राइडर का विकल्प भी उपलब्ध है. इस पॉलिसी का टर्म 10 से 18 साल रहेगा. आप सिंगल प्रीमियम पॉलिसी को अधिकतम 44 साल की उम्र तक खरीद सकते हैं. वहीं लिमिटेड प्रीमियम पॉलिसी को अधिकतम 60 साल की उम्र तक खरीदा जा सकता है. नवजीवन इंश्योरेंस के सिंगल प्रीमियम प्लान में मैच्युरिटी की अधिकतम उम्र 62 साल है. लिमिटेड इंश्योरेंस प्लान में ये 75 साल है.

टैक्स बचत-इस नए इंश्योरेंस पॉलिसी में इनकम टैक्स की बचत भी आप कर सकते हैं. इसके अलावा इस पर लोन भी लिया जा सकता है.

पिता के साथ ठेले पर बचपन में बेचता था सब्‍जी, अब ‘जज’ बनकर करेंगे समाजसेवा

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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पीसीएस-जे-2018 परीक्षा (UP PCS-J FINAL RESULT 2018) का परिणाम हाल ही में घोषित हुआ है. जौनपुर के महराजगंज थाना के सराय दुर्गादास गांव के रहने वाले अमित मौर्य ने पीसीएस-जे परीक्षा में सफलता का परचम लहराया. लेकिन अमित की लाइफ की कहानी भी बहुत संघर्ष भरी रही हैं. आपको बता दें कि अमित बचपन में अपने पिता के साथ ठेले पर सब्जी बेचने में मदद करते थे. उनके जीवन की एक ही लक्ष्य था, ‘जज’ बनकर समाज सेवा करना. इसी लक्ष्य को पाने के लिए काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय (बीएचयू) में दाखिल लिया.

हिम्मत कभी नहीं हारना चाहिए

बातचीत में अमित बताते हैं कि अगर कोई भी इंसान के अंदर लगन और मेहनत करने की क्षमता हो तो वो किसी भी मंजिल को असानी से हासिल कर सकता है. उन्होंने कहा कि हिम्मत कभी नहीं हारना चाहिए, जीवन में उतार चढ़ाव बहुत आते है. पीसीएस-जे की सफलता के पीछे के सावल पर अमित ने कहा कि गुरु जी प्रोफेसर जेपी राय और माता-पिता का आर्शीवाद के कारण आज मैं पीसीएस-जे परीक्षा में सफल हुआ हूं.

बता दें कि अमित के पिता रामचंद्र मौर्य सब्‍जी का ठेला लगाते हैं. अमित भी बचपन में पिता के साथ सब्‍जी और साइकिल की दुकान संभालते थे. बीएचयू से एलएलबी और एलएलएम करने के बाद शोध कर रहे अमित मौर्य ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थित ठीक नहीं थी. घर में बड़े भाई ऑटो गैरेज चलाते हैं, वहीं छोटा भाई सब्जी की दुकान करते हैं. आठ पर नेट की परीक्षा पास करने वाले अमित मौर्य ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बाद पिता जी मुझे पैसे भेजते थे. इसलिए हमारा एक ही लक्ष्य था, पढ़ाई और पीसीएस-जे परीक्षा को पास करना. अमित ने 457 रैंक हासिल की है.

आयोग के सचिव जगदीश ने रिजल्ट जारी किया है. पीसीएस-जे-2018 की प्रारम्भिक परीक्षा 16 दिसम्बर 2018 को आयोजित की गई थी जिसमें 38209 अभ्यर्थी शामिल हुए थे. 5 जनवरी 2019 को घोषित प्रारम्भिक परीक्षा में 6041 अभ्यर्थी सफल घोषित किए गए थे. 30 और 31 जनवरी और एक फरवरी को लखनऊ और प्रयागराज में पीसीएस की मेंस परीक्षा आयोजित की गई थी. 13 जून को घोषित मेंस परीक्षा परिणाम में 1847 अभ्यर्थी सफल हुए थे. मेंस परीक्षा में 5795 अभ्यर्थी शामिल हुए थे.

