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इंटरनेट की आधुनिक दुनिया पूरी तरह से समंदर की गहराइयों में छिपे एक बेहद जटिल नेटवर्क…

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इंटरनेट की आधुनिक दुनिया पूरी तरह से समंदर की गहराइयों में छिपे एक बेहद जटिल नेटवर्क पर टिकी हुई है. जब भी हम कोई ऑनलाइन काम करते हैं, तो हमारा डेटा आसमान से नहीं, बल्कि महासागरों के तल पर फैले लाखों किलोमीटर लंबे फाइबर ऑप्टिक तारों से होकर गुजरता है.

इन तारों को समंदर के खूंखार जीवों और पानी के भारी दबाव से बचाना एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम है. इंसानों की बनाई यह तकनीक शार्क के दांतों और व्हेल की भारी हलचल को नाकाम करते हुए दुनिया को आपस में जोड़े रखती है. चलिए जानें कि इनको शार्क के नुकीले दातों से कैसे बचाया जाता है.

कैसे होते हैं सबमरीन केबल्स?

समुद्र के नीचे बिछी इन खास तारों को सबमरीन केबल्स कहा जाता है. दिखने में यह केबल किसी मोटे पाइप जैसे भारी-भरकम होती हैं, लेकिन इनके बिल्कुल केंद्र में इंसानी बाल जितने महीन कांच के रेशे यानी फाइबर ऑप्टिक्स होते हैं. इन्हीं बारीक रेशों के भीतर से हमारा पूरा इंटरनेट डेटा प्रकाश की रफ्तार से एक देश से दूसरे देश की तरफ दौड़ता है. महासागरों के खाने पानी, भयानक दबाव और नमकीन पर्यावरण के बीच भी यह नाजुक फाइबर पूरी तरह से सुरक्षित रहकर सालों-साल बिना थके लगातार काम करते रहते हैं.

शार्क से कैसे होती है केबल की सुरक्षा?

इन केबल्स को शार्क जैसे जीवों के हमलों से बचाने के लिए उन पर कई परतों वाला मजबूत रक्षा कवच चढ़ाया जाता है. केबल के सबसे बाहरी हिस्से पर स्टील के मजबूत तारों का एक अभेद्य जाल बुना जाता है, जिसके ऊपर वॉटरप्रूफ पॉलीथीन की खास जेली की कोटिंग की जाती है. शार्क को अक्सर केबल्स ते आसपास पैदा होने वाले बेहद हल्के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड से खिंचाव महसूस होता है, जिससे वे इसे काटने की कोशिश करती हैं. मगर केबल की यह फैलादी परत शार्क के नुकीले दांतों को भीतर के मुख्य तारों तक पहुंचने ही नहीं देती है.

जहाजों के लंगर और मछली के जालों से कैसे रखते हैं सुरक्षित?

उथले पानी या तटीय इलाकों में समुद्री जीवों के अलावा इंसानी गतिविधियों जैसे जहाजों के भारी लंगर और मछली पकड़ने वाले जालों का सबसे बड़ा खतरा होता है. इस जोखिम से निपटने के लिए केबल्स को समुद्र की खुली सतह पर छोड़ने के बजाय रोबोटिक हलों की मदद से समंदर के तल के अंदर करीब एक से तीनमीटर तक गहराई में दफना दिया जाता है. गहरे समुद्र में, जहां पानी कई हजार मीटर गहरा होता है और इंसानी दखल या जीवों का खतरा न के बराबर होता है, वहां केबल्स को सीधे बिछा दिया जाता है.

कैसे होता है समुद्री केबल बिछाने का काम?

किसी भी समुद्री रास्ते पर केबल बिछाने का काम बेहद सूझबूझ और सटीक योजना के साथ किया जाता है. केबल डालने से पहले आधुनिक सोनार तकनीकों और पानी के अंदर चलने वाले रिमोट कंट्रोल वाहनों की मदद से पूरे समुद्री रास्ते का एक-एक इंच का नक्शा तैयार किया जाता है. इस प्रक्रिया में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि केबल का रास्ता किसी नुकीली चट्टान, सक्रिय ज्वालामुखी या बेहद संवेदनशील समुद्री जीवों के प्राकृतिक आवास के बीच से होकर न गुजरे, जिससे केबल हमेशा के लिए सुरक्षित रहे.

कौन से इसे सुरक्षित रखने का जिम्मेदार?

