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ढोड़िया में महिला सुरक्षा को लेकर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

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राजनांदगांव। पुलिस अधीक्षक सुश्री अंकिता शर्मा के निर्देशन में, 09 फरवरी 2026 को जिला राजनांदगांव के ग्राम ढोड़िया में रक्षा टीम द्वारा महिला सुरक्षा के मुद्दे पर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा के प्रति जागरूक करना और उन्हें आत्मरक्षा के लिए प्रेरित करना था।
कार्यक्रम के दौरान महिला आरक्षक रीनू मेश्राम, कौशिल्या साहू, आरक्षक अमित जाटवर और आरक्षक वाहन चालक शेषनारायण सिंह ने महिलाओं को घरेलू हिंसा, साइबर अपराध, महिला सुरक्षा, आत्मरक्षा, बाल श्रम और अन्य महिला संबंधित अपराधों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इसके साथ ही, महिलाओं को नशे से दूर रहने, किसी असहज स्थिति में सही कदम उठाने और भरोसेमंद व्यक्ति से मदद लेने के लिए भी प्रेरित किया गया।
कार्यक्रम में अभिव्यक्ति ऐप के बारे में बताया गया और उपस्थित महिलाओं को इस ऐप को डाउनलोड करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। साथ ही, ऐप में उपलब्ध एसओएस का उपयोग करने की विधि को सरल तरीके से समझाया गया। मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों पर भी महिलाओं को जागरूक किया गया।
इस कार्यक्रम में लगभग 75 महिलाएं उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाना और उन्हें सुरक्षा के प्रति सजग बनाना था, ताकि समाज में एक सुरक्षित और सकारात्मक माहौल का निर्माण हो सके।

यातायात पुलिस की सख्त कार्रवाई, नो पार्किंग में खड़े 30 वाहनों पर जुर्माना

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राजनांदगांव। पुलिस अधीक्षक सुश्री अंकिता शर्मा के निर्देश पर और अति. पुलिस अधीक्षक कीर्तन राठौर के मार्गदर्शन में, यातायात पुलिस ने शहर के विभिन्न क्षेत्रों में अवैध रूप से पार्क किए गए वाहनों के खिलाफ कार्रवाई की।
यातायात प्रभारी निरीक्षक नवरतन कश्यप के नेतृत्व में यह अभियान अग्रवाल ट्रांसपोर्ट तिराहा से लेकर पुराना बस स्टैंड चौक, पोस्ट ऑफिस चौक, रेल्वे स्टेशन रोड, भगत सिंह चौक, महावीर चौक, गुरूद्वारा चौक, नया बस स्टैण्ड, अम्बेडकर चौक, मनोकामना चौक और आरके नगर चौक तक चलाया गया। इन स्थानों पर दोनों ओर अवैध रूप से खड़े वाहनों पर लॉक लगाकर मोटरयान अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत जुर्माना वसूला गया।
इसके अलावा, नो पार्किंग में खड़ी दोपहिया वाहनों को क्रेन से हटाया गया और काले शीशे वाले एक चारपहिया वाहन पर मोटरयान अधिनियम की धारा 100 के तहत 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। कुल मिलाकर 30 वाहनों पर कार्रवाई की गई।
यातायात पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे अपने वाहन केवल निर्धारित पार्किंग स्थलों पर ही खड़े करें और सर्विस रोड जैसे स्थानों पर वाहन न खड़ा करें। पुलिस ने यह भी चेतावनी दी है कि इस तरह की कार्रवाई भविष्य में भी जारी रहेगी ताकि शहर में यातायात सुचारू रूप से चल सके और आमजन की आवाजाही में कोई रुकावट न आए।
साथ ही, शहर के कारोबारियों से आग्रह किया गया है कि वे मालवाहक वाहनों में लोडिंग-अनलोडिंग केवल जिला दंडाधिकारी द्वारा निर्धारित समय के अनुसार ही कराएं।

नगर निगम की सामान्य सभा में 13 विषयों पर चर्चा, 11 सर्वसम्मति से पारित, 2 बहुमत से

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नगर निगम की सामान्य सभा में 13 विषयों पर चर्चा, 11 सर्वसम्मति से पारित, 2 बहुमत से
राजनांदगांव। नगर पालिक निगम की सामान्य सभा की बैठक आज सुबह 11 बजे से निगम के सभागृह में शुरू हुई। बैठक में कुल 13 विषयों पर चर्चा हुई, जिसमें से 11 विषय सर्वसम्मति से और 2 विषय बहुमत से पारित किए गए।

बैठक की शुरुआत राष्ट्रगीत और राज्य गीत से हुई, जिसके बाद एक घंटे का प्रश्नकाल रखा गया। इसके पश्चात, क्रमबद्ध विषयों पर चर्चा हुई और निर्णय लिया गया।

सर्वसम्मति से पारित होने वाले प्रमुख विषयों में लोक सेवा केंद्र से प्राप्त सामाजिक सुरक्षा पेंशन के आवेदन की स्वीकृति, विभिन्न चौराहों के नामकरण, बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान, कर्मचारियों को पेट्रोल भत्ता, और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के संघ के लिए राशि की स्वीकृति शामिल हैं।

नामकरण प्रस्तावों में कई प्रमुख चौराहों के नाम बदलने का निर्णय लिया गया। इनमें महामाया चौक का नाम बदलकर संत शिरोमणी सेन जी महाराज चौक किया गया। इसके साथ ही कौरिनभाठा चौराहे का नाम चित्रांश चौराहा और सिंधी कालोनी के चौराहे का नाम संत बाबा आसूदाराम मार्ग रखने का प्रस्ताव भी पारित किया गया।

