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“PM नरेंद्र मोदी ने देवमोगरा मंदिर में किए दर्शन, जानें यहां किसकी पूजा होती है और इतिहास?”

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बिहार में विधानसभा चुनाव में मिली जीत के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को गुजरात का दौरा किया। इस दौरान पीएम मोदी अनेक स्थानों पर गए। इनमें से सबसे खास जगह थी नर्मदा जिले के डेडियापाड़ा में स्थित देवमोगरा मंदिर।

बहुत कम लोग इस मंदिर से जुड़ी बातें जानते हैं जैसे यहां किसकी पूजा होती है और इस मंदिर का इतिहास क्या है और मंदिर इसी दिन क्यों देवमोगरा मंदिर गए? आगे जानिए इस मंदिर से जुड़ी रोचक बातें…

देवमोगरा मंदिर में किसकी पूजा होती है?

नर्मदा जिले के डेडियापाड़ा में स्थित देवमोगरा मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में पंडोरी माता को समर्पित है। पंडोरी माता को गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के आदिवासी लोग अपनी कुलदेवी मानते हैं। इसलिए यहां दिन भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। 15 नवंबर को आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने वाले नायक बिरसा मुंडा की जयंती होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देवमोगरा धाम पहुंचकर पंडोरी माता के दर्शन किए।

क्यों खास है देवमोगरा धाम?

आदिवासी समुदाय की कुलदेवी का मंदिर होने के कारण देवमोगरा धाम बहुत ही प्रसिद्ध है। बाहर से देखने पर ये नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर जैसा दिखाई देता है। ये मंदिर सतपुड़ा की पर्वतमालाओं में प्रकृति की गोद आस्था व श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व राजस्थान के आदिवासी जनजाति के लोग यहां भक्ति के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।

कौन हैं आदिवासियों की कुलदेवी पंडोरी माता?

पंडोरी माता से जुड़ी एक प्रचलित कथा है, उसके अनुसार, हजारों साल पहले पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा। इंसान तो क्या पशु-पक्षियों के लिए अनाज और पानी की समस्या पैदा हो गई। उस समय गोर्या कोठार नाम के व्यक्ति ने अपने अनाज भंडार से लोगों को अन्न देना शुरू किया, लेकिन कुछ समय बाद उसका अन्न भंडार भी खाली होने लगा। तब उनकी पुत्री याहा पांडोरी ने कणी-कंसरी का रूप धारण कर अन्न वितरण का काम संभाला। इसके बाद उस अनाज के भंडार में कोई कमी नहीं आई। पांडोरी को आदिवासियों ने अपनी कुलदेवी स्वीकार कर उनकी पूजा करना शुरू की। तभी ये ये परंपरा चली आ रही है।

यहां देखी जाती है आदिवासी संस्कृति की झलक

आदिवासी समुदाय द्वारा समय-समय पर देवमोगरा धाम में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। महाशिवरात्रि के मौके पर यहां 5 दिनों तक एक मेला लगता है, जिसमें हजारों आदिवासी अपनी कुलदेवी के दर्शन करने आते हैं। इस दौरान वे नई फसल को बांस की टोकरी में रखकर देवी को समर्पित करते हैं। महिला-पुरुष रंग-बिरंग वस्त्र पहनकर जुलूस निकालते हैं, जिसे होब यात्रा कहते हैं। कुछ लोग तो सवा महीने का व्रत-उपवास करने के बाद यहां दर्शन करने आते हैं। होली के मौके पर भी यहां की रौनक देखते ही बनती है।

इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

Eid Al Etihad UAE? देशभर में जमकर चल रही तैयारियां”

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यूएई को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है. देश में इस समय जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं. यह सभी तैयारियां देश के नेशनल डे के सेलिब्रेशन के लिए चल रही हैं. जिसे Eid Al Etihad भी कहा जाता है.

इस मौके पर शारजाह में जश्न मनाया जाएगा.

शारजाह संयुक्त अरब अमीरात की एकता, प्रगति और सांस्कृतिक गौरव की यात्रा को याद करते हुए 54वें ईद अल इत्तिहाद के भव्य उत्सव की तैयारी कर रहा है. 19 नवंबर से 2 दिसंबर 2025 तक देश भर में पार्कों, ऐतिहासिक स्थलों में रंगीन परेड, आकर्षक प्रस्तुतियां, सांस्कृतिक प्रदर्शन और इंटरएक्टिव गतिविधियां आयोजित की जाएंगी. परिवारों, युवाओं और समुदायों के लिए यह ऐसा मौका होगा जहां वो अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए राष्ट्र की उपलब्धियों का जश्न मना सकेंगे.

पार्कों में होंगे कार्यक्रम आधिकारिक उद्घाटन बुधवार, 19 नवंबर को शाम 5:00 बजे अल सियूह फैमिली पार्क में होगा, जिसमें पारंपरिक लोक प्रस्तुतियां सभी आयु वर्गों के लिए प्रतियोगिताएं कलात्मक और ड्रामा युवाओं की चर्चा पैनल सांस्कृतिक और सामुदायिक गतिविधियां होंगी.