हो जाये सावधान : शोध में हुआ बड़ा खुलासा, इस वजह से खराब हो रहा 33 फीसदी लोगों का लिवर

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मंडी जंक फूड और शराब के अधिक सेवन से ही नहीं बल्कि फलों-सब्जियों की पैदावार बढ़ाने के लिए कीटनाशक का प्रयोग, घरों-कारों के लेड युक्त रंग भी देश में नौ से 33 फीसदी लोगों का लिवर खराब कर रहे हैं। लोग नॉन -अल्कोहलिक फैटी लिवर नएएफएलडी) जैसी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। पैक्ड फूड की पैकेजिंग और बीयर में लेड भी बीमारी बढ़ा रहा है। यह शोध आईआईटी मंडी के वैज्ञानिकों ने भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (सीएसआईआर) भारतीय विषय विज्ञान शोध संस्थान लखनऊ और रसायन एवं जीव विज्ञान विभाग-जामिया हमदर्द, नई दिल्ली के शोधार्थियों के सहयोग से किया। इसे हाल में एक प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू जरनल एफ ईबीएस लेटर्स में प्रकाशित किया है।

शोधकर्ताओं ने किया ये दावा

दावा किया कि आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने पहली बार इस प्रक्रिया को सामने रखा है। इससे लेड पीबी 2 प्लस साल्ट की वजह से लिवर में चर्बी बढ़ रही है। इस खोज के बाद अब नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर बीमारी के लिए दवा भी ईजाद की जा सकेगी।

एनएएफएलडी का संबंध मेटाबॉलिक ग्रुप की बीमारियों माटोपा और डायबिटीज आदि से है। इसमें लिवर है। हाल के शोधों में देखा गया कि पतले लोग भी मेटाबॉलिकली मोटे और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज से ग्रस्त हो सकते हैं।

वास्तविक प्रक्रिया का अब पता चला

स्कूल ऑफ बेसिक साइंसेज आईआईटी मंडी के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं शोधकर्ता टीम के सदस्य डॉ. प्रोसेनजीत मोंडल ने बताया कि लेड और फैटी लीवर रोग के बीच संबंध हमें पहले से ज्ञात है पर वास्तविक प्रक्रिया का अब तक पता नहीं था।

इसकी वजह से लेड से फैटी लीवर की समस्या बढ़ती है। लेड नामक यह मेटल (शीशा) पर्यावरण के विषैला होने का गंभीर संकट पैदा करता है। इससे चर्बी बनने और लिवर में जमा होने पर नियंत्रण नहीं रह पाता है। 

चुहिया पर किया प्रशिक्षण

शोधकर्ताओं ने चुहिया में एडेनोवायरस से डीएनए सेगमेंट (प्लाज्मीड) इंजेक्ट किया। ये लेड के प्रभाव को रोकता है। इससे सोरसीन सक्रिय हुआ और परिणामस्वरूप फैटी लिवर डिजीज बढ़ना रुक गया।

फैटी लिवर की बीमारी डे नोवो लाइपोजेनेसिस (डीएनएल) पर नियंत्रण के अभाव में होती है। यह रक्त प्रवाह में मौजूद कार्बोहाइड्रेट के फैट में बदल जाने की जटिल प्रक्रिया है। डीएनएल के नियंत्रण में अभाव से ज्यादा चर्बी बनती है जो लीवर और अन्य अंदरूनी अंगों में जमा हो जाती है जिसे विसेरल फैट कहते हैं।

बटवारें को लेकर हुआ हंगामा, खुदाई में मिले पांच सौ साल पुराने चांदी के 600 से अधिक सिक्के

