आप कभी-कभी देखते होंगे कि हमारे आस-पास कई सारे कीड़े, मकोड़े घूमते रहते हैं। लेकिन आपने मकड़ी, चीटियां, झींगुर, छिपकली ही घरों में घूमते हुए देखे होंगे इनसे लोग डरते नहीं है, क्योंकि ये हमें और हमारे शरीर को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते और लोगों को भी इन्हें देखने की आदत हो जाती है। लेकिन आज हम आपको जिस कीड़े के बारे में बताने जा रहे हैं, वो इतना खतरनाक है कि उसे छुना भी आपके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
इनदिनों एक खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है जिसमें बताया जा रहा है कि अमिरेका के दक्षिण फ्लोरिडा में एक ऐसा कीड़ा मिला है, जो इंसान के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है। बताया जा रहा है कि इस कीड़े का नाम ‘न्यू गुनिया फ्लैटवॉर्म’है।
ये भी बताया जाता है कि ये कीड़ा विश्व के 100 सबसे खतरनाक जीव में से एक है। बता दें कि ये कीड़ा न सिर्फ मनुष्य की बॉडी को नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि पेड़-पौधे को भी नष्ट कर सकता है।
अभी तक तो ये कीड़ा सनसाइन स्टेट में पाया जा रहा है। लेकिन हाल ही में ऐसा कीड़ा अमेरिका के कई शहरों में भी देखा गया है। यहां जब एक शख्स अपने बगीचे में गया तो उसे गमले के भीतर कुछ इस तरह के कीड़े दिखे बताया जा रहा है कि कोई भी मनुष्य यदि इसके सम्पर्क में आता है तो वो बहुत घातक होता है और इसका इन्फेक्शन बहुत तेजी से फैलता है। इसका जहर इंसान की बॉडी शरीर को खराब कर सकता है।
मिस्र की सभ्यता और संस्कृति दुनिया में सबसे प्राचीन मानी जाती है. यहां समय-समय पर खुदाई के दौरान ऐसी कला-कृतियां मिली हैं, जो हजारों साल पुरानी थीं. इससे वहां की सबसे प्राचीनतम सभ्यता के बारे में दुनिया को जानकारी मिलती है. हाल ही में समुद्र की गहराई में एक रहस्यमयी मंदिर मिला है. इस मंदिर के बारे में कहा जा रहा है कि करीब 1200 साल पुराना है. मंदिर के साथ ही खजाने से लदे हुए नाव भी मिले हैं, जिनसकी कीमत करोड़ों में है.
जानकारी के मुताबिक, मंदिर हेराक्लिओन शहर के उत्तरी हिस्से में मिला है, जिसे मिस्र का खोया हुआ शहर अटलांटिस कहा जाता है. इसकी खोज करने वाले पुरातत्वविदों के मुताबिक, प्राचीन समय में हेराक्लिओन को मंदिरों का शहर कहा जाता था. लेकिन करीब हजार साल पहले आए सुनामी के कारण यह शहर पानी में डूब गया.
अमर उजाला डॉट कॉम के मुताबिक, समुद्र की गहराई में कई प्राचीन इमारतें और मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं, जो करीब 2000 साल पुराने हैं. मिस्र और यूरोप के पुरातत्वविदों ने मिलकर ये अनोखी खोज की है.
पिछले 15 सालों में यहां समुद्र से गोताखोरों ने 64 प्राचीन नाव, सोने के सिक्कों का खजाना, 16 फीट ऊंची मूर्तियां और विशाल मंदिर के अवशेषों को खोजा है.
जानकारी के मुताबिक, मंदिर के साथ-साथ यहां समुद्र में कुछ नावें भी मिली हैं, जिसमें तांबे के सिक्के और ज्वैलरी लदे हुए हैं. ये सिक्के राजा टॉलमी द्वितीय के कार्यकाल यानी तीसरी शताब्दी के हैं.
‘सेक्रेड गेम्स’ की कुकू तो आपको याद ही होगी, जिसके लिए गणेश गायतोंडे पागल था. कुकू का ये ऐतिहासिक किरदार निभाया था एक्ट्रेस कुब्रा सैत ने. इस किरदार को निभाने के बाद हर कोई बस कुब्रा की ही बातें कर रहा था. उन्होंने इस किरदार को इतनी शिद्दत से निभाया कि कईयों ने तो ये समझ लिया कि कुब्रा ट्रांसजेंडर ही हैं लेकिन ऐसा नहीं है. आज कुब्रा अपना 27वां जन्मदिन मना रही हैं. यूं तो कुब्रा ने कई किरदार निभाए हैं लेकिन आज उनके जन्मदिन के मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं कि ‘कुकू’ के किरदार में जान डालने के लिए कुब्रा ने क्या-क्या जतन किए थे.