इन केबल्स को सुरक्षित रखने और पूरे इंटरनेट सिस्टम को चालू रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी दुनिया की बड़ी टेलीकॉम और टेक कंपनियों जैसे गूगल, मेटा और टाटा कम्युनिकेशंस के वैश्विक संगठनों की होती है. इसके अलावा इंटरनेशनल केबल प्रोटेक्शन कमेटी इस पर पूरी निगरानी रखती है. अगर कभी किसी प्राकृतिक आपदा या दुर्घटना की वजह से केबल को नुकसान पहुंचता भी है, तो तुरंत अत्याधुनिक केबल रिपेयर शिप्स को समंदर में रवाना किया जाता है, जो पानी के नीचे से खराब हिस्से को निकालकर उसे कुछ ही देर में ठीक कर देते हैं.

पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे मानव निर्मित मलबे की बढ़ती मात्रा दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक गंभीर चिंता…

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पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे मानव निर्मित मलबे की बढ़ती मात्रा दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक गंभीर चिंता बन चुकी है. निष्क्रिय सैटेलाइट, छोड़े गए रॉकेट चरण और टूटे हुए अंतरिक्ष यान के घटक काफी तेज रफ्तार से ग्रह के चक्कर लगा रहे हैं.

इससे टकराव की शंका बढ़ रही है जो संचार प्रणाली को बाधित कर सकती है. साथ ही यह अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकती है और कुछ मामलों में मलबे को वापस पृथ्वी पर भी भेज सकती है.

केसलर सिंड्रोम का बढ़ता खतरा

सबसे बड़ी चिंताओं में से एक केसलर सिंड्रोम की संभावना है. यह सिद्धांत नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड केसलर द्वारा 1978 में प्रस्तावित किया गया था. इसके मुताबिक जैसे-जैसे कक्षा में मलबे की मात्रा बढ़ेगी वस्तुओं के बीच टकराव से और भी ज्यादा टुकड़े पैदा होंगे. ये नए टुकड़े आगे की टक्करों को ट्रिगर कर सकते हैं. इससे एक ऐसी प्रतिक्रिया हो सकती है जो पृथ्वी की कक्षा को और भी ज्यादा खतरनाक मलबे से भर देगी.

रोजमर्रा की सेवा बाधित हो सकती है

अंतरिक्ष मलबा उन सैटेलाइट के लिए सीधा खतरा पैदा कर सकता है जो उन कई सेवाओं का समर्थन करते हैं जिन पर लोग हर दिन भरोसा करते हैं. अगर सक्रिय उपग्रह मलबे से टकराते हैं तो जीपीएस नेवीगेशन, इंटरनेट कनेक्टिविटी, टेलीविजन प्रसारण और मोबाइल संचार के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली बाधित हो सकती है. मौसम उपग्रह भी असुरक्षित हैं और उनके खराब होने से चक्रवातों की निगरानी करने और प्राकृतिक आपदाओं की सटीक भविष्यवाणी करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

क्या अंतरिक्ष का मलबा वापस धरती पर गिर सकता है?

वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि अंतरिक्ष मलबे के पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश करने का खतरा बढ़ रहा है. स्टडी से यह पता चलता है कि व्यस्त हवाई रास्तों पर मलबा गिरने की संभावना धीरे-धीरे बढ़ रही है. यहां तक कि किसी विमान की खिड़की या फिर इंजन से टकराने वाली छोटी वस्तु भी गंभीर विमानन खतरा पैदा कर सकती है.

ऑस्ट्रेलियाई तटों पर बड़े रॉकेट घटकों की खोज और केन्या के गांव में पाए जाने वाले तथाकथित स्पेस रिंग्स सहित हाल ही में हुई घटनाओं ने इस बात पर रोशनी डाली है कि कुछ अंतरिक्ष मलबे पहले से ही पृथ्वी पर वापस आ रहे हैं.

बढ़ती समस्या के पीछे की संख्या

अंतरिक्ष मलबे के पैमाने का विस्तार जारी है. वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि 13000 टन से ज्यादा मानव निर्मित मलबा फिलहाल पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है. 10 सेंटीमीटर से बड़ी 30000 से ज्यादा वस्तुओं को सक्रिय रूप से ट्रैक किया जाता है. इसी के साथ 1 सेंटीमीटर से बड़े 10 लाख से ज्यादा टुकड़े कक्षा में रहते हैं. ये छोटे टुकड़े ज्यादा खतरनाक होते हैं क्योंकि इनका पता लगाना मुश्किल होता है.