खशीशा पार्क और शारजाह नेशनल पार्क भी पूरे उत्सव के पीरियड के दौरान दैनिक गतिविधियों की मेजबानी करेंगे, जिनमें युवाओं के पैनल, बच्चों के शो और पारंपरिक प्रस्तुतियां शामिल होंगी.

पहली बार, अल लैयाह कैनाल भी 28 नवंबर से 2 दिसंबर तक उत्सव स्थलों में शामिल होगा, जहां राष्ट्रीय प्रस्तुतियां और पारिवारिक व्यवसाय प्रदर्शनी आयोजित की जाएंगी, जिससे उत्सवों का दायरा नए दर्शकों तक बढ़ेगा.

कई सितारे करेंगे परफॉर्म शारजाह के उत्सवों में कई प्रमुख कार्यक्रम शामिल होंगे, जिनमें: खोरफक्कान एम्फीथिएटर (29 नवंबर): देश के सितारों हुसैन अल जस्मी और फुआद अब्देलवाहद का शो होगा खोरफक्कान (21 नवंबर): ओपरेट्टा (Operetta) पल्स ऑफ द नेशन कल्बा (22 नवंबर से):वार्षिक ओपरेट्टा, आतिशबाजी के साथ दिब्बा अल हसन (22 नवंबर): राष्ट्रीय परेड और आतिशबाजी

ये कार्यक्रम देशभक्ति की भावना और सांस्कृतिक गौरव से भरपूर शामों का वादा करते हैं, जो यूएई की कलात्मक प्रतिभा को उजागर करेंगे.

कई जगह की जाएगी परेड

पूरे शारजाह में विभिन्न मोहल्लों और ऐतिहासिक स्थलों पर कई तरह की गतिविधियां आयोजित की जाएंगी:

अल बतायेह (2729 नवंबर): परेड, लोक प्रस्तुतियां अल धैद (2630 नवंबर): भव्य परेड और हेरिटेज मार्केट अल हमरिया हेरिटेज विलेज (2022 नवंबर): पारंपरिक गीत और क्लासिक कार प्रदर्शनी वाडी अल हिलो (23 नवंबर): कविता पाठ और छात्र प्रस्तुतियां अल ख्रूस उपनगर (28 नवंबर): परेड अल मदाम (2223 नवंबर): सांस्कृतिक चर्चाएं और वीडियो स्क्रीनिंग मलैहा हेरिटेज विलेज (2021 नवंबर): रेगिस्तानी माहौल में मिलिट्री बैंड और लोक नृत्य मुगैदर उपनगर (अल रिफा पार्क, 2122 नवंबर): साइकिल परेड और पारंपरिक कार्यक्रम.

इन सभी कार्यक्रमों का मकसद शारजाह की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करना, समुदायों को जोड़ना और एकता, निष्ठा और राष्ट्रीय गर्व के मूल्यों को मजबूत करना है.

क्यों कहा जाता है ईद अल इत्तिहाद?

सवाल उठता है कि देश के नेशनल डे को ईद अल इत्तिहाद क्यों कहा जाता है. दरअसल, ईद अल इत्तिहाद शब्द का अर्थ अरबी में फेस्टिवल ऑफ द यूनियन होता है. इसमें इत्तिहाद यानी यूनियन/एकता पर जोर दिया गया है-जो यूएई की राष्ट्रीय पहचान का मूल है. यह नाम देश की स्थायी विरासत, शक्ति और गर्व के मूल्यों का प्रतीक है.

ईद अल इत्तिहाद हर साल 2 दिसंबर को आधिकारिक रूप से मनाया जाता है. यह 1971 के उस ऐतिहासिक दिन की याद है जब 7 अमीरात एकजुट होकर संयुक्त अरब अमीरात बने. 2024 में, यूएई के नेशनल डे समारोहों को आधिकारिक रूप से ईद अल इत्तिहाद का नाम दिया गया.

“छठ को यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में शामिल करने से क्या-क्या बदलेगा? PM मोदी के बयान से चर्चा शुरू”

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बिहार विधान सभा चुनाव से गदगद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोक आस्था के पर्व छठ पर्व को यूनेस्को की हेरिटेज सूची में शामिल कराने के प्रयासों के बारे में बात की. वे नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कांग्रेस और आरजेडी पर तंज भी कसा कि इनके नेताओं ने अभी तक छठ मैया से माफी भी नहीं मांगी है.

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि अगर केंद्र सरकार छठ पर्व को यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में शामिल करवा पाती है तो असल में क्या-क्या बदलेगा? तब इसका स्वरूप कैसा हो जाएगा? आइए, पीएम की इस घोषणा के बहाने समझते हैं.