इस किरदार के बारे में कुक्कू यानी एक्ट्रेस कुब्रा सैत ने खुद एक इंटरव्यू के दौरान बात की थी. उन्होंने बताया, ‘अनुराग कश्यप ने मुझे इस रोल को लेकर एक सलाह दी थी कि मैं किरदार के प्रति ईमानदार रहूं.’ उन्होंने बताया, ‘मैंने इस किरदार को एक ह्यूमन टच के साथ निभाने की कोशिश की. मैं हमेशा किरदार को एक इंसान की तरह देखती हूं. इससे मुझे उनकी सोच समझने में आसानी होती है’.
किरदार को बनाया जानदार
कुब्रा ने बताया, ‘अपना किरदार जानकर मैंने अनुराग सर को फोन किया और कहा कि किताब में तो कुक्कू का जिक्र ही नहीं है. आपने मुझे कौन सा रोल दिया है. इस पर अनुराग सर ने कहा, बुक मत पढ़, उसमें है ही नहीं. किताब में कुक्कू का हल्का सा जिक्र है. वो एक ट्रांसजेंडर है और पेशे से कैब्रे डांसर है. इस किरदार को बेहतरीन तरीके से डेवलप करने के लिए मैं राइटर वसंत नाथ, स्मिता सिंह, वरुण ग्रोवर और मेकर्स को सेल्यूट करती हूं. उन्होंने इस किरदार को यादगार बनाया’.
मेकर्स ने किया ऐसा काम
एक तरफ जहां फिल्मों में ट्रांसजेंडर किरदारों को नेगेटिव, कॉमेडी या हल्के एलिमेंट तक सीमित रखा गया है. वहीं सेक्रेड गेम्स में कुक्कू का मजबूत किरदार दर्शकों को इंप्रेस करने में कामयाब रहा. बल्कि इस रोल ने तो ऐसी सुर्खियां बटोंरी कि लोग उन्हें ट्रांसजेंडर मानने लगे. इस पर भी कुब्रा ने जवाब दिया है.
आसान नहीं था काम
उन्होंने फनी अंदाज में अपने बारे में बताते हुए कहा ‘जब लोग इस बारे में बात करते हैं तो मुझे लगता है कि मेरी तारीफ कर रहे हैं. मैं एक और औरत हूं जिसे आदमी पसंद हैं लेकिन मैंने अपने किरदार से दुनिया को ये मानने के लिए मजबूर कर दिया तो मैं खुद को काफी तेज मानती हूं. इसी तरह मैं स्कूल के दिनों में पूरी ईमानदारी के साथ पेड़ का रोल अदा करती थी जब मैं छह साल की थी’. यानी पेड से लेकर कुकू के किरदार तक कुब्रा ने हर एक रोल को पूरी शिद्दत से निभाया है और वो स्क्रीन पर साफ दिखाई भी दिया है.
अब तक तो आप सिर्फ AC/TV जैसी चीजों को रिमोट से चलाते थे. लेकिन अब वो दिन दूर नहीं जब आप कुत्तों को भी रिमोट से चला सकते हैं. दरअसल, इजराइल की बेन-गुरियन यूनिवर्सिटी में एक ऐसा सिस्टम तैयार किया गया है जो वाइब्रेशन के जरिए कुत्तों के दिमाग तक मैसेज भेजता है. जिस कुत्ते पर इस रिमोट का टेस्ट किया गया उसका नाम ताई है. टेस्टिंग के दौरान ये पाया गया कि डिवाइस के जरिए भेजी गई वाइब्रेशन की भाषा कुत्ता ज्यादा बेहतर और आसानी से समझता है.
दूर से भी कर सकते हैं कंट्रोल टेस्ट किए जाने वाले कुत्ते ताई की उम्र 6 साल है. यह लेब्राडोर और जर्मन शेफर्ड की क्रॉसब्रीड है. ताई रिमोट के इशारे समझ सके इसके लिए उसे खास तरह की जेकेट पहनाई गई. इस जेकेट में लगे सेंसर से ही वाइब्रेशन पैदा होता है. इसी वाइब्रेशन के जरिए ताई को पता चलता है कि उसका मालिक क्या कह रहा है.