इसके अलावा, नगर निगम कर्मचारियों को पेट्रोल भत्ता देने के विषय में संशोधन प्रस्ताव पारित हुआ। वार्ड प्रभारी को 500 रुपये और सफाई दरोगा एवं स्वच्छता निरीक्षक को 1000 रुपये भत्ता देने का निर्णय लिया गया।

निर्माण कार्यों में भी कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। मुख्यमंत्री नगरोत्थान योजना के तहत गंज चौक से कन्हारपुरी तक सड़क चौड़ीकरण और अन्य निर्माण कार्यों के लिए निविदा आमंत्रण की स्वीकृति दी गई। साथ ही नार कन्हैया नाला से जिला अस्पताल तक नाला निर्माण के लिए 350 लाख रुपये की निविदा की पुष्टि की गई।

अंतिम विषय, संपत्तिकर और युक्तिकरण की स्वीकृति से संबंधित था, जिसे बहुमत से पारित किया गया।

बैठक के अंत में, महापौर श्री मधुसूदन यादव ने सभी विषयों पर चर्चा के बाद अंतिम निर्णयों की जानकारी दी। निगम अध्यक्ष श्री टोपेन्द्र सिं और पारस वर्मा ने बैठक का सफल संचालन किया। बैठक के समापन के बाद दिवंगत पार्षदों के परिजनों को दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि दी गई।

बैठक में नेता प्रतिपक्ष श्री संतोष पिल्लेसांसद प्रतिनिधि श्री देवशरण सेन, महापौर परिषद के प्रभारी सदस्य, पार्षद, निगम आयुक्त श्री अतुल विश्वकर्मा, अधिकारी कर्मचारी और पत्रकार बंधु उपस्थित थे।

सामुदायिक पुलिसिंग अंतर्गत जिला स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता का भव्य समापन

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मोहला/मानपुर/अंबागढ़ चौकी। जिला पुलिस मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी द्वारा आयोजित जिला स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता का भव्य समापन आज (07.02.2026) हुआ। प्रतियोगिता का आयोजन 02 से 04 फरवरी 2026 तक जिले के 10 थाना और 01 पुलिस चौकी में सलेक्शन मैचों के रूप में हुआ था, जिसमें कुल 154 टीमों ने भाग लिया। चयन के बाद प्रत्येक थाना/चौकी से 3 महिला और 3 पुरुष टीमों का चयन कर कुल 59 टीमों ने मोहला में आयोजित प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व सांसद श्री अभिषेक सिंह ने कार्यक्रम में शिरकत की। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री यशपाल सिंह (भा. पु. से.), भाजपा जिला अध्यक्ष श्री दिलीप वर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती नम्रता सिंह सहित जिले के कई प्रमुख जनप्रतिनिधि और अधिकारी उपस्थित रहे।

मुख्य अतिथि श्री अभिषेक सिंह ने प्रतियोगिता के फाइनल मैच का शुभारंभ सिक्का उछालकर किया। इस अवसर पर उन्होंने खिलाड़ियों से खेल भावना, अनुशासन और जोश के साथ खेलने की अपील की। उन्होंने कहा, “खेलों से केवल शारीरिक क्षमता नहीं बढ़ती, बल्कि मानसिक स्थिति भी मजबूत होती है।”

पुरस्कार वितरण:
प्रतियोगिता में महिला और पुरुष दोनों वर्गों में निम्नलिखित पुरस्कार दिए गए:

प्रथम पुरस्कार: ₹21,000 नगद, ट्रॉफी, शील्ड और मेडल

द्वितीय पुरस्कार: ₹15,000 नगद, ट्रॉफी, शील्ड और मेडल

तृतीय पुरस्कार: ₹11,000 नगद, ट्रॉफी, शील्ड और मेडल

चतुर्थ पुरस्कार: ₹5,100 नगद, ट्रॉफी, शील्ड और मेडल

फाइनल परिणाम:
महिला वर्ग:

प्रथम स्थान: ग्राम हथरा, थाना खड़गांव

द्वितीय स्थान: ग्राम मरकेली, थाना मानपुर

तृतीय स्थान: ग्राम केसरी टोला, थाना अंबागढ़ चौकी

चतुर्थ स्थान: बसेली, थाना मदनवाड़ा

पुरुष वर्ग:

प्रथम स्थान: जिला कबड्डी संघ, मोहला

द्वितीय स्थान: सी.जी. योद्धा मरारटोला, थाना चिल्हाटी

तृतीय स्थान: ग्राम हथरा, थाना खड़गांव

चतुर्थ स्थान: ग्राम संबलपुर, थाना खड़गांव

इस अवसर पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री यशपाल सिंह और मुख्य अतिथि श्री अभिषेक सिंह ने सभी खिलाड़ियों को बधाई दी और खेल को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर हर संभव सहायता का आश्वासन दिया। कार्यक्रम का समापन सभी थाना प्रभारियों, पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की गरिमामयी उपस्थिति में सफलतापूर्वक हुआ।

शिक्षा को सेवा के रूप में नहीं, बल्कि एक वसूली के रूप में देख रही है भाजपा सरकार : अब्दुल कलाम खान

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राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (माशिमं) द्वारा 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी को लेकर कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस के राष्ट्रीय कोआर्डिनेटर और अल्पसंख्यक विभाग के राजस्थान &ओडिशा प्रदेश प्रभारी अब्दुल कलाम खान ने इस बढ़ोतरी को “छात्र-विरोधी” करार दिया और कहा कि भाजपा सरकार शिक्षा को सेवा के रूप में नहीं, बल्कि एक वसूली के रूप में देख रही है।