लोक आस्था का पर्व छठ

छठ पर्व आज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं रह गया है, बल्कि यह लोक आस्था, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक समरसता का अनोखा उदाहरण है. साल-दर-साल इस पर्व की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है. पर्व विस्तार ले रहा है. देश का शायद ही कोई राज्य हो जहां छठ पर्व न मनाया जाता हो. इसे यदि यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में (इंटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज / अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर) की सूची में शामिल किया जाता है, तो इसका प्रभाव केवल बिहार या पूर्वी भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सकारात्मक बदलाव दिखेंगे.

यूनेस्को सूची में शामिल करने का मतलब

यूनेस्को (UNESCO) संयुक्त राष्ट्र की वह संस्था है जो शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के संरक्षण के लिए काम करती है. जब कोई त्योहार, लोक-कला, परंपरा या ज्ञान प्रणाली यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल होती है, तो इसका अर्थ होता है कि वह परंपरा मानव सभ्यता के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है. उसे बचाने, संजोने और आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी केवल उस क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की मानी जाती है. उस परंपरा के दस्तावेज़ीकरण, शोध और संरक्षण के लिए अतिरिक्त सहयोग और ध्यान मिलता है. यदि छठ पर्व को यह दर्जा मिलता है, तो इसे एक वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी मान्यता मिलेगी.

छठ पर्व के यूनेस्को हेरिटेज बन जाने से क्या-क्या बदलेगा?

  • वैश्विक पहचान और सम्मान में वृद्धि:

अभी छठ मुख्य रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच मनाया जाता है. यूनेस्को की सूची में आने के बाद दुनिया के अलग-अलग देशों के लोग इस पर्व के बारे में जानेंगे. छठ को केवल स्थानीय या क्षेत्रीय त्योहार नहीं, बल्कि विश्व-स्तरीय सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा जाएगा. यह बिहार और पूर्वी भारत की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत करेगा.

  • संरक्षण और शुद्धता पर ज़्यादा ध्यान:

छठ की खासियत इसकी सादगी, पवित्रता और अनुशासन है. यूनेस्को दर्जा मिलने के बाद सरकार और समाज दोनों पर यह नैतिक दबाव बढ़ेगा कि छठ की मूल भावना और पारंपरिक रूप बरकरार रहे. नदी-घाटों की साफ-सफाई, प्रदूषण पर नियंत्रण, कृत्रिम रंग और प्लास्टिक के उपयोग पर रोक जैसे कदमों पर अधिक गंभीरता से काम किया जाएगा. पारंपरिक गीत, लोककथाएं, मान्यताएं और छठ से जुड़े लोक-संगीत का व्यवस्थित रिकॉर्ड और दस्तावेज़ तैयार किया जा सकेगा.

  • पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा:

जब कोई पर्व या स्थान यूनेस्को की सूची में आता है, तो देश-विदेश से पर्यटक और शोधकर्ता उससे जुड़ने आते हैं. छठ के समय पटना, गया, देव (औरंगाबाद), भागलपुर, मुज़फ्फरपुर जैसे शहरों में धार्मिक पर्यटन बढ़ सकता है. स्थानीय कारीगरों, दुकानदारों, फल-सब्जी विक्रेताओं, परिवहन सेवा और होटल-धंधे को आर्थिक लाभ होने की संभावना बनेगी. पर्यटन बढ़ने से रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं.

  • शोध, अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण में तेजी:

विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों में छठ पर शोध कार्य बढ़ेगा. छठ के ऐतिहासिक विकास, लोकविश्वास, गीत-संगीत, महिला-केन्द्रित भूमिका और पर्यावरणीय दृष्टिकोण पर गंभीर अध्ययन होंगे. इससे नई पीढ़ी के लिए छठ केवल करने वाला पर्व नहीं, बल्कि समझने और सीखने वाली परंपरा बन सकेगा.

  • प्रवासी भारतीय समुदायों के लिए गर्व का विषय:

दुनिया भर में बसे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग छठ को बहुत श्रद्धा से मनाते हैं. यूनेस्को की मान्यता उन्हें अतिरिक्त सांस्कृतिक आत्मविश्वास देगी. विदेशों में छठ-समारोह अधिक व्यवस्थित और मान्यता प्राप्त रूप में हो सकेंगे.

क्या बिहार का कोई स्थान या इमारत पहले से यूनेस्को की सूची में है?

हां, बिहार के कुछ बेहद महत्वपूर्ण स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में पहले से शामिल हैं. यह दिखाता है कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से कितना समृद्ध है.

बोधगया  एक:

महाबोधि मंदिर, बोधगया यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है. इसे साल 2002 में शामिल किया गया था. यही वह स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था. यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए विश्व का एक प्रमुख तीर्थस्थल है. मंदिर की स्थापत्य कला, शांति का वातावरण और ऐतिहासिक महत्व इसे वैश्विक स्तर पर अत्यंत विशिष्ट बनाते हैं. यूनेस्को सूची में शामिल होने के बाद यहां पर्यटन, संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहले से अधिक बढ़ा है.