IND vs ENG 4th T20: जानिए आज भारत बनाम इंग्लैंड चौथे T20 में कैसा रहेगा…

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भारत बनाम इंग्लैंड चौथा टी20 मैच आज खेला जाएगा. श्रेयस अय्यर एंड टीम के लिए ये मुकाबला करो या मरो वाला है, हालांकि टीम इंडिया वैसे भी सीरीज जीत नहीं सकती. सीरीज के बचे दोनों मैच जीतकर भारतीय टीम इसे ड्रा पर खत्म कर सकती है, लेकिन अगर कोई मैच बारिश से धुला तो इंग्लैंड सीरीज जीत जाएगी.

जानिए आज के मैच में क्या बारिश की संभावना है, मौसम कैसा रहेगा?

कहां है IND vs ENG चौथा T20?

भारत बनाम इंग्लैंड चौथा टी20 मैच ब्रिस्टल के काउंटी ग्राउंड पर खेला जाएगा. इस ग्राउंड पर 2018 में भारत ने अपना एकमात्र टी20 मैच खेला था, जिसमें इंग्लैंड को 7 विकेट से हराया था. इस ग्राउंड पर 7 टी20 इंटरनेशनल मैच हुए हैं, जिसमें से 4 बार लक्ष्य का पीछा करने वाली टीम जीती है और 3 बार पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम.

कितने बजे से शुरू होगा IND vs ENG 4th T20?

ब्रिस्टल के समयनुसार मैच शाम को 5:30 बजे शुरू होगा, टॉस 5 बजे होगा. भारतीय समयनुसार भारत बनाम इंग्लैंड चौथा टी20 रात 10 बजे से शुरू होगा, 9:30 बजे टॉस होगा.

IND vs ENG 4th T20 में कैसा रहेगा मौसम?

मौसम के लिहाज से भारत के लिए अच्छी खबर है, आज ब्रिस्टल में बारिश की संभावना बहुत कम है. टॉस के समय तापमान 32 डिग्री सेल्सियस तक रहेगा और बारिश की संभावना नहीं है. हवाएं भी 10 km प्रति घंटे की रफ्तार से ही चलेंगी, जो बल्लेबाजों के लिए राहत भरी खबर है. हालांकि दूसरी पारी के दौरान यहां बारिश की संभावना है, लेकिन सिर्फ 5 प्रतिशत. तापमान भी घटकर 28 डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है, लेकिन हवाएं तेज नहीं चलेंगी.

भारतीय स्क्वॉड

श्रेयस अय्यर (कप्तान), संजू सैमसन (विकेटकीपर), ईशान किशन (विकेटकीपर), अभिषेक शर्मा, वैभव सूर्यवंशी, अक्षर पटेल, प्रसिद्ध कृष्णा, वाशिंगटन सुंदर, शिवम दुबे, वरुण चक्रवर्ती, अर्शदीप सिंह, तिलक वर्मा, रवि बिश्नोई, सूर्यांश शेडगे, हर्षित राणा, प्रिंस यादव.

इंग्लैंड का स्क्वॉड

लियाम डॉसन, आदिल रशीद, जोस बटलर (विकेटकीपर), जोफ्रा आर्चर, ल्यूक वुड, साकिब महमूद, सैम करन, फिल साल्ट (विकेटकीपर), जोश टंग, हैरी ब्रुक (कप्तान), टॉम बैंटन, विल जैक्स, जॉर्डन कॉक्स (विकेटकीपर), जेम्स कोल्स, जैकब बेथेल, रेहान अहमद, सोनी बेकर.

अगर E-10 गाड़ी में डाला E-25 पेट्रोल तो क्या होगा असर, गड़बड़ी पर कहां कर सकते हैं शिकायत?

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E-25 Petrol Effects : भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की प्रक्रिया लगातार बढ़ रही है. सरकार देश में E20 को बढ़ावा दे रही है, इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, ईंधन की लागत घटाना और इथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ाना है.

हालांकि, E20 लागू होने के बाद पुराने पेट्रोल वाहनों ने माइलेज कम होने और मेंटेनेंस बढ़ने जैसी शिकायतें भी की हैं.

ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर भारत में E25 पेट्रोल लागू होता है, तो क्या E10 के लिए बनी कारें और बाइक इसे सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल कर पाएंगी? साथ ही क्या इससे इंजन, माइलेज और गाड़ी की उम्र पर असर पड़ेगा. तो आइए जानते हैं कि अगर E-10 गाड़ी में E-25 पेट्रोल डाल दिया जाए तो क्या असर होगा और अगर कोई गड़बड़ी होती है तो उसकी शिकायत कहां कर सकते हैं.