कांग्रेस नेता ने कहा, “पांच साल बाद एक साथ परीक्षा शुल्क, आवेदन शुल्क, स्वाध्यायी छात्रों के पंजीयन और अनुमति शुल्क सहित करीब 22 मदों में बढ़ोतरी की गई है। पहले जहां बोर्ड परीक्षा, अंकसूची और प्रायोगिक शुल्क मिलाकर 460 रुपये लिए जाते थे, अब इसे बढ़ाकर 800 रुपये कर दिया गया है। आवेदन शुल्क 80 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये कर दिया गया है।”

अब्दुल कलाम खान ने इस बढ़ोतरी को प्रदेश के किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ा वित्तीय बोझ बताते हुए कहा, “यह बढ़ोतरी ऐसे समय में की गई है जब प्रदेश का किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग पहले से महंगाई की मार झेल रहा है।”

उन्होंने शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव पर निशाना साधते हुए कहा, “मंत्री जी को छात्रों और उनके अभिभावकों की समस्याएं नजर नहीं आ रही हैं, या फिर वे जानबूझकर शिक्षा को केवल अमीरों तक सीमित करना चाहते हैं।”

स्वाध्यायी छात्रों के पंजीयन शुल्क में भी बढ़ोतरी का जिक्र करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा, “स्वाध्यायी छात्रों के पंजीयन शुल्क को 560 रुपये से बढ़ाकर 800 रुपये और राज्य से बाहर के छात्रों के लिए इसे 1540 रुपये से बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया गया है। यह दर्शाता है कि शिक्षा मंत्री पूरी तरह असंवेदनशील हो गए हैं।”

अब्दुल कलाम खान ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह मंचों से “बेटा-बेटी पढ़ाओ” और “नई शिक्षा नीति” के नारे तो लगाती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि परीक्षा शुल्क बढ़ाकर हजारों गरीब छात्रों को पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। “यह फैसला सीधे-सीधे ग्रामीण अंचल, किसान परिवारों और मजदूर वर्ग के बच्चों के सपनों पर हमला है।”

कांग्रेस नेता ने सरकार से मांग की कि माशिमं द्वारा बढ़ाए गए सभी शुल्कों को तत्काल वापस लिया जाए और 2021 से पहले की दरों को ही लागू किया जाए, ताकि विद्यार्थियों के परिवारों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

अकलतरा के जर्वे मंडई-मेला में शामिल हुए शमसूल आलम

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राजनांदगांव। अकलतरा के जर्वे ग्राम में आयोजित मंड़ई-मेला सोमवार रात को सजीव उत्साह से भरा हुआ था। इस आयोजन में अजीत जोगी युवा मोर्चा के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष शमसूल आलम विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनके साथ पूर्व भाजपा विधानसभा प्रत्याशी अकलतरा दिनेश सिंह, कांग्रेस नेता कन्हैया राठौर, कमलकांत यादव, धर्मेंद्र कुर्रे, अजीत जोगी युवा मोर्चा विधानसभा अध्यक्ष अंकू पांडे, गोलू खान, आयुष पाण्डेयए और रोहन केवर्त जैसे अन्य प्रमुख लोग भी उपस्थित रहे।
इस दौरान शमसूल आलम ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, अकलतरा के जर्वे में जब भी आता हूं, यहाँ के लोगों से जो स्नेह और प्यार मिलता है, वह मेरे लिए किसी भी पुरस्कार से बढ़कर है। इस स्नेह और आशीर्वाद के लिए मैं सभी का दिल से आभारी हूं और यह प्रेम जीवनभर मेरी यादों में रहेगा।
उनके संबोधन के बादए कार्यक्रम में आयोजित डांस प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने अपनी कला का अद्भुत प्रदर्शन किया। डांस के दौरान युवाओं की उत्साही और जोशपूर्ण प्रस्तुतियों ने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मेला में अकलतरा के स्थानीय लोग और आसपास के क्षेत्र से आए लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। इस आयोजन ने क्षेत्रीय एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का संदेश दिया, साथ ही स्थानीय प्रतिभाओं को अपनी कला दिखाने का एक बेहतरीन मंच प्रदान किया।

अजीत जोगी युवा मोर्चा के शमसूल आलम ने जांजगीर कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, 15 दिन में कार्यवाही की मांग

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राजनांदगांव। अजीत जोगी युवा मोर्चा के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष शमसूल आलम ने आज अपने समर्थकों के साथ जांजगीर चांपा के कलेक्टर को जिले और ग्राम की मूलभूत समस्याओं का समाधान करने के लिए ज्ञापन सौंपा। इस दौरान जोगी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गंभीर समस्याओं को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।

ज्ञापन में शमसूल आलम ने विशेष रूप से अकलतरा के ग्राम जर्वे में डैम निर्माण के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि “पूर्ववर्ती सरकार में डैम के नाम पर पैसे पास हो चुके थे, लेकिन आज तक इसका काम शुरू नहीं किया गया। इससे ग्रामीणों में आक्रोश है, क्योंकि इसे कृषि कार्यों में सहायक बनाया गया था। लेकिन सरकार की नीयत इससे बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है, जो कि प्रशासन की मानसिकता को दर्शाता है।”

शमसूल आलम ने इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ डॉक्टरों के खिलाफ भी शिकायत की, आरोप लगाते हुए कहा कि शासकीय अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति कम और निजी क्लीनिकों में ज्यादा देखी जाती है, जिससे अस्पतालों की व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। उन्होंने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की बिगड़ती स्थिति की भी जानकारी दी।

ज्ञापन में आबकारी विभाग के सुपरवाइजर और लोकेशन ऑफिसर के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई, क्योंकि इनकी लापरवाही से शराब के ओवर रेटिंग और कोचियागिरी में इजाफा हुआ है। इसके साथ ही महतारी वंदन योजना के तहत अयोग्य लोगों को पैसे मिलने और अवैध परिवहन व खनन के मामलों पर रोक लगाने की भी अपील की गई।

