भारत का खाड़ी देशों के साथ व्यापारिक संबंध
यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों में तेजी लाने के बाद, खाड़ी देश भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं। यह केवल एक संयोग नहीं है, बल्कि वैश्विक परिदृश्य में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा, आत्मविश्वासी विदेश नीति और मजबूत आर्थिक स्थिति का परिणाम है।
अब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक साझेदार के रूप में देख रही हैं।
भारत और खाड़ी सहयोग परिषद के छह देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की उपस्थिति में दोनों पक्ष वार्ता की रूपरेखा पर हस्ताक्षर करने वाले हैं, जो आगामी बातचीत के दायरे और प्राथमिकताओं को निर्धारित करेगा। लगभग दो दशकों से रुकी हुई यह प्रक्रिया अब फिर से गति पकड़ने जा रही है। खाड़ी सहयोग परिषद में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं। भारत पहले ही संयुक्त अरब अमीरात के साथ मुक्त व्यापार समझौता लागू कर चुका है और ओमान के साथ व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं।
भारत और खाड़ी देशों के बीच व्यापार का मुख्य आधार ऊर्जा रहा है। भारत अपने कच्चे तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा इन देशों से प्राप्त करता है, जबकि सऊदी अरब और कतर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ बने हुए हैं। दूसरी ओर, भारत इन देशों को कीमती पत्थर, धातु, कृत्रिम आभूषण, बिजली उपकरण, लोहा, इस्पात और रसायन भेजता है। आंकड़ों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में भारत का निर्यात लगभग 57 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 121 अरब डॉलर से अधिक हो गया। कुल द्विपक्षीय व्यापार 178 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है, जो इस संबंध की गहराई को दर्शाता है।
भारतीय प्रवासी श्रमिकों का योगदान
खाड़ी देश भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं। लगभग तीन करोड़ भारतीय जो विदेश में रहते हैं, उनमें से बड़ी संख्या इसी क्षेत्र में कार्यरत है। ये श्रमिक हर वर्ष भारी धनराशि भारत भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा है। पहले भी भारत और खाड़ी देशों के बीच दो दौर की वार्ता हो चुकी थी, लेकिन 2008 के बाद यह प्रक्रिया रुक गई थी। शुल्क में कटौती, निवेश सुरक्षा और आंतरिक प्राथमिकताओं पर मतभेद के कारण बातचीत ठंडी पड़ गई थी। अब निवेश संधि और व्यापार समझौते को अलग-अलग रास्तों पर रखकर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की जा रही है।
नई व्यापारिक पहल का महत्व
हाल के समय में भारत ने यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में प्रगति दिखाई है। ऐसे माहौल में खाड़ी क्षेत्र के साथ नई पहल यह संकेत देती है कि नई दिल्ली अब व्यापार समझौतों को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी देख रही है।
खाड़ी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में बढ़ता कदम केवल बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत है। अब दुनिया की ताकत केवल हथियारों से नहीं, बल्कि बाजार, आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा मार्गों से तय हो रही है। जो देश स्थिर ऊर्जा स्रोत और खुले बाजार सुरक्षित कर लेगा, वही आने वाले दशकों में मजबूती से खड़ा रहेगा। भारत ने लंबे समय तक सतर्क और कभी-कभी संकोची व्यापार नीति अपनाई है, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।
चुनौतियाँ और सावधानियाँ
हालांकि, इस उत्साह में आंख मूंद लेना भी उचित नहीं होगा। मुक्त व्यापार समझौते का अर्थ है अपने बाजार को खोलना। यदि घरेलू उद्योग तैयार नहीं हुए, तो सस्ता आयात कई क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए सरकार को केवल समझौते पर हस्ताक्षर करने की जल्दी नहीं करनी चाहिए, बल्कि घरेलू उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की भी चिंता करनी होगी। सामरिक दृष्टि से यह कदम पश्चिम एशिया में भारत की उपस्थिति को और मजबूत करेगा, जहां चीन भी तेजी से अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।