E10 गाड़ी में E25 पेट्रोल

अगर आपकी कार या बाइक केवल E10 पेट्रोल के हिसाब से बनाई गई है, तो लंबे समय तक E25 पेट्रोल इस्तेमाल करने से दिक्कतें बढ़ सकती हैं. ऐसी गाड़ियां अधिकतम 10 प्रतिशत इथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए डिजाइन की गई हैं. ऐसे में 25 प्रतिशत इथेनॉल वाला ईंधन इस्तेमाल करने से फ्यूल सिस्टम के उन पार्ट्स पर ज्यादा असर पड़ सकता है, जो इतनी ज्यादा इथेनॉल मात्रा के लिए तैयार नहीं हैं.

पहले भी E20 को लेकर सामने आई थीं शिकायतें

जब भारत में E20 पेट्रोल का इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कई पुराने पेट्रोल वाहनों के मालिकों ने माइलेज कम होने और मेंटेनेंस खर्च बढ़ने की शिकायत की. नागरिक सहभागिता मंच LocalCircles के देशभर में किए गए एक सर्वे के अनुसार, 2023 से पहले बनी पेट्रोल गाड़ियों के 66 प्रतिशत मालिकों ने बताया कि E20 पेट्रोल आने के बाद उनकी गाड़ी का माइलेज 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हो गया. इससे पहले किए गए इसी तरह के सर्वे में यह आंकड़ा 45 प्रतिशत था.

अगर कोई गड़बड़ी होती है, तो उसकी शिकायत कहां कर सकते हैं?

  1. पेट्रोल पंप पर शिकायत दर्ज करें – अगर कोई गड़बड़ी होती है तो सबसे पहले उसी पेट्रोल पंप के शिकायत रजिस्टर में अपनी शिकायत लिखें. हर पेट्रोल पंप पर यह रजिस्टर रखना जरूरी होता है.
  2. संबंधित तेल कंपनी से संपर्क करें – अगर पेट्रोल पंप पर आपकी समस्या का समाधान नहीं होता, तो इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) या हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी संबंधित तेल कंपनी के टोल-फ्री नंबर या आधिकारिक वेबसाइट पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं.
  3. नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन पर शिकायत करें – आप राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर कॉल करके भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं. इसके अलावा NCH, UMANG ऐप, CPGRAMS और MoPNG e-Seva जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

मुनाफे में होने के बाद भी क्यों Cost Cutting कर रहीं बड़ी MNC कंपनियां? ये है असली वजह…

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MNC Companies Cost Cutting : अब कॉर्पोरेट की दुनिया तेजी से बदल रही है. आज दुनिया की कई बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां शानदार मुनाफा कमाने के बाद भी कॉस्ट कटिंग कर रही हैं और कर्मचारियों की संख्या भी घटा रही हैं.

कंपनियों की रणनीति अब पहले जैसी नहीं रही, अब केवल कमाई बढ़ाना ही गोल नहीं है, बल्कि खर्च को कंट्रोल करना, कामकाज को ज्यादा आसान बनाना और फ्यूचर की तकनीकों में निवेश बढ़ाना भी उतना ही जरूरी हो गया है.

यही वजह है कि कई कंपनियां पुराने और ज्यादा कर्मचारियों वाले विभागों में खर्च कम कर रही हैं, जबकि उसी पैसे को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग, ऑटोमेशन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि मुनाफे में होने के बाद भी बड़ी MNC कंपनियां क्यों कॉस्ट कटिंग कर रही हैं.

मुनाफा होने के बाद भी क्यों हो रही है कॉस्ट कटिंग?

विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियां अब पूरे कारोबार में कटौती नहीं कर रहीं, बल्कि अपने खर्च करने के तरीके बदल रही हैं. कई कंपनियां उन विभागों से पैसा और कर्मचारियों को हटा रही हैं जिनकी फ्यूचर में जरूरत कम मानी जा रही है और उसी संसाधन को उन क्षेत्रों में लगा रही हैं जहां आने वाले सालों में ज्यादा ग्रोथ हो सकती है. ऐसे में कोई कंपनी एक तरफ बिक्री और मुनाफा बढ़ा सकती है, वहीं दूसरी तरफ कुछ टीमों, विभागों या कार्यालयों को बंद भी कर सकती है. इसका मतलब यह माना जाता है कि कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल को बदल रही हैं.

2026 में कंपनियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता क्या है?