शमसूल आलम ने प्रशासन को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया और कहा कि यदि इन मुद्दों पर कार्यवाही नहीं होती, तो जोगी कांग्रेस उग्र प्रदर्शन करेगी। ज्ञापन सौंपने के बाद अपार कलेक्टर ने जल्द कार्यवाही करने का आश्वासन दिया।

इस अवसर पर शमसूल आलम के साथ जोगी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलकांत यादव, धर्मेंद्र कुर्रे, युवा मोर्चा विधानसभा अध्यक्ष अंकू पांडे, किशोर दास, नवाज कुरैशी, शेर अली, लाला केवर्त, ननकी गुड्डू, रोहन केवर्त, सतीश दास, गुरु महाराज समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और ग्रामवासी उपस्थित रहे।

संपत्ति का सिर्फ 1/3 हिस्सा ही वसीयत कर सकता है मुस्लिम व्यक्ति: छत्तीसगढ़ HC, वक्फ की आड़ में जमीनों पर कब्जा करना भी मुश्किल…

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने गंभीर कानूनी गलती की थी, जब उन्होंने विधवा को उसके वैधानिक हिस्से से पूरी तरह वंचित कर दिया।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (मोहम्मदन लॉ) के तहत संपत्ति की वसीयत को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए किसी को दे सकता है। इससे ज्यादा हिस्सा देने के लिए बाकी कानूनी वारिसों की मृत्यु के बाद स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति जरूरी है। बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अवैध मानी जाएगी। यह फैसला इस्लामी कानून के उस मूल सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसका उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने 2 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कोरबा जिले की एक विधवा जैबुन निशा की अपील को मंजूर करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने गंभीर कानूनी गलती की थी, जब उन्होंने विधवा को उसके वैधानिक हिस्से से पूरी तरह वंचित कर दिया। कोर्ट ने वसीयत के फायदार्थी को संपत्ति का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा देने से इनकार कर दिया।

संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा पूरा मामला क्या था?

यह विवाद कोरबा जिले की रहने वाली 64 वर्षीय जैबुन निशा से जुड़ा है। वह दिवंगत अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं। अब्दुल सत्तार का निधन 19 मई 2004 को हुआ था। उनके नाम पर कोरबा शहर में खसरा नंबर 1045/3 की 0.004 एकड़ (लगभग आठ डिसमिल) जमीन और उस पर बना मकान था। यह उनकी निजी संपत्ति थी।

अब्दुल सत्तार की कोई संतान नहीं थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर (उम्र करीब 27 साल) ने दावा किया कि वह अब्दुल सत्तार का गोद लिया हुआ बेटा है और पूरी संपत्ति उसकी है। सिकंदर ने 27 अप्रैल 2004 की एक वसीयत पेश की, जिसमें कथित तौर पर अब्दुल सत्तार ने पूरी संपत्ति उसके नाम कर दी थी।

सिकंदर ने तहसीलदार के सामने आवेदन देकर राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम जैबुन निशा के साथ संयुक्त रूप से दर्ज करवा लिया। तहसीलदार ने 7 दिसंबर 2004 को दोनों के नाम दर्ज करने का आदेश दिया। जैबुन निशा ने दावा किया कि उन्हें इसकी जानकारी नवंबर 2007 में हुई और उन्होंने वसीयत को फर्जी व अवैध बताया। उनका कहना था कि वसीयत उनकी सहमति के बिना बनाई गई और मुस्लिम कानून के खिलाफ है।

जैबुन निशा ने 2014 में सिविल जज कोरबा के सामने मुकदमा दायर किया। उन्होंने मांगा कि संपत्ति पर उनका अकेला मालिकाना हक घोषित किया जाए और सिकंदर का नाम हटाया जाए। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने 7 फरवरी 2015 को उनका दावा खारिज कर दिया। अपील में दूसरी अतिरिक्त जिला जज कोरबा ने 28 जनवरी 2016 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद जैबुन निशा हाईकोर्ट पहुंचीं। हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2023 को अपील को स्वीकार करते हुए दो महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर सुनवाई की।

दोनों पक्षों की तरफ से पेश की गई दलीलें

जैबुन निशा की ओर से अधिवक्ता पराग कोटेचा ने दलील दी कि मुस्लिम कानून में गोद लेने की कोई मान्यता नहीं है। सिकंदर ने खुद लिखित बयान में स्वीकार किया कि वह अब्दुल सत्तार का सगा बेटा नहीं है। फिर भी उसने राजस्व रिकॉर्ड में खुद को बेटा बताया। वसीयत पूरी संपत्ति की है, जबकि मुस्लिम कानून में बिना वारिसों की सहमति के एक-तिहाई से ज्यादा नहीं दिया जा सकता। जैबुन निशा ने कभी सहमति नहीं दी।

सिकंदर की ओर से अधिवक्ता मीरा अंसारी और अमन अंसारी ने कहा कि अब्दुल सत्तार ने सिकंदर को बचपन से बेटे की तरह पाला था। समाज में भी उसे बेटा माना जाता था। वसीयत स्वेच्छा से बनाई गई थी और दो गवाहों ने इसकी पुष्टि की। जैबुन निशा ने खुद वसीयत सिकंदर को सौंपी थी और कई साल तक चुप रही, जो सहमति मानना चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने विस्तार से दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और रिकॉर्ड का गहन अध्ययन किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही वसीयत की लिखत और गवाहों से साबित हो जाए, लेकिन उसका कानूनी प्रभाव मोहम्मदन लॉ की धारा 117 और 118 के आधार पर जांचना जरूरी है।