मिलिट्री ऑपरेशन में होगा कारगर
रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तरह का सिस्टम मिलिट्री ऑपरेशन के लिए बेहद कारगर साबित होगा. यह उन लोगों के लिए भी फायदेमंद होगा जो चलफिर नहीं सकते हैं. क्योंकि इस डिवाइस की खास बात ही ये है कि इसे दूर से भी संचालित किया जा सकता है.
ऐसे काम करता है सिस्टम दरअसल, इस जैकेट में पीछे और किनारे की तरफ चार छोटे वाइब्रेशन बटन लगाए गए हैं. हर बटन का संकेत अलग-अलग है. इन बटनों में पास आने, दूर जाने, उछने, बैठ जाने के सिग्नल छुपे हैं. इसी हिसाब से ताई को ट्रेनिंग भी दी गई है. यूनिवर्सिटी में रोबोटिक्स लाइब्रेरी के डायरेक्टर प्रो. आमिर शेपिरो के मुताबिक, अब तक की रिसर्च में सामने आया है कि बोलने की अपेक्षा कुत्ते वाइब्रेशन से कम्युनिकेशन को ज्यादा बेहतर समझते हैं. हाल ही इस कॉन्सेप्ट को जापान में आयोजित वर्ल्ड हेप्टिक कॉन्फ्रेंस में पेश किया गया था.
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने निधन से महज महीने भर पहले मौजूदा डीआरडीओ प्रमुख सतीश रेड्डी को दोबारा उपयोग में लाई जा सकने वाली मिसाइल प्रणाली पर काम करने के लिए कहा था. रेड्डी उस वक्त रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार थे.
रेड्डी ने कलाम से हुई मुलाकात को याद करते हुए बताया कि वैज्ञानिक सलाहकार बनने के बाद उन्होंने उनसे (कलाम से) उनके निधन से महज महीने भर पहले उनके आवास पर मुलाकात की थी. कलाम ने दोबारा उपयोग में लाई जा सकने वाली मिसाइलों का विचार दिया. एक ऐसी मिसाइल जो पेलोड ले जा सके, फिर वापस आ जाए और एक बार फिर दूसरा पेलोड ले जाए ‘…इस तरह की प्रणाली पर काम करिए.’
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) प्रमुख ने बताया कि पहली बार बतौर एक युवा वैज्ञानिक वह 1986 में कलाम से मिले थे.
वर्ष 2012 में डीआरडीओ के तत्कालीन प्रमुख वी के सारस्वत ने दूरदर्शन को दिये एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत दोबारा उपयोग में लाई जा सकने वाली मिसाइल प्रणाली विकसित करने की योजना बना रहा है.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने ‘फिर से उपयोग में लाये जा सकने वाले प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी प्रदर्शक’ (आरएलवी-टीडी) का सफल परीक्षण किया है.
लत किसी भी चीज की हो बुरी ही होती है लेकिन आज हम सिगरेट की लत पर बात करेंगे. यह हमारे शरीर में धीरे-धीरे प्रवेश करती है और फिर देखते ही देखते अपनी गिरफ्त में ले लेती है. एक बार जो इंसान इसके घेरे में आ जाता वो इसे पीने के लिए पैसे बहाने लगता है. अगर आप अपने किसी करीबी को इसकी गिरफ्त से बाहर लाना चाहते हैं तो इन चीजों की मदद से आप उनकी यह आदत छुड़ा सकते हैं.
मन में ठानें
जब तक आप खुद नहीं चाहेंगे, कोई और आपका नशा नहीं छुड़ा पाएगा. इसलिए सबसे पहले मन में ठान लें कि आप नशा छोड़ना चाहते हैं. शुरुआत में थोड़ी दिक्कत होगी, लेकिन अपने मन को मजबूत रखें.