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हिमाचल प्रदेश में खुदाई के दौरान मूंढापांडे के मजदूरों को मिले सालों पुराने खजाने को लेकर शुक्रवार को ठेकेदार से विवाद हो गया। सूचना पर पहुंची पुलिस ने ठेकेदार के कब्जे से खजाना बरामद किया है। खजाने को अब पुरातत्व विभाग के सुपुर्द किया जाएगा। देर शाम तक रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई है। मूंढापांडे के बरबाला खास में रहने वाले कुछ युवकों को मजदूरी के लिए ठैकेदार गुलाम नवी हिमाचल प्रदेश ले गया था। शिमला के पास मजदूर खुदाई का काम कर रहे थे। इस दौरान ही उनको एक घडे़ में सालों पुराना खजाना मिला। खजाना में भारी मात्रा में चांदी के सिक्के थे। 

मजदूरों ने इसकी जानकारी दी तो वहां पर खुदाई का काम करवाने वालों ने खजाने को अपने पास रख लिया। खजाने का एक हिस्सा मूंढापांडे के मजदूरों और ठेकेदार को दे दिया। इस खजाने को ठेकेदार ने अपने पास रखा और मजदूरों को लेकर मुरादाबाद आया। यहां पहुंचने पर जब ठेकेदार गुलाम नवी से मजदूरों ने खजाने की मांग की तो वह मुकर गया। खजाने को मांगने पर वह जान से मारने की धमकी देने लगा। इस पर मजदूरों ने पुलिस को इस बारे में सूचित कर दिया।

एसएचओ कटघर अजीत सिंह ने बताया कि शुक्रवार को सूचना पर पुलिस की टीम बरबाला खास पहुंची। वहां पर गुलाम नवी के कब्जे से पुलिस ने चांदी के 698 सिक्के बरामद का लिए। यह खजाना लगभग चार सौ से पांच सौ साल पुराना और मुगलों के शासनकाल का बताया जा रहा है।

एसएचओ ने बताया कि इस मामले में पुरातत्व विभाग को सूचित किया गया है। यह खजाना जल्द ही पुरातत्व विभाग को सौंपा जाएगा। सिक्कों पर दर्ज मजमून के मुताबिक कुछ सिक्के अकबर काल के हैं तो कुछ शाहजहां और औरंगजेब काल के हैं। सिक्कों पर जलालुद्दीन अकबर, शहंशाह और औरंगजेब आलमगीर दर्ज और कलमा दर्ज है।

सिक्कों को बेचने की हुई कोशिश

सूत्रों ने बताया कि ठेकेदार ने इन सिक्कों को बेचने की कोशिश की थी। उसने एक सराफ से भी संपर्क साधा था। पुलिस इस संबंध में भी जानकारी कर रही है कि कुछ सिक्कों को बेच तो नहीं दिया गया। ऐसे में सराफा पर भी पुलिस की नजर है।

भारतीयों के लिए पोषक तत्व की औसत जरूरत और मात्रा हुई तय

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हैदराबाद पहली बार यह तय किया गया है कि भारतीयों के लिए रोजाना के खानपान में पोषक तत्वों की अनुमानित औसत जरूरत कितनी होनी चाहिए और यह कितनी मात्रा में होनी चाहिए। भारतीय चिकित्सा परिषद (आईसीएमआर) के तहत अनुसंधान संस्थान राष्ट्रीय पोषक संस्थान (एनआईएन) ने भारतीयों के लिए संशोधित अनुसंशित आहार राशन (आरडीए) का मसौदा तैयार किया है। अभी सभी पोषक तत्वों के लिए एक ही मानक का इस्तेमाल होता है। आईसीएमआर-एनआईएन की निदेशक हेमलता आर के मुताबिक, बरसों से पोषक तत्वों की जरूरतें बढ़ी हैं, इसे देखते हुए यह प्रस्ताव तैयार किया गया है, ताकि इनका इस्तेमाल निजी तौर पर या आबादी के लिए किया जा सके। मौजूदा प्रस्ताव के मुताबिक, अनुमानित औसत जरूरत (ईएआर) का इस्तेमाल आबादी द्वारा पोषक तत्वों की मात्रा के मूल्यांकन में किया जाता है। वहीं, किसी व्यक्ति के लिए पोषक तत्वों की कितनी सुरक्षित मात्रा होनी चाहिए, इसके लिए आरडीए बनाया गया है। इससे पहले ईएआर के मूल्यांकन में आरडीए का इस्तेमाल नहीं होता था।