अमेरिका में 2026 के लिए कंपनियों की रणनीति को लेकर किए गए सर्वे बताते हैं कि अब नियोक्ताओं का सबसे बड़ा फोकस लागत को कंट्रोल करना है. सर्वे के अनुसार, 2026 में कंपनियों की दो सबसे बड़ी प्राथमिकताएं बिजनेस के लिए बेनिफिट्स की लागत कम करना और कर्मचारियों पर बेनिफिट्स का वित्तीय बोझ घटाना है. पहले कंपनियां कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए ज्यादा सुविधाएं, लचीली वर्क पॉलिसी और बेहतर वेतन पर जोर दे रही थीं, लेकिन अब उनका ध्यान खर्च कम करने और वित्तीय अनुशासन पर ज्यादा है.

कंपनियां खर्च कम करने पर इतना जोर क्यों दे रही हैं?

कई आर्थिक कारण इस बदलाव के पीछे जिम्मेदार हैं. जिसमें सबसे बड़ा कारण हेल्थकेयर और कर्मचारी फायदों की बढ़ती लागत है. रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026 में कर्मचारियों के हेल्थ बेनिफिट्स पर कंपनियों का खर्च लगभग 6.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. अगर कंपनियां लागत कम करने के कदम नहीं उठातीं तो यह बढ़ोतरी करीब 9 प्रतिशत तक पहुंच सकती थी. इसके अलावा महंगाई, ऊंची ब्याज दरें, कंपनी के लिए निवेश या फंड जुटाना मुश्किल होना और दुनियाभर में आर्थिक हालात को लेकर चिंता ने भी कंपनियों को खर्च पर कंट्रोल रखने के लिए मजबूर किया है.

कॉस्ट कटिंग का कर्मचारियों पर क्या असर पड़ रहा है?

जब कंपनियां अपने खर्च घटाती हैं तो सबसे पहले इसका असर कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं पर दिखाई देता है. कई कंपनियां नई भर्तियां रोक रही हैं, बोनस कम कर रही हैं, बेनिफिट्स सीमित कर रही हैं और कर्मचारियों को फिर से ऑफिस बुलाने की नीति अपना रही हैं. ऐसे बदलावों का असर खासकर उन कर्मचारियों पर ज्यादा पड़ता है जो बेहतर वेतन और करियर ग्रोथ को प्राथमिकता देते हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार कम संसाधनों में ज्यादा काम करने का दबाव कर्मचारियों में तनाव और बर्नआउट भी बढ़ा सकता है.

Luxury Car Sales India 2026: भारत में लग्जरी कारों की बंपर डिमांड…

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पिछले कुछ सालों में भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट तेजी से ऊपर बढ़ रहा है. ऑटोमोबाइल बाजार में केवल अब नॉर्मल गाड़ियां ही नहीं बल्कि लग्जरी कारों के ग्राफ भी ऊपर गए हैं.

बता दें कि, हाल ही में साल 2026 के पहले 6 महीने के आंकड़े सामने आएं हैं. जिसे देख सभी को हैरानी हुई है. क्योंकि, भारत में लग्जरी कारें इस साल जमकर बिकी हैं.

लग्जरी गाड़ियों में मर्सिडीज-बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी बड़ी कंपनियों ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. तो चलिए जानतें हैं कि, कौन सी लग्जरी कार की सेल ज्यादा हुई है और भारत में लग्जरी गाड़ियों की डिमांड क्यों बढ़ती जा रही है.

मर्सिडीज ने मचाया धमाल

आपको बता दें कि, लग्जरी कार मार्केट में हमेशा से धमाल मचाने वाली मर्सिडीज-बेंज इंडिया ने इस साल के पहले छह महीनों में अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया है. कंपनी ने जनवरी से जून 2026 के बीच पूरे 9,768 गाड़ियां बेची हैं. जो पिछले साल के मुकाबले 9 परसेंट की ग्रोथ हुई है.

इतना ही नहीं अप्रैल से जून की तिमाही में मर्सिडीज ने 4,637 कारें बेचकर नया रिकॉर्ड बनाया है. रिपोर्ट में सामने आया है कि, कंपनी के सबसे महंगे मॉडल्स जैसे मेबैक और एएमजी सीरीज की डिमांड में 20 परसेंट से ज्यादा का उछाल आया है.