नालंदा. दो:

नालंदा महाविहार (पुरातात्त्विक अवशेष): नालंदा का प्राचीन विश्वविद्यालय, जिसे नालंदा महाविहार कहा जाता है, भी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है. इसे साल 2016 में शामिल किया गया. यह प्राचीन काल में विश्व के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक था. यहां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन करने आते थे. आज नालंदा के खंडहर हमें उस गौरवशाली शैक्षिक परंपरा की याद दिलाते हैं, जो ज्ञान के मुक्त आदान-प्रदान पर आधारित थी. यूनेस्को दर्जा मिलने के बाद नालंदा के संरक्षण, व्यवस्थित खुदाई, संग्रहालय और पर्यटन सुविधाओं में सुधार हेतु लगातार काम हो रहा है.

यूनेस्को हेरिटेज लिस्ट और बिहार की छवि

महाबोधि मंदिर और नालंदा महाविहार के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल होने से बिहार की यह पहचान बनी है कि यह केवल एक पिछड़ा या प्रवासी-आधारित राज्य नहीं, बल्कि प्राचीन ज्ञान, अध्यात्म, बौद्ध धर्म, शिक्षा और संस्कृति का वैश्विक केन्द्र रहा है. यदि छठ पर्व भी यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल हो जाता है, तो यह बिहार की आधुनिक सांस्कृतिक पहचान को भी उतनी ही मजबूती से सामने रखेगा, जितनी ऐतिहासिक स्थल रखते हैं.

छठ और यूनेस्को, समाज के स्तर पर संभावित बदलाव

यदि छठ को यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया जाए, तो समाज में कुछ और सकारात्मक बदलाव भी देखे जा सकते हैं. छठ में जाति, वर्ग, धर्म, अमीरी-गरीबी का भेद कम हो सकता है. यूनेस्को की मान्यता के बाद यह पर्व समावेशी समाज का वैश्विक उदाहरण बन सकता है. महिलाओं की भूमिका पर नया विमर्श संभावित है. छठ में व्रत धारण करने वाली महिलाएँ परिवार और समाज के केन्द्र में रहती हैं. इस पर्व के अध्ययन से महिलाओं की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका पर नई सकारात्मक बहसें जन्म लेंगी. पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ सकती है. छठ का मूल भाव सूर्य, जल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है. यदि इसे वैश्विक मंच पर पर्यावरण-उन्मुख त्योहार के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो लोगों में नदियों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के प्रति अधिक जागरूकता पैदा होगी.

“Petrol Diesel Price: फटाफट से करवा लें टंकी फुल! हो गया पेट्रोल-डीजल सस्ता, जानें किन शहरों में घटे दाम”

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वीकेंड आ चुका है। अगर आप सैटरडे और संडे को कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं तो गाड़ी में तेल भरवाने से पहले आज के लेटेस्ट रेट्स ज़रूर देख लें। तेल विपणन कंपनियों ने आज 15 नवंबर 2025 के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतें जारी कर दी हैं।

देश के बड़े महानगरों नई दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आज कीमतों में कोई बदलाव नहीं आया है। हालांकि कई शहरों में दाम घटे हैं वहीं कुछ शहरों खासकर पटना में बड़ा उछाल देखने को मिला है।

क्यों घटते-बढ़ते हैं ईंधन के दाम?

तेल विपणन कंपनियां हर दिन सुबह 6 बजे ईंधन की कीमतों को अपडेट करती हैं। यह बदलाव वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और मुद्रा विनिमय दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव के अनुसार किया जाता है। कंपनियां पारदर्शिता बनाए रखने और उपभोक्ताओं को सटीक दरें सुनिश्चित करने के लिए रोज़ाना भाव जारी करती हैं।

आज पेट्रोल की कीमत (₹ प्रति लीटर)

यहां कल के मुकाबले पेट्रोल के दाम में हुए बदलाव दिए गए हैं:

शहर कीमत (₹/लीटर) बदलाव (₹ में)

नई दिल्ली 94.77 0.00

कोलकाता 105.41 0.00

मुंबई 103.50 0.00

चेन्नई 100.90 +0.10

गुड़गांव 95.36 -0.29 (सस्ता)

नोएडा 94.77 -0.10 (सस्ता)

बैंगलोर 102.92 0.00

भुवनेश्वर 100.94 -0.17 (सस्ता)

चंडीगढ़ 94.30 0.00

हैदराबाद 107.46 0.00

जयपुर 104.38 -0.34 (सस्ता)

लखनऊ 94.57 -0.16 (सस्ता)

पटना 106.11 +0.88 (महंगा)

तिरुवनंतपुरम 107.48 -0.01 (सस्ता)

आज डीजल की कीमत (₹ प्रति लीटर)

यहां कल के मुकाबले डीजल के दाम में हुए बदलाव दिए गए हैं:

