Home राजनीति शराबबंदी: सुप्रीम कोर्ट के 5 सवालों से समझिए पूरा मॉडल…

शराबबंदी: सुप्रीम कोर्ट के 5 सवालों से समझिए पूरा मॉडल…

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शराब की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाने से क्या शराब की खपत सच में खत्म हो जाती है या फिर इसका कारोबार अवैध तरीके से चलने लगता है? सुप्रीम कोर्ट ने 18 सितंबर को महाराष्ट्र में मेथनॉल की बिक्री से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान शराबबंदी की नीति से जुड़े कई अहम सवाल उठाए.

अदालत ने शराबबंदी से जुड़े पांच संभावित नुकसान गिनाए. सरकारी राजस्व का नुकसान, कानून लागू करने पर खर्च, पुलिस और आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार, अवैध शराब बनाने का बढ़ना और उससे जुड़ा ड्रग्स का खतरा.

मामला महाराष्ट्र के उन नियमों से जुड़ा था, जिनमें गैर-दवा उद्योगों को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना जरूरी था. सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के नियम 18A और 18B को संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) की कसौटी पर असंगत माना और उन्हें रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि मेथनॉल जहरीला पदार्थ है और इसकी बिक्री, भंडारण और इस्तेमाल पर प्रभावी निगरानी जरूरी है, लेकिन अपनाए गए उपायों का जहरीली शराब की घटनाएं रोकने से सीधा और उचित संबंध साबित नहीं हुआ.

1991 की मुंबई त्रासदी से शुरू हुआ था नियम

महाराष्ट्र ने ये नियम 1991 की मुंबई की एक बड़ी जहरीली शराब त्रासदी के बाद बनाए थे. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक करीब 250 लोगों ने मेथनॉल मिली नकली शराब पी थी और 93 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद बनी पार्थसारथी समिति ने ऐसी घटनाओं के कई कारण बताए थे. इनमें मेथनॉल का अवैध तरीके से शराब बनाने में इस्तेमाल, इसकी चोरी, मिथाइल और एथाइल अल्कोहल को लेकर भ्रम, कार्रवाई करने वाली एजेंसियों में भ्रष्टाचार और मेथनॉल का सस्ता विकल्प होना शामिल था.

अदालत ने कहा कि सिर्फ मेथनॉल में रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने से अवैध शराब का इस्तेमाल रोकना सुनिश्चित नहीं होता. इसके बजाय मेथनॉल के परिवहन, भंडारण और बिक्री की निगरानी, लाइसेंस और परमिट की जांच तथा विभागों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है.

गुजरात का उदाहरण क्यों आया?

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात का उदाहरण देते हुए शराबबंदी के बाद भी जहरीली शराब की घटनाओं का जिक्र किया. अदालत के मुताबिक, गुजरात में राज्य बनने के बाद से कम से कम 10 बड़ी सामूहिक जहरीली शराब त्रासदियां हुई हैं, जिनमें 600 से ज्यादा लोगों की जान गई. गुजरात 1960 से सख्त शराबबंदी नीति वाला राज्य है. हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए अदालत ने गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई जहरीली शराब की घटनाओं को भी अधिकारियों के लिए चेतावनी बताया. एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन घटनाओं में 13 और 15 लोगों की मौत हुई थी.

शराबबंदी वाले राज्यों में राजस्व का सवाल

शराब पर टैक्स राज्यों की आय का अहम हिस्सा है. शराबबंदी वाले राज्यों में यह सोर्स काफी सीमित हो जाता है. PRS Legislative Research के 2024-25 के एनालिसिल के मुताबिक बिहार, गुजरात, मिजोरम और नागालैंड में शराबबंदी के कारण आबकारी शुल्क से राजस्व लगभग शून्य है. इसके उलट कई अन्य राज्यों में आबकारी शुल्क राज्य की अपनी कर आय का हिस्सा है.

हालांकि इसे सिर्फ राजस्व का नुकसान कहकर खत्म नहीं किया जा सकता. शराबबंदी के समर्थकों का तर्क है कि शराब की उपलब्धता कम होने से परिवारों और समाज पर शराब से जुड़े नुकसान घट सकते हैं. इसलिए किसी राज्य की नीति का आकलन करते समय राजस्व के साथ स्वास्थ्य, घरेलू हिंसा, अपराध जैसे पहलुओं को भी अलग-अलग देखना जरूरी है.

बिहार में भी दिखता है अवैध बाजार का पैमाना

बिहार ने अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी. राज्य सरकार के अनुसार इसका मकसद शराब की लत और उससे जुड़ी सामाजिक बुराइयों पर रोक लगाना था. लेकिन शराबबंदी लागू होने के बाद भी अवैध शराब के खिलाफ बड़े स्तर पर कार्रवाई जारी है. जून 2026 में बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, एक महीने में 1,22,275 छापे, 11,339 मामले और 13,166 गिरफ्तारियां हुईं. इस दौरान 7,30,472 लीटर अवैध शराब जब्त की गई और 969 वाहन जब्त हुए. यानी शराबबंदी के बाद भी बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार चल रहा है.

जहरीली शराब का राष्ट्रीय आंकड़ा क्या कहता है?

यह समस्या सिर्फ शराबबंदी वाले राज्यों तक सीमित नहीं है. गृह मंत्रालय ने संसद में NCRB के आंकड़ों के हवाले से बताया था कि देश में अवैध/जहरीली शराब पीने से 2018 में 1,365, 2019 में 1,296 और 2020 में 947 मौतें दर्ज हुई थीं. इसलिए शराबबंदी और जहरीली शराब के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित करने से पहले राज्यवार आंकड़ों, कानूनों और प्रवर्तन व्यवस्था को अलग-अलग देखना जरूरी है. खुद गृह मंत्रालय के मुताबिक, शराब का उत्पादन, निर्माण, कब्जा, परिवहन, खरीद और बिक्री राज्य सूची का विषय है.

सुप्रीम कोर्ट का फोकस सिर्फ शराबबंदी नहीं, सुरक्षित नियंत्रण पर

इस फैसले का एक अहम पहलू यह है कि अदालत ने सिर्फ पाबंदी पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि जहरीली शराब रोकने के लिए बेहतर निगरानी और तालमेल वाली व्यवस्था पर जोर दिया. मेथनॉल जैसे जहरीले केमिकल की खरीद, भंडारण और ट्रांसपोर्ट की निगरानी, लाइसेंस की जांच और बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने पर विशेष आपदा प्रबंधन व्यवस्था जैसे कदम सुझाए गए हैं. यानी बहस अब सिर्फ शराब बंद हो या नहीं तक सीमित नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि शराब से होने वाले स्वास्थ्य और सामाजिक नुकसान को रोकते हुए अवैध शराब, जहरीली शराब, तस्करी और प्रवर्तन में भ्रष्टाचार से कैसे निपटा जाए.