बीएमडब्ल्यू ने इलेक्ट्रिक सेगमेंट में मचाया गदर

इस साल मर्सिडीज को कड़ी टक्कर देते हुए बीएमडब्ल्यू ग्रुप इंडिया ने भी अपनी बिक्री में 17 परसेंट की जबरदस्त ग्रोथ हासिल की है. कंपनी ने साल के पहले छह महीनों में रिकॉर्ड 9,075 कारें सेल की हैं. बता दें कि, ऐसा माना जा रहा है कि बीएमडब्ल्यू की इस तूफानी रफ्तार के पीछे सबसे बड़ा हाथ उसकी इलेक्ट्रिक गाड़ियों का है.

आज के समय में बीएमडब्ल्यू की बिकने वाली हर चौथी कार इलेक्ट्रिक है. जिससे कंपनी लग्जरी ईवी मार्केट में 69 परसेंट हिस्सेदारी के साथ नंबर वन बन चुकी है. इसके अलावा कंपनी की लंबी व्हीलबेस वाली सेडान और एसयूवी कारों को भी लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

क्यों बढ़ गई भारत में महंगी गाड़ियों की मांग?

आपको यह बता दें कि इस बंपर सेल के पीछे का सबसे बड़ा कारण है देश के लोगों की बदलती लाइफस्टाइल और बढ़ती आमदनी. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करोड़पति परिवारों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है, जिससे महंगी और आलीशान गाड़ियों को स्टेटस सिंबल के तौर पर देखा जा रहा है.

इसके अलावा कंपनियों की बेहतरीन प्रोडक्ट स्ट्रेटजी लगातार नए मॉडल्स का लॉन्च होना और ग्राहकों का नई टेक्नोलॉजी की तरफ झुकाव होना भी इस रिकॉर्ड बिक्री की मुख्य वजह है. आजकल अब लोग सिर्फ गाड़ी नहीं बल्कि एक प्रीमियम और आलीशान ड्राइविंग एक्सपीरियंस खरीदना चाहते हैं.

Human Brain: कितने जीबी का होता है इंसान का दिमाग….

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वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि इंसानी दिमाग की स्टोरेज क्षमता लगभग 2.5 पेटाबाइट यानी कि 2.5 मिलियन जीबी है. यह लगभग 3 मिलियन घंटे का एचडी वीडियो स्टोर करने के लिए काफी है. यह लगातार 340 साल से ज्यादा समय तक चलने वाले वीडियो के बराबर है.

दिमाग में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं. इसी के साथ हर न्यूरॉन हजारों कनेक्शन बनाता है. इन कनेक्शन को सिनेप्स कहा जाता है. ये नेटवर्क काफी बड़ी मात्रा में जानकारी को स्टोर करने और प्रोसेस करने में जिम्मेदार होते हैं.

फिक्स्ड स्टोरेज वाले कंप्यूटर के उलट जैसे-जैसे हम सोचते, सीखते और अनुभव प्राप्त करते हैं दिमाग लगातार नए न्यूरल कनेक्शन बनाता रहता है. यह क्षमता इसे समय के साथ अपनी प्रोसेसिंग और मेमोरी क्षमता को बढ़ाने में मदद करती है.

इतने शानदार प्रदर्शन के बावजूद भी इंसानी दिमाग सिर्फ 20 वॉट बिजली पर काम करता है. यह लगभग एक छोटे लाइट बल्ब के बराबर है. इसकी तुलना में आधुनिक सुपर कंप्यूटर को मुश्किल कैलकुलेशन करने के लिए मेगावाट बिजली की जरूरत होती है.

दिमाग मेमोरी, भावना, रचनात्मक, चेतना और अनुकूलन क्षमता को एक साथ मिलाता है और साथ ही सांस लेने, दिल की धड़कन, देखने और सोचने के काम को भी कंट्रोल करता है. दूसरी तरफ सुपर कंप्यूटर सिर्फ इंसानों द्वारा दिए गए डेटा और निर्देशों के आधार पर ही काम कर सकते हैं.

स्टोरेज भर जाने पर क्रैश होने के बजाय दिमाग समय के साथ कम जरूरी यादों को कमजोर कर देता है और उन पर नई जानकारी लिख देता है. यह अनोखी प्रक्रिया नई और ज्यादा जरूरी जानकारी के लिए जगह बनाने में मदद करती है.