शहर मत (₹की/लीटर) बदलाव (₹ में)

नई दिल्ली 87.67 0.00

कोलकाता 92.02 0.00

मुंबई 90.03 0.00

चेन्नई 92.48 +0.09

गुड़गांव 87.82 -0.28 (सस्ता)

नोएडा 87.89 -0.12 (सस्ता)

बैंगलोर 90.99 0.00

भुवनेश्वर 92.52 -0.17 (सस्ता)

चंडीगढ़ 82.45 0.00

हैदराबाद 95.70 0.00

जयपुर 89.90 -0.31 (सस्ता)

लखनऊ 87.67 -0.19 (सस्ता)

पटना 92.32 +0.83 (महंगा)

तिरुवनंतपुरम 96.48 0.00

“Earthquake: भारत के इस पड़ोसी देश में कांपी धरती, महसूस किए गए भूकंप के जोरदार झटके”

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भारत के पड़ोसी क्षेत्र तिब्बत (Tibet) में एक बार फिर भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं। राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान केंद्र (NCS) के अनुसार इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 4.1 दर्ज की गई है।

भूकंप की गहराई और पिछली घटना

भूकंप का केंद्र जमीन के काफी भीतर था जिससे सतह पर इसका प्रभाव हल्का रहा।

गहराई: NCS ने बताया कि भूकंप की गहराई जमीन के लगभग 60 किलोमीटर भीतर थी।

पिछला भूकंप: आपको बता दें कि तिब्बत में यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले भी 11 नवंबर को यहां भूकंप आया था जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 3.8 थी।

“यात्रीगण कृपया ध्यान दें! अगले सात दिन तक नहीं चलेंगी ये ट्रेनें, कहीं निकलने से पहले देखें पूरी लिस्ट”

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भारतीय रेलवे जो दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल व्यवस्था है अपने नेटवर्क को सुरक्षित और उन्नत बनाने के लिए लगातार काम कर रहा है। इसी कड़ी में शालीमार स्टेशन यार्ड में रीमॉडलिंग और ट्रैक अपग्रेड का महत्वपूर्ण कार्य चल रहा है जो 21 नवंबर तक चलेगा।

इस ज़रूरी काम के कारण चक्रधरपुर डिवीजन से गुजरने वाली लंबी दूरी की कई ट्रेनों के संचालन पर असर पड़ा है। रेलवे ने यात्रियों की सुविधा के लिए कैंसिल और डायवर्ट की गई ट्रेनों की अपडेटेड लिस्ट जारी की है। यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे स्टेशन पहुंचने से पहले अपनी ट्रेन का लेटेस्ट स्टेटस ऑनलाइन या हेल्पलाइन के माध्यम से ज़रूर चेक कर लें।

कैंसिल ट्रेनों की सूची (13 से 21 नवंबर तक)

नेटवर्क को सुरक्षित और तय समय पर काम पूरा करने के लिए रेलवे ने इन ट्रेनों को रद्द किया है:

ट्रेन नंबर ट्रेन का नाम रद्द होने की तारीखें

18030 शालीमार-मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस कुर्ला एक्सप्रेस 13 से 21 नवंबर तक

22830 शालीमार-भुज सुपरफास्ट एक्सप्रेस 15 नवंबर

22829 भुज – शालीमार सुपरफास्ट एक्सप्रेस 18 नवंबर

15022 गोरखपुर – शालीमार साप्ताहिक एक्सप्रेस 10 और 17 नवंबर

15021 शालीमार – गोरखपुर साप्ताहिक एक्सप्रेस 18 नवंबर

18029 मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस-शालीमार कुर्ला एक्सप्रेस 12 से 19 नवंबर तक

12151 मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस-शालीमार समरसता एक्सप्रेस 12, 13 और 19 नवंबर

12152 शालीमार-मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस समरसता एक्सप्रेस 14, 15 और 21 नवंबर

20971 उदयपुर सिटी-शालीमार सुपरफास्ट एक्सप्रेस 15 नवंबर

20972 शालीमार-उदयपुर सिटी सुपरफास्ट एक्सप्रेस 16 नवंबर

डायवर्ट/शॉर्ट टर्मिनेट की गई ट्रेनों की सूची

ट्रैक अपग्रेड के कारण कुछ ट्रेनों के रूट में भी बदलाव किया गया है। ये ट्रेनें शालीमार की जगह सांतरागाछी स्टेशन तक ही चलेंगी या वहीं से शुरू होंगी:

ट्रेन नंबर ट्रेन का नाम डायवर्ट/शॉर्ट टर्मिनेट की तारीखें रूट में बदलाव

18049 शालीमार – बदामपहाड़ साप्ताहिक एक्सप्रेस 15 और 22 नवंबर सांतरागाछी से बदामपहाड़ तक चलेगी।