भोजन और पोषक तत्वों की बाकायदा सूची तैयार कर रही सरकार

सरकार फिलहाल भोजन और पोषक तत्वों की सूची तैयार कर रही है, इसलिए खुराक की मात्रा तय की गई है। इससे पहले 2011 में आरडीए में बदलाव किया गया था। 2019 के आखिर में आरडीए में फिर बदलाव कर दिया जाएगा। नए आरडीए में दूध और दूध से बने उत्पादों को प्रोटीन का उच्च गुणवत्ता वाला स्रोत माना गया है और इसे खानपान में अनिवार्य रूप से शामिल करने को कहा गया है।

सामने आया सच उड़ गये सबके होश : नंदी पी रहे दूध खबर फैलते ही मंदिरों में उमड़ी भीड़

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सावन के इस महीने में जहां हर तरफ जय भोलेनाथ का उद्घोष सुनने को मिल रहा है. वहीं यूपी से कुछ ‘दैवीय चमत्कार’ की भी खबरें आ रहीं हैं. कई जिलों से ऐसी खबरें आई हैं कि नंदी भगवान दूध पी रहे हैं. मैनपुरी और पीलीभीत में जैसे ही लोगों को ये खबर लगी, उन्होंने एक दूसरे को मैसेज करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे पूरे शहर में यह खबर आग की तरह फैल गई. इसके बाद शहर के तमाम शिव मंदिरों के बाहर लोगों का तांता लगने लगा.

पीलीभीत के बाद मेरठ में भी इस खबर ने जोर पकड़ा. न्यूज18 ने जब मंदिर में जाकर इस खबर की पड़ताल की तो पाया कि लोग सिर्फ अफवाहों को सुनकर नंदी की प्रतीमा को दूध पिला रहे थे और जय भोले के जयकारे लगा रहे थे. हालांकि लोगों ने कहा कि ये आस्था का विषय है, कुछ लोगों को ऐसा लगा होगा कि नंदी दूध पी रहे हैं पर ऐसा है नहीं.

24 साल पहले गणेश की प्रतीमा ने पिया था दूध
सबसे पहले 1995 में 21 सितंबर (गणेश चतुर्थी) को यह अफवाह फैली थी कि गणेश प्रतिमाएं दूध पी रही हैं. देखते ही देखते मंदिरों में भीड़ लग गई. न्यूज चैनलों पर अटलजी समेत कई नेता गणेशजी को दूध पिलाते दिख रहे थे. इसके बाद लोगों ने एक दूसरे को फोन करके इसकी सूचना दी. जिसको जहां जानकारी लगी, गणेश मंदिर का पता पूछ वहां पहुंच गया. और गणेश प्रतिमाएं वैसे ही दूध को पीती रहीं. इसके बाद समय-समय पर दूसरे देवी-देवताओं के दूध पीने की खबर भी आती रहीं. 
जैसे ही गणेशजी के दूध पीने की खबरें फैली, वैज्ञानिकों ने तुरंत यह कहकर रिएक्ट किया कि यह नेचुरल साइंस है, लेकिन वे यह नहीं बता पाए कि ऐसा नेचुरल करिश्मा पहले कभी क्यों नहीं हुआ और केवल 24 घंटे तक ही क्यों चला? हालांकि कुछ ही समय बाद उन्होंने महसूस किया कि यह चमत्कार विज्ञान के दायरे से बाहर है.