अपने स्मोकिंग पार्टनर से दूरी बनाएं
ग्रुप में ही हमें नशे की लत लगती है. जबतक सुट्टा या सिगरेट पीने वाला साथी नहीं मिलता हम एक तय लिमिट में ही सिगरेट पीते हैं. वहीं अगर कुछ लोग मिल गएं तो यह डोज ज्यादा हो जाता है. कभी-कभी आपका मन नहीं भी होता तो दोस्तों के दबाव में आप स्मोकिंग ड्रिंकिंग शुरू कर देते हैं. फिर यह आपके आदत में शुमार हो जाती है. फैमिली व दोस्तों की मदद लें अपने सभी दोस्तों और परिजनों से कह दें कि आपने शराब, सिगरेट या गुटखा छोड़ दिया है. इनके सेवन के लिए आपको मजबूर न करें. अकेले न रहें. फैमिली, खासकर छोटे बच्चें हों तो उनके साथ वक्त बिताएं. पालतू डॉग है तो उसके साथ भी वक्त बिता सकते हैं. जब कभी आपका मन सिगरेट पीने का करे तो मुंह में हरड़ रख लें. इससे आपकी सिगरेट पीने की आदत छूट जाएगी. सिगरेट की लत छुड़ाने के लिए दालचीनी को बारीक पीसकर उसमें शहद मिला लें. जब भी सिगरेट पीने का मन हो तो तैयार किए हुए दालचीनी के मिश्रण का सेवन करें.
सोचिए अगर आप रेस्तरां में खाना खाने पहुंचें और खाना आपकी प्लेट से निकलकर कहीं और चला जाए तो आप क्या करेंगे. कुछ ऐसा ही नजारा फ्लोरिडा के एक रेस्तरां में देखने को मिला है. रेस्तरां में एक महिला ने खाने के लिए ऑर्डर में मीट दिया था. कुछ देर बाद जब ऑर्डर आया तो प्लेट में रखा मीट का पीस प्लेट में हिलने लगा और तेजी से प्लेट से निकलकर टेबल पर आ गया. मामला यहीं नहीं खत्म हुआ. इसके बाद मीट का पीस और आगे बढ़ा और नीचे जमीन पर गिर पड़ा. महिला ने इस पूरे वाकये को कैमरे में कैद किया और फेसबुक पर वीडियो शेयर कर दिया. इस वीडियो को अब तक 1 करोड़ 37 लाख बार देखा जा चुका है.
जानकारी के मुताबिक फ्लोरिडा की रहने वाली रे फिलिप्स कुछ दिन पहले एशियन रेस्टोरेंट में खाना खाने गई थीं. इस दौरान उन्होंने मीट का ऑर्डर दिया था. ऑर्डर में आया मीट अपने आप चलने लगा. मेल ऑनलाइन के मुताबिक इस वीडियो को देखने के बाद कुछ लोगों ने इसे फेक बताया है. वीडियो देखने का बाद लोगों का कहना है कि मीट के पीस को किसी धागे से बांधा गया है और कोई उसे खींच रहा है.
वहीं कुछ लोगों का कहना है कि यह फ्रेश मीट है. फ्रेश मीट तेजी से हिलता है. वहीं, एक और शख्स ने कमेंट किया कि यह मीट जिंदे मेंढक का था, जिसे एशियन देशों जैसे जापान, चीन में खाया जाता है. खाने की शौकीन रे ने अपने फेसबुक पेज पर अपने खाने का एक वीडियो पोस्ट किया है. इस वीडियो को अब तक एक करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका है.
ऐसा पहली बार नहीं है जब इस तरह का कोई वीडियो सोशल मीडिया पर इतनी बार देखा गया हो. इससे पहले भी प्लेट में हिलते नॉन-वेज खाने की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर आ चुके हैं.
एक ताज़ा अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि यौन संबंधों से फैलने वाली संक्रामक बीमारी सिफिलिस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. ये भी खुलासा हुआ है कि एचआईवी से ज़्यादा तेज़ी से ये बीमारी फैल रही है. रोग निवारण एवं नियंत्रण के लिए बने नए यूरोपियन सेंटर के अध्ययन में इस बीमारी को लेकर और भी चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. साथ ही, जो आंकड़े सामने आए हैं उन्हें लेकर विशेषज्ञों में चिंता देखी जा रही है. जानें कि क्या है ये बीमारी और कैसे व क्यों इतनी तेज़ी से फैल रही है.