नितिन गडकरी ने बुधवार को केंद्र के इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम का ज़ोरदार बचाव…

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केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को केंद्र के इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम का ज़ोरदार बचाव किया। उन्होंने हितों के टकराव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस पॉलिसी से गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं हुआ है।

उन्होंने आलोचकों को चुनौती दी कि वे E20 फ्यूल से किसी पेट्रोल गाड़ी को नुकसान पहुंचने का सबूत पेश करें। साथ ही, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस पहल का मकसद फ्यूल का आयात कम करना, साफ़-सुथरे फ्यूल को बढ़ावा देना और किसानों की आय बढ़ाना है। गडकरी ने उन आरोपों को खारिज कर दिया कि इथेनॉल प्रोग्राम में उनका कोई निजी हित है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार का चीनी का कारोबार सरकार की इथेनॉल पॉलिसी से पहले से चल रहा है और इथेनॉल प्रोडक्शन में उनकी हिस्सेदारी न के बराबर है।

उन्होंने कहा कि मुझे इथेनॉल पॉलिसी से कोई फायदा नहीं होता। इथेनॉल प्रोडक्शन में मेरी हिस्सेदारी सिर्फ़ 0.07 प्रतिशत है। इतनी कम हिस्सेदारी के साथ, किसी बड़े आर्थिक फायदे का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने उन दावों को खारिज कर दिया कि उन्हें इथेनॉल प्रोग्राम से कोई फायदा होने वाला था।

हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट) के आरोपों को खारिज करते हुए गडकरी ने कहा, यह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है कि मैंने अपने फायदे के लिए इथेनॉल पॉलिसी बनाई। 0.07 प्रतिशत हिस्सेदारी वाला व्यक्ति निजी फायदे के लिए देश की इथेनॉल पॉलिसी को प्रभावित नहीं कर सकता।

मंत्री ने कहा कि भारत अभी लगभग 550 इथेनॉल बनाने वाली यूनिट्स के ज़रिए हर साल करीब 1,500 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन करता है, जिसमें उनका हिस्सा सिर्फ़ 0.07 प्रतिशत है।

गडकरी ने कहा कि उन्होंने हमेशा सिर्फ़ इथेनॉल के बजाय वैकल्पिक ईंधन की वकालत की है। उनका तर्क है कि इस पॉलिसी से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है और किसानों को भी फ़ायदा होता है।

उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ़ इथेनॉल की बात नहीं करता। मैं वैकल्पिक ईंधन की बात करता हूँ। इथेनॉल के इस्तेमाल से किसानों को फ़ायदा होगा। इस बात पर ज़ोर देते हुए कि यह पॉलिसी सामूहिक रूप से बनाई गई थी, गडकरी ने कहा कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का फ़ैसला अकेले उन्होंने नहीं लिया था, बल्कि इसके लिए व्यापक बातचीत और वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया था।

उन्होंने कहा कि इथेनॉल पर फ़ैसला मैंने अकेले नहीं लिया। पूरी प्रक्रिया पेट्रोलियम मंत्रालय, कैबिनेट और वैज्ञानिक शोध के साथ बातचीत के बाद पूरी की गई है।

ED का TMC पर बड़ा एक्शन, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के तीन बैंक खातों में 440 करोड़ की राशि को फ़्रीज़…

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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के तीन बैंक खातों में ₹440 करोड़ की राशि को फ़्रीज़ कर दिया है। ममता बनर्जी की पार्टी के HDFC बैंक में मौजूद तीन अकाउंट्स में रखे फंड को फ्रीज़ करने के लिए PMLA की धारा 17(1A) के तहत एक आदेश जारी किया गया।

यह कदम एजेंसी द्वारा TMC के बैंक अकाउंट्स से कथित तौर पर संदिग्ध लेन-देन की जांच के सिलसिले में कोलकाता और उसके आस-पास एक फ्लाइट चार्टर फर्म से जुड़ी प्रॉपर्टीज़ पर छापेमारी करने के एक दिन बाद उठाया गया है।

ईडी ने एक बयान में कहा कि ईडी के कोलकाता ज़ोनल ऑफिस ने PMLA के प्रावधानों के तहत कोलकाता और उसके आस-पास एविएशन सेक्टर में काम करने वाली केयरवेल ग्रुप की कंपनियों से जुड़ी पांच जगहों पर तलाशी अभियान चलाया।

तलाशी के दौरान, AITC के तीन HDFC बैंक अकाउंट्स में मौजूद ₹440.42 करोड़ की रकम को PMLA की धारा 17(1A) के तहत फ्रीज़ कर दिया गया है। एजेंसी के बयान में कहा गया है कि जांच से पता चला है कि AITC के बैंक अकाउंट से केयरवेल एविएशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़ी कंपनी को लगभग ₹160 करोड़ ट्रांसफर किए गए थे; यह ज़्यादातर अप्रैल 2023 से जून 2026 के बीच हुआ।