ये जान लें : दिल्ली और मुंबई में बिहारियों को गाली देने वाले

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एक आम धारणा है कि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में बिहार और यूपी के लोग भरे पड़े हैं. दिल्ली-मुंबई के बाशिंदे अक्सर इसे लेकर ताना भी कसते हैं. महानगरों में प्रवासी बिहारियों के लिए कई बार स्थितियां मुश्किल भी हो जाती हैं. कभी मुंबई में रेहड़ी-पटरी पर बैठने वाले प्रवासी बिहारियों को पीटा जाता है, तो कभी दिल्ली में उन्हें गंदगी और बिगड़ती कानून व्यवस्था का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में बिहार के ज्यादा लोग हैं? इन शहरों के प्रवासी लोगों की क्या स्थिति है?

मुंबई में बिहार से ज्यादा मध्य प्रदेश के प्रवासी
इस बारे में सरकार ने कुछ आंकड़े जारी किए हैं. इन आंकड़ों के बाद मुंबई और दिल्ली वाले कम से कम बिहारी प्रवासियों को कोसना बंद कर देंगे. 2011 में हुई जनगणना के आधार पर बड़े शहरों और राज्यों के प्रवासी लोगों के आंकड़े जारी हुए हैं. इसके मुताबिक मुंबई में रह रहे बाहरी लोगों में बिहार से ज्यादा मध्य प्रदेश से आए लोगों की संख्या है. यानी बिहार से ज्यादा मध्य प्रदेश के लोगों ने अपने यहां से पलायन कर मुंबई में ठिकाना तलाशा है. लेकिन मुंबई में घुसे बाहरी लोग के नाम पर बिहार बदनाम है.

एक और चौंकाने वाला आंकड़ा गुजरात से है. आम धारणा ये भी है कि गुजरात में बिहारियों की तादाद ज्यादा है. लेकिन असलियत कुछ और ही है. गुजरात में रहने वाले प्रवासियों में राजस्थान के रहने वाले सबसे ज्यादा हैं. यहां तक कि बिहारियों की तुलना में प्रवासी राजस्थानी दोगुने हैं. ये आंकड़े दिलचस्प हैं. इसके पहले यकीन करना मुश्किल हो सकता था कि गुजरात में सबसे ज्यादा राजस्थान के लोग प्रवासी के तौर पर रह रहे हैं.

महाराष्ट्र में रहने वाले प्रवासियों में यूपी के लोगों की संख्या अच्छी खासी है. महाराष्ट्र में कुल 5.74 करोड़ प्रवासी हैं, इसमें 27.55 लाख लोगों ने अपना पिछला निवास यूपी का बताया है. महाराष्ट्र में रहने वाले बिहारियों की संख्या 5.68 लाख है. वहीं महाराष्ट्र के ही किसी एक हिस्से से आकर दूसरी जगह बसने वालों की संख्या भी 4.79 करोड़ है.

जनगणना पर जारी रिपोर्ट में उन लोगों को प्रवासी माना गया है, जिन्होंने काम-धंधा, शादी-विवाह या किसी और वजह से अपना जन्मस्थान छोड़ दिया हो. 1961 की जनगणना से पहले प्रवासियों के आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया. बाद की जनगणना में इस पर फोकस रखा गया. 2011 की जनगणना में इसे विस्तार से समझा गया. हालांकि आंकड़े मिलने में काफी देरी हुई है.

10 वर्षों में 30 फीसदी बढ़ गए प्रवासी
2011 की जनगणना में कुल 45.58 करोड़ लोगों को प्रवासी माना गया. इसके पहले 2001 की जनगणना में इनकी संख्या 31.45 करोड़ थी. 10 साल में प्रवासियों की संख्या में 30 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया. 2001 से तुलना करने पर दस वर्षों में 5.43 करोड़ लोग (करीब 12 फीसदी) रोजगार या किसी दूसरी वजह से एक राज्य से निकलकर दूसरे राज्य में गए. वहीं इस दौरान एक राज्य के ही किसी एक हिस्से से दूसरे इलाके में जाकर प्रवास करने वाले लोगों की संख्या 39.57 करोड़ रही.