18050 बदामपहाड़ – शालीमार साप्ताहिक एक्सप्रेस 16 और 23 नवंबर सांतरागाछी तक ही चलेगी।

12101 मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस – शालीमार ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस 18 नवंबर सांतरागाछी तक ही चलेगी।

12102 शालीमार – मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस 20 नवंबर सांतरागाछी से शुरू होगी।

12905 पोरबंदर – शालीमार सुपरफास्ट एक्सप्रेस 19 नवंबर सांतरागाछी तक ही जाएगी।

12906 शालीमार – पोरबंदर सुपरफास्ट एक्सप्रेस 21 नवंबर सांतरागाछी से शुरू होगी।

यात्रियों को सलाह दी जाती है कि किसी भी असुविधा से बचने के लिए वे यात्रा शुरू करने से पहले अपनी बुकिंग की स्थिति अवश्य जांच लें।

“बिहार में NDA की प्रचंड जीत के बाद कांग्रेस में हाहाकार! हार के बाद खड़गे के घर राहुल गांधी की मौजूदगी में शुरु हुई अहम बैठक”

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे सामने आने के बाद तस्वीर साफ हो चुकी है। बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिकगठबंधन (NDA) ने राज्य की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया है।

एनडीए ने 243 सीटों में से 202 सीटें जीतकर विपक्षी ‘महागठबंधन’ को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। इसी के साथ राज्य के सबसे लंबे समय तक सीएम रहे नीतीश कुमार रिकॉर्ड छठी बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं।

NDA की मिली शानदार जीत

इस चुनाव में विपक्ष का महागठबंधन अपने मजबूत गढ़ों में भी कोई खास असर नहीं दिखा पाया, यहाँ तक कि RJD अपनी पारंपरिक सीटों पर भी फीका पड़ गया। बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। नीतीश कुमार की JDU ने 85 सीटें हासिल कीं। गठबंधन के अन्य सहयोगी LJP(RV) को 19, HAM(S) को 5 और RLM को 4 सीटें मिलीं। इसके विपरीत महागठबंधन के खाते में सिर्फ 34 सीटें आईं। अन्य दलों में AIMIM ने सीमांचल क्षेत्र में 5 सीटें जीतीं, जबकि BSP और IIP ने एक-एक सीट पर जीत दर्ज की।

करारी हार के बाद कांग्रेस में मंथन शुरू

बिहार चुनाव में मिली करारी और चौंकाने वाली हार के बाद विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने तत्काल एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। यह बैठक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आधिकारिक आवास पर हो रही है। इस हाई-लेवल मीटिंग में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और वरिष्ठ नेता अजय माकन भी मौजूद हैं।

बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनाव परिणामों की गहन समीक्षा करना, पार्टी की संगठनात्मक कमजोरियों पर चर्चा करना और भविष्य की रणनीति तय करना है। कांग्रेस नेतृत्व बिहार में मिली हार के कारणों को समझने और आगे की दिशा तय करने में जुटा हुआ है।

“बिहार में प्रचंड जीत के बाद BJP का बड़ा कदम, वरिष्ठ नेता आरके सिंह को पार्टी से 6 साल के लिए निकाला”

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने संगठन में अनुशासन का कड़ा संदेश देने के लिए अहम कदम उठाया है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह को तत्काल प्रभाव से 6 साल के लिए अपनी प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने बिहार में प्रचंड बहुमत दर्ज किया है, लेकिन कुछ सीटों पर आंतरिक मतभेद और बागी उम्मीदवारों के कारण पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा।

पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप

बीजेपी सूत्रों का कहना है कि आरके सिंह के खिलाफ यह कार्रवाई उनके द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान और उसके आसपास पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की शिकायतों के आधार पर की गई है। आरोप है कि उन्होंने पार्टी उम्मीदवारों और गठबंधन के हितों के खिलाफ काम किया और सार्वजनिक मंचों पर ऐसे बयान दिए, जो संगठन और गठबंधन की छवि के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते थे।

अनुशासन का सख्त संदेश

बीजेपी के नेतृत्व ने इसे संगठनात्मक अनुशासन के उल्लंघन के रूप में लिया और इस कठोर कदम के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी के भीतर कोई भी नेता चुनावी रणनीति और संगठन के निर्णयों के खिलाफ कार्य नहीं कर सकता।

वरिष्ठ नेता पर गाज

आरके सिंह पार्टी के वरिष्ठ और प्रभावशाली चेहरों में से रहे हैं। केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। उनके निलंबन से यह संकेत मिलता है कि बीजेपी चुनाव परिणामों के बाद भी संगठनिक अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करेगी।

“Bihar Assembly Election Result 2025: जीते तो नहीं लेकिन, वोट जरूर काटे… किस-किस सीट पर प्रशांत किशोर की वजह से NDA को हुआ नुकसान?”