कोर्ट ने धारा 117 और 118 का उल्लेख करते हुए कहा-

धारा 117: वारिस को वसीयत तभी वैध है, जब बाकी वारिस मृत्यु के बाद सहमति दें। एक भी वारिस की सहमति से उसका अपना हिस्सा बंध जाता है।

धारा 118: मुस्लिम व्यक्ति अंत्येष्टि और कर्ज चुकाने के बाद बची संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। इससे ज्यादा के लिए वारिसों की मृत्यु के बाद सहमति जरूरी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति स्पष्ट, स्वतंत्र और मृत्यु के बाद की होनी चाहिए। केवल चुप रहना या मुकदमा देर से दायर करना सहमति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सिकंदर ने कोई ठोस सबूत नहीं दिया कि जैबुन निशा ने मृत्यु के बाद स्पष्ट सहमति दी थी। गवाहों के बयान भी केवल वसीयत सौंपने तक सीमित थे, सहमति तक नहीं।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले की मुख्य बात

कोर्ट ने निचली अदालतों की गलती गिनाते हुए तीन मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला-

सबूत का बोझ गलत तरीके से जैबुन निशा पर डाला गया, जबकि सिकंदर पर था कि वह सहमति साबित करे।

भले ही वसीयत वैध मान लें, तो भी सिकंदर को केवल एक-तिहाई हिस्सा ही मिल सकता था। फिर भी निचली अदालतों ने जैबुन निशा का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया, जो कानूनी रूप से गलत था।

मुकदमे में ज्यादा राहत माँगने से वैध हिस्सा नहीं छीना जा सकता।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दिया पुराने फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण पुराने निर्णयों का जिक्र किया-

नूरुल इस्सा बनाम रहमान बी (2001) 3 एमएलजे 141 (मद्रास हाईकोर्ट): कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम व्यक्ति केवल एक-तिहाई संपत्ति ही वसीयत कर सकता है। इससे ज्यादा के लिए वारिसों की सहमति जरूरी है। वारिस को वसीयत बिना सहमति के पूरी तरह अवैध है।

बयाबाई बनाम बयाहाई (एआईआर 1942 बॉम्बे 328): बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि सुन्नी मुस्लिम कानून में दो प्रतिबंध हैं – एक-तिहाई से ज्यादा नहीं और वारिस को बिना सहमति नहीं।

यासिम इमामभाई शेख बनाम हजराबी (एआईआर 1986 बॉम्बे 357): बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिर दोहराया कि एक-तिहाई से ज्यादा की वसीयत बिना सहमति के अमान्य है।

वलशियिल कुन्ही अवुल्ला बनाम ईंगायिल पीटिकायिल कुन्ही अवुल्ला (एआईआर 1964 केरल 200): केरल हाईकोर्ट ने कहा कि बिना सहमति के वारिसों को ज्यादा हिस्सा देने वाली वसीयत अवैध है।

रहुमथ अम्माल बनाम मोहम्मद माइदीन रोउदर (1978) 2 एमएलजे 499 (मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच): कोर्ट ने कहा कि वारिस और गैर-वारिस दोनों को वसीयत में हिस्सा देने पर भी एक-तिहाई की सीमा लागू होती है। वारिस को दिया हिस्सा बिना सहमति के अमान्य रहेगा।

मोहम्मद अशरफ बनाम तबस्सुम (आईएलआर 2014 कर्नाटक 6861): कर्नाटक हाईकोर्ट ने धारा 117 को अनिवार्य बताते हुए कहा कि बिना सहमति के केवल एक-तिहाई ही वैध है।

सुलक्सनी बनाम सत्तार अली (2022 एससीसी ऑनलाइन छत्तीसगढ़ 803): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की ही समन्वय पीठ ने कहा कि बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अमान्य है।

इन सभी फैसलों से हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस्लामी कानून का मूल उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है। ज्यादा वसीयत से वारिसों का नुकसान नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने दोनों महत्वपूर्ण सवालों का जवाब जैबुन निशा के पक्ष में दिया। अपील मंजूर कर ली गई। ट्रायल कोर्ट और अपील कोर्ट के फैसले रद्द कर दिए गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैबुन निशा वैधानिक वारिस होने के नाते संपत्ति में अपना हिस्सा पाने की हकदार हैं।

वसीयत के नाम वक्फ बनाने वाले दावों पर कितना असर?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला मुख्य रूप से वसीयत (विल) पर केंद्रित है, न कि वक्फ पर। मुस्लिम पर्सनल लॉ में वसीयत और वक्फ दो अलग-अलग कॉन्सेप्ट हैं, इसलिए यह फैसला उन मामलों पर सीधे लागू नहीं होगा जहाँ मृत्यु के बाद संपत्ति को ‘वक्फ’ बताकर कब्जा किया जाता है।

वसीयत और वक्फ में मुख्य अंतर

वसीयत मृत्यु के बाद प्रभावी होती है और व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही बिना वारिसों की सहमति के दे सकता है (मोहम्मदन लॉ की धारा 117-118)। वहीं वक्फ जीवित व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला स्थायी दान है, जो अल्लाह के नाम पर धार्मिक या चैरिटेबल कामों के लिए होता है। सुन्नी मुस्लिम लॉ (जो भारत में ज्यादा लागू है) में वक्फ वसीयत से नहीं बन सकता, यह जीवित रहते ही वैध होता है। शिया लॉ में कुछ छूट है, लेकिन सामान्यतः वक्फ मृत्यु के बाद प्रभावी नहीं माना जाता। भारत में वक्फ एक्ट 1995 से यह अलग कानून से नियंत्रित होता है।