यूपी भी ढो रहा है प्रवासियों का बोझ
उत्तर प्रदेश को लेकर कुछ दिलचस्प जानकारी निकलकर सामने आई है. मसलन यूपी के लोग सबसे ज्यादा देश के दूसरे हिस्सों में जाकर काम-धंधा करते हैं. हालांकि राज्य खुद करीब 5.65 करोड़ प्रवासियों का बोझ वहन कर रहा है. इसमें 5.20 करोड़ प्रवासी राज्य के ही एक हिस्से से दूसरे इलाके में जाकर बसे हैं. जबकि 40.62 लाख दूसरे राज्यों के हैं. यूपी में रहने वाले बिहारियों की संख्या 10.73 लाख है.

पंजाब में प्रवासियों की संख्या 1.37 करोड़ है. हालांकि इसमें दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों की संख्या सिर्फ 24.88 लाख है. इसमें 6.50 लाख लोगों ने अपना पिछला निवास यूपी बताया है, जबकि 3.53 लाख लोगों ने बिहार.

गुजरात में प्रवासियों की संख्या 2.69 करोड़ है. इसमें 39.16 लाख (करीब 42 फीसदी) प्रवासी दूसरे राज्यों से आए हैं. इसमें यूपी से आने वाले लोगों की संख्या 9.29 लाख है, जबकि राजस्थान से 7.47 लोग आकर यहां बसे हैं.

मौत के आगोश में समा गए 1000 लोग, आसमान से बारिश बनके बरसी थी आफत

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जून का महीना आते आते देश के विभिन्न हिस्सों में बारिश की आहट सुनाई देने लगती है और जुलाई में सावन अपने शबाब पर होता है, लेकिन 14 बरस पहले 26 जुलाई के दिन बादलों से बारिश नहीं बल्कि आफत बरसी. 2005 में देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई सहित महाराष्ट्र के कई हिस्से बारिश के इस सितम का शिकार हुए. जो जहां था वहीं थम गया, जिसने कुदरत के इस कहर से मुकाबला करने की कोशिश की, उसे मौत ने लील लिया. लोग कई दिनों तक अपने घरों, दफ्तरों, फैक्टरियों और रेलवे स्टेशनों पर फंसे रहे. स्कूल कॉलेज बंद करने पड़े और राज्य को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा.

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार उस दिन महाराष्ट्र में कुल 944 मिमी. (37.17 इंच) बारिश हुई थी. वर्षा जनित घटनाओं में एक हजार से ज्यादा लोगों की जान गई और इस तेज रफ्तार महानगर को दोबारा अपनी चाल पर वापस लौटने में कई हफ्ते लगे.

देश दुनिया के इतिहास में 26 जुलाई की तारीख कई महत्पूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है. इन घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:-

1844: भारत के प्रमुख शिक्षाविद् गुरुदास बनर्जी का जन्म. 1876 : कलकत्ता में इंडियन एसोसिएशन की स्थापना.
1945 : विंस्टन चर्चिल ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया.
1951 : नीदरलैंड ने जर्मनी के साथ युद्ध खत्म किया.1953 : कम्युनिस्ट क्रांतिकारी फ़िदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा की क्रांति की शुरूआत.
1956 : मिस्र ने स्वेज नहर पर कब्ज़ा किया.
1965 – मालदीव ब्रिटेन के कब्जे से स्वतंत्र हुआ.
1974 – फ्रांस ने मुरूओरा द्वीप में परमाणु परीक्षण किया.
1997 : श्रीलंका ने क्रिकेट एशिया कप जीता.
1998 : महानतम महिला एथलीट जैकी जायनर कर्सी ने एथलेटिक्स से सन्यास लिया.
2002 : इंडोनेशिया की एक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति सुहातों के पुत्र को 15 वर्ष कारावास की सज़ा सुनायी.
2005 : मुंबई में अभूतपूर्व बरसात से जनजीवन ठप्प, एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत.
2005 : नासा शटल डिस्कवरी का प्रक्षेपण.
2007 : पाकिस्तान ने परमाणु शक्ति सम्पन्न क्रूज मिसाइल बाबर हत्फ़-7 का सफल परीक्षण किया.
2008 : यूरोपीय वैज्ञानिकों ने सौरमंडल के बाहर एक और नये ग्रह की खोज की.
2008 : गुजरात के अहमदाबाद शहर में 21 धमाके, 56 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा जख्मी.
2012 – सीरिया में हिंसक घटनाओं में एक दिन में करीब 200 लोगों की मौत.
2013 – पाकिस्तान के पराचिनार में बम विस्फोट, 57 मरे.