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने जबरदस्त प्रचार के साथ मैदान में उतरकर पूरे चुनाव को अलग ही माहौल दिया था. पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारते हुए दावा किया था कि जनता बदलाव के लिए तैयार है और जनसुराज निर्णायक भूमिका निभाएगी.

हालांकि, मतगणना के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने पार्टी की राजनीतिक ताकत को साफ कर दिया. नतीजों ने दिखा दिया कि भारी प्रचार का असर जमीन पर वोटों में नहीं बदल सका.

238 सीटों की लड़ाई में पार्टी को एक भी जीत नहीं मिली. सिर्फ मढ़ौरा में जनसुराज उम्मीदवार दूसरे नंबर पर आए, बाकी लगभग सभी क्षेत्रों में पार्टी तीसरे या चौथे पायदान पर सिमट गई. मतगणना में यह भी साफ हुआ कि कई जगहों पर पार्टी को उम्मीद से बेहतर वोट मिले, लेकिन वह किसी सीट को जीतने या गंभीर चुनौती देने के लिए पर्याप्त नहीं थे.

कुछ सीटों पर जनसुराज के वोट NDA की हार से कई गुना ज़्यादा

चुनावी नतीजों में एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि कई जगहों पर जनसुराज उम्मीदवारों को मिली वोट संख्या, NDA उम्मीदवार की हार के अंतर से बहुत अधिक थी. इस वजह से राजनीतिक हलकों में यह चर्चा गरम है कि अगर जनसुराज मैदान में न होती तो इन सीटों का परिणाम शायद अलग दिखता.

वे सात सीटें जहां जनसुराज के वोट बने बड़ा फैक्टर

नीचे उन 7 सीटों का विवरण दिया गया है जहां NDA बेहद कम अंतर से हारा, मगर जनसुराज को उससे कई गुना अधिक वोट मिले. यही सीटें चुनावी नतीजों की सबसे दिलचस्प कहानी बन गईं.

ढाका – NDA सिर्फ 178 वोटों से हारा, जनसुराज को 8,347 वोट

जहानाबाद – अंतर 793, जनसुराज को 5,760 वोट

मखदुमपुर – अंतर 1,830, जनसुराज को 4,803 वोट

टिकारी – अंतर 2,058, जनसुराज को 2,552 वोट

गोह – अंतर 4,041, जनसुराज को 7,996 वोट

बोधगया – अंतर 881, जनसुराज को 4,024 वोट

चनपटिया – अंतर 602, जनसुराज को 37,172 वोट

चनपटिया बना सबसे बड़ा उदाहरण

चनपटिया में जनसुराज प्रत्याशी मनीष कश्यप ने 37,172 वोट हासिल किए, जबकि NDA उम्मीदवार सिर्फ 602 वोटों से चुनाव हार गया. यही वजह है कि यह सीट पूरे चुनाव की सबसे ज्यादा चर्चित सीट बन गई.

आंकड़ों में जनसुराज की पूरी तस्वीर

जनसुराज पार्टी ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा,लेकिन कोई भी सीट जीत में नहीं बदल सकी. मढ़ौरा में नवीन कुमार सिंह दूसरे नंबर पर रहे, लेकिन RJD उम्मीदवार से उन्हें लगभग 27 हज़ार वोटों से हार का सामना करना पड़ा. बाकी सभी क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन साधारण रहा और उसे तीसरी-चौथी स्थिति से ऊपर नहीं पहुंच पाया.

“रायपुर में बना देश का पहला AI आधारित जनजातीय संग्रहालय, 3 दिन में 8,000 लोग पहुंचे देखने”

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रायपुर के आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में अंग्रेजी हुकुमत काल के दौरान जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बने शहीद वीर नारायण सिंह जनजातीय संग्रहालय लोगों के लिए प्रेरणा और आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है.

स्कूलों और कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के साथ ही बड़ी तादात में आम लोग संग्रहालय को देखने पहुंच रहे हैं.

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव रजत जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक नवम्बर को इस भव्य संग्रहालय को लोगों के लिए समर्पित किया गया था. आम लोगों के लिए 4 नवम्बर से शुरू हुए इस शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक सह-जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय का महज 2-3 दिनों में ही 8 हजार से अधिक लोगों ने अवलोकन किया.

और ऑडियो विसुअल की मदद से दे रहे जानकारी

नया रायपुर का शहीद वुर नायरायन सिंह जनजातीय संग्रहालय देश का पहला अत्याधुनिक सग्रहालय है. जिसमें AI जनरेटेड ऑडियो विसुअल और एनिमेशन के जरिये वीर स्वतंत्रता सेनानी की अमर गाथा लोगों तक पहुचाई जा रही है. आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि छत्तीसगढ़ में जनजातीय वर्गों के ऐतिहासिक गौरव गाथा, शौर्य और बलिदान का प्रतीक शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक सह-जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों उद्घाटन होना गौरव की बात है.

