क्या भारत में सोने की खदानें सिर्फ फिल्मों या इतिहास की किताबों तक सीमित हैं? कर्नाटक की मशहूर केजीएफ (Kolar Gold Fields) बंद होने के सालों बाद, अब आंध्र प्रदेश के कर्नूल में देश की पहली प्राइवेट गोल्ड माइन की शुरुआत हो चुकी है. जियोमैसूर और डेक्कन गोल्ड माइंस के इस बड़े प्रोजेक्ट से हर साल टन के हिसाब से सोना निकालने की तैयारी है. जानिए यह प्रोजेक्ट भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे बदलेगा और आम लोगों को इससे क्या फायदा होगा. क्या आंध्र प्रदेश बनेगा नया सोने का गढ़?
जब भी भारत में सोने की खदान की बात होती है, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले कर्नाटक की मशहूर ‘कोलार गोल्ड फील्ड्स’ (KGF) की तस्वीर उभरती है. फिल्मों और इतिहास के पन्नों में सिमट चुकी इस कहानी के बाद, अब भारत के माइनिंग सेक्टर में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है. आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में देश की पहली प्राइवेट सेक्टर की सोने की खदान और प्रोसेसिंग फैसिलिटी का उद्घाटन हो चुका है. यह कदम देश को सोने के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग माना जा रहा है.
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने कर्नूल जिले के तुग्गली मंडल में आने वाले जोन्नागिरी में इस प्राइवेट गोल्ड माइनिंग और प्रोसेसिंग फैसिलिटी का उद्घाटन किया है. इस पूरे प्रोजेक्ट को जियो मैसूर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और डेक्कन गोल्ड माइंस लिमिटेड मिलकर संभाल रहे हैं, जिन्होंने इसमें करीब 405 करोड़ रुपये का एक बड़ा निवेश किया है. इस जगह की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने पहली यूनिट की औपचारिक शुरुआत के साथ ही दूसरी यूनिट का शिलान्यास भी कर दिया. इस मौके पर उनके साथ राज्य के मंत्री कोल्लू रवींद्र, निम्मला रामानायडू और टीजी भरत भी मौजूद थे. यह पूरा प्रोजेक्ट कुल 1,500 एकड़ के बड़े इलाके में फैला हुआ है, जिसके पहले फेज में फिलहाल 600 एकड़ जमीन पर एक्टिव माइनिंग का काम शुरू किया जा चुका है. इस बड़े प्रोजेक्ट की अहमियत को देखते हुए राज्य कैबिनेट ने इसके होस्ट विलेज यानी जोन्नागिरी का नाम बदलकर सांकेतिक रूप से ‘स्वर्णगिरी’ रख दिया है.
आंध्र प्रदेश सरकार के लिए यह गोल्ड माइनिंग प्रोजेक्ट किसी लॉटरी से कम नहीं है और सरकारी अधिकारी इसकी तुलना सीधे कर्नाटक के केजीएफ से कर रहे हैं. इस प्लांट से उत्पादन के पहले साल में ही 400 किलोग्राम सोना निकालने की उम्मीद जताई गई है, जो कि अगले साल बढ़कर 900 किलोग्राम हो जाएगा. जैसे-जैसे इस प्लांट की प्रोसेसिंग कैपेसिटी को बढ़ाया जाएगा, यहां से हर साल 2 टन यानी 2,000 किलोग्राम सोना निकालने का लक्ष्य रखा गया है.
यह प्रोजेक्ट सिर्फ सोना ही नहीं उगलेगा, बल्कि इससे लगभग 700 स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे. सबसे मजेदार बात यह है कि राज्य सरकार को यहां से निकलने वाले कुल सोने की वैल्यू पर 4 परसेंट की रॉयल्टी मिलेगी. मौजूदा अनुमानों के हिसाब से सरकार को पहले साल के 400 किलोग्राम प्रोडक्शन से लगभग 57 करोड़ रुपये की रॉयल्टी मिलेगी, जो अगले साल 900 किलोग्राम प्रोडक्शन होने पर बढ़कर करीब 144 करोड़ रुपये हो जाएगी.
साल 2001 में जब कर्नाटक की केजीएफ खदान पूरी तरह बंद हो गई, तो भारत में प्राइमरी लेवल पर सोने की माइनिंग का काम सिर्फ सरकारी हुट्टी गोल्ड माइंस तक ही सीमित रह गया था, जो कि कर्नाटक में है. किसी भी ऐसी जगह पर जहां सालों से काम बंद पड़ा हो, दोबारा सोने का डिपॉजिट ढूंढना और वहां कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू करना बेहद लंबा, खर्चीला और हाई-रिस्क वाला काम होता है. इसके लिए सालों की खोजबीन और भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट की जरूरत पड़ती है. स्वर्णगिरी प्रोजेक्ट आज अगर हकीकत बन पाया है, तो उसकी वजह प्राइवेट कंपनी जियोमैसूर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की सालों की मेहनत है, जिसने इस इलाके में दशकों तक रिसर्च की और रिसोर्सेज को डेवलप किया.