एक समाचार पोर्टल टुडे ऑनलाइन के मुताबिक गए ज़माने की सिफिलिस बीमारी को दुनिया में भुलाया जा चुका था, लेकिन ये फिर दुनिया भर में वापसी कर चुकी है. सिंगापुर के स्वास्थ्य अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि केवल सिंगापुर जैसे छोटे देश में ही पिछले पांच सालों में हर साल डेढ़ हज़ार नए मरीज़ बढ़ रहे हैं. वहीं, यूरोपियन सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में ये बीमारी अपने न्यूनतम प्रभाव में थी, जबकि इसके बाद के सालों में ये तेज़ी से बढ़ी है और यूरोप में तो स्थिति भयानक हो रही है.
क्या कहते हैं आंकड़े?
यूरोपियन सेंटर यानी ईसीडीसी के मुताबिक साल 2017 में ही सिफिलिस के 33 हज़ार से ज़्यादा नए मरीज़ सामने आए. पूरे यूरोप में ये बीमारी तेज़ी से फैली है और अब तक 2 लाख 60 हज़ार से ज़्यादा प्रमाणित केस सामने आ चुके हैं. 2010 में जहां हर एक लाख लोगों में से औसतन 4.2 लोगों को ये बीमारी होना पाया गया था, 2017 में ये औसत 7.1 देखा गया. यूरोप के 15 देशों में 15 फीसदी मरीज़ों की बढ़ोत्तरी हुई. पांच देशों आइसलैंड, आयरलैंड, यूके, जर्मनी और माल्टा में 100 फीसदी या उससे भी ज़्यादा मरीज़ बढ़े.
सिफिलिस ट्रेपानिमा पैलिडम नाम के बैक्टीरिया के कारण फैलता है.
आइसलैंड के आंकड़े तो ये कह रहे हैं कि सिफिलिस के मरीज़ों की संख्या में 850 फीसदी तक वृद्धि हुई है. इसी समय के दौरान केवल दो देश एस्टोनिया और रोमानिया रहे, जहां मरीज़ों की संख्या घटकर आधी या उससे भी कम रह गई है.
पुरुष ज़्यादा हैं शिकार
सिफिलिस को लेकर आई ईसीडीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की तुलना में पुरुष इस बीमारी के ज़्यादा शिकार हैं. आंकड़ों के हिसाब से 2017 में प्रति लाख पुरुषों में से 12.1 सिफिलिस के मरीज़ हैं, वहीं प्रति लाख में से 6.1 महिलाएं. हालांकि इन आंकड़ों में एक राहत की बात है कि 2005 से बच्चों में पैदाइशी तौर पर इस रोग के पाए जाने की संख्या में कमी आई है. यूरोप के अलावा अमेरिका और जापान जैसी जगहों पर महिलाओं को सिफिलिस होने के मामले बढ़ते दिख रहे हैं.
क्या है ये बीमारी और क्या है इलाज?
सिफिलिस एसटीआई यानी यौन संचरित संक्रमण है, जो ट्रेपानिमा पैलिडम नाम के बैक्टीरिया के कारण फैलता है और इसके लक्षण अलग अलग स्टेजों पर अलग अलग होते हैं. संक्रमित रोगी अगर शुरूआती स्टेज पर है तो बगैर दर्द वाला अल्सर प्रमुख लक्षण है, जो ज़्यादातर गुप्तांगों या होंठों जैसे दूसरे अंगों पर भी हो सकता है. कुछ मामलों में ऐसे अल्सरों में दर्द की शिकायतें भी देखी जा चुकी हैं.
आगे की स्टेज में, पूरे शरीर पर खराशों या लकीरों के निशान दिखते हैं. हथेलियों और तलवों पर ज़ख्म हो जाना आम लक्षण होते हैं. कुछ मरीज़ों में हाथ और पैर में ऐसे ज़ख्म नहीं देखे गए बल्कि खोपड़ी, धड़ और लिम्ब्स पर रैशेज़ पाए गए. अंतिम या खतरनाक स्टेज पर मरीज़ के अंगों पर रोग का हमला होता है. विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि यह संक्रमण इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसके लक्षण कई मामलों में दिखते नहीं हैं लेकिन असुरक्षित यौन संबंधों से यह बीमारी फैलने का खतरा बना रहता है.
इस बीमारी का इलाज आसान भी है और ज़्यादा महंगा भी नहीं है, लेकिन दिक्कत ये है कि कई बार लक्षण न दिखने पर इस बीमारी का पता देर तक चलता ही नहीं है. लेकिन, ध्यान न दिए जाने पर ये बीमारी कठिन स्टेज पर पहुंच जाती है और इसके चलते एचआईवी का खतरा भी बढ़ जाता है. दूसरी ओर, ये बीमारी गर्भ में पल रहे शिशु को प्रभावित करती है और उसे जन्मजात सिफिलिस हो सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता बढ़ाना ही इस संक्रमण से बचाव का सबसे सही रास्ता है.