फर्जी वक्फ क्लेम के कई मामले सामने आए हैं जहाँ वक्फ बोर्ड या लोग फर्जी दस्तावेज बनाकर संपत्ति पर कब्जा करते हैं, जैसे-

किसानों की जमीन पर, मंदिर की जमीन पर।

कब्रिस्तानों को वक्फ बताना

इसके साथ ही अहमदाबाद में किराया घोटाला या गुजरात में करोड़ों के फ्रॉड जैसे कई उदाहरण हैं। लेकिन ये ज्यादातर जीवित लोगों या बोर्ड की गलत कार्रवाई से जुड़े हैं, न कि मृत्यु के बाद ‘वसीयत के नाम पर वक्फ’ से।

फर्जी वक्फ जैसे मामलों में मदद करेगा ये फैसला?

अगर कोई मृत्यु के बाद फर्जी वसीयत बनाकर संपत्ति को वक्फ बताता है, तो हाईकोर्ट का यह सिद्धांत (एक-तिहाई सीमा और सहमति जरूरी) चुनौती देने में मदद कर सकता है। कोर्ट इसे वसीयत मानकर अवैध घोषित कर सकती है। लेकिन अगर क्लेम शुद्ध वक्फ एक्ट के तहत है (भले फर्जी हो), तो अलग कानून लागू होगा और वक्फ बोर्ड की जाँच या सिविल सूट से लड़ना पड़ेगा। ऐसे फ्रॉड रोकने के लिए वक्फ संशोधन कानून भी चर्चा में हैं। कुल मिलाकर यह फैसला वसीयत वाले विवादों में मजबूत हथियार है, लेकिन शुद्ध वक्फ फ्रॉड के लिए अलग रणनीति चाहिए।

वसीयत की सीमा सख्ती से लागू करने की जरूरत

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मुस्लिम संपत्ति विवादों में एक मिसाल बनेगा। कई मामलों में लोग पूरी संपत्ति वसीयत कर देते हैं, जिससे विधवाएँ या अन्य वारिस परेशान होते हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि वसीयत की सीमा सख्ती से लागू होगी और सहमति के बिना एक-तिहाई से ज्यादा नहीं मिलेगा।

 

दुनिया के सबसे पॉवरफुल 20 देशों में खलबली! मूडीज का अनुमान, भारत बनेगा ग्लोबल इकोनॉमी का ‘बाहुबली’

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ग्लोबल इकोनॉमी में भारत मौजूदा समय का सबसे चमकता हुआ सितारा है. ये बात सिर्फ भारत में ही नहीं कही जा रही है. बल्कि दुनिया की बाकी एजेंसीज भी इस बात पर अपी मुहर लगा रही है. मूडीज की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अगले वित्त वर्ष 2027 में देश की जीडीपी जी20 देशों के मुकाबले में सबसे ज्यादा रह सकती है.

जी20 दुनिया के सबसे पॉवरफुल ग्रुप्स में से एक हैं. जिसमें चीन, अमेरिका और यूरोपीय यनियन भी शामिल हैं. इस ग्रुप में शामिल देशों की ग्लोबल जीडीपी में 85 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी है. अगर ये अनुमान सही निलकता है, तो भारत अगले कुछ सालों में दुनिया की टॉप 3 सबसे बड़ी इकोनॉमीज में शामिल हो सकता है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर मूडीज ने भारत की ग्रोथ को लेकर ऐसा कौन सा अनुमान लगाया है, जिससे दुनिया के बड़े बड़े दग्गिज देश हिल गए हैं.

मूडीज का अनुमान

रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स ने सोमवार को एक रिपोर्ट में कहा कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर आगामी वित्त वर्ष में 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यह घरेलू खपत में मजबूती, नीतिगत उपायों और स्थिर बैंकिंग प्रणाली के दम पर जी-20 अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ेगी. मूडीज ने अपने बैंकिंग सिस्टम आउटलुक रिपोर्ट में कहा कि असेट क्वालिटी मजबूत बनी रहेगी. हालांकि सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) में कुछ दबाव देखने को मिल सकता है. इसके बावजूद, बैंकों के पास लोन नुकसान को झेलने के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद है. रेटिंग एजेंसी ने कहा कि मजबूत व्यापक आर्थिक परिस्थितियों और संरचनात्मक सुधारों के समर्थन से 2026 में बैंकों के लिए परिचालन माहौल मजबूत बना रहेगा.

मूडीज ने क्या कहा

मूडीज ने कहा कि हमारा अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक जीडीपी दर 6.4 प्रतिशत रहेगी जो मजबूत घरेलू खपत एवं नीतिगत उपायों के कारण जी-20 अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज होगी. रेटिंग एजेंसी ने कहा कि सितंबर 2025 में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) का रिफॉर्म और इससे पहले पर्सनल इनकम टैक्स की सीमा बढ़ाए जाने से उपभोक्ताओं की वहन क्षमता सुधरेगी एवं खपत आधारित वृद्धि को समर्थन मिलेगा. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मूडीज का यह अनुमान वित्त मंत्रालय की आर्थिक समीक्षा में जताई गई 6.8-7.2 प्रतिशत की सीमा से कम है. आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष (2025-26) में भारत की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने की संभावना है जो 2024-25 में दर्ज 6.5 प्रतिशत से अधिक है.