तमिलनाडु की त्रिवेणी अर्थमूवर्स के बैकअप और डेक्कन गोल्ड माइंस के सपोर्ट के साथ इस कंपनी ने सबसे पहले 1990 के दशक में यहां खोजबीन के राइट्स हासिल किए थे. इसके बाद साल 2006 में माइनिंग लीज के लिए अप्लाई किया गया और अब जाकर करीब 405 करोड़ रुपये का निवेश करने के बाद यहां कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू हो पाया है.
इस पूरे प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने में सरकार की पॉलिसी और माइनिंग रिफॉर्म्स ने भी एक बहुत बड़ा रोल निभाया है. साल 2015 में सरकार ने नियमों में कुछ बदलाव किए थे, जिसके तहत मिनरल ब्लॉक्स के लिए ट्रांसपेरेंट ऑक्शन यानी पारदर्शी नीलामी को जरूरी बना दिया गया था. इसके बाद साल 2021 में एक और बड़ा अमेंडमेंट किया गया, जिसने प्राइवेट कंपनियों का रास्ता और आसान कर दिया. इस नए नियम के मुताबिक, अगर कोई प्राइवेट कंपनी किसी मिनरल डिपॉजिट को खोज निकालती है, तो माइनिंग के राइट्स उसी के पास सुरक्षित रहेंगे और वह वहां से निकाले गए रिसोर्सेज को कमर्शियल तौर पर बाजार में बेच भी सकती है. स्वर्णगिरी भारत के उन पहले बड़े गोल्ड माइनिंग प्रोजेक्ट्स में से एक है, जिसे इस नए कानूनी ढांचे का सीधा फायदा मिला है, और यह दिखाता है कि भारत के माइनिंग सेक्टर में अब प्राइवेट निवेश की भूमिका कितनी तेजी से बढ़ रही है.
अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो केजीएफ ने लगभग 120 सालों के दौरान देश को अनुमानित 800 से 900 टन सोना दिया था. उस खदान की गहराई 3.2 किलोमीटर तक नीचे चली गई थी, जो इसे दुनिया की सबसे गहरी खदानों में से एक बनाती थी, लेकिन धीरे-धीरे वहां सोने का अयस्क कम होता गया और आखिरकार सरकार को उसे बंद करना पड़ा. इसके मुकाबले स्वर्णगिरी प्रोजेक्ट भारत की गोल्ड माइनिंग के सफर में एक बिल्कुल नया चैप्टर है.
डेक्कन गोल्ड माइंस के एक ऑडिट के मुताबिक, इस साइट पर करीब 82 लाख टन ओर मौजूद है, जिसमें प्रति टन औसतन 1.49 ग्राम सोना मिल सकता है. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि इस खदान में करीब 12 टन शुद्ध सोना मौजूद है. इसके मेन माइनिंग पिट की ऑपरेशनल लाइफ की अवधि करीब आठ से नौ साल की होने की उम्मीद है. हालांकि, आंध्र प्रदेश सरकार का यह भी कहना है कि अगर इस पूरे बड़े रीजन को देखा जाए, तो यहां 42.5 टन तक सोना मिल सकता है, लेकिन ये अनुमान अभी सिर्फ शुरुआती खोज पर आधारित हैं और इनका पूरी तरह से वैरिफिकेशन होना अभी बाकी है.
स्वर्णगिरी प्रोजेक्ट की सबसे खास बात इसकी माइनिंग टेक्नोलॉजी है, जो इसे पुराने केजीएफ से बिल्कुल अलग बनाती है. जहां केजीएफ में जमीन के अंदर मीलों गहरे जाकर अंडरग्राउंड माइनिंग करनी पड़ती थी, जो बेहद खतरनाक और मुश्किल काम था, वहीं स्वर्णगिरी को एक ओपन-पिट माइन के रूप में डेवलप किया जा रहा है. इसका मतलब यह है कि यह एक खुली खदान होगी, जहां बड़ी-बड़ी मशीनों के जरिए सीधे जमीन की ऊपरी सतह की खुदाई करके सोना निकालने वाले ओर को बाहर निकाला जाएगा. यह तरीका न सिर्फ सुरक्षित है बल्कि इसमें समय और लागत भी काफी कम आती है, जिससे भारत में सोने का उत्पादन अब और भी ज्यादा आसान और तेज हो जाएगा.