ईसीडीसी की रिपोर्ट में सिफिलिस का बड़ा कारण समलैंगिक संबंधों को माना गया है.
कारण है सोशल मीडिया?
असुरक्षित यौन संबंधों के कारण फैलने वाले इस संक्रमण पर ईसीडीसी की रिपोर्ट में बड़ा कारण समलैंगिक संबंधों को माना गया है. इसके अलावा टुडे की रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि सोशल मीडिया पर डेटिंग वेबसाइटों के कारण लोग कैज़ुअल सेक्स या कई पार्टनरों के साथ यौन संबंध बनाने की तरफ बढ़े हैं. ये एक बड़ा कारण है, जिससे इस रोग के मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है.
इनके अलावा और भी कारण हैं जैसे एड्स से बचाव के लिए कुछ दवाएं चलन में आ चुकी हैं. इन दवाओं का सेवन करने के बाद सेक्स करने पर एड्स नहीं होता. ऐसे दावों के चलते लोग इन दवाओं का सेवन करने के बाद असुरक्षित तरीके से यानी बगैर कंडोम इस्तेमाल किए यौन संबंध बनाने की तरफ बढ़ रहे हैं, जिसके कारण सिफिलिस जैसे संक्रमण की आशंकाएं बढ़ रही हैं.
गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका, जहां द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की आराधना होती है। आओ जानते हैं इससे जुड़े रहस्य और इतिहास को।
1. पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र तट पर कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम पहले कुशस्थली था।
2. हरिवंश पुराण के अनुसार कुशस्थली के उजाड़ होने के बाद श्रीकृष्ण के आदेश पर मयासुर और विश्वामित्र ने यहां एक भव्य नगर का निर्माण किया जिसका नाम द्वारिका रखा गया।
3. कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्य स्थान भी कहा जाता है।
4. इस नगर में विशालकाय सभा मंडप था। समुद्री व्यापार के लिए बंदरगाह भी था। कहते हैं कि शहर में सोना, रजत और रत्नों के साथ 7,00,000 महल थे। इसके अलावा वनस्पति उद्यान और झील भी थी।
5. जैन सूत्र ‘अंतकृतदशांग’ में द्वारका के 12 योजन लंबे, 9 योजन चौड़े विस्तार का उल्लेख है तथा इसे कुबेर द्वारा निर्मित बताया गया है और इसके वैभव और सौंदर्य के कारण इसकी तुलना अलका से की गई है।
6. बहुत से पुराणकार मानते हैं कि कृष्ण अपने 18 साथी और कुल के साथ द्वारका आए थे। यहां उन्होंने 36 साल तक राज किया। उनके देहांत के दौरान द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई और यादव कुल नष्ट हो गया।
7. यह भी कहा जाता है कि धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी और ऋषि दुर्वासा ने यदुवंश के नष्ट होने का श्राप दिया था जिसके चलते द्वारिका नष्ट हो गई थी।
8. एक मान्यता यह भी है कि यह नगर अरबी समुद्र में 6 बार डुब चुका है और वर्तमान द्वारका 7वां शहर या नगर है जिसको पुराने द्वारिका के पास पुन: स्थापित किया गया है।
9. वर्तमान की द्वारका नगरी आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित है। द्वारकाधीश मंदिर का वर्तमान स्वरूप 16वीं सदी में निर्मित हुआ था। यहां पहले कई मंदिर थे, लेकिन मुगलों ने उन्हें तोड़ दिया।
10. द्वारकाधीश मंदिर के गर्भगृह में चांदी के सिंहासन पर भगवान कृष्ण की श्यामवर्णी चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है। यहां उन्हें ‘रणछोड़जी’ भी कहा जाता है। कहते हैं कि इस मंदिर की जगह पहले निजी महल और हरिगृह था।
11. वर्तमान में द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारिका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है।
12. ‘द हिन्दू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1963 में सबसे पहले द्वारका नगरी का एस्कवेशन डेक्कन कॉलेज पुणे, डिपार्टमेंट ऑफ आर्कियोलॉजी और गुजरात सरकार ने मिलकर किया था। इस दौरान करीब 3,000 साल पुराने बर्तन मिले थे। इसके बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की अंडर वॉटर आर्कियोलॉजी विंग को समंदर में कुछ ताम्बे के सिक्के और ग्रेनाइट स्ट्रक्चर भी मिले थे। इसके बाद में पूरा नगर खोज लिया गया।
रेलवे की सुविधाएं बेहतर करने के लिए सरकार हर संभव कोशिश कर रही है. इंडियन रेलवे में पहली बार टिकट के लिए बायोमीट्रिक सिस्टम का इस्तेमाल होगा. रेलवे मंत्रालय अनारक्षित डिब्बों या जनरल डिब्बों में बायोमीट्रिक सिस्टम से टिकट देने की शुरुआत कर रहा है. इससे यात्रियों को सीट मिलने में आसानी होगी, प्लेटफॉर्म पर टिकट लेने और ट्रेन पकड़ने और असामाजिक तत्वों की मनमानी से भी छुटकारा मिलेगा.ये पायलट प्रोजेक्ट वेस्टर्न रेलवे डिवीजन के मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन और बांद्रा टर्मिनस पर पहले ही शुरू कर दिया गया है. इसके लिए दोनों स्टेशन्स पर 2-2 बायोमीट्रिक मशीन लगाए गए हैं.