बैंकिंग सिस्टम में दम

मूडीज ने कहा कि ​​महंगाई कंट्रोल में रहने और वृद्धि की गति मजबूत बने रहने से वह उम्मीद करता है कि भारतीय रिजर्व बैंक 2026-27 में मौद्रिक नीति में और ढील तभी देगा, जब आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती के संकेत मिलेंगे. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 2025 में अपनी नीतिगत दर में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती कर इसे 5.25 प्रतिशत कर दिया है. मूडीज के अनुसार, समूचे बैंकिंग सिस्टम में लोन ग्रोथ वित्त वर्ष 2026-27 में मामूली बढ़कर 11-13 प्रतिशत रह सकती है जो वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक 10.6 प्रतिशत रही है.

Mughal History: मुगलों तक कैसे पहुंचती थी जापानी चांदी, खजाने को करती थी मालामाल?

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जापान में नई प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के नेतृत्व में उनकी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. यह पहला मौका है जब कोई महिला प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभाल रही है. प्रचंड जीत के बावजूद उन्होंने कहा है कि वे विपक्ष को साथ लेकर अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगी.

इस परिवर्तन को जापान में युगांतकारी रूप में देखा जा रहा है. आमजन से लेकर पूरी दुनिया को नई पीएम से बड़ी उम्मीदें हैं. आइए, इसी संदर्भ को मुगल काल से जोड़ते हैं और जानने का प्रयास करते हैं कि मुगलों के जापान के रिश्ते कैसे थे? ट्रेड की क्या स्थिति थी?

मुग़ल साम्राज्य और जापान के बीच कभी प्रत्यक्ष कूटनीतिक या सैन्य संबंध नहीं रहे, न ही दोनों के बीच किसी सम्राट स्तर की आधिकारिक दूतावासीय यात्राएं दर्ज हैं. फिर भी 16वीं-17वीं शताब्दी में, जब मुग़ल साम्राज्य अपनी शक्ति के शिखर पर था और जापान में टोकुगावा शोगुनात की स्थापना हो चुकी थी, तो समुद्री व्यापार और यूरोपीय ताकतों के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के बीच एक अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण कनेक्शन बना.

समुद्री रास्ते और मध्यस्थ शक्तियां

मुग़लों और जापान के बीच भू मार्ग नहीं था, इसलिए व्यापार का लगभग पूरा तंत्र समुद्री रास्तों पर निर्भर था. इंडियन ओशन, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और पूर्वी एशिया के समुद्रों के साथ साथ कई मध्यस्थ शक्तियां इस कड़ी को जोड़ती थीं.

पुर्तगाली:16वीं सदी की शुरुआत से ही पुर्तगाली व्यापारी भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों तटों पर सक्रिय हो चुके थे. गोवा, दमन दीव, होर्मुज़ और मलक्का पर उनकी पकड़ थी.

डच (हॉलैंड के VOC व्यापारी): 17वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत, बरोडा, कोचीन, नागपट्टनम और बंगाल में फैक्ट्रियाँ बनाईं और दूसरी ओर जापान के नागासाकी बंदरगाह से वे व्यापार करते रहे.

अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी: मुग़ल दरबार से फरमान लेकर सूरत, मद्रास, कलकत्ता जैसे बंदरगाहों पर जमा हो चुके अंग्रेज़ भी धीरे धीरे इस समुद्री नेटवर्क का हिस्सा बने.

एशियाई मध्यस्थ: गुजरात, बंगाल, मलाबार तट, मलक्का और दक्षिण पूर्व एशिया के मुसलमान, हिंदू और चीनी व्यापारी भी वस्तुओं की आवाजाही में अहम कड़ी थे.

जापानी वस्तुएं, विशेष रूप से चांदी (सिल्वर), तांबा (कॉपर), कुछ खास तरह की स्टील की तलवारें और बाद के समय में लाख का सामान और उच्च कोटि की चीनी मिट्टी, इन्हीं यूरोपीय और एशियाई व्यापारिक नेटवर्क के जरिये हिंद महासागर के बाजारों तक पहुंचती थीं. भारत में मुग़ल बंदरगाहों पर इन्हें बदले में भारतीय कपास, रेशम, मसाले, नील और अन्य विलासिता की वस्तुओं के बदले बेचा खरीदा जाता था.

जापानी चांदी और मुग़ल अर्थव्यवस्था

16वीं17वीं सदी में जापान दुनिया के सबसे बड़े चांदी उत्पादक क्षेत्रों में से एक था. इस समय विश्व व्यापार में चांदी ही प्रमुख मुद्रा थी, और एशियाई व्यापार का संतुलन बड़े पैमाने पर जापान और लैटिन अमेरिका की चांदी पर टिका था.

मुग़ल भारत, खासकर अकबर, जहांगीर और शाहजहां के समय, कपास, कपड़े, रेशम, मसालों, अफीम, चीनी और नील का विशाल निर्यातक था. यूरोपीय कंपनियां भारत से इन वस्तुओं को लेने के लिए चांदी लाती थीं, जो अक्सर जापान या अमेरिका की खदानों से आती थी. इस तरह, भले ही मुग़ल दरबार सीधे जापानी व्यापारियों से न जुड़ पाया हो, मगर जापानी चांदी मुग़ल साम्राज्य की नसों में बहते हुए धन का हिस्सा बन चुकी थी.

चांदी बाज़ार में चांदी की यह आमद मुद्रा प्रवाह बढ़ाने, कर वसूली को स्थिर करने और दरबार की खर्चीली जीवनशैली को आधार देने में सहायक थी. इतिहासकार कई बार यह इंगित करते हैं कि एशियाई स्वर्ण युग काफी हद तक वैश्विक चांदी प्रवाह पर निर्भर था, जिसमें जापान का योगदान महत्वपूर्ण रहा.

जापानी वस्तुएं मुग़ल दरबार तक कैसे पहुंचीं?