पिता ने सांप काटने के बाद मृत घोषित की गई बेटी को मौत के मुंह से खींच निकाला

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दुर्गम क्षेत्र में निवास, घर में गरीबी, यातायात के साधन का अभाव, गांव में डॉक्टर की कमी ऐसी स्थिति में विषधर सांप काटने से लड़की बेहोश हो गई । इसके बाद डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। लेकिन बेटी पर प्यार ने पॉकेट में पैसे नहीं होने के बावजूद उसके पिता ने जीवन से संघर्ष किया और बेटी की जान बचा ली । असामान्य धैर्य के पिता की जिद्द को डॉक्टरों ने भी सलाम किया है ।

मनोज मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करते है 
मनोज तिंडोरे अपने परिवार के साथ तलेा\गांव के पास के कान्हे खेड़ में रहते है । उनकी बेटी का नाम ख़ुशी है । मनोज मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करते है। घर में आनंद के वातावरण के बीच रात में सोते वक़्त विषैले सांप ने ख़ुशी को काट लिया। यह बात उसके पिता को पता चली । लेकिन तलेगांव के पास कान्हे खेड़ गांव में उन्हें इलाज के भारी संकट से गुजर रहे थे। ख़ुशी को सरकारी हॉस्पिटल में सही व्यवस्था नहीं होने की वजह से उसे सही इलाज नहीं मिल पाया और ख़ुशी कोमा में चली गई । लेकिन उसके पिता ने उसे बचने की जिद्द नहीं छोड़ी। ख़ुशी को बचाने के लिए जीवन से संघर्ष किया और आखिरकार उसकी जान बचा ली।

यह सांप नाग से 15 गुना अधिक विषैला होता है 
ख़ुशी को मण्यार जाति के बेहद विषैले सांप ने काटा था. यह सांप नाग से 15 गुना अधिक विषैला होता है । काले और नीले रंग वाला यह सांप होता है । ऐसे में सांप काटने पर काफी ज्यादा दर्द होता है और समय पर इलाज नहीं मिलने पर मौत हो जाती है`।
ख़ुशी के पिता ने रात भर कई क्लिनिक के चक्कर लगाए। आखिर में भूषण जगताप-देशमुख नाम के सामाजिक कार्यकर्ता उनके लिए भगवान बनकर आये । भूषण ने उन्हें एक क्लिनिक में ख़ुशी को एडमिट कराने में मदद की । ख़ुशी को पिंपरी चिंचवड़ के स्पर्शक हॉस्पिटल में भर्ती किया गया. करीब 48 घंटे से कोमा में गई ख़ुशी डॉक्टरों दवारा किये गए इलाज से मौत को मात कर होश में आ गई. लेकिन इलाज से ज्यादा ख़ुशी के पिता की मेहनत और दिखाए गए आत्मविश्वास से डॉक्टरों को बल मिला। पहले मृत घोषित की गई ख़ुशी अपने पिता की जिद्द के कारण मौत को मात देकर वापस आ गई।

सामने आई कैंसर पर चौंकाने वाली रिपोर्ट, इन राज्यों की हालत सबसे ज्यादा खराब

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कैंसर ऐसी बीमारी है, जिसका नाम सुनते ही रूह कांप जाती हैं. ये जितनी भयावह बीमारी है, उतनी ही तेजी से फैल भी रही है. भारत में कैंसर मरीजों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है. पिछले वर्षों में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में कैंसर मरीजों की संख्या में तेजी देखी गई थी. हालात काफी चिंताजनक थे. लेकिन अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट में नई तरह की जानकारी सामने आई है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में कैंसर मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ी है. सरकार ने पिछले हफ्ते ही संसद में इस रिपोर्ट को रखा है. इसके मुताबिक 2016 से लेकर 2018 तक उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज पाए गए. इस रिपोर्ट के बाद भारत में कैंसर के लखबढ़ते मामलों के नए पैटर्न का पता चला है.