कैसे होगा इस्तेमाल? जनरल डिब्बों के लिए टिकट खरीद रहे यात्रियों को बायोमीट्रिक मशीन पर पर अपना फिंगरप्रिंट देना होगा, जिसके बाद उन्हें एक टोकन जेनरेट किया जाएगा. ये टोकन नंबर हर जनरल क्लास के कोच सीटों के नंबर के क्रम में अलॉट किए जाएंगे.
इसके बाद यात्रियों को अपने टोकन नंबर के क्रम में एक लाइन में खड़े होना होगा. एक आरपीएफ स्टाफ एंट्री पॉइंट पर खड़ा होगा जो टोकन का सीरियल नंबर चेक करेगा और पैसेंजर को उसी ऑर्डर में कोच में आने देगा.
ये सिस्टम इन ट्रेनों के जनरल कोचों के लिए काम कर रहा है: > अमरावती एक्सप्रेस (मुंबई सेंट्रल स्टेशन) > जयपुर सुपरफास्ट एक्सप्रेस (मुंबई सेंट्रल स्टेशन) > कर्णावती एक्सप्रेस (मुंबई सेंट्रल स्टेशन) > गुजरात मेल (मुंबई सेंट्रल स्टेशन) > गोल्डेन टेंपल मेल (मुंबई सेंट्रल स्टेशन) > पश्चिम एक्सप्रेस (बांद्रा टर्मिनस) > अमरावती एक्सप्रेस (बांद्रा टर्मिनस) > अवध एक्सप्रेस (बांद्रा टर्मिनस) > महाराष्ट्र संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (बांद्रा टर्मिनस)
रेलवे की एक और नई तैयारी- रसोई गैस की तर्ज पर अब रेलवे में यात्रियों को सब्सिडी छोड़ने का विकल्प मिलेगा. रसोई गैस में सफल रही गिव ईट अप मुहिम अब रेलवे में भी पूरी तरह से लागू करने की तैयारी है. सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक रेल मंत्रालय ऑनलाइन टिकट बुकिंग पर दौरान यात्रियों को सब्सिडी छोड़ने का विकल्प देने जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे सीनियर सिटीजन के लिए दिया गया था. सूत्रों के मुताबिक IRCTC की वेबसाइट पर टिकट खरीदते वक्त सब्सिडी छोड़ने का विकल्प दिया जाएगा. ये यात्री पर निर्भर करेगा कि वो सब्सिडी लेना चाहता है या नहीं. यानी आप अपने रेल सफर की पूरी कीमत चुका सकते हैं.
यात्रियों को किराये 47% सब्सिडी देती है रेलवे-बता दें कि भारतीय रेल मुसाफिरों को किराये पर 47 फीसदी सब्सिडी देती है. सब्सिडी की भरपाई मालढुलाई से होने वाली कमाई से की जाती है. इसके लिए सोशल मीडिया, रेल टिकट के पीछे, ट्रेन के अंदर और प्रिंट विज्ञापनों के जरिए जागरूकता फैलाई जाएगी. इस स्कीम की शुरुआत अगले महीने से हो सकती है.