उन्होंने कहा कि काफी संख्या में लोग संग्रहालय देखने आ रहे हैं, इससे संग्रहालय बनाने का उद्देश्य सार्थक हो रहा है. इस संग्रहालय के शुरू होने से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने लगा है. सोनवनी बोरा ने कहा कि संग्रहालय का धरातल में आने से नई पीढ़ियों को अपने पुरखों का याद दिलाता रहेगा. यह न सिर्फ जनजातीय वर्गों के लिए बल्कि सभी लोगों के लिए प्रेरणाप्रद है.

आदि वाणी एक AI-संचालित अनुवाद उपकरण है जो भारत की जनजाति विरासत को संरक्षित करते हुए भाषा के अंतर को खत्म करता है/ यह हिंदी, अंग्रेजी और जनजाति भाषाओं (मुंडारी, भीली, गोंडी, संथाली, गारो, कुई) के बीच वास्तविक समय में टेक्स्ट और भाषण अनुवाद करता है, जिससे देशी भाषाओं में जानकारी तक पहुँच संभव होती है और लोककथाओं, मौखिक परंपराओं और सांस्कृतिक ज्ञान को डिजिटाइज़ करने और संरक्षित करने में मदद मिलती है.

जनजाति डिजिटल दस्तावेज़ भारत सरकार की आर्काइव पर उपलब्ध है, जो भारत में जनजातियों से संबंधित दस्तावेज़ों का एक खोज योग्य डिजिटल भंडार है.

देश भर में संग्रहालयों का हो रहा निर्माण

मोदी सरकार ने जनजाति संस्कृति और विरासत के संवर्धन और संरक्षण के लिए लगातार कई पहल की हैं. स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अमूल्य योगदान को सामने लाने के लिए, 11 जनजाति स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय विकसित किए जा रहे हैं. इनमें से चार का उद्घाटन अब तक हो चुका है, जो रांची (झारखंड), छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश), जबलपुर (मध्य प्रदेश) और रायपुर (छत्तीसगढ़) में हैं—जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने 1 नवंबर को किया था.

शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक एवं जनजाति स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय छत्तीसगढ़ के जनजाति प्रतिरोध की कहानी को अलग अलग गैलरियों की एक सीरीज़ के जरिये प्रस्तुत करता है.

स्वतंत्रता संग्राम में जनजातियों की प्रमुख क्रांति

इसमें हलबा क्रांति, सरगुजा क्रांति, भोपालपट्टनम क्रांति, परलकोट क्रांति, तारापुर क्रांति, मेरिया क्रांति, कोई क्रांति, लिंगागिरी क्रांति, मुरिया क्रांति, और गुंडाधुर एवं लाल कालिन्द्रा सिंह के नेतृत्व में हुई प्रतिष्ठित भूमकाल क्रांति जैसे प्रमुख विद्रोह शामिल हैं.

महिलाओं का प्रतिरोध: यह रानी चो-रिस क्रांति (1878) को उजागर करता है—जो महिलाओं के नेतृत्व वाला एक अग्रणी विरोध प्रदर्शन था.

शहीद वीर नारायण सिंह और 1857 का विद्रोह ब्रिटिश अत्याचार के विरुद्ध उनके प्रतिरोध और उनकी शहादत का वर्णन करता है.

झंडा सत्याग्रह और जंगल सत्याग्रह: महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों में जनजाति भागीदारी को दर्शाता है. संग्रहालय आगंतुकों को एक इंटरैक्टिव और गहन अनुभव प्रदान करता है. अपनी 650 मूर्तियों, डिजिटल कहानी-कथन, और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के माध्यम से, यह भारत की जनजाति विरासत के गुमनाम नायकों का सम्मान करते हुए, सीखने और प्रेरणा के लिए एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में कार्य करता है.

जनजाति इतिहास और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार के अन्य प्रयास

आदि संस्कृति परियोजना जनजाति कला रूपों के लिए एक डिजिटल शिक्षण मंच है, जो विविध जनजाति कला रूपों पर लगभग 100 गहन पाठ्यक्रम प्रदान करता है, साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक जनजाति विरासत पर लगभग 5,000 क्यूरेटेड दस्तावेज़ भी उपलब्ध कराता है.

कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के शहीद वीर नारायण सिंह जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में गौरवशाली इतिहास के साथ साथ जनजातियों की परंपरा और संस्कृति की पूरी जानकारी देश और दुनिया के लोगों के लिए सँजोई गई है. जिसमें जनजाति उपचारकर्ताओं और औषधीय पौधों द्वारा स्वदेशी प्रथाओं, आदिवासी भाषाओं, कृषि प्रणाली, नृत्य और चित्रकला का अनुसंधान और दस्तावेज़ीकरण, साहित्यिक उत्सवों का आयोजन, जनजाति लेखकों द्वारा लिखित पुस्तकों का प्रकाशन, अनुवाद कार्य और साहित्य प्रतियोगिताओं आदि भी किए जा रहे हैं. जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास के रूबरू हो सके.