ईडी ने अपने बयान में आगे कहा कि जांच में यह भी पता चला है कि केयरवेल एविएशन प्राइवेट लिमिटेड ने 2023-2026 के दौरान ₹82.96 करोड़ की रकम एक नई बनी जुड़ी हुई कंपनी को भेजी, ताकि एम्ब्रेयर लिगेसी 600 एयरक्राफ्ट और अगस्ता 109 ग्रैंड न्यू हेलिकॉप्टर खरीदा जा सके।

इन चीज़ों को खरीदने के लिए कुल ₹112 करोड़ खर्च किए गए। साथ ही, यह भी पता चला है कि हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए 2023 में केमैन आइलैंड्स की एक कंपनी से 1.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर का बिना गारंटी वाला लोन लिया गया था।

इसमें आगे कहा गया है कि एम्ब्रेयर लिगेसी 600 एयरक्राफ्ट और अगस्ता हेलीकॉप्टर को बाद में खुद AITC को ही किराए पर दे दिया गया, जबकि इन्हें AITC के फंड से खरीदा गया था।

एजेंसी ने कहा इसके बाद, एयरक्राफ्ट के इस्तेमाल के नाम पर बड़ी रकम ट्रांसफर की गई। इन ट्रांज़ैक्शन का असल मकसद पता लगाने के लिए इस संदिग्ध व्यवस्था की जांच की जा रही है। राज्यसभा सांसद और ममता बनर्जी खेमे के नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने मंगलवार को HT को बताया कि ये आरोप राजनीतिक मकसद से लगाए गए हैं।

Allahabad High Court का ऐतिहासिक फैसला, PCMA, POCSO Act देश के हर नागरिक पर समान रूप से लागू…

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम जैसे विशेष कानूनों को निष्प्रभावी या ओवरराइड नहीं कर सकता।

अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि विवाह की आयु के रूप में किशोरावस्था (प्यूबर्टी) की शुरुआत को मान्यता देने वाला पर्सनल लॉ उन कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता, जो बच्चों के साथ यौन संबंध को अपराध की श्रेणी में रखते हैं।न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धर्म की परवाह किए बिना देश के प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह की न्यूनतम आयु वही होगी, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष) में निर्धारित की गई है।

क्या है पूरा मामला?

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने कहा कि धर्म की परवाह किए बिना देश के प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह की न्यूनतम आयु वही होगी, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में निर्धारित की गई है। खंडपीठ ने ये टिप्पणियां पुलिस और ‘चाइल्डलाइन’ की बचाव टीम पर कथित हमला करने तथा उनके काम में बाधा डालने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध करने वाली रुबी और 18 अन्य लोगों की याचिका को खारिज करते हुए कीं।

बचाव दल ने बुलंदशहर जिले में 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की का प्रस्तावित विवाह रुकवाने के लिए हस्तक्षेप किया था, जिसके बाद उस समय हमला किया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि शरीया कानून के तहत लड़की के किशोरावस्था की दहलीज में कदम (आमतौर पर 15 वर्ष की आयु) रखने के बाद ही उसका विवाह किया जा सकता है। उन्होंने दलील दी कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (पीसीएमए) के प्रावधान विवाह से संबंधित उनके व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) को प्रभावित नहीं करते। अदालत ने हालांकि इस दलील को खारिज कर दिया।

खंडपीठ ने कहा कि कोई भी व्यक्तिगत कानून, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए) के तहत बाल विवाह पर लगाए गए प्रतिबंध या पॉक्सो अधिनियम के वैधानिक प्रभावों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। खंडपीठ ने कहा कि अगर 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के विवाह की अनुमति दी जाती है, तो विवाह और यौन संबंधों के परस्पर जुड़े होने के कारण यह स्थिति पॉक्सो अधिनियम के उल्लंघन को वैधता प्रदान करने जैसी होगी।

अदालत ने बचाव दल के साथ कथित तौर पर अभद्रता, धमकी और हमला किए जाने तथा टीम के सदस्यों को अपनी जान बचाने के लिए मजबूर होने संबंधी विवरण वाली प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा, “पीड़िता को बचाव दल की देखरेख और संरक्षण से जबरन ले जाया गया था, जिसके बाद अंततः उसे फिर से बचाया गया।

प्रथम दृष्टया यह सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने का मामला बनता है। प्राथमिकी में जिन अन्य अपराधों का उल्लेख है, उनकी भी गहन जांच आवश्यक है।” अदालत ने एक जुलाई को याचिका खारिज करते हुए कहा कि प्राथमिकी को रद्दे करने करने का कोई उचित आधार नहीं है।