यूपी और महाराष्ट्र में कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज

आईसीएमआर की रिपोर्ट में 2016, 2017 और 2018 के कैंसर मरीजों के आंकड़े बताए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में 2016 में कैंसर के 2 लाख 45 हजार 231 मामले सामने आए. 2017 में ये बढ़कर 2 लाख 57 हजार 353 हो गए. 2018 में यूपी में कैंसर के मामले बढ़कर 2 लाख 70 हजार 53 हो गए. कैंसर के नए मरीजों में महाराष्ट्र का स्थान दूसरा है. महाराष्ट्र में 2016 में कैंसर के 1 लाख 32 हजार 726 मामले सामने आए. 2017 में ये बढ़कर 1 लाख 38 हजार 271 हो गए. वहीं 2018 में महाराष्ट्र में 1 लाख 44 हजार 32 कैंसर के नए मरीजों के बारे में पता चला.

यूपी और महाराष्ट्र की तुलना में हरियाणा और असम में कैंसर के कम मामले सामने आए. हैरानी की बात है कि बिहार में कैंसर के मरीज कम थे. लेकिन पिछले वर्षों में यहां भी कैंसर के मरीजों में वृद्धि हुई है. बिहार में साल-दर साल सबसे ज्यादा कैंसर के मरीजों में इजाफा हो रहा है. 2016-17 में बिहार में कैंसर के मरीज 5.38 परसेंट की रेट से बढ़े. वहीं 2017-18 में इसमें 5.37 फीसदी की रेट से बढ़ोत्तरी देखी गई.

बिहार जैसे पिछड़े राज्य में कैंसर मरीजों की संख्या में इजाफा चिंताजनक हालात पैदा करते हैं. पिछड़ा राज्य होने की वजह से यहां की स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही खराब हैं. कैंसर के स्पेशलाइज्ड अस्पतालों की कमी है. ऐसे में यहां कैंसर के मरीजों की संख्या का बढ़ना सरकार के सामने मुश्किल हालात पैदा कर सकता है.

राज्यों के लिहाज से कैंसर मरीजों की संख्या बढ़ने का पैटर्न बदला है. 2017 में आईसीएमआर ने ही एक रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक कैंसर के लिहाज से हरियाणा सबसे खराब राज्य साबित होने जा रहा था. हालात इतने बुरे थे कि हरियाणा को लेकर रिपोर्ट में डरावने आंकड़े बताए गए थे. रिपोर्ट में कहा गया था कि 2020 तक देशभर में कैंसर के 17 लाख से भी ज्यादा मरीज होंगे.

2014 के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया गया था कि देशभर के कुल कैंसर मरीजों में 39.6 फीसदी मरीज सिर्फ हरियाणा से आते हैं. दूसरे नंबर पर दिल्ली था जहां 27.3 फीसदी कैंसर मरीज थे. यूपी में 12.7 फीसदी कैंसर मरीज थे.

भारत में कैंसर के मरीज पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़े हैं. एक आंकड़े के मुताबिक पिछले 26 साल में कैंसर के मरीज दोगुने हुए हैं. इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में कैंसर के 14 लाख मरीज थे. महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले बढ़े हैं. ब्रेस्ट कैंसर के 60 फीसदी मामलों में इसकी जानकारी एडवांस्ड स्टेज में आने के बाद पता चलती है.

रिपोर्ट के मुताबिक ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, ओरल कैंसर और लंग कैंसर के मरीज ही कुल कैंसर मरीज के 41 फीसदी हैं. जबकि 100 तरह के कैंसर होते हैं. भारत में होने वाली मौतों में कैंसर दूसरी बड़ी वजह है.