मुग़ल दरबार में विलासिता, शिल्प और संग्रह का शौक बहुत गहरा था. शाहजहां और जहांगीर के दरबारों में कीमती पत्थरों, दुर्लभ जंतर मंतर, किताबों और विदेशी कलाकृतियों का संग्रह विशेष रूप से प्रसिद्ध था. जापान और पूर्वी एशिया के सामान कई तरह से दरबार तक पहुंचते थे.

यूरोपीय कंपनियों के तोहफ़े: पुर्तगाली, डच और अंग्रेज़, जब मुग़ल सम्राट से व्यापारिक अधिकारों के लिए फरमान मांगते, तो वे उनके सामने दुर्लभ विदेशी वस्तुएं पेश करते. अनोखे हथियार, घड़ियां, दूरबीनें, चीनी मिट्टी के बर्तन, लैक्कर की पेटियां, पेंटिंग्स आदि. इनमें से कई वस्तुएं जापान या चीन से आई होती थीं.

भारतीय समुद्री व्यापारियों के ज़रिये: गुजरात, बंगाल और मलाबार के काफ़ी व्यापारी सीधे या परोक्ष रूप से दक्षिण पूर्व एशिया और फार ईस्ट के व्यापार से जुड़े थे. इनका सामान सूरत, मसुलीपट्टनम, होगली जैसे बंदरगाहों पर उतरता और फिर कारवां के जरिए आगरा, लाहौर या दिल्ली के बाज़ारों और दरबार तक पहुँचा दिया जाता.

मध्य एशियाई और फारसी नेटवर्क: कुछ वस्तुएं फारस (ईरान) और मध्य एशिया के रास्ते भी आती थीं, जहाँ पहले से ही चीनी और जापानी पोरसिलेन और लैक्कर की चीजें प्रतिष्ठित मानी जाती थीं.

इस तरह, मुग़ल दरबार में रखी जाने वाली कई चीनियां, जापानी डिब्बे, या पूर्वी तलवारें सीधे नाम से भले न पहचानी जाती हों, पर उनका मूल स्रोत जापान या उसके नज़दीकी क्षेत्र ही थे.

सांस्कृतिक प्रभाव और पारस्परिक छवि

हालांकि, ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण कम हैं कि मुग़ल इतिहासकारों ने जापान पर विस्तृत टिप्पणी की हो, पर वे चीन, तुर्किस्तान, यूरोप और अन्य क्षेत्रों के बारे में अक्सर लिखते हैं. जापान उस समय इस्लामी दुनिया की मुख्य बौद्धिक धारा से थोड़ा दूर था, इसलिए अरबी फारसी ग्रंथों में उसका उल्लेख सीमित है.

इसके विपरीत, जापानी रिकॉर्ड्स में भी भारत सीधे सीधे कम दिखाई देता है, जबकि वे चीन, कोरिया, पुर्तगाल, नीदरलैंड और स्पेन की गतिविधियों पर अधिक ध्यान देते हैं. लेकिन समुद्री व्यापार के कारण दोनों सभ्यताओं के बीच वस्तुओं, धातुओं और तकनीकों का आदान प्रदान हो रहा था, जो अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक संपर्क की एक रूपरेखा तैयार करता है.

जापान में पहली महिला प्रधानमंत्री के मायने

अब यदि हम आधुनिक जापान की ओर नज़र डालें तो वहां का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा एक अलग ही कहानी कहता है. जापान एक संवैधानिक राजतंत्र है, जहां सम्राट प्रतीकात्मक राज्याध्यक्ष हैं और वास्तविक राजनीतिक सत्ता संसद, प्रधानमंत्री और कैबिनेट के हाथ में होती है. जापान ने पूर्व में कई महिला सम्राटों (Empresses) को देखा है, जैसे सम्राट सुइको, जिटो, गेंशो आदि लेकिन अब तक कोई महिला प्रधानमंत्री नहीं रही. यह स्थिति उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से कुछ अलग सी लगती है जिसमें जापानी समाज ने बौद्ध, शिंतो और सामुराई परंपराओं के बीच स्त्री पुरुष भूमिकाओं को समय समय पर नई व्याख्या दी.

बीते कुछ दशकों में जापान की राजनीति में महिलाएं अधिक सक्रिय हुई हैं, और स्थानीय निकायों, संसद और मंत्रिमंडल के स्तर पर उनकी मौजूदगी बढ़ी है. कई महिला राजनेताओं ने पार्टी नेतृत्व के चुनावों में हिस्सा लिया, कुछ ने रक्षा, विदेश, आंतरिक मामलों जैसे अहम मंत्रालय संभाले. यह सब संकेत देता है कि जापानी समाज और राजनीति धीरे धीरे उस मुकाम की ओर बढ़ रही है जहां किसी दिन एक महिला प्रधानमंत्री का चयन स्वाभाविक घटना की तरह देखा जा रहा है.

इस तरह हम पाते हैं कि मुग़ल साम्राज्य और जापान के बीच का कनेक्शन मुख्य रूप से समुद्री व्यापार, यूरोपीय कंपनियों और एशियाई व्यापारियों के नेटवर्क के माध्यम से बना. जापान की चांदी और कुछ विशेष वस्तुएं, जैसे स्टील, पोरसिलेन और लैक्कर का सामान, इस नेटवर्क से होते हुए मुग़ल भारत तक पहुँचीं और वहाँ की अर्थव्यवस्था तथा दरबारी संस्कृति का हिस्सा बनीं. इस प्रकार, मुग़लों और जापान के ऐतिहासिक संबंधों की यह झलक हमें न सिर्फ अतीत की एक रोचक कहानी सुनाती है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के एशिया में स्त्री नेतृत्व, लोकतंत्र और वैश्विक आपसी निर्भरता के नए अध्यायों की ओर भी संकेत करती है.